मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
दूसरा अध्याय ।
अथ द्वितीयोऽध्यायः ।
विद्वद्भिः सेवितः सद्भिर्नित्यमद्वेषरागिभिः ।
हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तन्निबोधत ॥ १ ॥
कामात्मता न प्रशस्ता न चैवेहास्त्यकामता ।
काम्यो हि वेदाधिगमः कर्मयोगश्च वैदिकः ॥ २ ॥
दूसरा अध्याय ।
धर्म का लक्षण ।
अब धर्म का सामान्य लक्षण कहते हैं-वेदविशारद, धार्मिक,
राग द्वेष से रहित, महात्माओं ने जिस धर्म का पालन किया और
हृदय से स्वीकार किया उस को सुनो । पुरुष को कामफल का
अभिलाषी होना अच्छा नहीं है और न बिल्कुल इच्छा का त्याग
ही श्रेष्ठ है। क्योंकि बिना इच्छा, वेदाध्ययन और वैदिक कर्मों का
अनुष्ठान नहीं होसकता ॥ १-२ ॥
सङ्कल्पमूलः कामो वै यज्ञाः संकल्पसम्भवाः ।
व्रता नियमधर्माश्च सर्वे सङ्कल्पजाः स्मृताः ॥ ३ ॥
अकामस्य क्रिया काचिद्दृश्यते नेह कर्हिचित् ।
यद्यद्धि कुरुते किंचित् तत्तत्कामस्य चेष्टितम् ॥ ४ ॥
तेषु सम्यग्वर्तमानो गच्छत्यमरलोकताम् ।
यथा सङ्कल्पितांश्चेह सर्वान् कामान् समश्नुते ॥ ५ ॥
इस कर्म से यह इष्टफल होगा-यही संकल्प है । इसलिए सब
कामों का मूल संकल्प है। यज्ञादि सब संकल्प से ही होते हैं।
व्रत, नियम, धर्म सब संकल्प से किये जाते हैं अर्थात् बिना संकल्प
२४ मनुस्मृति ।
कुछ नहीं होसकता । संसार में कोई कर्म बिना इच्छा के होते नहीं
देखा गया । शास्त्रोक्त कर्मों का भलीभांति अनुष्ठान करने से स्वर्ग-
लोक की प्राप्ति और इष्टकाम पूरे होते हैं ॥ ३-५ ॥
वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् ।
आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥ ६ ॥
संपूर्ण वेद, धर्ममूल हैं-वेदवेत्ताओं की स्मृति और शील-
ब्रह्मज्ञता, साधु पुरुषों का आचार, और आत्म-सन्तोष ये धर्म
में प्रमाण माने जाते हैं ॥ ६ ॥
यः कश्चित्कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः ।
स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ॥ ७ ॥
सर्वं तु समवेक्ष्येदं निखिलं ज्ञानचक्षुषा ।
श्रुतिप्रामाण्यतो विद्वान् स्वधर्मे निविशेत वै ॥ ८ ॥
श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिष्ठन् हि मानवः ।
इह कीर्तिमवाप्नोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम् ॥ ६ ॥
जिस वर्ण का जो धर्म मनु ने कहा है, वह सब वेदोक्त है । वेद
संपूर्ण ज्ञान का भण्डार है । विद्वान्, ज्ञानदृष्टिसे, वेदप्रमाण द्वारा
धर्मशास्त्र को जानकर, अपने धर्म में श्रद्धा करे । जो पुरुष, वेद
और स्मृतियों में कहे धर्मों का पालन करताहै, वह संसार में कीर्ति
पाकर, परलोक में अक्षय सुख पाता है ॥ ७-६ ॥
श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः ।
ते सर्वार्थेष्वमीमांस्ये ताभ्यां धर्मो हि निर्बभौ ॥ १०॥
योऽवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयाद्विजः ।
स साधुभिर्बहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः ॥ ११ ॥
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः ।
एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ॥ १२ ॥