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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

आठवां अध्याय । २७५

आठवां अध्याय । २७५
गया हो और ऋण का द्रव्य कुटुम्ब में लगाया हो तो उसके
बान्धव मिले या जुदे हों पर अपने धन से ऋण देवें । कोई
अधीन पुरुष भी स्वामी के कुटुम्ब के लिए देश या परदेश में
लेन-देन करले तो स्वामी उसको कबूल करलेवे, इन्कार
न करे ॥ १६५-१६७ ॥
बलाद्दत्तं बलाद्भुक्तं बलाद्यच्चापि लेखितम् ।
सर्व्वान् बलकृतानर्थानकृतान् मनुरब्रवीत् ॥ १६८ ॥
त्रयः परार्थे क्लिश्यन्ति साक्षिणः प्रतिभूः कुलम् ।
चत्वारस्तूपचीयन्ते विप्र आढ्यो वणिङ्नृपः ॥ १६६ ॥
अनादेयं नाददीत परिक्षीणोऽपि पार्थिवः ।
न चादेयं समृद्धोऽपि सूक्ष्ममप्यर्थमुत्सृजेत् ॥ १७०॥
अनादेयस्य चादानादादेयस्य च वर्जनात् ।
दौर्बल्यं ख्याप्यते राज्ञः स प्रेत्येह च नश्यति ॥ १७१ ॥
स्वादानाद्वर्णसंसर्गात्स्वबलानां च रक्षणात् ।
बलं संजायते राज्ञः स प्रेत्येह च वर्धते ॥ १७२ ॥
बलात्कार से दिया, बलात्कार से भोग किया, कुछ लिखाया या
कुछ किसी से कराया न किये के समान मनुजी ने कहा है । तीन
दूसरे के लिए दुःख पाते हैं—साक्षी, ज़ामिन और ऋणी के
कुटुम्बी । और चार दूसरे के कारण बढ़ते हैं—ब्राह्मण, धनी,
बनिया और राजा । राजा निर्धन होकर भी अनुचित धन आदि
न लेवे और धनी होकर भी लेने योग्य धन थोड़ा भी न छोड़े ।
न लेने लायक़ वस्तु को लेने और लेने लायक़ को छोड़ने से राजा
का ढीलापन ज़ाहिर होता है। और अपयश पाकर नष्ट होजाता
है। उचित धन लेने से प्रजाओं को वर्णसंकर न होने देने से
और दुर्बलों की रक्षा करने से राजा को बल प्राप्त होता है। और
लोक-परलोक में सुख भोगता है ॥ १६८-१७२ ॥

२७६ मनुस्मृति ।
तस्माद्यम इव स्वामी स्वयं हित्वा प्रियाप्रिये ।
वर्तेत याम्यया वृत्त्या जितक्रोधो जितेन्द्रियः ॥ १७३ ॥
यस्त्वधर्मेण कार्याणि मोहात्कुर्यान्नराधिपः ।
अचिरात्तं दुरात्मानं वशे कुर्वन्ति शत्रवः ॥ १७४ ॥
कामक्रोधौ तु संयम्य योऽर्थान् धर्मेण पश्यति ।
प्रजास्तमनुवर्तन्ते समुद्रमिव सिन्धवः ॥ १७५ ॥
इसलिए राजा यमराज के समान अपना प्रिय और अप्रिय
छोड़कर क्रोध और इन्द्रियों को वश में करके, समभाव प्रजापर
रक्खे। जो राजा मूर्खता से अधर्म के कार्य करता है, उस दुष्ट
को शत्रु शीघ्रही वश में कर लेते हैं। परन्तु जो काम, क्रोध को
वश में करके, धर्म से कार्यों को देखता है, उसकी प्रजा समुद्र के
नदियों की भांति अनुगामिनी होती हैं ॥ १७३-१७५ ॥
यः साधयन्तं छन्देन वेदयेद्धनिकं नृपे ।
स राज्ञा तच्चतुर्भागं दाप्यस्तस्य च तद्धनम् ॥ १७६ ॥
कर्मणापि समं कुर्याद्धनिकायाधमर्णिकः ।
समोऽवकृष्टजातिस्तु दद्याच्छ्रेयांस्तु तच्छनैः ॥ १७७ ॥
अनेन विधिना राजा मिथो विवदतां नृणाम् ।
साक्षिप्रत्ययसिद्धानि कार्याणि समतां नयेत् ॥ १७८ ॥
यदि ऋणी (अपने को राजप्रिय मानकर) राजा से कहे कि
धनी ज़बरदस्ती ऋण वसूल करता है तोभी राजा उसका धन
दिलावे और ऋणीपर ऋण का चौथाई दण्ड करे। समानजाति
वा हीनजाति कर्ज़दार, महाजन का धन उसके यहां काम करके
चुका दे और महाजन से ऊंची जाति का ऋणी धीरे धीरे अदा
करदेवे। इसभांति राजा आपस में झगड़ा करनेवालों का निर्णय
साक्षी, लेख आदि के आधार से करे ॥ १७६-१७८ ॥