मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
.............इत्यादि । (बृहद्ब्रह्मसंहिता चतुर्थपाद)
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भूमिका । ६७
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लक्ष्मीनारायणं तत्र बुद्ध्या ध्यायन्ति नित्यशः ॥ १३५ ॥'
.............इत्यादि । (बृहद्ब्रह्मसंहिता चतुर्थपाद)
'अशुचिर्वाप्यनाचारी महापापयुतोऽपि हि ।
पुण्ड्रसंधारणादेव निर्भयत्वं प्रपद्यते ॥ ५६ ॥
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रा म्लेच्छा वान्त्यजजातयः ।
ऊर्ध्वपुण्ड्रधराः सर्वे नमस्या देवता इव ॥ ५७ ॥'
.............इत्यादि । (बृहद्ब्रह्मसंहितासुदर्शनगीता.)
उक्त ऊर्ध्वपुण्ड्र से पूर्णरीत्या सहमत श्रीरामानुजाचार्य के
अनुयायियों को छोड़कर अन्यसंप्रदायी वैष्णव भी नहीं हैं
और ऊर्ध्वपुण्ड्र के विषय में निर्णयसिन्धु आदि ग्रन्थों में भी
अनेकानेक संकीर्ण वाक्य प्राप्त होते हैं जिनका निर्णय अल्प-
साधन से दुःशक है । वैष्णव चार संप्रदायों के जो चार
आचार्य हुए हैं उनमें श्रीरामानुजस्वामी भारी विद्वान् हुए,
आप जिस संप्रदाय में दीक्षित हुए उसके प्रथमाचार्य
श्रीशठकोप शूद्रजातीय थे, यह वृत्त श्रीनिवासाचार्यकृत
दिव्यसूरिचरित्र नामक ग्रन्थ के चौथे सर्ग से ज्ञात होता है
और उनके विषय में-
'विचक्षणो विश्वविमोहहेतुः
कुलोचिताचारकलानुपक्तः ।
पुण्ये महीसारपुरे विधाय
विक्रीय शूर्पं विचचार योगी ॥'
यह श्लोक भी सुप्रसिद्ध है ।
आधुनिक वैष्णवों का शैवों के साथ द्वेष क्यों जब
शैव, विष्णु को पूज्यतम मानते हैं, और तुलसी आदिका
१ यहां शैवशब्द से स्मार्त उपासकमात्र का ग्रहण है ।
· ६८ मनुस्मृति ।
शिवपूजन में उपयोग करते हैं, विष्णुचरणामृत तथा एकादशी-
जन्माष्टमीव्रत से पराङ्मुख नहीं हैं, इस दशा में पूर्वापर
विचार से यही ज्ञात होता है कि जब श्रीशठकोप आदि
शूद्राचार्य के संप्रदाय में श्रीरामानुज आदि ब्राह्मण व्यक्ति
दैववशात् प्रवृत्त हुए और ये लोग अपने ब्राह्मणसमाज में
शूद्राचार्यक होने के कारण हीनदृष्टि से व्यवहृत हुए तब
कुपित होकर इन लोगों ने अपने संप्रदाय के प्रतिष्ठार्थ अनेक
ग्रन्थ और वाक्य बनाये तथा श्रुति-स्मृति को गौरवार्थ ढाल
बनाया । जो अन्य वैष्णव भी इनके आचार से सहमत हुए वे
भी इन लोगों की तरह शैवद्वेषी हुए । बाक़ी संप्रदायी वैष्णव
भी शैवद्वेषी न हुए । जैसे वल्लभ-संप्रदायी वैष्णव लोग.... ।
'परमेश्वरैक्य' प्रकरण में पञ्च देवताओं का ऐक्य अनेक
प्रकार से सिद्ध होचुका है । अब विष्णु और शिव के कति-
पय घनिष्ठ संबन्धों को दिखलाते हैं-जब शिव, विष्णुपदी
(गङ्गा) को धारण करते हैं और विष्णु, शिवकृपा से प्राप्त
चक्र (सुदर्शन) को धारण करते हैं तथा विष्णु-शिव मिल-
कर हरिहर (हरिहरावतार) बने; तब उपास्यों के ऐसे
हिलमिल बर्ताव में उपासकों का अनमिल बर्ताव क्यों ? और
१ 'गाङ्गं वारि मनोहारि मुरारिचरणच्युतम् । त्रिपुरारिशिरश्चारि पापहारि
पुनातु माम् ॥'
२ 'हरिस्ते साहस्त्रं कमलवलिमाधाय पदयोर्यदेकोने तस्मिन्निजमुदहरन्नेत्रकमलम् ।
गतोभक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषा त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्त्ति जगताम् ॥'
३ अर्धे दानववैरिणा गिरिजयाप्यर्धे शिवस्याहृतं देवेत्थं जगतीतले स्मरहराभावे
समुन्मीलति । गङ्गासागरमम्बरं शशिकला नागाधिपः क्ष्मातलं सर्वज्ञत्वमधीश्वरत्वमगमत्त्वां
मां च भिक्षाटनम् ॥'
भूमिका । ६६
विष्णुने रामरूप से रामेश्वर ( लिङ्ग ) की स्थापना की तथा
कृष्णरूप से पुत्रार्थ शिव की तपस्या की, ये बातें रामायण
और भारत आदि में विख्यात हैं । और देखिये शिवकी
दिव्यमूर्ति की यह महिमा लिखी है-
' तवैश्वर्यं यत्नाद् यदुपरि विरञ्चिर्हरिरधः
परिच्छेत्तुं यातावन्नलमनलस्कन्धवपुषः ।
ततो भक्तिश्रद्धाभरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश य-
त्स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति ॥ १ ॥
और देखिये इतिहास-पुराणधुरन्धर रोमहर्षण ( सूत )
का नैमिषीय ऋषियों के प्रति यह वचन है-
' विष्णुर्विश्वजगन्नाथो विश्वेशस्य शिवस्य तु ।
आज्ञया परया युक्तो व्यासो जज्ञे गुरुर्मम ॥ '
( सूतसंहिता माहात्म्यखण्डे १ अध्या० ४२ श्लो० )
इत्यादि अनेकानेक प्रमाणों से विशिष्टाद्वैतवाद के
अनुसार विष्णु शिव के मूर्तिभेद मानने पर भी उनका परस्पर
पूज्य-पूजक वा ध्यातृ-ध्येय भाव के निर्बाध होने से जगत् की
एक स्वामिकता में विरोध नहीं है ।
और जो स्मृति-पुराण-महर्षियों को गुण विभाग से विभक्त
मानते हैं, तथा विष्णु के अतिरिक्त शिवादि मोक्ष को नहीं
दे सकते-इत्यादि गीत गाया करते हैं; वे सब बातें वास्तविक
विचार से विरुद्ध हैं । यह मात्स्य वचन है-
' यस्मिन् कल्पे च यत्प्रोक्तं पुराणं ब्रह्मणा पुरा ।
तस्य तस्य च माहात्म्यं तत्स्वरूपेण वर्ण्यते ॥
अग्नेः शिवस्य माहात्म्यं तामसेषु प्रकीर्तितम् ।
राजसेषु च कल्पेषु माहात्म्यं ब्रह्मणो विदुः ॥
१०० मनुस्मृति ।
संकीर्णेषु सरस्वत्या पितॄणां च निगद्यते ।
सात्त्विकेषु च कल्पेषु माहात्म्यमधिकं हरेः ॥
तेष्वेव योगसंसिद्धा गच्छन्ति परमां गतिम् ॥ '
यह स्मृतिविभाग है-
' मानवी याज्ञवल्की च आत्रेयी दाक्षिणी तथा ।
कात्यायनी वैष्णवी च राजसी स्वर्गदा स्मृतिः ॥
शाङ्खी चौशनसी देवि तामसी नियमप्रदा ।'
यह पुराणविभाग है-
"वैष्णवं नारदीयं च तथा भागवतं शुभम् ।
गारुडं च तथा पाद्मं वाराहं शुभदर्शनम् ॥
षडेतानि पुराणानि सात्त्विकानि मतानि मे ।"
ब्रह्माण्डं ब्रह्मवैवर्तं मार्कण्डेयं तथैव च ।
भविष्यद् वामनं ब्राह्मं राजसानि मतानि मे ॥'
'मात्स्यं कौर्मं तथा लैङ्गं शैवं स्कान्दं तथैव च ।
आग्नेयं च षडेतानि तामसानि मतानि मे ॥'
यह महर्षिविभाग है-
' कणादं गौतमं शक्तिमुपमन्युं च जैमिनिम् ।
कपिलं चैव दुर्वासं मृकण्डुं च बृहस्पतिम् ॥
भार्गवं जमदग्निं च दशैतांस्तामसानृषीन् ।'
यह मोक्षहेतु है-
' पश्यत्येनं जायमानं ब्रह्मा रुद्रोऽथवा पुनः ।
रजसा तमसा चैव मानसं समभिप्लुतम् ॥
जायमानं हि पुरुषं यं पश्येन्मधुसूदनः ।
सात्त्विकः स तु विज्ञेयः स वै मोक्षार्थचिन्तकः ॥'
यहां ये सब वाक्य सात्त्विक गुण के अभिप्राय से आपाततः
भूमिका।
विष्णु में समन्वित किये गये हैं पर इन वाक्यों की सुप्रसिद्ध
वर्णाश्रम व्यवस्थापक ग्रन्थों के साथ एकवाक्यता होनी
असंभव है।
मन्वादि-शास्त्रानुसार कल्प ( ब्रह्मदिन ) कृत, त्रेता,
द्वापर, कलि तथा मन्वन्तरसंज्ञक कालविभाग से विभक्त
माना गया है; और कृतादि विभाग के अनुसार ही धर्म, ज्ञान,
वैराग्य, ऐश्वर्यात्मक सात्त्विक भाव पादक्रम से न्यून कहागया
है; और एक गुणोपाधिक कार्य ब्रह्म की उपासना कहीं नहीं
है, किन्तु सर्वगुणोपाधिक कारण ब्रह्मही की उपासना सर्वत्र
कही है; अत एव उनके सर्वगुणमय चरित्र इतिहास-पुराणों
में जगमगा रहे हैं; और एककर्तृक लोकव्यवस्था मानने में
एकत्रही राजस, सात्त्विक, तामस गुणों का उपसंहार है,
वासनाभेद से वह ( अधिष्ठान ) चाहे राम-कृष्ण नाम से
उपास्य हो वा विष्णु-शिव नाम से उपास्य हो; और उपास्य-
प्राप्ति ( मोक्ष ) भक्ति-ज्ञान से है, भक्ति-ज्ञान की उत्पत्ति
अन्तःकरण शुद्धि से कही है; ऐसी दशा में व्युत्थान काल में
वर्णाश्रममर्यादा के बांधनेवाले मन्वादि तथा ज्ञाननिष्ठ
कपिलादि, काल्पनिक सात्त्विक-राजस-तामस कल्प ( कोटि )
से क्यों घसीटे जाते हैं ? और यह खैंचातानी भगवान् वेद-
पुरुष तक क्या नहीं पहुँची ? अवश्य पहुँच कर उनको ढीला
करदिया ।
काल की दशा-
‘ भिन्ना व्याकृतिदण्डनेन शतधा वेदोऽर्थतः पाठ्यते
तत्पोष्याः स्मृतयोऽवसन्नमनसोऽङ्गाङ्गात्समुद्धाम्यता'