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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

बारहवां अध्याय। ४५७

बारहवां अध्याय। ४५७
ये कर्म ब्राह्मणों को परम-हितकारी हैं। इन सब शुभकर्मों में भी
पुरुष का, अधिक कल्याण करनेवाला कर्म-आत्मज्ञान है। वह
सब विद्याओं में श्रेष्ठ है और उससे मोक्ष मिलता है। इन ऊपर
कहे छः कर्मों में लोक-परलोक दोनों में अधिक कल्याणकारी
वैदिक कर्म है ॥ ७६-८६ ॥
वैदिके कर्मयोगे तु सर्वाण्येतान्यशेषतः ।
अन्तर्भवन्ति क्रमशस्तस्मिंस्तस्मिन् क्रियाविधौ ॥८७॥
सुखाभ्युदयिकं चैव नैःश्रेयसिकमेव च ।
प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्विविधं कर्म वैदिकम् ॥ ८८ ॥
इह चामुत्र वा काम्यं प्रवृत्तं कर्म कीर्त्यते ।
निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमुपदिश्यते ॥ ८६ ॥
प्रवृत्तं कर्म संसेव्य देवानामेति साम्यताम् ।
निवृत्तं सेवमानस्तु भूतान्यत्येति पञ्च वै ॥ ६० ॥
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
समं पश्यन्नात्मयाजी स्वाराज्यमधिगच्छति ॥ ६१ ॥
यथोक्तान्यपि कर्माणि परिहाय द्विजोत्तमः ।
आत्मज्ञाने शमे च स्याद्वेदाभ्यासे च यत्नवान् ॥ ६२॥
एतद्धि जन्मसाफल्यं ब्राह्मणस्य विशेषतः।
प्राप्यैतत्कृतकृत्यो हि द्विजो भवति नान्यथा ॥ ६३ ॥
पितृदेवमनुष्याणां वेदश्चक्षुः सनातनम् ।
अशक्यं चाप्रमेयं च वेदशास्त्रमिति स्थितिः ॥ ६४॥
वैदिक कर्मों में ऊपर कही सब क्रियाओं का अन्तर्भाव होता
है। स्वर्गादि सुख और अभ्युदय करनेवाला प्रवृत्ति कर्म और
५८

४५८ मनुस्मृति ।
मोक्ष देनेवाला आत्मज्ञानरूप निवृत्त कर्म ये दो प्रकार के वै-
दिक कर्म होते हैं। इसलोक के और परलोक के सुख की कामना
से किया हुआ कर्म प्रवृत्त और निष्काम आत्मज्ञानार्थ किया कर्म
निवृत्त कहलाता है। प्रवृत्त कर्म के करने से देवताओं की समता
को और निवृत्त कर्म करने से पञ्चभूतों को उलांघ कर मोक्ष
पाता है। सब भूतों में आत्मा को और आत्मा में सब भूतों
को समान देखनेवाला आत्मयाजी मोक्ष को पाता है। द्विज
शास्त्रोक्त कर्मों को भी न कर सके तो ब्रह्मध्यान, इन्द्रियनिग्रह और
वेदाभ्यास ही करे। इन्हीं आचरणों से ही विशेषकर ब्राह्मण के जन्म
की सफलता है। द्विज आत्मज्ञान को पाकर ही कृतार्थ होता है,
अन्यथा नहीं। पितर, देवता और मनुष्यों के धर्म का मार्ग दिखाने
वाला वेद ही नेत्र है। वह मीमांसा आदि शास्त्रों के विचार विना
जानने में अशक्य है और अनन्तहै। यही मर्यादा है ॥८७-९४॥
या वेदबाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः ।
सर्वास्ता निष्फलाःप्रेत्य तमोनिष्ठा हि ताःस्मृताः॥६५॥
उत्पद्यन्ते व्ययन्ते च यान्यतोऽन्यानि कानिचित् ।
तान्यर्वाक्कालिकतया निष्फलान्यनृतानि च ॥ ९६ ॥
चातुर्वर्ण्यं त्रयो लोकाश्चत्वारश्चाश्रमाः पृथक् ।
भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात्प्रसिद्ध्यति ॥ ९७ ॥
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः ।
वेदादेव प्रसूयन्ते प्रसूतिगुणकर्मतः ॥ ६८ ॥
बिभर्त्ति सर्वभूतानि वेदशास्त्रं सनातनम् ।
तस्मादेतत्परं मन्ये यज्जन्तोरस्य साधनम् ॥ ६६ ॥
सेनापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च ।
सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्रविदर्हति ॥ १०० ॥