मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
आठवां अध्याय । २८६
आठवां अध्याय । २८६
अश्मनोऽस्थीनि गोवालांस्तुषान्भस्मकपालिकाः ।
करीषमिष्टकाङ्गारान्छर्करा बालुकास्तथा ॥ २५० ॥
यानि चैवंप्रकाराणि कालान्भूमिर्न भक्षयेत् ।
तानि संधिषु सीमायामप्रकाशानि कारयेत् ॥ २५१ ॥
एतैर्लिङ्गैर्नयेत्सीमां राजा विवदमानयोः ।
पूर्वभुक्त्या च सततमुदकस्यागमेन च ॥ २५२ ॥
गुल्म, बांस, शमी, लता, रामशर, कुब्जक की वेल वगैरह लगावे
तो सीमा नहीं बिगड़ती । तालाब, कुआं, बावली, झरना, देवम-
न्दिर सीमा के मेल पर बनवावे । सीमा के लिए लोक में प्रायः
झगड़ा हुआ करता है इसलिए उसके जानने के लिए छिपा चिह्न
भी कर रक्खे । पत्थर, हड्डी, गौके बाल, भूसी, राख, ठीकरा, सूखा
गोबर, ईंट, कोयला, रोड़ा, रेता आदि वस्तुओंको जो बहुत दिनों
तक ज़मीन में छिपजाने लायक न हों उनको सीमाके नीचे रखदेवे।
राजा इन चिह्नों से पुराने भोग से, नदी आदि जल मार्ग से,
सीमा निर्णय करे ॥ २४७-२५२ ॥
यदि संशय एव स्याल्लिङ्गानामपि दर्शने ।
साक्षिप्रत्यय एव स्यात्सीमावादविनिर्णयः ॥ २५३ ॥
ग्रामीणककुलानां च समक्षं सीम्नि साक्षिणः ।
प्रष्टव्याः सीमलिङ्गानि तयोश्चैव विवादिनोः ॥ २५४ ॥
चिह्नों के देखने पर भी अगर कोई संदेह हो तो साक्षी-गवाहों
के विश्वास पर निर्णय होगा । वादी, प्रतिवादी, गांवके कुलीन
पंचों के सामने सब बातें पूंछे और फ़ैसला करे ॥ २५३-२५४ ॥
ते पृष्टास्तु यथा ब्रूयुः समस्ताः सीम्नि निश्चयम् ।
निबध्नीयात्तथा सीमां सर्वांस्तांश्चैव नामतः ॥ २५५ ॥
३७
२६० मनुस्मृति ।
शिरोभिस्ते गृहीत्वोर्वीं स्रग्विणो रक्तवाससः ।
सुकृतैः शापिताः स्वैः स्वैर्नयेयुस्ते समञ्जसम् ॥ २५६ ॥
यथोक्तेन नयन्तस्ते पूयन्ते सत्यसाक्षिणः ।
विपरीतं नयन्तस्तु दाप्याः स्युर्द्विशतं दमम् ॥ २५७ ॥
साक्ष्याभावे तु चत्वारो ग्रामाः सामन्तवासिनः ।
सीमाविनिर्णयं कुर्युः प्रयता राजसन्निधौ ॥ २५८ ॥
सामन्तानामभावे तु मौलानां सीम्नि साक्षिणाम् ।
इमानप्यनुयुञ्जीत पुरुषान्वनगोचरान् ॥ २५६ ॥
व्याधाञ्छाकुनिकान्गोपान्कैवर्तान्मूलखानकान् ।
व्यालग्रहानुञ्छवृत्तीनन्यॉंश्च वनचारिणः ॥ २६० ॥
ते पृष्टास्तु यथा ब्रूयुः सीमां संधिषु लक्षणम् ।
तत्तथा स्थापयेद्राजा धर्मेण ग्रामयोर्द्वयोः ॥ २६१ ॥
वे लोग पूँछने पर जैसा कहें उसीके मुताबिक सीमा बांधे
और उन पञ्चों का नाम लिखले । वे साक्षी लाल फूलों की माला,
लाल वस्त्र पहनकर शिर पर मिट्टी का ढेला रखकर अपने अपने
पुण्य की शपथ खाकर ठीक बात कहें । वे सत्य साक्षी यथार्थ
निर्णय करने से निष्पाप होते हैं और असत्य निर्णय करें तो दो
सौ पण दण्ड उन पर करे । यदि साक्षियों का अभाव हो तो
आसपास के चार ज़मींदार धर्म से राजा के सामने सीमा निर्णय
करें । यदि ज़मींदार और गांव के पुराने वाशिन्दा सीमा के साक्षी
न मिलें तो वनमें रहनेवाले मनुष्यों से पूंछे । व्याध, चिड़ीमार,
ग्वाल, मछुए, जड़ खोदनेवाले, कना बीनकर जीनेवाले आदि
मनुष्यों से सब बातें निश्चित करे । वे लोग जैसा बतलावें उसी
भांति राजा दो गावोंके बीच सीमाका स्थापन करे ॥ २५५-२६१ ॥