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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages
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४१४ मनुस्मृति ।
वश्य को सुरा-मद्य न पीनी चाहिए । गुड़ की, पीठे की, और
महुवे की ये तीन प्रकार की मद्य होती हैं । जैसी गुड़ की है, वैसी
ही दूसरी भी है । इस लिए द्विजों को न पीनी चाहिए । मद्य यक्षों
का, मांस राक्षसों का और सुरा-आसव पिशाचों का भोजन
है। देव-हवि खानेवालें द्विजों को यह कभी न सेवन करनी
चाहिए ॥ ६१-६६ ॥
अमेध्ये वा पतेन्मत्तो वैदिकं वाप्युदाहरेत् ।
अकार्यमन्यत्कुर्याद्वा ब्राह्मणो मदमोहितः ॥ ६७ ॥
यस्य कायगतं ब्रह्म मद्येनाप्लाव्यते सकृत् ।
तस्य व्यपैति ब्राह्मण्यं शूद्रत्वं च स गच्छति ॥ ६८ ॥
एषा विचित्राभिहिता सुरापानस्य निष्कृतिः ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि सुवर्णस्तेयनिष्कृतिम् ॥ ६६ ॥
ब्राह्मण मद्यपान करके उसके नशे में अपवित्र स्थान में गिरता
है, गोप्य वेदमन्त्र पढ़ता है और अकार्य करता है । जिस ब्राह्मण
के शरीर में रहनेवाला वेदज्ञान एकबार भी मद्य से मिल जाता है
उसका ब्राह्मणत्व नष्ट होजाता है और शूद्रता को प्राप्त होजाता
है। यह सुरापान का प्रायश्चित्त नानाप्रकार का कहा है। अब
सोना चुराने का प्रायश्चित्त कहा जायगा ॥ ६७-६६ ॥
सुवर्णस्तेयकृद्विप्रो राजानमभिगम्य तु ।
स्वकर्म ख्यापयन् ब्रूयान् मांभवाननुशास्त्विति ॥१००॥
गृहीत्वा मुसलं राजा सकृद्धन्यात्तु तं स्वयम् ।
वधेन शुध्यति स्तेनो ब्राह्मणस्तपसैव तु ॥ १०१ ॥
तपसाऽपनुनुत्सुस्तु सुवर्णस्तेयजं मलम् ।
चीरवासा द्विजोऽरण्ये चरेद्ब्रह्महणो व्रतम् ॥ १०२ ॥

ग्यारहवां अध्याय । ४१५

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ग्यारहवां अध्याय । ४१५
एतैर्व्रतैरपोहेत पापं स्तेयकृतं द्विजः ।
गुरुस्त्रीगमनियं तु व्रतैरेभिरपानुदेत् ॥ १०३ ॥
सुवर्ण चोरी का प्रायश्चित्त ।
सुवर्णचोरी करनेवाला ब्राह्मण राजा के पास जाकर अपना
कर्म प्रकट करे और कहे कि मेरे को आप शिक्षा दें—तब राजा
उसके कंधे पर से मूसल लेकर उसको एकवार मारे । चोर मारने
से शुद्ध होता है और ब्राह्मण तप से शुद्ध होजाता है । जो तप से
शुद्ध होना चाहे वह चीर पहन कर वन में ब्रह्महत्या का व्रत करे ।
इन व्रतों से चोरी के पाप को दूर करे और गुरुपत्नीगमन के पाप
को आगे लिखे व्रतों से दूर करे ॥ १००-१०३ ॥
गुरुतल्प्यभिभाष्यैनस्तप्ते स्वप्यादयोमये ।
सूर्मीं ज्वलन्तीं स्वाश्लिष्येन्मृत्युना स विशुध्यति १०४
स्वयं वा शिश्नवृषणावुत्कृत्याधाय चाञ्जलौ ।
नैर्ऋतीं दिशमातिष्ठेदानिपातादजिह्मगः ॥ १०५ ॥
खट्वाङ्गी चीरवासा वा श्मश्रुलो विजने वने ।
प्राजापत्यं चरेत्कृच्छ्रमब्दमेकं समाहितः ॥ १०६ ॥
चान्द्रायणं वा त्रीन्मासानभ्यस्येन्नियतेन्द्रियः ।
हविष्येण यवाग्वा वा गुरुतल्पापनुत्तये ॥ १०७ ॥
एतैर्व्रतैरपोहेयुर्महापातकिनो मलम् ।
उपपातकिनस्त्वेवमेभिर्नानाविधैर्व्रतैः ॥ १०८ ॥
गुरुपत्नीगमन-प्रायश्चित्त ।
गुरुपत्नीगामी अपने पाप को कहकर लोहे की जलती हुई
शय्या पर सोवे । या लोह की बनी स्त्री मूर्ति जलती हुई को चिं-
पट कर मरने से पाप शुद्ध होता है । अथवा खुदही अपने लिङ्ग

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४१६ मनुस्मृति ।
और अण्डकोशों को काटकर अंजलि में रखकर मरण तक
नैऋत्य दिशा में चला जाय । या हाथ में खाट का पाया रखे,
चीथड़े पहने, दाढ़ी मूंछों को बढ़ाकर निर्जन वन में एक वर्ष
तक सावधानी से निवास करे। और प्राजापत्य व्रत करे । अथवा
जितेन्द्रिय होकर, हविष्यान्न, जौ की लपसी खाकर तीन मास
तक चान्द्रायण व्रत करे । इन व्रतों से महापातकीपुरुष अपने
पापों को दूर करें और उपपातकी लोग आगे लिखे विविध व्रतों
से अपने पापों का नाश करें ॥ १०४-१०८ ॥
उपपातकसंयुक्तो गोघ्नो मासं यवान् पिबेत् ।
कृतवापो वसेद्गोष्ठे चर्मणा तेन संवृतः ॥ १०६ ॥
चतुर्थकालमश्नीयादक्षारलवणं मितम् ।
गोमूत्रेणाचरेत्स्नानं द्वौ मासौ नियतेन्द्रियः ॥ ११० ॥
दिवानुगच्छेद्गास्तास्तु तिष्ठन्नूर्ध्वं रजः पिबेत् ।
शुश्रूषित्वा नमस्कृत्य रात्रौ वीरासनं वसेत् ॥ १११ ॥
तिष्ठन्तीष्वनुतिष्ठेत्तु व्रजन्तीष्वप्यनुव्रजेत् ।
आसीनासु तथासीनो नियतो वीतमत्सरः ॥ ११२ ॥
उपपातकों का प्रायश्चित्त ।
गोवध करनेवाला मुण्डन कराकर, गोचर्म ओढ़कर एक मास
गौगोष्ठमें रहे और जौकी लपसी चाटे। दो मास तक गोमूत्र से
स्नान करे, जितेन्द्रिय रहे, चौथे काल (दूसरे दिन सायंकाल)
विना नमक का थोड़ा भोजन करे । दिन में गौओं के पीछे फिरे
और खड़ा होकर उनके खुर से उड़ी धूर को पिये । गो-सेवा करे,
उनको प्रणाम करे, रात में वीरासन से बैठा रहे । सदा गौओं के
बैठने पर बैठे और खड़ी होने पर खड़ा हो, चलने पर चले और
फिर बैठने पर बैठ जाय । यह सब प्रेमभाव से करे ॥ १०६-११२ ॥

ग्यारहवां अध्याय । ४१७

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ग्यारहवां अध्याय । ४१७
आतुरामभिशस्तां वा चौरव्याघ्रादिभिर्भयैः ।
पतितां पङ्कलग्नां वा सर्वोपायैर्विमोचयेत् ॥ ११३ ॥
उष्णे वर्षति शीते वा मारुते वाति वा भृशम् ।
न कुर्वीतात्मनस्त्राणं गोरकृत्वा तु शक्तितः ॥ ११४ ॥
आत्मनो यदि वान्येषां गृहे क्षेत्रेऽथवा खले ।
भक्षयन्तीं न कथयेत्पिबन्तं चैव वत्सकम् ॥ ११५ ॥
अनेन विधिना यस्तु गोघ्नो गामनुगच्छति ।
स गोहत्याकृतं पापं त्रिभिर्मासैर्व्यपोहति ॥ ११६ ॥
वृषभैकादशा गाश्च दद्यात्सुचरितव्रतः ।
अविद्यमाने सर्वस्वं वेदविद्भ्यो निवेदयेत् ॥ ११७ ॥
रोगी, चोर, वाघ के भय से व्याकुल गिरीहुई कीचड़ में फंसी
हुई गौ को सब उपायों से मुक्त करे। धूप में, वर्षा में, शीत में और
आंधी चलने पर यथाशक्ति गौ की रक्षा करे फिर अपनी रक्षा
करे। अपने वा दूसरे के घर में, खेत में, खरिहान में चरती गौ
को और दूध पीते बछड़े को किसी से न कहे। जो गोवध करने
वाला पुरुष इस विधि से गोसेवा करता है वह तीन मास में गो-
हत्या के पाप से मुक्त होजाता है। इसभांति व्रत करनेवाला एक
बैल और दश गौ दान करे। यह पास न हो तो वेदज्ञ-ब्राह्मण को
सर्वस्व अर्पण कर देवे ॥ ११३-११७ ॥
एतदेव व्रतं कुर्यु रुपपातकिनो द्विजाः ।
अवकीर्णिवर्ज्यं शुद्ध्यर्थं चान्द्रायणमथापिवा ॥ ११८॥
अवकीर्णी तु काणेन गर्दभेन चतुष्पथे ।
पाकयज्ञविधानेन यजेत निर्ऋतिं निशि ॥ ११९ ॥
५३

खण्डित करनेवाला अवकीर्णी होता है । वह रात को काने गधे

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४१८ मनुस्मृति।
हुत्वाग्नौ विधिवद्धोमानन्ततश्च समेत्यृचा ।
वातेन्द्रगुरुवह्नीनां जुहुयात् सर्पिषाहुतीः ॥ १२० ॥
अवकीर्णी को छोड़कर दूसरे उपपातकी द्विज अपनी शुद्धि के
लिए इसी व्रत को या चान्द्रायण व्रतको करें। परस्त्री से ब्रह्मचर्य
खण्डित करनेवाला अवकीर्णी होता है । वह रात को काने गधे
पर चढ़कर चौराहा में जाकर पाकयज्ञ के विधान से निर्ऋति
देवता का यज्ञ करे। अग्नि में विधि से होम करके 'सं मा सि-
ञ्चन्तु मरुतः—'* इत्यादि ऋचा से, मरुत, इन्द्र, गुरु, और अग्नि
को घृत की आहुति करे ॥ ११८-१२० ॥
कामतो रेतसः सेकं व्रतस्थस्य द्विजन्मनः ।
अतिक्रमं व्रतस्याहुर्धर्मज्ञा ब्रह्मवादिनः ॥ १२१ ॥
मारुतं पुरुहूतं च गुरुं पावकमेव च ।
चतुरो व्रतिनोऽभ्येति ब्राह्मं तेजोऽवकीर्णिनः ॥ १२२॥
एतस्मिन्नेनसि प्राप्ते वसित्वा गर्दभाजिनम् ।
सप्तागारांश्चरेद्भैक्षं स्वकर्मपरिकीर्तयन् ॥ १२३ ॥
तेभ्यो लब्धेन भैक्षेण वर्तयेन्नेककालिकम् ।
उपस्पृशंस्त्रिषवणं त्वब्देन स विशुध्यति ॥ १२४ ॥
जातिभ्रंशकरं कर्म कृत्वान्यतममिच्छया ।
चरेत्सान्तपनं कृच्छ्रं प्राजापत्यमनिच्छया ॥ १२५ ॥
संकरापात्रकृत्यासु मासं शोधनमैन्दवम् ।
मलिनीकरणीयेषु तप्तः स्याद्यावकैस्त्र्यहम् ॥ १२६ ॥

  • 'सं मा सिञ्चन्तु मरुतः सं पूषा सं बृहस्पतिः । सं मायमग्निः सिञ्चतु प्रजया
    च धनेन च दीर्घमायुः कृणोतु मे ।' अथर्व०, ७ । ३ । ३३ । १.

ग्यारहवां अध्याय । ४१६

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ग्यारहवां अध्याय । ४१६
तुरीयो ब्रह्महत्यायाः क्षत्रियस्य वधे स्मृतः ।
वैश्येऽष्टमांशो वृत्तस्थे शूद्रे ज्ञेयस्तु षोडशः ॥ १२७ ॥
अकामतस्तु राजन्यं विनिपात्य द्विजोत्तमः ।
वृषभैकसहस्रा गा दद्यात्सुचरितव्रतः ॥ १२८ ॥
ज्ञानधारी इच्छा से वीर्यपात करे तो उसका व्रत भङ्ग होजाता है।
यह धर्मज्ञ-ब्राह्मणादियों का मत है। व्रतभङ्ग से उसका तेज वायु,
इन्द्र, बृहस्पति और अग्नि इन चार व्रतधारियों को प्राप्त होता
है। इस व्रतभङ्ग का पाप लगे तो गधे का चमड़ा ओढ़कर अपना
कर्म करे और सात घरों से भीख मांगे और उस भिक्षा से एक
बार भोजननिर्वाह करे। और तीन बार स्नान करे। इस प्रकार
एक वर्ष में शुद्ध होता है। जानकर कोई जातिभ्रंश कर पाप करे
तो 'सान्तपन व्रत' और अनजान में करे तो 'प्राजापत्य व्रत'
करे। संकर और अपात्र करनेवाले कर्मों में एक मास चान्द्रायण
व्रत शुद्ध करता है। और मलिनीकरण कर्मों में तीन दिन जौ की
लपसी खाने से शुद्ध होता है। सदाचारी क्षत्रिय के वध में ब्रह्म-
हत्या का चौथाई वैश्य वध में आठवां हिस्सा और शूद्रवध में
सोलहवां हिस्सा-प्रायश्चित्त जानना चाहिए । यदि श्रेष्ठ द्विज
अनजान में क्षत्रिय का वध करे तो विधिपूर्वक प्रायश्चित्त करके
बाद में एक हज़ार गौ और एक बैल का दान करे ॥ १२१-१२८ ॥
त्र्यब्दं चरेद्वा नियतो जटी ब्रह्महणो व्रतम् ।
वसन्दूरतरे ग्रामाद्वृक्षमूलनिकेतनः ॥ १२६ ॥
एतदेव चरेदब्दं प्रायश्चित्तं द्विजोत्तमः ।
प्रमाप्य वैश्यं वृत्तस्थं दद्याच्चैकशतं गवाम् ॥ १३० ॥
एतदेव व्रतं कृत्स्नं षण्मासाञ्शूद्रहा चरेत् ।
वृषभैकादशा वापि दद्याद्विप्राय गाः सिताः ॥ १३१ ॥

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४२० मनुस्मृति।
मार्जारनकुलौ हत्वा चाषं मण्डूकमेव च ।
श्वगोधोलूककाकांश्च शूद्रहत्या व्रतं चरेत् ॥ १३२ ॥
पयः पिवेत् त्रिरात्रं वा योजनं वाध्वनो व्रजेत् ।
उपस्पृशेत्स्रवन्त्यां वा सूक्तं वाब्दैवतं जपेत् ॥ १३३ ॥
अस्त्रिं कार्ष्णायसीं दद्यात् सर्पं हत्वा द्विजोत्तमः ।
पलालभारकं षण्ढे सैसकञ्चैक्रमाषकम् ॥ १३४ ॥
घृतकुम्भं वराहे तु तिलद्रोणन्तु तित्तिरौ ।
शुके द्विहायनं वत्सं क्रौञ्चं हत्वा त्रिहायनम् ॥ १३५ ॥
हत्वा हंसं बलाकां च बकं बर्हिणमेव च ।
वानरं श्येनभासौ च स्पर्शयेद्ब्राह्मणाय गाम् १३६ ॥
अथवा वह पुरुष ग्राम से दूर वृक्ष के नीचे जटा रखकर एक
वर्ष तक ब्रह्महत्या का प्रायश्चित्त करे। और यहीं प्रायश्चित्त अ-
ज्ञान में सदाचारी वैश्य के वध में भी जानना चाहिए। और एकसौ
गौ का दान करना चाहिए। शूद्रवध में भी यही सब प्रायश्चित्त
छः मास तक करना दश श्वेतगौ और एक बैल दान करना चाहिए।
विलाव, नौला, पपीहा, मेंडक, कुत्ता, छिपकली, उल्लू और कौआ
को अनजान में मारकर शूद्रहत्या का व्रत करे। अथवा तीन रात
तक दूध पीकर रहे या एक योजन तक मार्ग चले या तीनबार
नदी में स्नान करे या ‘आपोहिष्ठा’ इत्यादि वरुणसूक्त का पाठ
करे। द्विज सर्प का वध करे तो तीखे नोक का-लोह का दण्डा
दान करे। नपुंसक का वध करने पर एक भार पयाल वा एक
मासा सीसा देय। सूअर के वध में घी भरा घड़ा, तीतर मारने
पर एक द्रोण तेल, तोता की हत्या में दो वर्ष का बछड़ा, क्रौञ्च-
वध में तीन वर्ष का बछड़ा दान करे। हंस, बगली, बगला, मोर,
वानर, बाज और भास इन पक्षियों को मारकर ब्राह्मण को गो-
दान करे तब पाप से शुद्ध होता है ॥ १२६-१३६॥

ग्यारहवां अध्याय । ४२१

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[हेडर]
ग्यारहवां अध्याय । ४२१

वासो दद्याद्धयं हत्वा पञ्च नीलान् वृषान् गजम् ।
अजमेषावनड्वाहं खरं हत्वैकहायनम् ॥ १३७ ॥
क्रव्यादांस्तु मृगान् हत्वा धेनुं दद्यात्पयस्विनीम् ।
अक्रव्यादान् वत्सतरीमुष्ट्रं हत्वा तु कृष्णलम् ॥ १३८ ॥
घोड़े की हत्या में वस्त्र, हाथी की हत्या में पांच नीले बैल, बकरा
और मेढ़ा के लिए सांड़ और गर्दभ के वध में एक वर्ष का बछड़ा
दान करे। मांसाहारी पशुओं की हत्या में दूध देनेवाली गौ, मांस
न खानेवाले पशुओं की हिंसा में बछड़ी और ऊंट की हिंसा में
रत्तीभर सोने का दान करना चाहिए ॥ १३७-१३८ ॥
जिनकार्मुकवस्तावीन् पृथग्दद्याद्विशुद्धये ।
चतुर्णामपि वर्णानां नारीर्हत्वाऽनवस्थिताः ॥ १३६ ॥
दानेन वधनिर्णैकं सर्पादीनामशक्नुवन् ।
एकैकशश्चरेत्कृच्छ्रं द्विजः पापापनुत्तये ॥ १४० ॥
अस्थिमतां तु सत्त्वानां सहस्रस्य प्रमापणे ।
पूर्णे चानस्यनस्थ्नां तु शूद्रहत्याव्रतं चरेत् ॥ १४१ ॥
किञ्चिदेव तु विप्राय दद्यादस्थिमतां वधे ।
अनस्थ्नां चैव हिंसायां प्राणायामेन शुद्ध्यति ॥ १४२॥
फलदानां तु वृक्षाणां छेदने जप्यमृक्शतम् ।
गुल्मवल्लीलतानां च पुष्पितानां च वीरुधाम् ॥ १४३ ॥
अन्नाद्यजानां सत्त्वानां रसजानां च सर्वशः ।
फलपुष्पोद्भवानां च घृतप्राशोविशोधनम् ॥ १४४ ॥
चारों वर्ण की व्यभिचारिणी स्त्रियों की हत्या होने पर क्रम से
मृगचर्म, धनुष, बकरा और मेढ़े का दान करे । पूर्व कहे हुए सर्प

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४२२ मनुस्मृति।

आदि के प्रायश्चित्तों को न करसके तो एक एक कृच्छ्र व्रत करे।
हजार हड्डीवाले जीवों की हत्या और बिना हड्डीवाले गाड़ी भर
जीवों की हत्या में शूद्रहत्या का प्रायश्चित्त करे। अस्थि-हड्डी
वाले प्राणियों की हत्या में ब्राह्मण को कुछ दक्षिणा दे और अस्थि-
रहितों की हत्या में प्राणायाम से शुद्ध होता है। फल देनेवाले वृक्ष,
गुल्म, बेल, लता और फूलवाले पौधों को व्यर्थ काटने पर सौ
ऋचाओं का पाठ करे। सब भांति के अन्न, रस, फल-पुष्पादिमें पैदा
हुए जीवों के वध में 'घृत-प्राशन' शुद्ध करता है ॥ १३६-१४४॥
कृष्टजानामोषधीनां उत्पन्नानां स्वयं वने ।
वृथालम्भेऽनुगच्छेद्रां दिनमेकं पयोव्रतः ॥ १४५ ॥
एतैर्व्रतैरपोह्यं स्यादेनो हिंसासमुद्भवम् ।
ज्ञानाज्ञानकृतं कृत्स्नं शृणुतानाद्यभक्षणे ॥ १४६ ॥
खेत में या वन में स्वयं उत्पन्न औषधियों को व्यर्थ काटने पर
एक दिन दूध पीकर गौ के पीछे फिरे। जान या अनजान में हिंसा
से हुए सब पाप इन व्रतों से नष्ट होजाते हैं। अब अभक्ष्य-भक्षण
का प्रायश्चित्त सुनो ॥ १४५-१४६ ॥
अज्ञानाद्वारुणीं पीत्वा संस्कारेणैव शुध्यति ।
मतिपूर्वमनिर्देश्यं प्राणान्तिकमिति स्थितिः ॥ १४७॥
अपः सुराभाजनस्था मद्यभाण्डस्थितास्तथा ।
पञ्चरात्रं पिबेत्पीत्वा शंखपुष्पीसृतं पयः ॥ १४८ ॥
स्पृष्ट्वा दत्त्वा च मदिरां विधिवत्प्रतिगृह्य च।
शूद्रोच्छिष्टाश्च पीत्वापः कुशावारि पिबेत्त्र्यहम् ॥ १४६॥
ब्राह्मणस्तु सुरापस्य गन्धमाघ्राय सोमपः ।
प्राणानप्सु त्रिरायम्य घृतं प्राश्य विशुध्यति ॥ १५० ॥

ग्यारहवां अध्याय । ४२३

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ग्यारहवां अध्याय । ४२३
अज्ञानात्प्राश्य विण्मूत्रं सुरासंसृष्टमेव च ।
पुनः संस्कारमर्हन्ति त्रयो वर्णा द्विजातयः ॥ १५१ ॥
वपनं मेखलादण्डो भैक्षचर्या व्रतानि च ।
निवर्तन्ते द्विजातीनां पुनः संस्कार कर्मणि ॥ १५२ ॥
अभक्ष्य-भक्षणप्रायश्चित्त।
अज्ञान में मद्यपान से संस्कार से शुद्धि होती है। जानकर पीने
का कोई प्रायश्चित्त नहीं कहा है। मरणान्त में शुद्धि होती है-यही
मर्यादा है। जिसने सुरा और मद्य के पात्र का जल पिया हो वह
पांच दिन शंखपुष्पी का काढ़ा पिये । मद्य छूकर, देकर और
विधि से ग्रहण करके और शूद्र का जूठा जल पीकर, तीन दिन
कुशका उबाला जल पीये। सोमपान करनेवाला ब्राह्मण, मद्यप के
मुखगंध को सूंघकर तीन प्राणायाम जलका और घृतप्राशन करने से
शुद्ध होता है। अज्ञान से विष्ठा, मूत्र और मद्यका स्पर्श हुआ पदार्थ
खाकर द्विजातियों का फिर संस्कार होना उचित है। द्वितीयवार
संस्कार में द्विजातियों को मुण्डन, मेखला, दण्ड, भिक्षा और व्रत
धारण नहीं करना होता ॥ १४७-१५२ ॥
अभोज्यानां तु भुक्त्वान्नं स्त्रीशूद्रोच्छिष्टमेव च ।
जग्ध्वा मांसमभक्ष्यं च सप्तरात्रं यवान् पिबेत् ॥ १५३॥
शुक्तानि च कषायांश्च पीत्वामेध्यान्यपि द्विजः ।
तावद्भवत्यप्रयतो यावत्तन्न व्रजत्यधः ॥ १५४ ॥
विड्वराहखरोष्ट्राणां गोमायोः कपिकाकयोः ।
प्राश्य मूत्रपुरीषाणि द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ॥ १५५ ॥
शुष्काणि भुक्त्वा मांसानि भौमानि कवकानि च ।
अज्ञातं चैव सूनास्थमेतदेव व्रतं चरेत् ॥ १५६ ॥

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४२४ मनुस्मृति ।
क्रव्यादांस्सूकरोष्ट्राणां कुक्कुटानां च भक्षणे ।
नरकाकखराणां च तप्तकृच्छ्रं विशोधनम् ॥ १५७ ॥
मासिकान्नं तु योऽश्नीयादसमावर्तको द्विजः ।
स त्रीण्यह्रान्युपवसेदेकाहं चोदके वसेत् ॥ १५८ ॥
ब्रह्मचारी तु योऽश्नीयान्मधुमांसं कथंचन ।
स कृत्वा प्राकृतं कृच्छ्रं व्रतशेषं समापयेत् ॥ १५६ ॥
विडालकाकाखूच्छिष्टं जग्ध्वाश्वनकुलस्य च ।
केशकीटावपन्नं च पिबेद् ब्रह्मसुवर्चलाम् ॥ १६० ॥
अभोज्यों का अन्न, स्त्री और शूद्र का जूठन खाकर और अभक्ष्य
मांस खाकर सात रात जव की लपसी खावे । सिरका आदि
सड़ी भोज्य वस्तु और काढ़ा पीकर बिना वमन किये द्विज शुद्ध
नहीं होता। गांव का सुअर, गधा, ऊंट, सियार, वानर और
कौआ का मूत्र, विष्ठा खाजाने पर, चान्द्रायण व्रत करे। सूखा
मांस, ज़मीन के फूल, अज्ञात और कसाईखाने का मांस खाकर
भी चान्द्रायण ही करे। कच्चे मांस खानेवाले, सुअर, ऊंट, मुरगा,
मनुष्य, कौआ और गधे का मांस खाने में आजाय तो तप्तकृच्छ्र
से शुद्ध होता है। बिना समावर्तन के जो ब्रह्मचारी द्विज, मा-
सिक श्राद्ध का अन्न खाय वह तीन दिन उपवास करे और एक
दिन जल में बैठे। जो ब्रह्मचारी किसी प्रकार मांस सेवन करले,
वह प्राजापत्य व्रत करे और बाक़ी ब्रह्मचर्य को खतम करदे।
बिल्ली, कौआ, चूहा, कुत्ता और नौला का जूठा और बाल,
कीड़ा पड़ा अन्न खाकर 'ब्रह्मसुवर्चला' का काढ़ा पीवे ॥१५३-१६०॥
अभोज्यमन्नं नात्तव्यमात्मनः शुद्धिमच्छता ।
अज्ञानभुक्तं तूत्तार्यं शोध्यं वाऽप्याशु शोधनैः ॥१६१॥

ग्यारहवां अध्याय। ४२५

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ग्यारहवां अध्याय। ४२५
एषोऽनाद्यादनस्योक्तो व्रतानां विविधो विधिः ।
स्तेयदोषापहतॄणां व्रतानां श्रूयतां विधिः ॥ १६२ ॥
धान्यान्नधनचौर्याणि कृत्वा कामाद्विजोत्तमः ।
स्वजातीयगृहादेव कृच्छ्राब्देन विशुध्यति ॥ १६३ ॥
मनुष्याणां तु हरणे स्त्रीणां क्षेत्रगृहस्य च ।
कूपवापीजलानां च शुद्धिश्चान्द्रायणं स्मृतम् ॥ १६४॥
द्रव्याणामल्पसाराणां स्तेयं कृत्वान्यवेश्मतः ।
चरेत्सान्तपनं कृच्छ्रं तन्निर्यात्यात्मशुद्धये ॥ १६५ ॥
भक्ष्यभोज्यापहरणे यानशय्यासनस्य च ।
पुष्पमूलफलानां च पञ्चगव्यं विशोधनम् ॥ १६६ ॥
तृणकाष्ठद्रुमाणां च शुष्कान्नस्य गुडस्य च ।
चैलचर्मामिषाणां च त्रिरात्रं स्यादभोजनम् ॥ १६७॥
मणिमुक्ताप्रवालानां ताम्रस्य रजतस्य च ।
अयः कांस्योपलानां च द्वादशाहं कणान्नता ॥ १६८॥
अपनी शुद्धि चाहनेवाला पुरुष अभोज्य अन्न न खाय और
अज्ञान से खाया हुआ वमन करदे। यह न करसके तो शीघ्र
प्रायश्चित्तों से शुद्धि करे। यह सब अभक्ष्य-भक्षण व्रतों की अनेक
प्रकार की विधि कही। अब चोरी के पाप को नाश करनेवाले
व्रतों को सुनो। ब्राह्मण यदि जानकर अपने सजातीय के घर से
अन्न, पक्वान्न और धन चुरावे तो एक वर्ष प्राजापत्य करने से
शुद्ध होता है। मनुष्य, स्त्री, खेत, घर, कूप और बावड़ी के जल
की चोरी करने पर चान्द्रायण व्रत करना चाहिये। कम कीमत
के पदार्थ दूसरे के घर से चुराने पर सान्तपन व्रत करे और वह
पदार्थ लौटा देवे। लड्डू आदि भक्ष्य, खीर वगैरह भोज्य, सवारी,
५४

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४२६ : मनुस्मृति ।
शय्या, आसन, फूल, मूल और फल की चोरी में पञ्चगव्य से
शुद्धि होती है। तृण, काष्ठ, वृक्ष, सूखा अन्न, गुड़, वस्त्र, चर्म और
मांस चुराने पर तीन दिन उपवास करे। मणि, मोती, मूँगा,
तांबा, चांदी, लोहा, कांस और पत्थर चुराने पर बारह दिन
चावल की कनकी खावे ॥ १६१-१६८ ॥
कार्पासकीटजीर्णानां द्विशफैकशफस्य च ।
पक्षिगन्धौषधीनां च रज्जवाश्चैव त्र्यहं पयः॥१६६॥
एतैर्व्रतैरपोहेत पापं स्तेयकृतं द्विजः।
अगम्यागमनीयं तु व्रतैरेभिरपानुदेत् ॥ १७० ॥
गुरुतल्पव्रतं कुर्याद्रेतः सिक्त्वा स्वयोनिषु ।
सख्युः पुत्रस्य च स्त्रीषु कुमारीष्वन्त्यजासु च ॥१७१॥
पैतृष्वस्रेयीं भगिनीं स्वस्त्रीयां मांतुरेव च ।
मातुश्च भ्रातुस्तनयां गत्वा चान्द्रायणं चरेत्॥१७२॥
एतास्तिस्रस्तु भार्यार्थे नोपयच्छेत्तु बुद्धिमान् ।
ज्ञातित्वेनानुपेयास्ताः पतति ह्युपयन्नधः ॥ १७३ ॥
कपास, रेशम, ऊन दो और एक खुर के पशु, पक्षी, सुगन्ध
द्रव्य, औषध, रस्सी की चोरी करने पर तीन दिन पानी पीकर
बितावे। द्विजों को इन व्रतों से चोरी के पाप को दूर करना चा-
हिए। अगम्या स्त्री के गमन का पाप इन व्रतों से दूर करे:-सगी
बहन, मित्र और पुत्र की स्त्री, कुमारी और चाण्डाली के साथ ग-
मन में, गुरुपत्नी-गमन का प्रायश्चित्त करे। फूफूकी बेटी, मौसी
की बेटी और मामा की बेटी इन तीन बहिनों से गमन करके
चान्द्रायण व्रत करे। बुद्धिमान् पुरुष इन तीनों को स्त्रीरूप से स्वी-
कार न करे। ये जाति की होने से अगम्या हैं इनसे गमन करने
से नरकगामी होता है ॥ १६६-१७३ ॥

ग्यारहवां अध्याय। ४२७

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ग्यारहवां अध्याय। ४२७
अमानुषीषु पुरुष उदक्यायामयोनिषु ।
रेतः सिक्त्वा जले चैव कृच्छ्रं सान्तपनं चरेत् ॥१७४॥
मैथुनं तु समासेव्य पुंसि योषिति वा द्विजः ।
गोयानेऽप्सु दिवा चैव सवासाः स्नानमाचरेत् ॥१७५॥
चण्डालान्त्यस्त्रियो गत्वा भुक्त्वा च प्रतिगृह्य च ।
पतत्यज्ञानतो विप्रो ज्ञानात् साम्यं तु गच्छति॥ १७६॥
अमानुषी योनि, रजस्वला और जल में वीर्यपात करके सान्त-
पन व्रत करे । द्विज को पुरुष, स्त्री, बैलगाड़ी में, जल में और
दिन में, मैथुन करके वस्त्र सहित स्नान करना चाहिए । ब्राह्मण
अज्ञान से चाण्डाल, म्लेच्छस्त्री से गमन करके, भोजन करके
उनसे दान लेकर पतित होता है। और जानकर ऐसा कर्म करने
पर उनके समान होजाता है ॥ १७४-१७६ ॥
विप्रदुष्टां स्त्रियं भर्ता निरुन्ध्यादेकवेश्मनि ।
यत्पुंसः परदारेषु तच्चैनां चारयेद्व्रतम् ॥ १७७ ॥
सा चेत्पुनः प्रदुष्येत्तु सदृशेनोपयन्त्रिता ।
कृच्छ्रं चान्द्रायणं चैव तदस्याः पावनं स्मृतम्॥१७८॥
यत्करोत्येकरात्रेण वृषलीसेवनाद्द्विजः ।
तद्भैक्षभुग्जपन्नित्यं त्रिभिर्वर्षैरपोहति ॥ १७६ ॥
एषा पापकृतामुक्ता चतुर्णामपि निष्कृतिः ।
पतितैः संप्रयुक्तानामिमाः शृणुत निष्कृतीः ॥ १८०॥
दुराचारी स्त्री को उसका पति एक घर में बन्द करे और जो
पुरुष को परस्त्रीगमन में प्रायश्चित्त है वही उससे करवावे ।
किसी जातीय पुरुष के बहकाने पर फिर भी वह बिगड़ जावे तो
उसको चान्द्रायण व्रत करावे । एक रात चांडाली के साथ

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४२८ :: मनुस्मृति ।
समागम से जो पाप द्विज करता है वह तीन वर्ष तक भिक्षा अन्न
खाकर गायत्री जप से दूर होता है । यह सब पाप करनेवाले चारों
वर्णं की शुद्धि कही है । अब पतितों के संसर्ग का प्रायश्चित्त
सुनो ॥ १७७-१८० ॥
संवत्सरेण पतति पतितेन सहाचरन् ।
याजनाध्यापनाद्यौनान्न तु यानासनाशनात् ॥ १८१ ॥
यो येन पतितेनैषां संसर्गं याति मानवः ।
स तस्यैव व्रतं कुर्यात्तत्संसर्गविशुद्धये ॥ १८२ ॥
पतितस्योदकं कार्यं सपिण्डैर्बान्धवैर्बहिः ।
निन्दितेऽहनि सायाह्ने ज्ञात्यृत्विग्गुरुसन्निधौ ॥ १८३ ॥
दासी घटमपां पूर्णं पर्यस्येत्प्रेतवत्पदा ।
अहोरात्रमुपासीरन् अशौचं बान्धवैः सह ॥ १८४ ॥
एक वर्ष तक पतितों के साथ एक सवारी वा आसन पर बैठने
से और एक पंक्ति में भोजन करने से उनको यज्ञकर्म कराने, वेद
पढ़ाने और विवाहसम्बन्ध करने से पतित होजाता है। जो मनुष्य
इन पतितों के साथ जो संसर्ग करता है वह उस संसर्ग की शुद्धि
के लिए वही व्रत करे। पतित प्रायश्चित्त न करे तो उसके स-
पिण्ड और ममेरे-फुफेरे भाई आदि निन्दित तिथिको सायंकाल
गाँव के बाहर जाति-पुरोहित-गुरुजनों के सामने जलदान करे।
दासी जल भरे पुराने घड़े को प्रेत के समान पैर से ठोकर देकर
फोड़ दे और सपिण्ड बान्धवों के साथ एक दिन-रात का
प्रायश्चित्त माने ॥ १८१-१८४ ॥
निवत्र्तेरंश्च तस्मात्तु संभाषणमहाशने ।
दायाद्यस्य प्रदानं च यात्रा चैव हि लौकिकी॥१८५॥

ग्यारहवां अध्याय । ४२६

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ग्यारहवां अध्याय । ४२६
ज्येष्ठता च निवर्त्तेत ज्येष्ठावाप्यं च यद्धनम् ।
ज्येष्ठांशं प्राप्नुयाच्चास्य यवीयान्गुणतोऽधिकः ॥१८६॥
प्रायश्चित्ते तु चरिते पूर्णकुम्भमपां नवम् ।
तेनैव सार्धं प्रास्येयुः स्नात्वा पुण्ये जलाशये ॥१८७॥
स त्वप्सु तं घटं प्रास्य प्रविश्य भवनं स्वकम् ।
सर्वाणि ज्ञातिकार्याणि यथापूर्वं समाचरेत् ॥ १८८ ॥
एतदेव विधिं कुर्याद्योषित्सु पतितास्वपि ।
वस्त्रान्नपानं देयं तु वसेयुश्च गृहान्तिके ॥ १८६ ॥
सपिण्ड उनके साथ बोल-चाल उठना-बैठना छोड़ दें । पिता
के धन में उसको भाग न दें और लौकिक व्यवहार भी न करें ।
पतित की ज्येष्ठता और उसके भाग का धन जाता रहता है ।
इसलिये वह भाग छोटों में जो गुणी हो उसको देना चाहिये ।
परन्तु वह प्रायश्चित्त करे तो सपिण्ड-बान्धव साथही पवित्र
जलाशय में स्नान करें और जल भरा घड़ा उस जलाशय में
डालें । ओर घर में आकर जाति के सब काम पूर्ववत् करे ।
पतित स्त्रियों के विषय में भी यही विधि करे । परन्तु उनको अन्न,
वस्त्र, जल देना चाहिए और घर के पास में रहें ॥ १८५-१८६ ॥
एनास्विभिरनिर्णिक्तैर्नार्थं किञ्चित् सहाचरेत् ।
कृतनिर्णेजनांश्चैव न जुगुप्सेत कर्हिचित् ॥१९०॥
बालघ्नांश्च कृतघ्नांश्च विशुद्धानपि धर्मतः ।
शरणागतहन्तूंश्च स्त्रीहन्तूंश्च न संवसेत् ॥ १६१ ॥
येषां द्विजानां सावित्री नानूच्येत यथाविधि ।
तांश्चारयित्वात्रीन्कृच्छ्रान्यथाविध्युपनाययेत् ॥१९२॥

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४३० मनुस्मृति ।
प्रायश्चित्त न करनेवाले पातकियों के साथ दान आदि का
कोई सम्बन्ध न रक्खे । और प्रायश्चित्त करनेवालों की फिर
निन्दा भी न करे । बालहत्यावाले, कृतघ्न, शरणागत को मारने
वाले और स्त्रियों की हत्या करनेवाले, प्रायश्चित्त कर भी लें
तोभी उनका संसर्ग न करे । जिन द्विजों का शास्त्रोक्त समय में
यज्ञोपवीत न हुआ हो उनको तीन प्राजापत्य व्रत कराकर विधि-
पूर्वक यज्ञोपवीत करावे ॥ १६०-१६२ ॥
प्रायश्चित्तं चिकीर्षन्ति विकर्मस्था तु ये द्विजाः ।
ब्राह्मणा च परित्यक्तास्तेषामप्येतदादिशेत् ॥ १६३ ॥
यद्गर्हितेनार्जयन्ति कर्मणा ब्राह्मणा धनम् ।
तस्योत्सर्गेण शुद्ध्यन्ति जप्येन तपसैव च ॥ १६४ ॥
जपित्वा त्रीणि सावित्र्याः सहस्राणि समाहितः ।
मासं गोष्ठे पयः पीत्वा मुच्यतेऽसत्प्रतिग्रहात् ॥ १६५ ॥
उपवासकृशं तं तु गोव्रजान्पुनरागतम् ।
प्रणतं प्रतिपृच्छेयुः साम्यं सौम्येच्छसीति किम् ॥ १६६ ॥
सत्यमुक्त्वा तु विप्रेषु विकिरेद्यवसं गवाम् ।
गोभिः प्रवर्तिते तीर्थे कुर्युस्तस्य परिग्रहम् ॥ १६७ ॥
व्रात्यानां याजनं कृत्वा परेषामन्त्यकर्म च ।
अभिचारमहीनं च त्रिभिः कृच्छ्रैर्व्यपोहति ॥ १६८ ॥
शरणागतं परित्यज्य वेदं विप्लाव्या च द्विजः ।
संवत्सरं यवाहारस्तत्पापमपसेधति ॥ १६६ ॥
श्वशृगालखरैर्दष्टो ग्राम्यैः क्रव्याद्भिरेव च ।
नराश्वोष्ट्रवराहेश्च प्राणायामेन शुद्ध्यति ॥ २०० ॥

ग्यारहवां अध्याय । ४३१

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ग्यारहवां अध्याय । ४३१
विरुद्ध कर्म करनेवाले और वेद न पढेहुए द्विज प्रायश्चित्त
करना चाहें तो उनको भी यही तीन कृच्छ्र का प्रायश्चित्त बतावे ।
जो ब्राह्मण निंदित कर्मों से धन कमाते हैं वे उसको छोड़ने और
जप-तप से शुद्ध होते हैं । एकाग्रचित्त से तीन हज़ार गायत्री का
जप करके एक महीना गोष्ठ में दुग्धाहार करके, बुरे दान लेने के
पाप से छूटता है । उस उपवास से कृश, गोष्ठ से आए विनीत
ब्राह्मण से पूछे कि हे सौम्य ! “क्या तू हमारे समान रहने की
प्रतिज्ञा करना चाहता है ?” उन ब्राह्मणों से ‘अब असत् दान
न लूंगा’ यह सत्यवचन कहे और गौओं को चारा देवे फिर
गौओं से पवित्र किए स्थान (जहां जल पीती हों) में वे ब्राह्मण
उसके साथ व्यवहार आरम्भ करें । व्रात्यों को यज्ञ कराकर माता,
पिता और गुरु से अन्य का प्रेतकर्म कराके मारणकर्म और
'व्रात्य' नामक यज्ञ करके तीन प्राजापत्य व्रत करने से शुद्ध
होता है । शरणागत को छोड़कर अनधिकारी को वेद पढ़ाकर एक
वर्ष जौ खाय तो पाप से छुटकारा पाता है । गाँव के रहनेवाले
कोई जीव कुत्ता, सियार, गदहा, मांसाहारी जीव, मनुष्य, घोड़ा,
ऊंट और सुअर काट लें या स्पर्श कर लें तो प्राणायाम से शुद्ध
होता है ॥ १६३-२०० ॥
षष्ठान्नकालता मासं संहिताजप एव वा ।
होमाश्च सकला नित्यमपाङ्क्त्यानां विशोधनम् ॥२०१॥
उष्ट्रयानं समारुह्य खरयानं तु कामतः ।
स्नात्वा तु विप्रो दिग्वासाः प्राणायामेन शुद्धयति ॥२०२॥
विनाद्भिरप्सु वाप्यार्तः शारीरं सन्निवेश्य च ।
सचैलो बहिराप्लुत्य गामानभ्य विशुद्ध्यति ॥ २०३ ॥
वेदोदितानां नित्यानां कर्मणां समतिक्रमे ।
स्नातकव्रतलोपे च प्रायश्चित्तमभोजनम् ॥ २०४ ॥

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४३२ मनुस्मृति ।
हुङ्कारं ब्राह्मणस्योक्त्वा त्वङ्कारं च गरीयसः ।
स्नात्वाऽनश्नन्नहः शेषमभिवाद्य प्रसादयेत् ॥ २०५ ॥
ताडयित्वा तृणेनापि कण्ठे वाबध्य वाससा ।
विवादे वा विनिर्जित्य प्रणिपत्य प्रसादयेत् ॥ २०६ ॥
अवगूर्य त्वब्दशतं सहस्रमभिहत्य च ।
जिघांसया ब्राह्मणस्य नरकं प्रतिपद्यते ॥ २०७ ॥
शोणितं यावतः पांशून् संगृह्णातिमहीतले ।
तावन्त्यब्द सहस्राणि तत्कर्ता नरके वसेत् ॥ २०८ ॥
एक मास तक दो दिन के बाद तीसरे दिन सायंकाल को
भोजन, वेदसंहिता का पाठ और साकल मन्त्रों से होम, पंक्ति-
बाह्य को शुद्ध करता है । ब्राह्मण जानकर ऊंट या गधे की सवारी
में बैठे या नंगा होकर स्नान करे तो प्राणायाम से शुद्ध होता
है । मल, मूत्र के वेग से आतुर पुरुष बिना जलके वा जल में
मल-मूत्र करे तो गाँव के बाहर सचैल स्नान करे और गौ का
स्पर्श करके शुद्ध होता है । वेदोक्त नित्यकर्मों का और स्नातक
का व्रत का लोप होने पर उपवास करना प्रायश्चित्त है । ब्राह्मण
को हुंकार (चुप रह आदि) और बड़े को (तू) कहकर स्नान
करके भोजन करे और प्रणाम करके उनको प्रसन्न करे । ब्राह्मण
को तिनुके से भी मारकर अथवा वस्त्र से बांधकर या विवाद
से जीतकर प्रणाम करके उनको प्रसन्न करे । ब्राह्मण को मारने
की इच्छा से दण्डा उठाकर सौ वर्ष और मारकर हज़ार वर्ष
नरक में पड़ता है । मारेहुए ब्राह्मण के देह से गिरा रुधिर धूल
के जितने कणों को भिगोता है मारनेवाला उतने हज़ार वर्ष
नरक में पड़ता है ॥ २०५-२०८ ॥
अवगूर्य चरेत्कृच्छ्रमतिकृच्छ्रं निपातने ।
कृच्छ्रातिकृच्छ्रौ कुर्वीत विप्रस्योत्पाद्य शोणितम् ॥ २०६॥

ग्यारहवां अध्याय । ४३३

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ग्यारहवां अध्याय । ४३३
अनुक्तनिष्कृतीनां तु पापानामपनुत्तये।
शक्तिं चावेक्ष्य पापं च प्रायश्चित्तं प्रकल्पयेत्॥२१०॥
यैरभ्युपायैरेनांसि मानवो व्यपकर्षति ।
तान्वोऽभ्युपायानूवक्ष्यामिदेवर्षिपितृसेवितान् ॥२११॥
त्र्यहं प्रातस्त्र्यहं सायं त्र्यहमद्यादयाचितम् ।
त्र्यहं परं च नाश्नीयात्प्राजापत्यं चरन् द्विजः ॥२१२॥
गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् ।
एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रं सान्तपनं स्मृतम् ॥ २१३ ॥
एकैकं ग्रासमश्नीयात् त्र्यहाणि त्रीणि पूर्ववत् ।
त्र्यहं चोपवसेदन्त्यमतिकृच्छ्रं चरन् द्विजः ॥ ॥ २१४॥
तप्तकृच्छ्रं चरन् विप्रो जलक्षीरघृतानिलान् ।
प्रतित्र्यहं पिबेदुष्णान् सकृत्स्नायी समाहितः ॥२१५॥
यतात्मनोऽप्रमत्तस्य द्वादशाहमभोजनम् ।
पराको नाम कृच्छ्रोऽयं सर्वपापापनोदनः ॥ २१६ ॥
ब्राह्मण के ऊपर मारने के लिए लकड़ी उठाकर प्राजापत्य,
मारने पर अतिकृच्छ्र और रुधिर निकलने पर कृच्छ्रातिकृच्छ्र व्रत
करे। जिन दोषों का प्रायश्चित्त नहीं कहा है उनका शक्ति और
पाप विचार कर प्रायश्चित्त नियत करे। मनुष्य जिन उपायों से
पाप नष्ट करता है उन देवर्षि और पितरों के सेवित उपायों को
तुम से कहता हूं । प्राजापत्य-व्रत करनेवाला द्विज तीन दिन प्रातः-
काल और तीन दिन सायंकाल और तीन दिन बिना मांगा अन्न
खावे और तीन दिन व्रत करे यों बारह दिनका होता है। एक दिन
गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घी और कुशका जल मिलाकर खाय और
एक रात्रिका उपवास करे तब 'कृच्छ्र-सान्तपन' होता है। तीन
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