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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 557 of 649

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Page 557

ग्यारहवां अध्याय । ४१७
आतुरामभिशस्तां वा चौरव्याघ्रादिभिर्भयैः ।
पतितां पङ्कलग्नां वा सर्वोपायैर्विमोचयेत् ॥ ११३ ॥
उष्णे वर्षति शीते वा मारुते वाति वा भृशम् ।
न कुर्वीतात्मनस्त्राणं गोरकृत्वा तु शक्तितः ॥ ११४ ॥
आत्मनो यदि वान्येषां गृहे क्षेत्रेऽथवा खले ।
भक्षयन्तीं न कथयेत्पिबन्तं चैव वत्सकम् ॥ ११५ ॥
अनेन विधिना यस्तु गोघ्नो गामनुगच्छति ।
स गोहत्याकृतं पापं त्रिभिर्मासैर्व्यपोहति ॥ ११६ ॥
वृषभैकादशा गाश्च दद्यात्सुचरितव्रतः ।
अविद्यमाने सर्वस्वं वेदविद्भ्यो निवेदयेत् ॥ ११७ ॥
रोगी, चोर, वाघ के भय से व्याकुल गिरीहुई कीचड़ में फंसी
हुई गौ को सब उपायों से मुक्त करे। धूप में, वर्षा में, शीत में और
आंधी चलने पर यथाशक्ति गौ की रक्षा करे फिर अपनी रक्षा
करे। अपने वा दूसरे के घर में, खेत में, खरिहान में चरती गौ
को और दूध पीते बछड़े को किसी से न कहे। जो गोवध करने
वाला पुरुष इस विधि से गोसेवा करता है वह तीन मास में गो-
हत्या के पाप से मुक्त होजाता है। इसभांति व्रत करनेवाला एक
बैल और दश गौ दान करे। यह पास न हो तो वेदज्ञ-ब्राह्मण को
सर्वस्व अर्पण कर देवे ॥ ११३-११७ ॥
एतदेव व्रतं कुर्यु रुपपातकिनो द्विजाः ।
अवकीर्णिवर्ज्यं शुद्ध्यर्थं चान्द्रायणमथापिवा ॥ ११८॥
अवकीर्णी तु काणेन गर्दभेन चतुष्पथे ।
पाकयज्ञविधानेन यजेत निर्ऋतिं निशि ॥ ११९ ॥
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