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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 559 of 649

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Page 559

ग्यारहवां अध्याय । ४१६
तुरीयो ब्रह्महत्यायाः क्षत्रियस्य वधे स्मृतः ।
वैश्येऽष्टमांशो वृत्तस्थे शूद्रे ज्ञेयस्तु षोडशः ॥ १२७ ॥
अकामतस्तु राजन्यं विनिपात्य द्विजोत्तमः ।
वृषभैकसहस्रा गा दद्यात्सुचरितव्रतः ॥ १२८ ॥
ज्ञानधारी इच्छा से वीर्यपात करे तो उसका व्रत भङ्ग होजाता है।
यह धर्मज्ञ-ब्राह्मणादियों का मत है। व्रतभङ्ग से उसका तेज वायु,
इन्द्र, बृहस्पति और अग्नि इन चार व्रतधारियों को प्राप्त होता
है। इस व्रतभङ्ग का पाप लगे तो गधे का चमड़ा ओढ़कर अपना
कर्म करे और सात घरों से भीख मांगे और उस भिक्षा से एक
बार भोजननिर्वाह करे। और तीन बार स्नान करे। इस प्रकार
एक वर्ष में शुद्ध होता है। जानकर कोई जातिभ्रंश कर पाप करे
तो 'सान्तपन व्रत' और अनजान में करे तो 'प्राजापत्य व्रत'
करे। संकर और अपात्र करनेवाले कर्मों में एक मास चान्द्रायण
व्रत शुद्ध करता है। और मलिनीकरण कर्मों में तीन दिन जौ की
लपसी खाने से शुद्ध होता है। सदाचारी क्षत्रिय के वध में ब्रह्म-
हत्या का चौथाई वैश्य वध में आठवां हिस्सा और शूद्रवध में
सोलहवां हिस्सा-प्रायश्चित्त जानना चाहिए । यदि श्रेष्ठ द्विज
अनजान में क्षत्रिय का वध करे तो विधिपूर्वक प्रायश्चित्त करके
बाद में एक हज़ार गौ और एक बैल का दान करे ॥ १२१-१२८ ॥
त्र्यब्दं चरेद्वा नियतो जटी ब्रह्महणो व्रतम् ।
वसन्दूरतरे ग्रामाद्वृक्षमूलनिकेतनः ॥ १२६ ॥
एतदेव चरेदब्दं प्रायश्चित्तं द्विजोत्तमः ।
प्रमाप्य वैश्यं वृत्तस्थं दद्याच्चैकशतं गवाम् ॥ १३० ॥
एतदेव व्रतं कृत्स्नं षण्मासाञ्शूद्रहा चरेत् ।
वृषभैकादशा वापि दद्याद्विप्राय गाः सिताः ॥ १३१ ॥