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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 266, कुल 649 में से

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पृष्ठ 266

१२६ मनुस्मृति ।
बालातपः प्रेतधूमो वर्ज्यं भिन्नं तथासनम् ।
न छिन्द्यान्नखलोमानि दन्तैर्नोत्पाटयेन्नखान् ॥ ६९ ॥
न मृल्लोष्ठं च मृद्नीयान्न छिन्द्यात्करजैस्तृणम् ।
न कर्म निष्फलं कुर्यान्नायत्यामसुखोदयम् ॥ ७० ॥
लोष्ठमर्दी तृणच्छेदी नखखादी च यो नरः ।
स विनाशं व्रजत्याशु सूचकोऽशुचिरेव च ॥ ७१ ॥
न विगर्ह्य कथां कुर्याद्वहिर्माल्यं न धारयेत् ।
गवां च यानं पृष्ठेन सर्वथैव विगर्हितम् ॥ ७२ ॥
प्रातःकाल का धूप, चिताका धूम, और फटा आसन इनको
बचाना चाहिए । नख और बालों को उखाड़ना और दांतों से नख
का काटना अच्छा नहीं है । मिट्टीके टुकड़ों को हाथ से न तोड़े, नख
से तिनुका न तोड़े और जिसका नतीजा खराब हो ऐसा काम न
करे । जो मनुष्य ढेला तोड़ता है, तृण तोड़ता है, नख चबाता है,
चुगली खाता है और भीतर-बाहर से मलिन रहता है वह शीघ्र
नष्ट होजाता है । निन्दाकी कोई कथा न करें, वस्त्र के ऊपर फूल-
माला न पहने और गौ की पीठपर बैठकर कहीं न जावे ॥६९-७२॥
अद्वारेण च नातीयाद् ग्रामं वा वेश्म वा वृतम् ।
रात्रौ च वृक्षमूलानि दूरतः परिवर्जयेत् ॥ ७३ ॥
नाक्षैः क्रीडेत् कदाचित्तु स्वयं नोपानहौ हरेत् ।
शयनस्थो न भुञ्जीत न पाणिस्थं न चासने ॥ ७४ ॥
सर्वं च तिलसम्बद्धं नाद्यादस्तमिते रवौ ।
न च नग्नः शयीतेह न चोच्छिष्टः क्वचिद्व्रजेत् ॥ ७५ ॥
जो गाँव का रास्ता हो उसको छोड़कर किसी खराब गली से
उसमें न घुसना और जो घर बन्द हो उसमें सीढ़ी आदि लगाकर