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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

नवां अध्याय । ३७३

नवां अध्याय । ३७३
ब्राह्मणाय च राज्ञे च सर्वाः परिददे प्रजाः ॥ ३२७ ॥
न च वैश्यस्य कामः स्यान्न रक्षेयं पशूनिति ।
वैश्ये चेच्छति नान्येन रक्षितव्याः कथंचन ॥ ३२८ ॥
मणिमुक्ताप्रवालानां लोहानां तान्तवस्य च ।
गन्धानां च रसानां च विद्यादर्घबलाबलम् ॥ ३२६ ॥
बीजानामुप्तिविच्च स्यात्क्षेत्रदोषगुणस्य च ।
मानयोगं च जानीयात्तुलायोगांश्च सर्वशः ॥ ३३० ॥
वैश्य-शूद्रकर्त्तव्य ।
वैश्य यज्ञोपवीत संस्कार के बाद विवाह करके नित्य व्यापार
और पशुरक्षा में तत्पर रहे । प्रजापति ने पशुओं की सृष्टि करके
रक्षार्थ वैश्यों को सौंपा और ब्राह्मण, क्षत्रिय को प्रजा को सौंपा ।
इसलिए पशुपालन न करने की इच्छा वैश्य न करे, जबतक वैश्य
पालन करे, दूसरे वर्ण को कभी न चाहिए । मणि, मोती, मूँगा,
लोहा, सूत की वस्तु, कपूर और मीठा, घी आदि रसपदार्थों का
भाव वैश्य सदा विचार में रक्खे । सब बीजों के बोने की विधि,
खेतों के गुण-दोष और सब तरह की नाप-तौल को जाना
करे ॥ ३२६-३३० ॥
सारासारं च भाण्डानां देशानां च गुणागुणान् ।
लाभालाभं च पण्यानां पशूनां परिवर्धनम् ॥ ३३१ ॥
भृत्यानां च भृतिं विद्याद्भाषाश्च विविधा नृणाम् ।
द्रव्याणां स्थानयोगांश्च क्रयविक्रयमेव च ॥ ३३२ ॥
धर्मेण च द्रव्यवृद्धावातिष्ठेद्यत्नमुत्तमम् ।
दद्याच्च सर्वभूतानामन्नमेव प्रयत्नतः ॥ ३३३ ॥

३७४ . मनुस्मृति ।
विप्राणां वेदविदुषां गृहस्थानां यशस्विनाम् ।
शुश्रूषैव तु शूद्रस्य धर्मो नैःश्रेयसः परः ॥ ३३४ ॥
शुचिरुत्कृष्टशुश्रूषुर्मृदुवागनहङ्कृतः ।
ब्राह्मणाद्याश्रयो नित्यमुत्कृष्टां जातिमश्नुते ॥ ३३५ ॥
एषोऽनापदि वर्णानामुक्तः कर्मविधिः शुभः ।
आपद्यपि हि यस्तेषां क्रमशस्तन्निबोधत ॥ ३३६ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रणीतायां स्मृतौ
नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥
गल्ले के अच्छे-बुरे का हाल, देशों में पदार्थों का भाव, गुण
आदि । समय में खरीद, बेंचने में मुनाफा आदि और पशुओं के
बढ़ने की रीति वैश्य जाना करे । नौकरोंकी नौकरी का परिमाण,
अनेक भाषा, माल ठीक रहने की विधि, खरीदने, बेंचने का ढंग
जाने । धर्मानुसार धन बढ़ाने में परमयत्न करे और सब प्राणियों
को अन्न देय यह सब वैश्यों का कर्त्तव्य है । वेदविशारद विद्वान्,
गृहस्थ, यशस्वी ब्राह्मण आदि की सेवा ही शूद्र का परम सुखदायी
धर्म है । जो शूद्र भीतर बाहर से पवित्र, उत्तमजाति का सेवक,
मधुरभाषी, निरहङ्कार और ब्राह्मणों के आश्रय में रहता है, वह
क्रम से उत्तम जाति में जन्म पाता है । इसप्रकार सुख के समय में
चारों वर्णों के कर्त्तव्य शुभकर्म कहे गये हैं । अब आपत्तिकाल में
चारों वर्णों का बर्त्ताव कहा जाता है ॥ ३३१-३३६ ॥
नवां अध्याय पूरा हुआ ।

अथ दशमोऽध्यायः ।
अधीयीरंस्त्रयोवर्णाः स्वकर्मस्था द्विजातयः।
प्रब्रूयाद् ब्राह्मणस्त्वेषां नेतराविति निश्चयः ॥ १ ॥
सर्वेषां ब्राह्मणो विद्याद्वृत्युपायान् यथाविधि ।
प्रब्रूयादितरेभ्यश्च स्वयं चैव तथा भवेत् ॥ २ ॥
वैशेष्यात्प्रकृतिश्रैष्ठ्यान्नियमस्य च धारणात् ।
संस्कारस्य विशेषाच्च वर्णानां ब्राह्मणः प्रभुः ॥ ३ ॥
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यस्त्रयो वर्णा द्विजातयः ।
चतुर्थ एकजातिस्तु शूद्रो नास्ति तु पञ्चमः ॥ ४ ॥
दशवां अध्याय ।
संकीर्ण-जातिभेद ।
अपने अपने धर्म कर्मों के अनुसार रहकर ब्राह्मण, क्षत्रिय
और वैश्य वेदों को पढ़ें । इन में ब्राह्मण सब को पढ़ावै और क्ष-
त्रिय, वैश्य पढ़ें, पढ़ावै नहीं, यह निर्णय है। ब्राह्मण सब वर्णों को
उनकी जीविका के उपायों को बतलावे और खुद भी अपने कर्त्तव्यों
को जाने । जाति की विशेषता परमात्मा के मुखसे उत्पत्ति नियमों
का धारण और जातकर्मादि संस्कारों की विशेषता से ब्राह्मण
वर्णों का स्वामी है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये तीन द्विजाति *

  • ब्राह्मण आदि जातिवाचक शब्द ऋग्वेद में भी हैं, जैसा—'ब्राह्मणस्त्वा
    शतक्रत उद्वंशमिव येमिरे ।' 'पञ्चजना मम होत्रं जुषध्वम्' इति । यहां पञ्चजन
    शब्द चारों वर्ण के लिए है, ऐसा निरुक्त में यास्कमुनि ने लिखा है। जातिभेद
    वैदिक युग का है, नवीन नहीं है ।