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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

महाराज वीरसिंह

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कूड़ा राक्षसने मरदानेको बाँधकर गरम तेलमें डाल दिया । वह तेलका कड़ाह साहबकी दयासे ठण्ढा हो गया, कूड़े को बड़ा आश्चर्य हुआ कि, यह कौन पुरुष है । जिसके कारण मेरी उत्तम कड़ाही एकदम पानीके समान ठण्ढी हो गई ।

यह कूड़ा राक्षस पहले ब्राह्मण और बड़ा पण्डित था । एक दिवस वह बैठता था कि, उसके गुरु आये । उनको देखकर वह अपनी विद्याके घमण्डसे नहीं उठा, न गुरुको प्रणामही किया । गुरुने कहा कि, हे पापी ! तूने अपनी विद्याके घमण्डसे प्रणाम नहीं किया है इस कारण राक्षस हो जा ; कूड़ाने अपने गुरुके चरणोंपर गिरकर कहा कि, अब मेरे अपराधोंको क्षमा करो । गुरुने उसको एक दर्पण देकर कहा कि, तू अवश्यही राक्षस होगा पर जिसको खानेको पकड़े उसे इस दर्पणमें देख लेना । जो कोई मनुष्य दिख ई दे उसको मत खाना जो पशु दिखाई दे उसको खा जाना । जब तुमको कोई मनुष्य दिखाई देगा उसके द्वारा तेरी इस योनिसे मुक्ति हो जायगी ।

कूड़ेने मरदानेको कड़ाहीमें डाला, कड़ाही ठण्ढी हो गई, नानक साहबने कूड़ेसे कहा कि, तू इसको भूनकर क्यों नहीं खाता क्या विलम्ब है ? कूड़ेने उस दर्पण द्वारा नानक साहबको देखा तो स्पष्ट रूपसे मनुष्यकी भव्य मूर्ति दिखाई दी ।

तब वह कूड़ा राक्षस नानक साहबके चरणोंपर गिरा, विनय करने लगा कि, महाराज ! आज मेरे गुरुका वचन पूरा हुआ । आजदिनतक जो मैं मनुष्योंको मारकर खाता था, प्रत्यक्षमें तो वे सब मनुष्यरूपमें दिखाई देते थे । परन्तु यथार्थमें वे सब पशुही थे । आजके दिवस केवल आप एक मनुष्य मिले हो दूसरा मनुष्य कभी कोई नहीं मिला, जितने मिले सब पशुही मिले । उन्हींको मैं खाया करता था । आप मनुष्य मिले हो, मेरा छुटकारा कीजिये । कूड़े राक्षस पर नानक साहबकी दया हुई वह सुखी हो गया । यह उदाहरण मैंने इस कारण लिखा है, कि, केवल हंस कबीरही को मनुष्यत्वका पद प्राप्त होता है, दूसरोंको नहीं होता क्योंकि, जैसे मैंने पहले सुपच सुदर्शनका वृत्तान्त लिखा कि, पुष्करजीमें सवा लाख प्रदीप जलवाकर जब देखा तो केवल सुपच सुदर्शनजी मनुष्य दिखाई दिये । शेष सभी डङ्गर, ढोर, कीड़े, मकोड़े, पशु, पक्षी इत्यादि थे । तब श्रीकृष्णचन्द्रने पाण्डवोंसे कहा कि, हे राजा युधिष्ठिर ? यमने सुपच सुदर्शनकी श्रेष्ठता देखी कि, नहीं ! वही बात तथा गुण नानक साहब तथा दूसरे हंस कबीरोंमें देखलो । कुछ भी विभिन्नता नहीं जिनको हंस पद प्राप्त नहीं हुआ सो सब बकुले हैं केवल हंस कबीर ही मनुष्य हैं ।

साखी - काहे हिरनी दूबरी, यही हरियरे ताल ।

लक्ष शिकारी एक मृग, कैंतिक टारे भाल ॥

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हंस कबीरोंमें ही ताकद है कि, अन्यान्य ब्रह्माण्डोंमें उड़कर चले जायें वहाँकी सैर करें। अतः नानक साहब केवल इस पृथिवीपरही नहीं बरन् अन्यान्य देशों तथा द्वीपों और ब्रह्माण्डोंकी भी सैर करते रहे हैं, केवल संसारहीमें बंद न रहे तथा लोकोपकार भी अच्छा किया।

तीनलोकके जीव तो कूएके मेंडकके समान हैं, क्योंकि वे बाहर नहीं निकल सकते। परन्तु हंस कबीर शक्तिमान हैं जहाँ चाहें चले जावें एक पल भरमें करोड़ों योजन उड़ जावें। नानक साहबकी जन्म साखियोंमें लिखा है तथा स्वयं नानकसाहबने कहा भी है कि, मैंने अनेक बार देह धारण की है, मैं सदैव ठाकुरपूजा करता था, इस कारण मुझको मुवितपद शीघ्र प्राप्त हुआ है, मुझको जिन्दा बाबा मिले, आवागमनका समस्त दुःख दूर हुआ।

एक अंग्रेजी पढ़े लिखेका मुझसे बातलाप हो रहा था, तब नानक साहबके सैरकी बात छिड़ी तो मैंने कहा कि, वे एक ऐसे देशमें गये जहाँ केवल स्त्रियाँही स्त्रियाँ थीं कोई मर्द ही नहीं था, वह स्त्रियोंका देश था। यह बात सुनकर उसने मेरी बातका खण्डन किया कि, भला जी ? योरोपवासियोंने समस्त पृथ्वीको छान डाला पर ऐसा देश पृथ्वीपर कोई नहीं जहाँ केवल स्त्रियाँही हों कोई मर्द न हों ! मैंने उत्तर दिया कि, विलायतवालोंने केवल पृथ्वीका ही भ्रमण किया है आकाशका नहीं। नानक साहब तो करोड़ों योजन एक पलभरमें उड़ जाते थे, न जाने यह वृत्तान्त किस ब्रह्माण्डका है जहाँ केवल स्त्रियाँ ही हैं ? नानक साहब ब्रह्मज्ञानी थे। ब्रह्मज्ञानी स्वयम् पवित्र परमेश्वरके समान हैं, ब्रह्मज्ञानीकी बड़ी प्रतिष्ठा कही है यथा—“ब्रह्म जानाति ब्रह्मैव भवति” इति श्रुतिः। यदि नानक साहब ब्रह्मज्ञानी न होते तो आपही सत्यलोकको कैसे जा सकते थे ? सारे सिद्धोंमें इनकी श्रेष्ठता कैसे होती ? यथार्थमें उन्हें ईश्वरी विद्या प्राप्त थी। इसीके बल वे बली थे।

दादूरामजी

दादूरामजी भी कबीर साहबके मुख्य शिष्योंमें थे, जबतक संसारमें रहे तब तक सत्यगुरुके अनुगृहीत होते हुए कृतज्ञ रहे। उनके सिधारनेके बाद उनके अनुयायियोंने वही काम किया जो नानक साहबके शिष्योंने किया है। उन लोगोंने कबीर साहबका नाम छोड़ दिया। सत्यगुरुका नाम छोड़तेही सत्य-पुरुषकी उपासना और स्वसंवेदकी शिक्षा उनसे पृथक् होगई। वे लोग स्वयम् सत्यगुरुका नाम छोड़कर अन्धकारमें चलते हुए भौति भौतिकी उपासना करने लगे। जहाँ जहाँ कबीर साहबका नाम और श्रेष्ठता थी उसको छोड़कर अपने

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आप अपने पैरपर कुल्हाड़ा मारते गये। सत्यगुरुके नामसे उनको घृणा होने लगी—जहाँ कबीर साहबका नाम देखते उसी ग्रंथको पसन्द न करते। कालपुरुषने उनकी बुद्धिपर ऐसा परदा डाला कि, उनको तनिक भी सुधि नहीं रही, सत्यगुरुके नाम छिपानेमें ही प्रसन्न होने लगे। दादुराम स्वयम् सत्यगुरुसे बड़ा प्रेम रखते थे। सुतरां गरीबदासजीकी बाणीमें लिखा है कि, दादुरामजी एक दिवस अपनी सभामें बैठे थे तब लोगोंसे पूछा कि, इस सभामें ऐसा भी कोई है जिसने कबीर साहबका दर्शन किया हो? उस समय एक बूढ़ा मनुष्य बोला कि, महाराज! मैंने कबीर साहबका दर्शन किया है। उस समय श्रीदादुरामने कहा कि, यदि तुमने दर्शन किया है तो मुझको सत्यगुरुका रङ्गरूप बतलाओ? वह बूढ़ा विवरण करने लगा कि, जब मैं छोटा बालक था, तब मेरा दादा कबीर साहबके दर्शनोंको जाया करता था, मैं भी अपने दादाकी उँगली पकड़कर उसके साथ जाता, जब मुझे कबीर साहबका दर्शन होता था उस समय मैं कबीर साहबकी शरीरकी ओर देखा करता था। साहबकी देह ऐसी जान पड़ती थी जैसे स्वच्छ दर्पण हो, उसके आर पार दिखाई देता था, दृष्टि रुकती नहीं थी। स्वच्छ काँचमें तो दृष्टि रुकभी जावे पर कबीर साहबका शरीर दृष्टिको तनिक भी नहीं रोकता था। यह बात सुनकर दादुरामने जान लिया कि, इस बूढ़ेने निश्चय कबीर साहबका दर्शन किया है। तब दादुरामने एक जलसे भरा बर्तन मँगवाया और उस बूढ़ेकी आँखें धोई उस जलको आप पीकर सभी सभासदोंको पिलाकर कहा कि, धन्य वे आँखें हैं जिन्होंने सत्यगुरुका दर्शन किया। ऐसी देह इस पृथिवीमें न किसी दूसरेकी है न होनी है वे तो एक केवल कबीर साहबही थे उसी समयकी दादुरामजीकी यह साखी है कि—

“जिन आँखन गुरु देखिया, सो किन पीवे धोवे।” कबीर साहबका शरीर नहीं था। वह एक केवल कौतुक था जिससे कि, शरीर दिखाई देता था। समस्त स्वसंवेदका यही कथन है कि, कबीर साहब विदेह हैं। उनकी देह केवल देखने मात्र है वास्तवमें नहीं है।

गोपालदास दादूपन्यी कृत दादुरामजीकी जन्म साखीके पहले विश्रामके अनुसार दादुरामजी सम्बत् १६०१ विक्रमीमें उत्पन्न हुए जब ग्यारह वर्षके हुए तो उनको कबीर साहब बूढ़े के स्वरूपमें मिल गये। उस समय दादुराम लड़कोंके साथ खेल रहे थे। बूढ़े बाबाने उनसे एक पैंसा मँगगा, दादुरामने पैंसा, लाकर उसी समय दे दिया। उस पैंसेका बूढ़े बाबाने पान मँगवाकर खाया। पीछे दादुरामजीसे पूछा कि, इस पानकी पीक कहाँ डालूँ। दादुरामने कहा कि, मेरे

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मुंहमें डाल दीजिये । बूढ़े बाबाने पानकी पीक दादूरामके मुंहमें डाल दी । उस समय दादूरामका हृदय स्वच्छ तथा प्रकाशित हो गया ; कबीर साहब अन्तर्धान हो गये । जब पहले कबीर साहब मिले तब दादूरामने पूछा कि, आपकी क्या जाति है ? कहाँ रहते हो ? क्या नाम है ? कबीर साहबने उत्तर दिया कि, मेरी जात पाँत कुछ नहीं मैं सब स्थानोंमें रहता हूँ, बूढ़न मेरा नाम है । जो मुझसे प्रेम करता है वही मुझको पाता है, दूसरा नहीं ।

सातवषोंके पीछे दादूरामको सत्यगुरु फिर दिखाई दिये, ददूरामका काम पूरा कर दिया, पीछे दादूरामका धर्म पृथिवीपर प्रचलित हुआ लोग उनके उपदेश ग्रहण करनेको आने लगे, उनकी बड़ी कीर्ति होगई; बूढ़ा बाबा दादूरामका प्रसिद्ध गुरु हुआ ।

गुरुदेव अङ्गकी साखी दादूराम बचन
सामरमें सदगुरु मिले, दिये पानकी पीक ।
बूढ़ा बाबा जस कहे, यह दादू की सीख ॥
मेरे कन्त कबीर है, वर और नहिं वरिहैं ।
दादू तीन तिलाक है, चित्त और न धरिहैं ॥
गोपालदास दादूपन्थी कृत दूसरा विश्राम

दादूरामकी जन्मसाखी

तीजे पहर निकट भई सांझा । खेलत हते सो लडकन मांझा ॥
बीते जबहि एकादश बरसू । बूढ़ा रूप दियो हरि दरसू ॥
साखी - दादू पूछे देव तुम, कौन सो जात कहाव ।

बूढ़ा जाति न पाति है, प्रीतिसँ कोई पाव ॥

चौ०- परम पुरुष परमेश्वरगामी । देव भये पद अन्तरजामी ॥
भव संसार तरन और तारू । ऋद्धि सिद्धि मुक्ती दरबारू ॥
मांग्यो आनि जो पैसा एकू । सब काहूको लियो बिबेकू ॥
बालक दीन्हो बार न लाई । रीझे बाबा सब सुखदाई ॥
विगसे बाबा निकट बुलाई । सकल शरीर हाथ तब लाई ॥
सरस्वति बोल दियो मुखमाहीं । राम दियो भेटे कोइ नाहीं ॥
सरबस देव माथ कर दीनो । बालक बुद्धि जानि नहिं लीनो ॥
एक बुंद पग ऊपर आई । चरणों लागि मुक्ति होय जाई ॥
रहे जो सात बरस घर माहीं । फिर दियो दरस निरञ्जन राई ॥
कर उपदेश भय अन्तरधाना । तब स्वामी प्रगटे ज्यों भाना ॥

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जहाँ व्यवपार पिताकर भाई । स्वामी हरिको भक्ति चलाई ॥
छाड़यो देश तज्यो घरबारा । स्वास उसास भजैं करतारा ॥
पुनि सामरको कियो पयाना । बाढी प्रीत विरह अधिकाना ॥
पारब्रह्म ते तारी लागी । गुप्त ज्योति उर अन्तर जागी ॥
झिल मिल नूर तेज निज देखी । जीवन जन्म भो सुफल विशेषी ॥
उपजा अनुभव ज्ञान अपारा । आया कबीर तुरत तेहि वारा ॥
मिले कबीर समाधि जगाई । ब्रह्मानन्द प्रकाश उगाई ॥
पदसे पद साखीसे साखी । रहनि गहनि सबही सो भाखी ॥
निर्गुण ब्रह्मको कियो समाधू । तबही चले कबीर साधू ॥
तुर्ककी राह खोज सब छाडी । हिन्दूकी करनी ते न्यारी ॥
षट् दर्शन से नाही सङ्गा । निसिदिन रहे रामके रङ्गा ॥
स्वाँग भेष पछ पंथ न मानी । पूर्ण ब्रह्म सत्य कर जानी ॥
देवी देव न पूजा पाती । तीरथ ब्रत न सेवा जाती ॥
हिन्दू तुर्कन झगडा कीन्हों । सब काहूको उत्तर दीन्हों ॥

दादूरामजीके ग्रंथों तथा जन्मसाखियोंको देखकर साराहाल मालूम हो जायगा ।

मुझको स्मरण होता है कि, लगभग आठ दस वर्ष बीते होंगे कि, एक मनुष्य मुझसे कहता था कि, अभी मैं दादूरामजीका दर्शन कश्मीरके पर्वतमें करके ही लौट रहा हूँ। परन्तु दादूपंथियोंने भी यथाशक्ति कबीर साहबका नाम छिपानेमें कुछ भी उठानेमें बाकी नहीं छोड़ा है।

शिवनारायणदासजी

शिवनारायणदासजी जातिके राजपूत कसबा चन्दबारा, (परगना जफर आबाद जिला गाजीपूर सूबा इलाहाबाद) के रहनेवाले थे। अंग्रेजी^१^ अधिकारके आरम्भकालमें सत्यगुरुका प्रताप शिवनारायणदास पर प्रगट हुआ, उनके हृदयमें प्रकाश फैल गया, उनका पंथ ससार में प्रचलित हुआ, उन्होंने कई एक ग्रंथभी बनाये थे, जो उनके शिष्योंमें विद्यमान हैं।

अगहन सुदी त्रयोदशी शुक्रवार सम्बत् १७९१ विक्रमी में शिवनारायणदासको सत्यगुरु मिले। उनसे पूछा कि, आपका क्या नाम है। तब सत्यगुरुने कहा कि, मेरा नाम दुःखहरण है। जो कोई दुःखहरणका दर्शन पावेगा उसका

^१^ अंग्रेज लोग उसी समयसे भारतवर्षमें अपनी कला, कौशल और व्यवहारादि जमाने लगे थे, पर उस समय इनका राज्य नहीं हुआ था।

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दुःख दर्द सब अवश्यही मिट जावेगा वह, बड़ा भाग्यवान् होगा। उसी दिनसे दुःखहरणजी शिवनारायणदासजीके गुरु प्रसिद्ध हुए।

शिवनारायणी लोग इस बातको कि दुःखहरण कबीर साहबका ही नाम है, भलीप्रकार जाननेपर भी कबीर साहबको बिलकुल नहीं मानते। यहाँतक कि, यदि कोई उनसे कबीर साहबको शिवनारायणदासका गुरु कहदे तो उससे बहुत द्वेष करने लगते हैं। वे लोग सत्यगुरुके नामसे ऐसे भागते हैं जैसे कि, दोपहर दिनके प्रकाशसे छुछंदर भागता है। जिस प्रकार चोर जिस धनीका माल चोरी करता है, उसको देखकर उसका नाम सुनकर भागता और अपना प्राण बचाता फिरता है, उसी प्रकार वे सत्यगुरुसे भागते हैं। यदि उनसे कोई पूछ दे कि, शिवनारायणदासका गुरु कौन है ? तो वे उत्तर देते हैं कि, वो स्वयं परमेश्वर हैं, कोई कहता है कि गुरुका नामही दुःखहरण है पर उनसे कोई पूछ दे कि, दुःखहरण कहाँ रहता है ? तो निरुत्तर हो जाते हैं। जैसे कि, नानक साहिबका जिन्दा तथा दादुरामजीका बूढ़ा है उसी तरह शिव नारायण दासजीका भी गुरु दुःखहरण है। शिवनारायणी लोग परवाना बन्दगी आदि तो कबीर पन्थियों जैसे करते हैं पर कबीरको गुरु नहीं मानते। यही कारण है कि, यह पन्थ वाममार्गियों जैसा हो गया है, इसमें अच्छे पुरुषोंकी संख्या कम है। प्रायः नीच जातिके लोग बहुत हैं। इनके आचार व्यवहार विचारने योग्य है। जब कुष्ठम ऋषि जैसे तेजस्वी पुरुषोंकी दशा, गुरु अवज्ञाके कारण भयंकर हो जाती है तो इन लोगोंकी न जाने कौनसी दशा होगी।

पाँप दास

जि. बिजनोर धामपुर नगीनामें पाँपदासजीका जन्म हुआ था, कबीर साहिबकी कृपासे इनका पन्थ प्रचलित हुआ। इस मतके लोग कबीर साहिब और पाँपदास दोनोंके ग्रन्थ रखते हैं। मेरठ दिल्ली सरधना आदिमें इनका पन्थ फैला हुआ है पर इस पन्थकी अधिक उत्पत्ति नहीं हुई है, इस मतके लोग साखी पढ़ते हैं तथा भजन आदि अपने पन्थके नियमके अनुसार करते हैं।

राधा स्वामी

इस मतके प्रवर्तक मुंशी शिवदयालु आगरेके डाक मुंशी थे इनका जन्म भाद्र. व. ८ सं. १८७५ सन् १८१८ में पन्नागली नामके मुहल्लेमें हुआ था। ये बालकपनसेही ज्ञानकी बातें किया करते थे। इन्होंने १५ वर्षतक अपने मकानके एक कोठेपर बैठकर सुरति शब्दका अभ्यास किया था। इन दिनोंमें ये घरसे न तो बाहिर निकलते थे एवं न नित्य क्रियाकी ओर ध्यान ही देते थे। १९१७

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विक्रमी में इन्होंने उपदेश देना आरंभ किया । ये ही पीछे राधास्वामी नामसे प्रसिद्ध हुए ।

मतका सार

इनके मतमें तीन चीज बहुत जरूरी हैं १ गुरु, २ नाम और तीसरे सत्संग उत्तम होना चाहिये । ये तीनों चीजें ही मुक्ति पथको देनेवाली हैं । गुरु सच्चा और पूरा होना चाहिये । दूसरे नाम भी ऊँचा और सच्चा होना चाहिये । सत्संग भी अच्छा और सच्चा होना चाहिये इनके यहाँ अन्तरंग और बहिरंग भेदसे सत्संग दो तरहका होता है । अन्तरंग सत्संगका यही स्वरूप है कि, अपने आत्माको सत्यपुरुषराधास्वामीके चरणोंमें लगा दे । बहिरंग सत्संग सच्चे साधुओंका संग करना है । इस मतमें शब्दकोही सृष्टिका रचयिता मानते हैं तथा शब्द और सुरतिकोही ये ईश्वर कहते हैं ।

इक्कीसवें हिंदायतनामा

सारवचन पृष्ठ ३८९ के इक्कीसवें राधास्वामी वचनमें समस्त स्थानोंको हाल लिखते हैं 'नासूत', 'मलकूत', 'जबरूत', और 'लाहूत' का विवरण करके हाहूतका उल्लेख करते हुये राधास्वामी कहते हैं कि, इस 'हाहूत' स्थानका विवरण सशत जानते हैं अधिक खोलना उचित नहीं समझता । बहुत कालतक उसका भ्रमण मैंने किया । फिर गुरुओंकी आज्ञासे मेरी आत्मा आगे चली ।

अब इस स्थानपर मेरा एक आक्षेप है । उसपर सब बुद्धिमान तथा दूर-दर्शी महाशय गौरके साथ ध्यान दें, कि, जो मनुष्य गुरुको अस्वीकार करता है वो फिर क्यों लिखता है कि, मेरी आत्मा गुरुके आदेशसे आगे चली ? भला जी ! जिसके गुरुही न हो उसको किसके गुरुकी आज्ञा मिलेगी, अपने तो गुरु है ही नहीं, दूसरेके गुरुको गुरु कहते बन नहीं पड़ता क्योंकि, दूसरेके गुरुको क्या गरज पड़ी है कि, वह सहायता करता हुआ मार्ग दिखावे ?

अतः इस स्थानपर उनका वचन मिथ्या हुआ उनका गुरु तो अवश्य है परन्तु उसको वे नहीं मानते । जान पड़ता है कि, या तो अपने गुरुका नाम लेनेमें उन्हें घृणा है या अपनी कुल मय्यर्दाका ध्यान आगया है या यह विचार होगा कि, मेरी श्रेष्ठता तथा बड़प्पनमें बाधा पड़ेगी, किंवा मेरा गुरु तुच्छ है । मैं बड़ाही प्रसिद्ध हूँ । मेरी मान भड़क और चमक दमकमें कुछ हानि होगी । उस गुरुका नाम होगा मेरा न होगा ।

फिर देखो पृष्ठ ३९३ आत्मा अर्थात् सुरति आगे चली । जब उस मैदानके पार पहुँचतेही सत्यलोकका नाका मिला । भलाजी ! बड़ी २ और २

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किताबोंकी तो वहाँतक पहुँचही नहीं, कबीर गुरु तथा स्वसंबेदके अतिरिक्त सत्यलोकका कोई हाल नहीं जानता, फिर आपको और किस गुरु तथा शास्त्रके अनुसार सत्यलोकका नाका प्राप्त हुआ ? उनका कथन है कि, सत्यपुरुषका दर्शन पाया, वह तेजपुञ्ज था उसके एक बालके तेजमें करोड़ों सूर्य और चन्द्र छिप जाते थे । सो इस सत्यपुरुषका दर्शन करानेवाले कौन गुरु हैं ?

फिर ३९४ पृष्ठमें लिखा है कि, एक पद्म पालङ्ग सत्यलोकका घेरा है । एक पालङ्गकी गिनती ऐसे करते हैं कि, यह तीन लोक एक पालङ्ग है । यह बनावट सरासर कबीर साहबके विरुद्ध है । कबीर साहबका कथन है कि, ये तीनों लोक छः पालंगके फैलावमें हैं, एक पालंगमें कदापि नहीं है । हजरतको पालंगकी भी हद्द मालूम नहीं । यदि कबीर साहबके ग्रन्थको देखकर पूरी नकल उतारते तो भी ठीक होता, अटकल पच्छु जो याद आया सो लिखते गये । कुछ शुद्धाशुद्धका भी ध्यान नहीं रखा । यदि पालंगका हिसाब अशुद्ध ठहरा तो सत्यलोकके फैलावका वर्णन झूठ है । जो कुछ उसने लिखा है तो सब कृत्रिम है जैसे गुरु हैं वैसेही शिष्य लोग हैं उनके विचारोंमें ये बात नहीं उपस्थित हुई कि, बिना गुरुके अगमका समाचार कौन कह सकेगा ? यह बही जाने ।

पहलेही उन्होंने स्वीकार कर लिया है कि, मुक्तिके लिये १-गुरु, २-नाम ३-सत्सङ्ग ; इन तीन वस्तुओंकी आवश्यकता है । भलाजी ? जो स्वयम् निगुरा होगा, उसके मतानुयायी किस तरह गुरुमुख हो सकेंगे ! हाँ यह तो ठीक है कि, आमके वृक्षसे आम, कटहलके वृक्षसे कटहल, अमृतके वृक्षसे अमृत, विष वृक्षसे विषही फल लगेगा । अतः जो स्वयम् निगुरा होगा उसके अनुयायी भी निगुरे ही होंगे । हाँ शिष्य तो अपनेको गुरुमुख मानेंगे परन्तु निगुरेके उपदेशसे कभी भी मुक्ति नहीं हो सकती ।

इस पन्थमें बहुत थोड़े लोग हैं । इसकी विशेष उन्नति नहीं हुई है । राधास्वामीके मतानुयायी लोग कबीर साहबके ग्रंथ पढ़ते हैं । तथा उनकी लिखावट कबीर साहबके अनुसार है । जहाँ उन्होंने कबीर साहबके विरुद्ध अपनी बनावट की है वो स्पष्ट जान पड़ती है । उनके ग्रंथोंमें सब बातें स्वसंबदकी हैं पर कबीर गुरुसे विमुख हैं । राधास्वामी अपनी उपदेश पुस्तकके दूसरे भागमें स्वयं लिखते हैं कि, ब्रह्माको जब कबीर साहबने समझाया तब उसको सत्यपुरुषके खोजनेका उत्साह हुआ पर काल पुरुषने भ्रमित कर दिया फिर जीवमें क्या सामर्थ्य है जो कि, सत्यगुरुकी दया बिना सत्यपुरुषके दर्शनको पा सके ।

इसपर मुझको यह कहना पड़ता है कि, जिस अवस्थामें ब्रह्मा ऐसे जानी

हस्तावलंबिनी कंजरी

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जिन्हें साक्षात् बुद्धि स्वरूप कहते हैं जिनकी कि, सन्तान सब मनुष्य हैं। सब ज्ञान उन्हींसे प्रगट हुआ है जब उन्हींको काल पुरुषने बहकादिया कि, सत्यपुरुष का दर्शन न पावें, तो क्या कालको यह सामर्थ्य न थी कि, राधास्वामीको बहका दे कि, तू अपने गुरुसे विमुख हो जा, जिससे तेरे साथ तेरे शिष्यगण भी मेरे जाल में फँस फँसकर जन्म मरण पावें।

यह राधास्वामी अपने ग्रंथमें अपनेको ही सत्यपुरुष मानते हैं। भलाजी ! यदि वे स्वयम् सत्यपुरुष थे तो पन्द्रह वर्षतक किसका भजन करते रहे, बिना गुरु के नाम किसने बतलाया ? किसने अभ्यास करना सिखाया ? उनके जितने लेख हैं, वे सब कबीर साहबके ग्रंथोंकी नकलें हैं, सिवाय इसको और कुछ नहीं; हां ! कहीं उनकी बनावट भी मिली हुई हैं। सत्यनाम तथा सार शब्दका उपदेश कबीर साहबके बिना और किसने दिया, अन्य कौन है कि, जो सत्यपुरुषकी भक्तिका समाचार देसके ? क्योंकि कबीर साहबको छोड़कर बाकी सब अनभिज्ञ हैं।

सत्यपुरुषके पुत्रोंमें सबसे पहला पुत्र निरञ्जन है। जिसने अपने आपको सत्यपुरुष बना, सत्यपुरुषका नाम छिपाया। इसके पीछे और भी बहुत हो गये हैं। वर्तमान कालमें विमुखोंमें प्रसिद्ध गुरुविमुख राधास्वामी जी महाराज हैं।

राय शालिग्राम' साहब राधास्वामीके शिष्य थे जो इस समय अपने स्वर्गवासी गुरुके स्थानापत्र हैं उन्होंने "सैर आलम् फिजा" नामक पुस्तकमें इस प्रकार लिखा है कि, मैं लाहृत स्थानपर पहुँचा, वहाँकी सब शोभा देखी, अदली कबीर मेरी आत्माको उस स्थानपर लेगये फिर गुरुकी आज्ञासे आगे चलते चलते सत्य लोकका नाका मिला। यह "सैर आलम् फिजा" राय शालिग्राम कृत संसारकी सैरका वृत्तान्त मैंने हस्तलिखितपुस्तकके रूपमें देखा था। उसमें तो इतनाही पता मिला। अस्तु, इतना भी धन्य है कि गुरुसे सर्वथा विमुख होनेपर भी चेला कृतज्ञ होकर इतना तो स्वीकार करता है। इस प्रकार कालपुरुषने सबकी बुद्धिपर आवरण डाल दिया है जिससे सब मनुष्य सत्यगुरुसे विमुख होकर कालके जालमें फँस गये हैं।

ये राधास्वामीजी सब गुरुविमुखोंसे बहुत बड़े हैं कारण कि, इन्होंने स्वयम् ही गुरुसे विमुखता की है। सबमें प्रथम श्रेणी निरञ्जनकी है कि, उसने सत्य पुरुषका नाम छिपाकर अपनेको स्वयम् ही सत्यपुरुष करके प्रगट किया, इसके अतिरिक्त जितने विमुख मनुष्य हैं। सभी निरञ्जनकी चालके और उसीके रूप

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के हैं। सब विमुखों तथा अकृतज्ञोंका एक ही ढङ्ग है। सब अपने नाम तथा प्रभुता के इच्छुक हैं। कबीर साहबने धर्मदाससे कहा है कि, हे धर्मदास ! यदि तू मुझ को चाहता है तो तू अपनी मान बड़ाईको त्याग दे, इस संसारसे कोई सम्बन्ध मत रख। धर्मदासने वैसाही किया, जिससे वो सत्यगुरुका स्थानापन्न हो गया। उनके वंशको सत्यगुरुने गुरुवाई प्रदान की।

जितने गुरुविमुख तथा अकृतज्ञ हैं उनका छुटकारा होना जरा असम्भव है। आदिसे अन्ततक कभी भी गुरुकी अकृतज्ञता करेगा तो फिर कालके बंधनमें निश्चय ही पड़ेगा। उसकी कदापि मुक्ति न होगी, न कोई उसकी सहायता ही करेगा। यही बात इस साखीमें लिखी हुई है कि—

साखी—गुरु सीढीते ऊतरे, शब्द विहूना होय।

ताको काल घसीटि है, राखि सकै नहिं कोय ॥

इस कारण गुरुका धन्यवाद और स्तुति सदैव करना चाहिये। क्योंकि, गुरुको छोडते ही सार रहित होजाता है, इसी बातकी विस्तारके साथ इस नमन में कहते हैं—

हम'लके बीचमें झूला^१^। हुआ जब ताप'का शूल^२^ ॥
जले ज्यों^३^ घासका पूला^४^। गुरुका शुक्र^५^ क्यों भूला ॥
हमल मादर^६^में जब सोया। पडा दुःख दर्दसे रोया ॥
वहाँकी अव'ल क्यों खोया। गुरुका शुक्र क्यों भूला ॥
वहाँ गुरुसे किया वादा^७^। सो भूला पापसे लादा ॥
यहाँ माँ वाप और दादा। गुरुका शुक्र क्यों भूला ॥
य'हाँ दर हाथियाँ डोलें। जवा^८^नौ पर्वतां तौलें ॥
न उन^९^के नामको बोलें। गुरुका शुक्र क्यों भूला ॥
किया दावा खुदा^१०^ई का। अमल हल्मो जुदाईका ॥
खबर बिन बे अदाईका। गुरुका शुक्र क्यों भूला ॥
रहे महरूम^११^ सो सबसे। भुला एहसान गुरु जबसे ॥
त'नासुखमें पडा तबसे। गुरुका शुक्र क्यों भूला ॥
गुरुका आसरा करके। सरेआजिज गुरु चरणधरके ॥
गुन^१२^ह बख'शो मेहर^१३^करके। गुरुका शुक्र क्यों भूला ॥

१ पेट, २ घबडाकर हला, ३ जठराकी तापिस, ४ दर्द, ५ जैसे, ६ पूली, ७ मिहरबानी, ८ माता, ९ जान, १० इकरार, ११ इस लोकमें, १२ जीभसे, १३ भगवान्के, १४ ईश्वर होनेका, १५ जुदा, १६ आवागमन, १७ अपराध, १८ मुआफ करो, १९ दया।

भक्त मीराबाई

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गुरुको कृतज्ञोंकी प्रशंसा जिस प्रकार स्वयम् कबीर साहब तथा सब ऋषि मुनि करते आये हैं उसी प्रकार गुरुको अकृतज्ञोंकी दुर्दशा का भी वर्णन किया है । इस विषयमें एक उदाहरण देता हूँ कि, किसी समय एक भङ्गिन गोमांसको मदिरा में पका, गन्दे बरतनमें रख शूकर के रक्तसे रंगे हुए वस्त्रसे ढँककर लिये जाती थी ? उससे किसीने पूछा कि, ऐ भङ्गिन ! तू क्या लिये जाती है ? उसने उत्तर दिया कि, गोमांस मदिरामें पका हुआ है, उसको शूकरके रक्तसे रंगे कपड़ेसे इस भयसे ढांके लिये जाती हूँ कि, कदाचित् किसी गुरुविमुखकी दृष्टि न पड़ जावे । इस पर उसकी दृष्टि पड़नेसे मांस अपवित्र होकर भस्म होजावेगा । अकृतज्ञ गुरुविमुख शास्त्रोंमें ऐसाही पतित समझा जाता है कि, ऐसी अपवित्र वस्तुको भी उसकी नजर लग जाय ।

कबीर साहबने रामानन्दस्वामीसे कहा कि—“गुरु मेटे सो आहि चँडारा । भरमें योनि अनन्त अपारा” कितने लोग तो ऐसे हैं कि, पहले बड़ी आधीनताके साथ विनीतभावसे गुरुकी सेवा कर अपना काम निकाल लेते हैं पीछे गुरुकी बात भी नहीं पूछते । गुरुको नामपर धूल डालकर संसारमें अपनी श्रेष्ठता और यश प्रकाशित करते हैं । ऐसे शिष्योंके विषयमें सन्देह है कि, उनसे गुरु अपित अमूल्य पदार्थ कहीं छीन न लिया जाय जिससे वे खालीके खाली रह जायें । यह कथन कबीर साहबका है कि, गुरुका उपकार कभी भी न भूलना चाहिये । यदि गुरुकी कृतज्ञता स्वीकार न करेगा तो अन्तःकरण अशुद्ध हो जावेगा । गुरुकी अकृतज्ञता तथा गुरुविमुख होनेका फल अन्तर वा बाहर सब प्रकारसे प्रगट होगा । गुरु विमुखोंकी बड़ी दुर्दशाएं होती हैं ।

घीसाजी

अभी कुछ दिनोंसे एक घीसा पन्थ भी चला है । कबीरपन्थसे निकला हुआ सुनते हैं । इनका विशेष विवरण अभीतक मेरे पास नहीं पहुँचा है । इस कारण नाममात्र लिख दिया है । यह पन्थ कहीं दिल्लीके समीप सुना जाता भी है । इसके बहुतसे साधु तथा गृहस्थ अनुयायी हैं । मुझ दीनकी जिह्वा तथा लेखनी में इतनी सामर्थ्य नहीं है कि, कबीर साहबके हंसोंकी प्रशंसा व बड़ाई कह अथवा लिख सकें पर जो कुछ होसका है विशुद्ध श्रद्धासे किया है । कबीर साहबके अनन्त हंस हैं, उनके अनन्तही पन्थ हैं, करोड़ों असी ब्रह्माण्ड हैं, जिसमें हंस कबीर ईश्वरीय शासन कर रहे हैं, वे सब सत्यगुरुके आज्ञाकारी हैं । किसीकी सामर्थ्य नहीं कि, साहबसे विमुखता कर सके । जो कोई साहबकी आज्ञाके विरुद्ध कार्य करता है वो तत्कालही ऐसा दण्ड पाता है कि, फिर कभी उसे कुछ करनेका साहस नहीं हो ।

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अध्याय १६.

आद्या और निरंजनपर जीत

आद्या और कबीर

जितने अभिमानी और अहंकारी हैं उन सबमें बढ़कर आद्या तथा निरंजन हैं। आद्याका दूसरा नाम आदिभवानी है। इसे कोई कोई विज्ञान प्रकृति कहकर भी याद करते हैं, जब ये बहुत अभिमानमें आयीं एवं सत्यपुरुषको भुलाकर निरंजनके साथ प्रसन्नता पूर्वक रहने लगीं, संसारमें विशेष अन्धेर होने लगा तो सत्यपुरुषकी आज्ञा हुई कि, हे ज्ञानीजी ! तुम जाकर आद्याको समझाओ। क्योंकि, वह बहुत अभिमानी भी होगई है, एवं बहुत जीव हत्या करती हैं। इस बातपर ज्ञानीजी सत्य पुरुषको नमस्कार करके चल दिये और प्रकृतिको जीत कर दिखा दिया। यह प्रकरण अम्बुसागरके नवम तरंगमें लिखा है कि—कबीर साहिब धर्म-वासजीको सुनाते है कि, मुझे सत्यपुरुषने आज्ञा दी कि, आद्या जीबोको सत्ता रही है इस कारण तुम आद्याके पास जाकर आद्याको समझा दो। सत्यपुरुषकी आज्ञाके अनुसार कबीर साहब आद्याके धामपर गये। द्वार पर खड़े होकर द्वारपालोंसे कहा कि, आदिभवानी से मेरा आनेका समाचार कहो। द्वारपालोंने आद्याको समाचार दिया, उसने कबीर साहबको अपने दरबारमें बुलाया। जब साहब भीतर गये तब आद्याने पूछा कि, आप कौन हो कहाँसे आये हो ? तब कबीर साहब ने उत्तर दिया कि, मैं सत्यलोकसे आया हूँ और सत्यपुरुषने मुझे तुम्हारे पास भेजा है, क्योंकि, संसारमें तुमने बड़ा अत्याचार तथा अन्धेर मचा रखा है। जब (दुर्गापूजा) दशहरा आता है तब भैंसा बकरा आदि कटवाती हो भांति भांति के फन्दे लगाकर मनुष्यको तुमने बन्धनमें डाल दिया है। तेरे फंदेमें फँसकर सब जीव मरते और दुःख पाते हैं। मूर्ख तथा बुद्धिहीन मनुष्य सत्यगुरुक शब्दको न मानकर तेरी फाँसीमें पड़ते हैं। तू सत्यगुरुकी चोर है। मैं तुझको बांधकर एक पलमें रसातल भेज दूँगा, यह सुनकर देवी कहने लगी कि—

चौ०—कह देवी तू कैसे बोले। शक्ति हमारी घर घर डोले॥
पुरुष तुम्हार में नहिं डरऊँ। तीनों लोक पाँव तर धरऊँ॥
तुमको मारूँ चाँपू हेठा। तीन लोक पसरी मम डेठा॥
ब्रह्मा विष्णु हाथ सब मोरे। शिव सनकादिकके बल तोरे॥
चौसठ लाख कामिनी होई। मेरे सङ्ग विचर सब सोई॥
तुम्हरे हंस कहाँ चलि आवा। केहि कारनतोहिपुरुष पठावा॥

शाहसिकन्दर लोधीकी दीक्षा

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नाम गुमान करो शठहारा । हमरे चित डर नाहिं तुम्हारा ॥
हाथ खप्पर मम भुजा अनन्ता । अपने वश कीन्हें भगवन्ता ॥
हम पर धनी और नहिं आना । तीन लोक मम नाम बखाना ॥
तुम कह गर्व करो रे भाई । कहो तो लोक मैं देउँ खँसाई ॥
तुरतहि रूप अनेकन धारुँ । लोक तुम्हार रसातल डारुँ ॥

शठिहार वचन

कह शठहार सुनो हो माया । कहा तोर मति गई भुलाया ॥
जादिन आदि अन्त नहिं जोती । ता दिन कहो कहाँ तुम होती ॥
पुरुष अकार कहो जिन जानी । शब्द डोर तोहि बाँधो तानी ॥
कामिनि तोहि करौं जर छारी । सकल हंसको लेउँ उबारी ॥
आदि पुरुषको तू कस मेटै । छोड़ै पुरुष काल उर भेटै ॥
अस जनि जानो सकल हमारा । देव आप होइहो जरि छारां ॥
हम तो सत्यलोक ते आवा । देवी तुम्हारो ज्ञान हिरावा ॥
पुरुष कीन्ह तोहि तब तुम भयऊ । तीनों लोक बखश तोहि दयऊ ॥
तुम जानी मैं आपन कीन्हा । पुरुष नामते नहिं चित दीन्हा ॥
अलख निरञ्जन देवी राता । विधि हरिहर कहै करिहैं बाता ॥
महा प्रलय आवैं जेहि बारा । तब जरबर होई है सब छारा ॥
तीन लोक परलय तर जाई । तब तुम आद्या कहाँ रहाई ॥
उनसे तू कर कौन गुमाना । जाकर चले जगतमैं पाना ॥
आदि पुरुष तुमरो है ताता । आद्या भयो निरञ्जन भ्राता ॥
ताहि तातको छोड़ेउ संगा । भ्राता जार कीन्ह अरधङ्गा ॥
ताहि रङ्गत गयी भुलाई । छोड़यो पुरुष जार मन लाई ॥
निशिवासर कीन्ह्यो यह नेहा । कामरूप कामिनि मत येहा ॥
तुच्छ बद्धि नारी तुम बाना । यही चाल जगनारि समाना ॥

देवी वचन

यह सुनि माया बहुत लजाई । धरि सिंहासन तब बँठाई ॥
बचन हमार सुनो शठिहारा । नाम जपे सो हंस उबारा ॥
हमतो पुत्री पुरुष की आहू । शब्द डोरि हंसन ले जाहू ॥
जो कोई नाम तुम्हार सुनाई । शीश हमार पावैं दे जाई ॥
चौसठ युग हम सेवा कीन्हा । पृथिवी बखश मोहि प्रभु दीन्हा ॥
तीन लोक मैं मर्दो माना । किमि हंसा कर लोक पयाना ॥

कमालजी

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शठिहार वचन

कह शठिहार सुनो तुम वाता । सकल जीव तुम कीन्हो घाता ॥
जो कोई जीव हमारा होई । ताके निकट जाहु जिन कोई ॥
जा घट शब्द हमार समावे । ताघट काल निकट नहिं आवे ॥

देवी वचन

तात वचन लीन्हे शठिहारा । को मेटे यह वचन अपारा ॥
हट करि वचन मेटि में डारा । तो हम होब लोकसे न्यारा ॥
जीव जो पुरुष नाम ते राता । ताहि हंस नहिं बोलब वाता ॥
एक तुम्हार पान जो पाई । देवी देव देख शिर नाई ॥
भीतर करनी बहुत गुमाना । ताकर जीव करब हम हाना ॥
गुरुसे मन चित अन्तर राखा । साधु सन्तसे डुरमति भाखा ॥
सो जिव हमरे खपर पराई । बार बार चौरासी जाई ॥
नाम तुम्हार कोई नहिं जाना । सकल जीव हमही लपटाना ॥
मुक्ति युक्ति सब भाखत प्रानी । मुक्ति नाम परवाना जानी ॥
मो कहैं और न जानौ दूजा । निशिदिनहम चित तुम्हरो पूजा ॥
सार नाम जिन पाय तुम्हारा । सो तो पहुँच पुरुष दरबारा ॥
ताहि जीव हम रोकब सोई । द्रोही पुरुष केर जो होई ॥

शठिहार वचन

विश्वायुग यह चरचा कीन्हा । पान रतन जीवन को दीन्हा ॥
तुरी बराबर नरियर जाना । चार हाथ लम्बा रह पाना ॥
दुई हाथकी रही चकराई । ऐसे युग हम पान चलाई ॥
बीस लाख युग अयुरबलभाखा । वर्ष सहस्र मानुष तन राखा ॥
अरसठ हाथ ऊँचाई होई । ऐसे नर सकलो तब सोई ॥
सात सहस्र पाये जिव दाना । सत्य शब्द निश्चय कर माना ॥
पुरुष दरश ते जिवन कराई । देवी वचन कहा समुझाई ॥

छन्द— यह चरित्र कर शठिहार तत छिन, पुरुषको दर्शन लहे ।

कीन्ह माया वाद बहु विधि, चरण तुम निश्चय गहे ॥

विश्वयुगमें जाइके हम, हंस कीन्ह उबार हो ।

जीव सातसहस्र खाय बीडा, आय लोक मँझार हो ॥

इस ऊपरके कहे प्रकरणसे पाठक महोदयोंको यह बात सुतरां विदित होगई होगी कि, कबीर साहिबने प्रकृतिपर किस प्रकार विजय पाई थी ? अब

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जगत्के अभिमानो यानी निरंजन पर किस प्रकार उन्होंने विजयडंका बजाया
था यही बात अब यहां विस्तारके साथ लिखते हैं —

निरञ्जन गोष्ठाका संक्षेप

चौ०—अलख निरंजन निर्गुण राई । तीन लोक जिहिं फिरी दुह्राई ॥
सातद्वीप पृथिवी नौ खण्डा । सप्त पताल इकीस ब्रह्मण्डा ॥
सहज शून्यमें कीन्ह ठिकाना । कालनिरंजन सबने माना ॥
ब्रह्मा विष्णु और सब देवा । सब मिलि करें कालकी सेवा ॥
चित्र गुप्त धर्म बरियारा । लिखनी लिखे सकल संसारा ॥
लख चौरासी चारों खानी । लिखनी लिखें सकल सब जानी ॥
पशु पंछी जल थल बिस्तारा । बन पर्वत जल जीव बिचारा ॥
काल निरञ्जन सबपर छाया । पुरुष नामको चिन्ह मिटाया ॥
सत्तर युग ऐसे चल गयऊ । पुरुष संदेश सूचित तेहि दियऊ ॥

पुरुष वचन

तबहीं पुरुष ज्ञानीसे कहेऊ । धर्मराय अति परबल भयऊ ॥
यह तो अंश भया बरियारा । तीन लोक जिव करे अहारा ॥
ताहि गारिके देहु ढह्राई । जगजीवन कहैं लेहु छुड़ाई ॥

ज्ञानी वचन

साखी—करि प्रणाम ज्ञानी चले, करत हंसको काज ।
जो वह काल न मानि है, तुमहिं पुरुषको लाज ॥

चौ०—मानसरोवर जब ज्ञानी आये । काल निकट तब छेंके धाये ॥
काल कठिन गरजै बहुबारा । मस्तक साठ सुण्ड बरियारा ॥
सत्तर योजना गरजै दन्ता । परलय कीन्हें कोटि अनन्ता ॥
कान जो एक आँख चौरासी । और मुख आठहाथ लियफाँसी ॥
छत्तिस नाभि ताहि पुनि जाने । बोले वचन बहुत इतराने ॥
तीन दन्त पाछे कहैं फेरी । यहि विधि तीन लोक करजेरी ॥
एक दन्त पाताल चलावा । तहाँ जाय वासुकि कहैं खावा ॥
दूजो दन्त पृथ्वी चल आई । देव ऋषी जग देत सुखाई ॥
तीजा दन्त गयो आकाशा । चाँद सूर्य खायो कैलाशा ॥
वेद पढत ब्रह्मा तेहि ठाई । ध्यान करत शङ्कर तब खाई ॥
लीन्हयो खाय विष्णुको धाई । सकल खाय पुनि धूल उड़ाई ॥
गरजै दन्त अग्नि सम थाई । तीन लोक खाये दुनियाई ॥

गरीब दास

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ज्ञानी देखा दृष्टि पसारी । यहि ते नहीं बचे संसारी ॥
ज्ञानी बोले शब्द परचाई । तुही काल खाये दुनियाई ॥

निरञ्जन बचन

साखी—जाव ज्ञानी घर आपने, मानो बचन हमार ।
तीन लोक मोहि पुरुष दिये, स्वर्ग पताल संसार ॥

ज्ञानी बचन

चौ०—ज्ञानी बोले शब्द अपारा । मोकहैं पुरुष दीन टकसारा ॥

साखी—हम पठये हैं पुरुष को, करें हंसको काज ।

काल मारि संधार हूँ, दीन सकल मोहि राज ॥

चौ०—मारूँ काल शब्दके झारा । टूटै दन्त कबीर पसारा ॥

निरञ्जन बचन

तबै निरञ्जन बोले बानी । कैसे हंस छोड़ाये ज्ञानी ॥

जगके माँहि कीन हम बासा । पशु पछी सबमें मम आसा ॥

तीनसो साठ पेट हम लाई । ताते सकल सृष्टि अरुझाई ॥

जेहि दिनते सो पेट लगाई । दिनदिन अरुझे सरुझि नहिं जाई ॥

तापर काम क्रोध हम डारा । तृष्णा सकल जीव हम मारा ॥

इनमें जीव बँधे सब झारी । कैसे हँसने लेहु उबारी ॥

ता ऊपर कीन्हचों यक काजा । पुण्य पाप हम थापै राजा ॥

शुभ अरु अशुभ दोइ दलसाजा । ऐसै अलख निरञ्जन राजा ॥

ज्ञानी बचन

सत्य शब्द हम बोलें बानी । बचन हमार छूटिहैं प्रानी ॥

गहे शब्द मम मन चित लाई । भजे काल जिव लेब बचाई ॥

काल बचन ।

तबै काल अस बोले बानी । सकल जीव बस हमरे ज्ञानी ॥

तीनसौ साठ क्षेत्र अरुझाई । कैसे जीव लेहो मुकताई ॥

गङ्गा यमुना सरस्वती जानी । पुष्कर गोदावरि छौछक्का मानी ॥

बदरी केदार द्वारिका ठयऊ । जहाँ तहाँ हम तीरथ लयऊ ॥

मथुरा नगर उत्तम जो जानी । जगरनाथ बैठे यमध्यानी ॥

सेतु बन्ध पुनि कीन्ह ठिकाना । पुष्कर क्षेत्र आहि यमथाना ॥

हिङ्गलाज जैसे जिव सोई । कालिका नगरकोटमें होई ॥

गढ़ गिरिनार दत्तको थाना । ताहि घेर यम बैठ निदाना ॥

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कमरू मांहि कमक्षा जानी । नीमक्षार मिश्री यम खानी ॥
नगर अयोध्या राम हैं राजा । कहहि दैतें बांधे सब साजा ॥
यही पैठ जग जीव भुलाई । केहि विधि जीव लेहु मुक्ताई ॥

ज्ञानी वचन

तब ज्ञानी बोले अस बानी । यमते जीव छोड़ैहौं आनी ॥
पुरुष नाम कहूँ समझाई । यम राजा तब छोड़ि पराई ॥
घाट बाट बैठे अरु झेरा । हमरे शब्दते होय निबेरा ॥
सुनुरे काल दुष्ट अन्याई । शब्द सन्धि हंसा घर जाई ॥

निरञ्जन वचन

केहि ज्ञानी देहु अधिकारा । हमसे नहि छूटे यम जारा ॥
पाँच पचीस तीन गुण आई । पहले सकल शरीर बनाई ॥
तामें पाप पुण्यका बासा । मन बैठे ले हमरो फाँसा ॥
जहाँ तहाँ सब जग भरमावे । ज्ञान सन्धि कछु रहन न पावे ॥
एक शब्दके केतक आसा । हमरे हैं चौरासी फाँसा ॥

ज्ञानी वचन

बोले ज्ञानी वचन विचारी । छूटे चौरासीकी धारी ॥
छूटे पाँच तीस गुण तीनी । ऐसो शब्द पुरुष मोहि दीनी ॥

निरञ्जन वचन

हो ज्ञानी क्या करो बड़ाई । हमते नहीं छूटि जिव जाई ॥
इतने युग हम तुम नहि पेखा । ज्ञानी हंस न एको देखा ॥
क्या तुम करो क्या शब्द तुम्हारा । तीनलोक परलय करि डारा ॥
साधु सन्त हम देखा रीता । परलय परे सकल जग जीता ॥
करम रेख बांधे सब साधू । सुरनर मुनी सकल जग बाँधू ॥

ज्ञानी वचन

ज्ञानी कहैं काल अन्याई । शब्द बिना तैं खाइ चबाई ॥
अब कैसे कहिये बटमारा । पुरुष शब्द दीना टकसारा ॥
जग जीवनको लेउँ उवारी । करम रेख तोरौं धरि न्यारी ॥
तीन सौ पाँच और गुण तीनी । तेहिंते हंसा लेइहौं छीनी ॥
पाँच जनैकी मेटूं आसा । पुरुष शब्द भाषूं विश्वासा ॥
शुभ अरु अशुभको करूँ निबेरा । मेटूं काल सकल अरुझेरा ॥

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निरञ्जन वचन

निर्गुन काल तो बोले बानी । अरुझे जीव सकल यमखानी ॥
कैसेके तुम शब्द पसारो । कौन विधि तुम जीव उबारो ॥
ऐसे जीव सकल है धरनी । कैसे पहुँचे पुरुषकी शरनी ॥
जगमें जीव क्रोध विकारा । कैसे पहुँचे पुरुष दुवारा ॥
क्रोधी जीव प्रीति अभिमानी । धरे सो जन्म नरककी खानी ॥
लोभी होय सर्व विकारा । माटी भस्ने जीव अधिकारा ॥
लोभी जन्म शूकर औतारा । कैसे पावे मुक्ती द्वारा ॥
विषया विष सब विषकी खानी । यह सब है जनमकी सहिदानी ॥

ज्ञानी वचन

ज्ञानी कहैं सुनो बरियारा । हमतो कीन सकल निर्धारि ॥
जो कोइ प्राणी होय हमारा । काम क्रोधते रहे निनारा ॥
तृष्णा लोभ सब देइ बहाई । विषय जन्म तब दूर पराई ॥
उनको ध्यान शब्द अधिकारा । काम क्रोध सब होत निनारा ॥
नाम ध्यान हंसा घर जाई । कहा दूत यम करे बडाई ॥
उनपर यमकी परे न छाहीं । ताते हंस लोकको जाहीं ॥

निरञ्जन वचन

कहैं निरञ्जन सुनोहो ज्ञानी । कथिहौं ज्ञान तुम्हारी बानी ॥
जगत महात्म सबै बताई । नाम तुम्हारे पन्थ चलाई ॥
जगके जीव सभी भरमाऊँ । ज्ञानवन्तको करम दूढाऊँ ॥
मारि जीवको करूँ अहारा । कथूँ ज्ञान तुम्हरे टकसारा ॥
ज्ञान हमार रहे तन छाई । ते सब जीव काल धरि खाई ॥
कैसे जैहैं लोक तुम्हारे । ज्ञान सन्धिमें मूँदूँ द्वारे ॥

ज्ञानी वचन

ज्ञानी कहैं सुनौ बरियारा । हमरे हंस होई हैं न्यारा ॥
नाम जपै औ सुरति लगाई । मैल करम लागे नहिं भाई ॥

निरञ्जन वचन

ज्ञानी मोरा पिरियल ज्ञाना । वेद कितेब भरम हम साना ॥
यह विधि जगके जीव भुलाई । जरा मरण सब वन्द्य बँधाई ॥
सूतक पातक वेद विचारा । पूछे वेद तब करैं सँभारा ॥
एकादशी मुक्तिकी माई । यो युक्ति करिबे अधिकाई ॥

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ज्ञानी बचन

सुनुहो काल ज्ञानकी सन्धी । छोडे जीव सकलकी फन्दी ॥
जब निज हंसा बीरा पावै । योग युक्ति तब सबै नसावै ॥
वेद कितेबकी छोडो आशा । हंसा करें शब्द विश्वासा ॥
योग यज्ञ तप होईहै छारा । अमृत नाम सदा रखवारा ॥
शब्द हमारे छूटे फन्दा । पहुँचे लोक मिटे यम द्वन्दा ॥
आवागमन बहुरि ना होई । काल फन्द तजि न्यारा सोई ॥

निरञ्जन बचन

ज्ञानी कहो मर्म सोई भाई । मेरो फन्द तोरको जाई ॥
कर्म जञ्जीर धांबि संसारा । योनी हम जञ्जाल पसारा ॥
तीन लोक योनी उत्तरि हैं । आवागमन फेरि फिरि परि हैं ॥
सिद्ध साधु और बड बड ज्ञानी । बाँधि बाँधि कीन्हा पिसमानी ॥
कर्म रेखते कोई न न्यारा । तीन देव सुर असुर पसारा ॥

ज्ञानी बचन

ज्ञानी कहें सुनु काल पसारा । करिहैं दूर जञ्जीर तुम्हारा ॥
हंसन लेइहैं तुरत उबारी । पुरुष शब्द दीना मोहिं मारी ॥
खण्ड खण्ड तोरूँ तोरवाना । मारूँ काल करूँ पिसमाना ॥
पुरुष अंश नौतम है अंशा । तेजमें प्रकट कहावै वंशा ॥
तिन्हके शरण हंस जो जाई । काटि कर्म सब देहिं बहाई ॥

निरञ्जन बचन

मान्यो ज्ञानी बचन तुम्हारा । हंस ले जाव पुरुष घरबारा ॥
चौदह काल काल यम मेरा । घाट वाट घेरें सब घेरा ॥
सुरनर मुनि आवें वहि घाटा । दश औतार जाँय वहि वाटा ॥
दुष्ट जगाती बड सरदारा । विना जगात न होइ कोई पारा ॥
भव जल नदी घाट नहिं थाहूँ । उत्तरन काज किये सब काहूँ ॥

ज्ञानी बचन

वंश छाप जो पावें प्राणी । ताको नहिं रोके दूग दानी ॥
शब्द सार दे हंस बहोरी । तेहि चढ़ि जाय काल मुख तोरी ॥

निरञ्जन बचन

हो ज्ञानी क्या करो बडाई । तमके काल निरञ्जन राई ॥
पौंव पताल शीश आकाशा । सोलह योजन अग्नि प्रकाशा ॥

नौबाब विजलीखां, रविदास

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गरजै काल महा विकरारा । सत्रह लक्षलों पाँव पसारा ॥
लपक जीभ यम टूटे तारा । यह बिजली चमकै अधिकारा ॥
ओंठ भयावन दन्त अतिबाढा । मध्य घेर ज्ञानीको डाढा ॥
हमरो पौरुख हम बरियारा । तुम ज्ञानी क्या करो हमारा ॥

ज्ञानी बचन

ज्ञानी पुरुष शब्द कियो जोरा । पकडे दन्त मुण्ड घुमेरा ॥
मान्यो शब्द पाय कर पेले । तोन्यो सुण्ड समुन्दर मेले ॥
पुरुष स्वरूप तबहीं पुनि धारा । योनि स्वरूप काल औतारा ॥

निरञ्जन बचन

भया अधीन काल करचोरी । तुम सत्पुरुष हम अंश तुम्हारी ॥
तुमसे बाल बुद्धि हम धारा । तुम जीवनके तारन हारा ॥
तुम सत्पुरुष दीन्ह मोहि राजू । अरु मोहि दीन्ह सकल सुख साजू ॥
अब लगि साहब हम नहि चीन्हां । सत्यपुरुष तुम दर्शन दीन्हा ॥
दोउ कर जोरि चरणचित लावा । धन्य भाग्य हम दर्शन पावा ॥
अब मोहि साहब देव बताई । पाऊं चिह्न वंश मुकताई ॥

ज्ञानी बचन

साखी—जो निज मेरा पाइ है, आवे लोक हमार ।
ताको खूट तु मत गहो, सुनो काल बट मार ॥

निरञ्जन बचन

चौ०—हे साहब एक विनती मोरा । वेंरा पायकरहु कछु औरा ॥
ज्ञान कथे अन्ते चित सासा । आवागमनको राख्यो आसा ॥

ज्ञानी बचन

सुनो निरञ्जन बचन हमारा । नहीं हंस वह जीव तुम्हारा ॥

काल बचन

कहे काल तुम भली निकारी । सन्धि देख हम क्रोध उतारी ॥
कीन्ह दण्डवत् और प्रणामा । सुन्न शिखर कीन्ह्यो विश्रामा ॥

ज्ञानी बचन

धर्मदास तब मनमें आई । गाहुर देशमें धारा पाई ॥
सतयुग सत्यनाम मम नाऊ । देही धरि मैं मनुष कहाऊँ ॥
प्रथमैं सतयुग लागा भाई । नूप हीचन्द दे तहाँको राई ॥
तहँवा जाय शब्द गोहराई । जो चीन्हें तेहि लोक पठाई ॥