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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

पाँच देहके नाम, पाँचों वाणियोंके नाम धर्मकी खोज

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अमलसे आदमी है वरनः चौपाया विचारा है ॥
अमल कर नेक गर आज्जिज अमल नस्क मिटावेगा ।
अमल करले अमल करले अमलही काम आवेगा ॥ ५ ॥

ईश्वर विषयक सिद्धान्त

पुरुष सूक्तका सिद्धान्त

एक पुरुष है जिसके बहुतसे शिर, नाक, आँखें, कान, मुंह, जिह्वा, पद और अङ्ग हैं, गुप्त प्रकट असंख्य ही इन्द्रियाँ हैं, सारे संसारमें वही व्यापक है। सब जीवधारी उसीकी आँखोंसे देखते हैं, उसीके कानोंसे सुनते हैं, वही सबके अन्तःकरणमें है, वह तीनों कालमें समान है, सबका स्वामी है, अद्वैत और अनुपम है, अनाम है, अक्रिय है, उसका कोई स्थान नहीं सब स्थानोंमें वही है, यह संसार उसके प्रकाशका लघुसे लघु किरण है, ऋग, यजु और साम ये तीनों वेद रज, सत, तम ये तीनों गुण उसीके प्रागटच का परमाणु है, उसीसे उत्पत्ति स्थिति और लय है। प्रणवके तीनों अक्षर उसीसे प्रगट होते हैं वह पुरुष जब स्वांस नीचेको छोड़ता है तो सारा संसार जीवित हो जाता है ऊपर को खींचता है तो प्रलय हो जाता है, ये सब क्रियाएँ होती रहती हैं पर वह पुरुष आप निलैप रहता है।

जब वह सृष्टि उत्पन्न करनेकी इच्छा करता है तो प्रथम हिरण्यगर्भको प्रगट करता है इससे सब जड़ चैतन्य और विराट पुरुष प्रगट होते हैं।

हिरण्यगर्भ अर्थात्-प्रजापति उससे मनु-अर्थात् आद'म और मनरूप-अथवा हौवा होते हैं जिससे सृष्टि होती है।

यज्ञ और जगतका एकही अर्थ है। पुरुष यज्ञ स्वरूप है, सब वस्तुयज्ञसे हुआ करते हैं उसीमें हवन होनेसे लय हो जाते हैं। वेदके ज्ञाता लोग इसी कारण अङ्गोंके समान है। ज्ञानी, पण्डित, वेद और शास्त्रके ज्ञाता, शास्त्रज्ञ, शास्त्रानुसार कर्म करनेवाले, सदाचरणमें बरतनेवाले, पापोंसे घृणा करनेवाले, दैवी सम्पत्तिसहित अपनी आयुको जगत्के उपकारमें बितानेवाले, ऋषि और मुनियोंके समान शरीरयात्रा करते हुये सर्वदा पुरोपकारमें रहनेवाले, विराट पुरुषके शिर हैं। राजा, तन्त्री, ज्योतिषी, वैद्य आदि जिनसे जगत्की रक्षा होती है जिसके द्वारा सब अपनी मर्यादापर चलते हैं, वाँह हैं। वाणिज्य करनेवाले,


१ समष्टि सूक्ष्म अभिमानी देवताको हिरण्यगर्भ कहा करते हैं। २ समष्टि स्थूलके अभिमानी देवताको विराट कहते हैं। ३ मानवी सृष्टिके प्रवर्तकोंको पाश्चात्य साहित्यकवाबा आदम और भी हौवा कहते हैं।

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खेती करनेवाले, कारीगरी प्रगट करने नानाप्रकारकी वस्तुओंद्वारा लाभ पहुँचानेवाले, पेटके समान हैं । सब प्रकारकी सेवा करनेवाले सेवक, जिनको कि न विद्या है न बुद्धि है वे बैलोंके समान कमाते हैं दूसरोंके आश्रय जीवन व्यतीत करते हैं, कुर्तोंके समान द्वार द्वार फिरते हैं वे उसके विराट रूपके पग हैं । पशू मांस, अस्थि और चर्मके समान हैं । वनस्पती उसके नख केश हैं, चन्द्रमा मन है, सूर्य आंख है, वायु प्राण हैं, अग्नि वाक्य है, पृथिवीनाभि है, वैकुण्ठशिर है, पाताल पगका तलवा है, दश दिशा कान हैं । इस प्रकार समष्टि स्थूलका नाम विराट है, समष्टि स्थूलही पुरुषका रूप है । इस यज्ञकी सामग्री यह है कि वसन्त ऋतु घोंके समान है, ग्रीष्म लकड़ी है, शरद ऋतु शाकल्य है, सात समुद्र सात काष्ठ हैं, जिससे हवन कुण्डका घेरा बनाते हैं, वेदमन्त्र उसके समान है जिससे अग्निमें शाकल्य छोड़ते हैं ।

प्राचीन कालमें देवता लोग इस यज्ञ को करके परम आनन्दको प्राप्त कर शोकसे छूट जाते थे । हिरण्यगर्भ समष्टि सूक्ष्मका नाम है, उसीसे तत्व प्रगट हुये, उसीमें लय हो जाते हैं, वैसे सूर्यकी किरण सूर्यमें समा जाती हैं, उसी प्रकार सब उसी पूर्ण अनन्त प्रकाशमें लय होजाते हैं । इस भेदको जो समझे वह अज्ञान सागरसे पार हो जावे और सत्यज्ञान पावे । प्रजापति स्थूल समष्टिसे आशय है; हिरण्यगर्भ समष्टि सूक्ष्म है जो इनको परमात्मा समझते हैं वे भूलमें हैं । सभस्त संसार प्रजापतिमें । प्रजापति हिरण्यगर्भमें और हिरण्यगर्भ उस पुरुषमें हैं । इसभेदको ब्रह्मज्ञानी समझते हैं जो समझते हैं वे भली प्रकार जानते हैं कि, हिरण्यगर्भ मैं ही हूँ सभस्त संसार जिससे प्रगट हुआ है वो मैं ही हूँ ।

जो कुछ कहा सुना और लिखा गया है उस अनन्त प्रकाशका वह एक किरण है, उसीको वारम्बार नमस्कार है । जो उस भेदको समझे वैसाही निश्चय करे उसको लोक परलोकका सब आनन्द प्राप्त होता है सब देवते उसकी आज्ञा मानते हैं ।

सारे संसारमें सूर्य श्रेष्ठ है । सबको उचित है कि, अपनेमें और अपनेको सबमें समझे, जैसा विराट पुरुषका वर्णन लिखा गया है वैसाही अपनेमें ध्यान करे ।

जैन धर्मका सिद्धान्त — निरञ्जन परमात्मा वैकुण्ठमें रहता है, वह न कुछ करता है न कराता है, उसको न किसीसे मित्रता है न शत्रुता, सर्व जीव अपने २ कर्म्मोंका फल पाते हैं, परमात्मा निलैप और अकर्त्ता है ।

योगी और संन्यासियोंका सिद्धान्त — निरञ्जन परमात्मा सहस्रदल कमलमें रहता है, प्रणवकी उपासनासे उसका दर्शन होता है ।


१ कंवलयसूत्रमें प्रतिपादित है ये आज केवलनाथ और केवली करके भले ही कुछ मानते हों पर निरंजनका तो जिक्र भी नहीं हैं ।