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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

अनुमान, राजहंस राजहंसिनीकी सावधानी

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अगस्त्यब्रह्मिणे देवताओंकी प्रार्थनाको स्वीकार किया । देवता बड़े प्रसन्न हुये । अपने २ स्थानको गये । पीछे मुनि अपनी स्त्रीसे कहने लगे कि, प्रिये ! यह महान् अनर्थकारक विघ्न उपस्थित हुआ है, पुरातन मुनियोंने कहा है कि, मुमुक्षुओंको काशीवासमें विघ्न भी बहुत होते हैं । काशीमें निवास करते वही विघ्न मुझे भी उपस्थित हुआ है । इस प्रकार अपनी पत्नीसे कह गंगामें स्नान कर, सब देवताओंका दर्शन कर, स्त्रीसहित काशीसे बिदा हुये । काशीके विरहसे सन्तप्त हो बारंबार काशीका स्मरण करते, तपके बलसे अल्प कालमेंही भृंगोंको उठाये हुये विध्या पर्वतके पास पहुँच गये । अपने पास खड़े हुये मुनिको देख पर्वत कंपायमान होगया सूक्ष्म हो दण्डवत करने नीचे झुकर पृथ्वीका स्पर्श करने लगा । अगस्त्यजी भक्तिभावसे पृथ्वीमें दण्डवत करते हुए विन्ध्य पर्वतको देखकर, अति प्रसन्न हो कहने लगे कि, हे वत्स ! मैं तुम्हारे उच्च शिखरों को नहीं उलंघ सकता, इस कारण जबतक मैं न आऊँ तबतक तुम योंही स्थित रहो । पीछे उसके शिखरोंको लांघते हुवे दक्षिण दिशाको चले गये । विन्ध्याचल उसी प्रकार पड़ाही रह गया ।

गंगाजीकी कथा ।

इसी प्रकार देवीभागवतके ९ स्कन्धमें नदियोंकी बहुतसी कथा हैं । प्रथम गंगाजी गोलोकमें कृष्ण भगवान् के पास थी, एक समय राधाजी भगवान् कृष्णको गंगाजीसे बात करते देखकर क्रोधित हुई उसीके भयसे गंगाजी कृष्णजीके चरणोंमें लुप्त हो गई ।

गंगाजीके लुप्त होते ही जल सूख गया, सर्व प्राणी जलके अभावसे दुःखी होने लगे, देवताओंसहित त्रिदेवतोंने कृष्णजीके निकट जाय बहुत विनय करके कृष्णजीके चरणोंसे गंगाको प्रगट कराया, पीछे विष्णु भगवानसे विवाह हुआ । किसी कालमें ब्रह्मलोकमें किसी राजापर मोहित होनेके कारण ब्रह्माजीके शापसे पृथ्वीपर स्त्रीरूपसे जन्मले शन्तनु महाराजकी भार्या बनी ।

शन्तनु महाराजसे विवाह होनेके समय गंगाजीने वचन लिया था कि, मेरे गर्भसे जो संतान उत्पन्न होगी उसे मैं लेलूँगी । राजा भी बाचाबन्ध हो गये । पीछे सात पुत्रोंको जन्म लेतेही गंगाने गंगामें डाल दिया पर जब आठवाँ पुत्र उत्पन्न हुआ तो महाराजने पुत्रके लोभसे मोहमें आकर कहा कि, यह पुत्र मैं तुम्हें न दूँगा । गंगाजी पूर्व वचनके अनुसार गंगामें प्रवेश कर गई । वेही गंगाजीके आठवें पुत्र महान् प्रतापी भौमविजयी भीष्मपितामहके नामसे प्रसिद्ध हुये, जिनकी कथासे महाभारतादि इतिहास पुराण भरे पड़े हैं ।

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इस प्रकारसे गंगाजी नदीरूपसे देवी करके जगत् प्रसिद्ध हैं। गंगाजीके दर्शनोंकी कथा भी प्रायः प्रख्यात है।

इसी प्रकारसे देवी भागवतके उसी अध्यायमें गंडकी, सरस्वती, लक्ष्मी यमुना आदि नदियोंकी भी कथाएँ विस्तारपूर्वक लिखी हैं। जिसको देखना हो देखले।

तात्पर्य—ऐसे २ सहस्रों उदाहरण हैं जो कि, जड़ चैतन्यके आत्माकी एकता सिद्ध करते हैं। चैतन्य जड़स्वरूपमें जाता है और जड़ चैतन्य हो जाता है।

इसलामी पुस्तकें और हदीसें।

मुसलमानी पुस्तकोंमेंभी इस प्रकारका बहुत वर्णन आता है। जिनसे यह बात सुतरां सिद्ध हो जाती है।

जमीनोंकी आपसकी बातें—सफर सआदत नामक किताबमें लिखा है कि, रसूल खुदाने फरमाया कि, जमीने आपसमें बात करती हैं कि, आज मुझपर कोई मुसल्ला बिछा किसीने निमाज पढ़ा कि, नहीं।

प्यालेका आशीर्वाद—हदीस तरमजी और अविनमाजःमें लिखा है कि, मुहम्मद साहब कहते हैं कि, कोई प्यालेमें खावें उसको चाट कर साफ करे तो प्याला उसके हकमें इस्तगफार करता है। मसकात शरीफमें लिखा है कि, प्याला उसके लिये कहता है कि, अल्लाह तुझे दोजखकी आँचसे मुक्त करे जैसे कि, तूने मुझको आजाद किया है।

इन्द्रियोंकी गवाँइयाँ—लिखा है कि, कयामतके दिन सब आदमियोंको उनके फेल नामे दिये जावेंगे। पढ़े अन पढ़े सब अपने २ आमाल नामे पढ़ लेवेंगे जब गुनहगार अपना अमाल नामा पढ़ेगा तो पुकारेगा कि, यह झूठ लिखा है, मैंने इनमेंसे एक भी गुनाह नहीं किया है। खुदा उनको समझावे कि, तुमने अवश्य किया है। रोज मुनिकिर नकीर तुम्हारे गुनाहोंके लिखते थे। इस पर भी जब न मानेगा उनके शरीरके सब अंग गवाही देंगे, सब इन्द्रियाँ बोलेंगी अपने कर्मोंको प्रगट करेंगी। गुणहगार लाचारीसे मान लेवेगा, उनके गुनाहोंके अनुसार उनके माथेपर चिन्ह किया जावेगा।

सजीवमूर्तियाँ।

लात १ मनात २ गुरों नामक तीन देवियाँ बड़ी प्रतिष्ठित थीं, जिन्होंको रैश जातिवाले—अरबदेशमें (पूजते थे। मुहम्मद साहबने उनके मन्दिर और मूर्तियोंको तोड़ा तो मन्दिरमेंसे कालीर मूर्तियाँ स्त्रियोंका रूप धारण कर जीवित