देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
About this granth
The Shrimad Devi Bhagavata Mahapurana (श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण) is the central Purana of the Shakta tradition and is traditionally ascribed to Veda Vyasa. In eighteen thousand verses and twelve books it presents the primordial goddess as the supreme Brahman and the source of creation, preservation and dissolution; Shakta tradition counts it among the Mahapuranas.
This is the first volume of the Gita Press, Gorakhpur edition (book code 1897), giving books 1 to 6 in Sanskrit with a simple Hindi exposition and illustrations. It opens with the Mahatmya, the half-verse summary of the Purana, and instructions for ritual recitation. These books include the slaying of Madhu and Kaitabha, the birth of Shuka, the vision of the goddess in Manidvipa granted to Brahma, Vishnu and Shiva, the Navaratri vow, and the defeat of Mahishasura and of Shumbha and Nishumbha.
The imprint records this as the first edition of Samvat 2067 (2010), printed in 10,000 copies. Prepared with devotees and Navaratri recitation in mind, the volume has 889 pages.
| ७१६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३४ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वा भक्तिसंयुतः।<br>पूजयेज्जगतां धात्रीं स सर्वसुखभाग्भवेत्॥ २०<br><br>नवरात्रव्रतं कुर्यान्नरनारीगणश्च यः।<br>वाञ्छितं फलमाप्नोति सर्वदा भक्तितत्परः॥ २१ | ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र—जो भी भक्तिपरायण होकर जगज्जननी जगदम्बाकी पूजा करता है, वह सब प्रकारके सुखका भागी हो जाता है। जो स्त्री अथवा पुरुष भक्तितत्पर होकर नवरात्रव्रत करता है, वह सदा मनोवांछित फल प्राप्त करता है॥ २०–२१॥ |
| आश्विने शुक्लपक्षे तु नवरात्रव्रतं शुभम्।<br>करोति भावसंयुक्तः सर्वान्कामानवाप्नुयात्॥ २२ | जो मनुष्य आश्विन शुक्लपक्षमें इस उत्तम नवरात्रव्रतको श्रद्धाभावसे करता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं॥ २२॥ |
| विधिवन्मण्डलं कृत्वा पूजास्थानं प्रकल्पयेत्।<br>कलशं स्थापयेत्तत्र वेदमन्त्रविधानतः॥ २३ | विधिपूर्वक मण्डलका निर्माण करके पूजा-स्थानका निर्माण करना चाहिये और वहाँपर विधिविधानसे वैदिक मन्त्रोंद्वारा कलशकी स्थापना करनी चाहिये॥ २३॥ |
| यन्त्रं सुरुचिरं कृत्वा स्थापयेत्कलशोपरि।<br>वापयित्वा यवांश्चारून्पार्श्वतः परिवर्तितान्॥ २४<br><br>कृत्वोपरि वितानञ्च पुष्पमालासमावृतम्।<br>धूपदीपसुसंयुक्तं कर्तव्यं चण्डिकागृहम्॥ २५ | अत्यन्त सुन्दर यन्त्रका निर्माण करके उसे कलशके ऊपर स्थापित कर देना चाहिये। तत्पश्चात् कलशके चारों ओर परिष्कृत तथा उत्तम जौका वपन करके पूजा-स्थानके ऊपर पुष्पमालासे अलंकृत चाँदनी लगाकर देवीका मण्डप बनाना चाहिये तथा उसे सदा धूप-दीपसे सम्पन्न रखना चाहिये॥ २४–२५॥ |
| त्रिकालं तत्र कर्तव्या पूजा शक्त्यनुसारतः।<br>वित्तशाठ्यं न कर्तव्यं चण्डिकायाश्च पूजने॥ २६<br><br>धूपैर्दीपैः सुनैवेद्यैः फलपुष्पैरनेकणः।<br>गीतवाद्यैः स्तोत्रपाठैर्वेदपारायणैस्तथा॥ २७<br><br>उत्सवस्तत्र कर्तव्यो नानावादित्रसंयुतैः।<br>कन्यकानां पूजनञ्च विधेयं विधिपूर्वकम्॥ २८<br><br>चन्दनैर्भूषणैर्वस्त्रैर्भक्ष्यैश्च विविधैस्तथा।<br>सुगन्धतैलमाल्यैश्च मनसो रुचिकारकैः॥ २९<br><br>एवं सम्पूजनं कृत्वा होमं मन्त्रविधानतः।<br>अष्टम्यां वा नवम्यां वा कारयेद्विधिपूर्वकम्॥ ३०<br><br>ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चात्पारणां दशमीदिने।<br>कर्तव्यं शक्तितो दानं देयं भक्तिपरैर्नृपैः॥ ३१ | अपनी शक्तिके अनुसार वहाँ [प्रातः, मध्याह्न तथा सायंकाल] तीनों समय पूजा करनी चाहिये। देवीकी पूजामें धनकी कृपणता नहीं करनी चाहिये। धूप, दीप, उत्तम नैवेद्य, अनेक प्रकारके फल-पुष्प, गीत, वाद्य, स्तोत्रपाठ तथा वेदपारायण—इनके द्वारा भगवतीकी पूजा होनी चाहिये। नानाविध वाद्य बजाकर उत्सव मनाना चाहिये। इस अवसरपर चन्दन, आभूषण, वस्त्र, विविध प्रकारके व्यंजन, सुगन्धित तेल, हार—मनको प्रसन्न करनेवाले इन पदार्थोंसे विधिपूर्वक कन्याओंका पूजन करना चाहिये। इस प्रकार पूजन सम्पन्न करके अष्टमी या नवमीको मन्त्रोच्चारपूर्वक विधिवत् हवन करना चाहिये। तत्पश्चात् ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिये। इसके बाद दशमीको पारण करना चाहिये। भक्तिनिष्ठ राजाओंको यथाशक्ति दान भी करना चाहिये॥ २६–३१॥ |
| एवं यः कुरुते भक्त्या नवरात्रव्रतं नरः।<br>नारी वा सधवा भक्त्या विधवा वा पतिव्रता॥ ३२ | इस प्रकार पुरुष अथवा पतिव्रता सधवा या विधवा स्त्री जो कोई भी भक्तिपूर्वक नवरात्रव्रत करता है, वह इस लोकमें सुख तथा मनोभिलषित |
| अ० ३४ ] | पञ्चम स्कन्ध | ७१७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इह लोके सुखं भोगान्प्राप्नोति मनसेप्सितान् ।<br>देहान्ते परमं स्थानं प्राप्नोति व्रततत्परः ॥ ३३<br><br>जन्मान्तरेऽम्बिकाभक्तिर्भवत्यव्यभिचारिणी ।<br>जन्मोत्तमकुले प्राप्य सदाचारो भवेद्वि सः ॥ ३४ | भोगोंको प्राप्त करता है और वह व्रतपरायण व्यक्ति देह-त्याग होनेपर परम दिव्य देवीलोकको प्राप्त करता है ॥ ३२-३३ ॥<br><br>उसे जन्मान्तरमें देवी जगदम्बाकी अविचल भक्ति प्राप्त होती है और उत्तम कुलमें जन्म पाकर वह स्वभावतः सदाचारी होता है ॥ ३४ ॥ |
| नवरात्रव्रतं प्रोक्तं व्रतानामुत्तमं व्रतम् ।<br>आराधनं शिवायास्तु सर्वसौख्यकरं परम् ॥ ३५ | नवरात्रव्रतको व्रतोंमें उत्तम व्रत कहा गया है; भगवती शिवाका आराधन सब प्रकारके उत्तम सुखको देनेवाला है ॥ ३५ ॥ |
| अनेन विधिना राजन् समाराध्य चण्डिकाम् ।<br>जित्वा रिपूनस्खलितं राज्यं प्राप्स्यस्यनुत्तमम् ॥ ३६<br><br>सुखञ्च परमं भूप देहेऽस्मिन्स्वगृहे पुनः ।<br>पुत्रदारान्समासाद्य लप्स्यसे नात्र संशयः ॥ ३७ | हे राजन्! इस विधिसे भगवती चण्डिकाकी आराधना कीजिये, इससे शत्रुओंको जीतकर आप अपना उत्तम राज्य पुनः प्राप्त कर लेंगे और हे भूप! अपनी स्त्री-पुत्र आदि स्वजनोंको प्राप्तकर आप अपने भवनमें परम उत्तम सुखका इसी शरीरसे उपभोग करेंगे; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३६-३७ ॥ |
| वैश्योत्तम त्वमेवाद्य समाराधय कामदाम् ।<br>देवीं विश्वेश्वरीं मायां सृष्टिंसंहारकारिणीम् ॥ ३८<br><br>स्वजनानां च मान्यस्त्वं भविष्यसि गृहे गतः ।<br>सुखं सांसारिकं प्राप्य यथाभिलषितं पुनः ॥ ३९ | हे वैश्यश्रेष्ठ! आप भी आजसे समस्त कामनाओंको देनेवाली, सृष्टि और संहारकी कारणभूता विश्वेश्वरी देवी महामायाकी आराधना कीजिये। इससे आप अपने घर जानेपर अपने लोगोंमें मान्य हो जायँगे और मनोभिलषित सांसारिक सुख प्राप्त करके अन्तमें शुभ देवीलोकमें वास करेंगे—इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३८-३९ १/२ ॥ |
| देवीलोके शुभे वासो भविता ते न संशयः ।<br>नाराधिता भगवती यैस्ते नरकभागिनः ॥ ४०<br><br>इह लोकेऽतिदुःखार्ता नानारोगैः प्रपीडिताः ।<br>भवन्ति मानवा राजञ्छत्रुभिश्च पराजिताः ॥ ४१ | हे राजन्! जो मनुष्य भगवतीकी आराधना नहीं करते, वे नरकके भागी होते हैं। वे इस लोकमें अत्यन्त दुःखी, विविध व्याधियोंसे पीड़ित, शत्रुओंद्वारा पराजित, स्त्री-पुत्रसे हीन, तृष्णाग्रस्त और बुद्धिभ्रष्ट होते हैं ॥ ४०-४१ १/२ ॥ |
| निष्कलत्रा ह्यपुत्राश्च तृष्णार्ताः स्तब्धबुद्धयः ।<br>बिल्वीदलैः करवीरैः शतपत्रैश्च चम्पकैः ॥ ४२<br><br>अर्चिता जगतां धात्री यैस्तेऽतीव विलासिनः ।<br>भवन्ति कृतपुण्यास्ते शक्तिभक्तिपरायणाः ॥ ४३ | बिल्वपत्रोंसे तथा कनैल, कमल और चम्पाके फूलोंसे जो जगज्जननीकी आराधना करते हैं, शक्तिस्वरूपा भगवतीकी भक्तिमें रत वे पुण्यशाली लोग विविध प्रकारके सुख प्राप्त करते हैं ॥ ४२-४३ ॥ |
| धनविभवसुखाढ्या मानवा मानवन्तः<br>सकलगुणगणानां भाजनं भारतीशाः ।<br>निगमपठितमन्त्रैः पूजिता यैर्भवानी<br>नृपतितिलकमुख्यास्ते भवन्तीह लोके ॥ ४४ | [हे नृपश्रेष्ठ!] जो लोग वेदोक्त मन्त्रोंसे भवानीका पूजन करते हैं, वे मानव इस संसारमें सब प्रकारके धन, वैभव तथा सुखसे परिपूर्ण, समस्त गुणोंके आगार, माननीय, विद्वान् और राजाओंके शिरोमणि होते हैं ॥ ४४ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे भगवत्याः
पूजाराधनविधिवर्णनं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
| ७१८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३५ |
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अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः
सुरथ और समाधिकी तपस्यासे प्रसन्न भगवतीका प्रकट होना और उन्हें इच्छित वरदान देना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| इति तस्य वचः श्रुत्वा दुःखितौ वैश्यपार्थिवौ।<br>प्रणिपत्य मुनिं प्रीत्या प्रश्रयावनतौ भृशम्॥ १<br><br>हर्षेणोत्फुल्लनयनावूचतुर्वाक्यकोविदौ ।<br>कृताञ्जलिपुटौ शान्तौ भक्तिप्रवणचेतसौ॥ २ | उनका यह वचन सुनकर दुःखित हृदयवाले वैश्य और राजाने प्रसन्नतापूर्वक विनम्रभावसे मुनिके चरणोंमें प्रणाम किया। भक्तिपरायण चित्तवाले, शान्त स्वभाववाले तथा हर्षके कारण खिले हुए नेत्रोंवाले वे दोनों वाक्य-विशारद राजा और वैश्य हाथ जोड़कर कहने लगे॥ १-२॥ |
| भगवन्पावितावद्य शान्तौ दीनौ शुचान्वितौ।<br>तव सूक्तसरस्वत्या गङ्गयेव भगीरथः॥ ३ | हे भगवन्! हम दोनों दुःखी जनोंको आपकी सूक्तिरूपिणी वाणीने उसी प्रकार शान्त तथा पवित्र कर दिया, जैसे गंगाने राजा भगीरथको कर दिया था॥ ३॥ |
| साधवः सम्भवन्तीह परोपकृतितत्पराः।<br>अकृत्रिमगुणारामाः सुखदाः सर्वदेहिनाम्॥ ४<br><br>पूर्वपुण्यप्रसङ्गेन प्राप्तोऽयमाश्रमः शुभः।<br>तवावाभ्यां महाभाग महादुःखविनाशकः॥ ५<br><br>भवन्ति मानवा भूमौ बहवः स्वार्थतत्पराः।<br>परार्थसाधने दक्षाः केचित्क्वापि भवादृशाः॥ ६<br><br>दुःखितोऽहं मुनिश्रेष्ठ वैश्योऽयं चातिदुःखितः।<br>उभौ संसारसन्तप्तौ तवाश्रमपदे मुदा॥ ७<br><br>दर्शनादेव हे विद्वन् गतं दुःखमिहावयोः।<br>देहजं मानसं वाक्यश्रवणादेव साम्प्रतम्॥ ८ | सज्जन लोग परोपकारपरायण, स्वाभाविक रूपसे गुणोंके भण्डार और सभी प्राणियोंको सुख देनेवाले होते हैं। पूर्वजन्मोंके पुण्यके कारण ही महान् दुःखका नाश करनेवाले आपके इस शुभ आश्रममें हम दोनोंका आना हुआ। पृथ्वीपर बहुत-से स्वार्थी मनुष्य होते हैं, परंतु दूसरोंके हित-साधनमें कुशल आप-जैसे कुछ ही लोग कहीं-कहीं मिलते हैं। हे मुनिश्रेष्ठ! मैं दुःखी हूँ और ये वैश्य अत्यन्त दुःखी हैं। हम दोनों इस संसारसे पीड़ित हैं। हे विद्वन्! आपके इस आश्रममें आकर प्रसन्नतापूर्वक आपके दर्शन और उपदेश-श्रवणसे हमारा शारीरिक तथा मानसिक क्लेश दूर हो गया॥ ४-८॥ |
| धन्यावावां कृतकृत्यौ जातौ सूक्तिसुधारसात्।<br>पावितौ भवता ब्रह्मन् कृपया करुणार्णव॥ ९ | हे ब्रह्मन्! आपकी अमृतमयी वाणीके रससे हम दोनों धन्य और कृतकृत्य हो गये। हे करुणासागर! आपने अपनी कृपासे हम दोनोंको पवित्र कर दिया॥ ९॥ |
| गृहाणास्मत्करौ साधो नय पारं भवार्णवे।<br>मग्नौ श्रान्ताविति ज्ञात्वा मन्त्रदानेन साम्प्रतम्॥ १० | हे साधो! हम दोनों थककर इस संसाररूपी महासागरमें डूब रहे हैं—यह जानकर अब आप हम दोनोंका हाथ पकड़िये और मन्त्रदान देकर भवसागरसे पार कर दीजिये॥ १०॥ |
| अ० ३५ ] | पञ्चम स्कन्ध | ७१९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तपः कृत्वातिविपुलं समाराध्य सुखप्रदाम्।<br>सम्प्राप्य दर्शनं भूयो यास्यावो निजमन्दिरम्॥ ११ | अब अत्यन्त कठोर तपस्या करके हम दोनों सुख प्रदान करनेवाली जगदम्बाका आराधन करके उनका दर्शन प्राप्तकर अपने-अपने घरोंको वापस जायँगे॥ ११॥ |
| वदनात्तव सम्प्राप्य देवीमन्त्रं नवाक्षरम्।<br>स्मरणञ्च करिष्यावो निराहारौ धृतव्रतौ॥ १२ | आपके मुखसे देवीका नवाक्षरमन्त्र ग्रहण करके हम दोनों निराहार रहकर व्रत करेंगे और उस मन्त्रका जप करेंगे॥ १२॥ |
| व्यास उवाच<br>इति संचोदितस्ताभ्यां सुमेधा मुनिसत्तमः।<br>ददौ मन्त्रं शुभं ताभ्यां ध्यानबीजपुरःसरम्॥ १३ | व्यासजी बोले— इस प्रकार उन दोनोंके आग्रह करनेपर मुनिश्रेष्ठ सुमेधाने उन्हें ध्यान-बीजसहित देवीका मंगलकारी नवाक्षरमन्त्र प्रदान किया॥ १३॥ |
| तौ च प्राप्य मुनेर्मन्त्रं सम्मन्त्र्य गुरुदैवतौ।<br>जग्मतुर्वैश्यराजानौ नदीतीरमनुत्तमम्॥ १४ | वे दोनों वैश्य और राजा मुनिसे मन्त्र और उसके ऋषि, छंद, देवताका ज्ञान प्राप्त करके तथा उनसे आज्ञा लेकर नदीके अत्युत्तम तटपर चले गये॥ १४॥ |
| एकान्ते विजने स्थाने कृत्वासनपरिग्रहम्।<br>उपविष्टौ स्थिरप्रज्ञौ तावतीव कृशोदरौ॥ १५ | अत्यन्त कृशकाय वे दोनों एकान्तमें निर्जन स्थानपर आसन लगाकर स्थिरचित्त होकर बैठ गये॥ १५॥ |
| मन्त्रजाप्यरत्तौ शान्तौ चरित्रत्रयपाठकौ।<br>निन्यतुर्मासमेकं तु तत्र ध्यानपरायणौ॥ १६ | उन दोनोंने शान्तचित्त तथा ध्यानपरायण होकर मन्त्रजप और भगवतीके तीनों चरित्रोंका पाठ करते हुए एक मासका समय व्यतीत कर दिया॥ १६॥ |
| तयोर्मासव्रतेनैव जाता प्रीतिरनुत्तमा।<br>पादाम्बुजे भवान्यास्तु स्थिरा बुद्धिस्तथाप्यलम्॥ १७ | उनके एक मासके व्रतसे ही उनमें भगवती भवानीके चरणकमलमें उत्तम प्रीति उत्पन्न हो गयी और उनकी बुद्धि स्थिर हो गयी॥ १७॥ |
| कदाचित्पादयोर्गत्वा मुनेस्तस्य महात्मनः।<br>कृतप्रणामावागत्य तस्थतुश्च कुशासने॥ १८<br><br>नान्यकार्यपरौ क्वापि बभूवतुः कदाचन।<br>देवीध्यानपरौ नित्यं जपमन्त्ररतौ सदा॥ १९ | वे दोनों नित्य जाकर एक बार महात्मा [सुमेधा] मुनिके चरणोंमें प्रणाम करते थे और वहाँसे लौटकर फिर अपने कुशासनपर बैठ जाते थे। वे दोनों अन्य कोई भी कार्य नहीं करते थे और सदैव देवीके ध्यान तथा मन्त्रजपमें संलग्न रहते थे॥ १८-१९॥ |
| एवं जाते तदा पूर्णे तत्र संवत्सरे नृप।<br>बभूवतुः फलाहारं त्यक्त्वा पर्णाशनौ नृप॥ २०<br><br>वर्षमेकं तपस्तत्र चक्रतुर्वैश्यपार्थिवौ।<br>शुष्कपर्णाशनौ दान्तौ जपध्यानपरायणौ॥ २१ | हे राजन्! इस प्रकार एक वर्ष पूर्ण होनेपर वे फलाहारका त्याग करके पत्तेके आहारपर रहने लगे। हे नृप! उन दोनों—वैश्य और राजाने एक वर्षतक सूखे पत्ते खाकर इन्द्रियोंको वशमें करके जप और ध्यानमें रत रहते हुए तप किया॥ २०-२१॥ |
| पूर्णे वर्षद्वये जाते कदाचिद्दर्शनञ्च तौ।<br>प्रापतुः स्वप्नमध्ये तु भगवत्या मनोहरम्॥ २२<br><br>रक्ताम्बरधरां देवीं चारूभूषणभूषिताम्।<br>कदाचिन्नृपतिः स्वप्नेऽप्यपश्यज्जगदम्बिकाम्॥ २३ | इस प्रकार दो वर्ष व्यतीत होनेपर उन दोनोंको किसी समय स्वप्नमें भगवतीका मनोहारी दर्शन प्राप्त हुआ। राजाने स्वप्नमें देवी जगदम्बिकाको लाल वस्त्र धारण किये हुए तथा सुन्दर आभूषणोंसे अलंकृत देखा॥ २२-२३॥ |
७२० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३५
७२० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३५
| वीक्ष्य स्वप्ने च तौ देवीं प्रीतियुक्तौ बभूवतुः।<br>जलाहारैस्तृतीये तु स्थितौ संवत्सरे तु तौ ॥ २४ | स्वप्नमें देवीका दर्शन प्राप्तकर दोनों प्रेमभावसे परिपूर्ण हो गये। अब वे दोनों तीसरे वर्षमें मात्र जलके आहारपर रहने लगे ॥ २४ ॥ |
| एवं वर्षत्रयं कृत्वा ततस्तौ वैश्यपार्थिवौ।<br>चक्रतुस्तौ तदा चिन्तां चित्ते दर्शनलालसौ ॥ २५ | इस प्रकार तीन वर्षतक तपस्या करनेके पश्चात् वे दोनों—राजा और वैश्य मनमें देवीके साक्षात् दर्शनकी लालसासे चिन्तित हो उठे ॥ २५ ॥ |
| प्रत्यक्षं दर्शनं देव्या न प्राप्तं शान्तिदं नृणाम्।<br>देहत्यागं करिष्यावो दुःखितौ भृशमातुरौ ॥ २६ | अत्यन्त दुःखी तथा व्याकुल होकर उन दोनोंने निश्चय किया कि मनुष्योंको शान्ति प्रदान करनेवाली देवीका प्रत्यक्ष दर्शन नहीं प्राप्त हुआ, अतः अब हम शरीरका त्याग कर देंगे ॥ २६ ॥ |
| इति सञ्चिन्त्य मनसा राजा कुण्डं चकार ह।<br>त्रिकोणं सुस्थिरं सौम्यं हस्तमात्रप्रमाणतः ॥ २७<br><br>संस्थाप्य पावकं राजा तथा वैश्योऽतिभक्तिमान्।<br>जुहावासौ निजं मांसं छित्त्वा छित्त्वा पुनः पुनः॥ २८<br><br>तथा वैश्योऽपि दीप्तेऽग्नौ स्वमांसं प्राक्षिपत्तदा।<br>रुधिरेण बलिं चास्यै ददतुस्तौ कृतोद्यमौ ॥ २९<br><br>तदा भगवती दत्त्वा प्रत्यक्षं दर्शनं तयोः।<br>प्राह प्रतिभरोद्भ्रान्तौ दृष्ट्वा तौ दुःखितौ भृशम्॥ ३० | ऐसा मनमें विचारकर राजाने एक हाथ प्रमाणका त्रिभुजाकार, सुन्दर तथा सुस्थिर अग्निकुण्ड बनाया। उसमें अग्निकी स्थापना करके राजा अपना मांस काट-काटकर बार-बार हवन करने लगे। साथ ही अत्यन्त भक्तिमान् वह वैश्य भी प्रदीप्त अग्निमें अपना मांस डालने लगा। तत्पश्चात् वे दोनों जब अपने रुधिरसे इन देवीको बलि देनेके लिये उद्यत हुए तब भगवती उन दोनोंको प्रेम-भक्तिमें तन्मय और अत्यन्त दुःखी देखकर उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देकर उनसे कहने लगीं— ॥ २७–३० ॥ |
| देव्युवाच<br>वरं वरय भो राजन् यत्ते मनसि वाञ्छितम्।<br>तुष्टाहं तपसा तेऽद्य भक्तोऽसि त्वं मतो मम ॥ ३१<br><br>वैश्यं प्राह तदा देवी प्रसन्नाहं महामते।<br>किं तेऽभीष्टं ददाम्यद्य प्रार्थयाशु मनोगतम्॥ ३२ | **देवी बोलीं—**हे राजन्! अपना मनोभिलषित वर माँगो, मैं आज तुम्हारी तपस्यासे सन्तुष्ट हूँ। अब मैंने समझ लिया कि तुम मेरे भक्त हो। उसके बाद देवीने वैश्यसे कहा—हे महामते! मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हारा अभीष्ट क्या है? तुम्हारे मनमें जो भी हो माँग लो, मैं उसे दूँगी ॥ ३१-३२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं राजा तामुवाच मुदान्वितः।<br>देहि मेऽद्य निजं राज्यं हतशत्रुबलं बलात्॥ ३३ | **व्यासजी बोले—**उनके इस वचनको सुनकर प्रसन्न मनवाले राजाने उनसे कहा कि बलपूर्वक मैं शत्रुओंका नाशकर अपना राज्य प्राप्त करूँ—मुझे आज यह वरदान दीजिये ॥ ३३ ॥ |
| तमुवाच तदा देवी गच्छ राजन् निजं गृहम्।<br>शत्रवः क्षीणसत्त्वास्ते गमिष्यन्ति पराजिताः॥ ३४<br><br>मन्त्रिणस्ते समागम्य ते पतिष्यन्ति पादयोः।<br>कुरु राज्यं महाभाग नगरे स्वं यथासुखम्॥ ३५ | तब देवीने उनसे कहा—हे राजन्! अपने घरको जाओ, तुम्हारे शत्रु शीघ्र ही क्षीण बलवाले होकर पराजित हो जायेंगे। हे महाभाग! तुम्हारे मन्त्रिगण आकर तुम्हारे पैरोंपर गिरेंगे। अब आप अपने नगरमें सुखपूर्वक राज्य करें। हे राजन्! अपने विस्तृत |
| अ० ३५ ] | पञ्चम स्कन्ध | ७२१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कृत्वा राज्यं सुविपुलं वर्षाणामयुतं नृप।<br>देहान्ते जन्म सम्प्राप्य सूर्याच्च भविता मनुः॥ ३६ | साम्राज्यका दस हजार वर्षोंतक शासन करके देहत्यागके बाद सूर्यसे जन्म प्राप्त करके तुम [सावर्णि] मनु होओगे॥ ३४—३६॥ |
| व्यास उवाच<br>वैश्यस्तामप्युवाचेदं कृताञ्जलिपुटः शुचिः।<br>न मे गृहेण कार्यं वै न पुत्रेण धनेन वा॥ ३७<br>सर्वं बन्धकरं मातः स्वप्नवन्नश्वरं स्फुटम्।<br>ज्ञानं मे देहि विशदं मोक्षदं बन्धनाशनम्॥ ३८<br>असारेऽस्मिंश्च संसारे मूढा मज्जन्ति पामराः।<br>पण्डिताः सन्तरन्तीह तस्मान्नेच्छन्ति संसृतिम्॥ ३९ | **व्यासजी बोले—**शुद्धहृदय वैश्यने हाथ जोड़कर कहा—अब मुझे न घरकी आवश्यकता है, न धनकी और न पुत्रकी ही। हे माता! ये सभी बन्धनमें डालनेवाले और स्वप्नकी भाँति नश्वर हैं, अतः आप मुझे बन्धनका नाश करनेवाला और मोक्ष देनेवाला दिव्य ज्ञान प्रदान करें। इस असार संसारमें अज्ञानी डूब जाते हैं और ज्ञानी पार उतर जाते हैं, इसलिये वे संसारकी इच्छा नहीं करते॥ ३७—३९॥ |
| व्यास उवाच<br>तदाकर्ण्य महामाया वैश्यं प्राह पुरःस्थितम्।<br>वैश्यवर्य तव ज्ञानं भविष्यति न संशयः॥ ४० | **व्यासजी बोले—**तब अपने समक्ष खड़े वैश्यकी बात सुनकर देवी महामायाने कहा—हे वैश्यश्रेष्ठ! तुम्हें ज्ञान प्राप्त होगा, इसमें सन्देह नहीं है॥ ४०॥ |
| इति दत्त्वा वरं ताभ्यां तत्रैवान्तरधीयत।<br>अदर्शनं गतायां तु राजा तं मुनिसत्तमम्॥ ४१<br>प्रणम्य हयमारुह्य गमनाय मनो दधे।<br>तदैव तस्य सचिवास्तत्रागत्य नृपं प्रजाः॥ ४२<br>प्रणेमुर्विनयोपेतास्तमूचुः प्राञ्जलिस्थिताः।<br>राजंस्ते शत्रवः सर्वे पापाच्च निहता रणे॥ ४३<br>राज्यं निष्कण्टकं भूप कुरुष्व पुरमास्थितः। | इस प्रकार उन दोनोंको वरदान देकर देवी वहीं अन्तर्धान हो गयीं। तब भगवतीके अन्तर्धान हो जानेपर राजा सुरथने उन मुनिश्रेष्ठको प्रणाम करके घोड़ेपर चढ़कर चलनेका निश्चय किया, तभी उनके प्रजाजनों और मन्त्रिगणोंने वहाँ आकर प्रणाम किया; वे हाथ जोड़कर खड़े हो गये तथा विनम्र होकर राजासे कहने लगे—हे राजन्! आपके शत्रुगण अपने पापके कारण युद्धमें मारे गये। हे भूप! अब आप अपने नगरमें निवास करके निष्कण्टक राज्य कीजिये॥ ४१—४३ \frac{१}{२}॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं राजा नत्वा तं मुनिसत्तमम्॥ ४४<br>आपृच्छ्य निर्ययौ तत्र मन्त्रिभिः परिवारितः।<br>सम्प्राप्य च निजं राज्यं दारान्स्वजनबान्धवान्॥ ४५<br>बुभुजे पृथिवीं सर्वां ततः सागरमेखलाम्। | उनकी बात सुनकर राजा मुनिश्रेष्ठको प्रणाम करके उनसे आज्ञा लेकर मन्त्रियोंके साथ चल दिये। वे अपने राज्य, स्त्री और बन्धु-बान्धवोंको पाकर समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य भोगने लगे॥ ४४—४५ \frac{१}{२}॥ |
| वैश्योऽपि ज्ञानमासाद्य मुक्तसङ्गः समन्ततः॥ ४६<br>कालातिवाहनं तत्र मुक्तबन्धश्चकार ह।<br>तीर्थेषु विचरन्गायन्भगवत्या गुणानथ॥ ४७ | वैश्य भी ज्ञान प्राप्त करके सर्वथा आसक्तिरहित और बन्धनसे मुक्त होकर तीर्थोंमें भ्रमण करता हुआ तथा भगवतीके गुणोंका गान करता हुआ समय व्यतीत करने लगा॥ ४६—४७॥ |
| एतत्ते कथितं देव्याश्चरितं परमाद्भुतम्।<br>आराधनफलप्राप्तिस्तथाऽभून्नृपवैश्ययोः ॥ ४८<br>दैत्यानां हननं प्रोक्तं प्रादुर्भावस्तथा शुभः।<br>एवंप्रभावा सा देवी भक्तानामभयप्रदा॥ ४९ | इस प्रकार देवीकी परम अद्भुत लीला तथा राजा और वैश्यद्वारा की गयी उनकी आराधना एवं फलप्राप्तिको मैंने यथार्थ रूपसे आपसे कहा। देवीके शुभ आविर्भाव और उनके द्वारा दैत्योंके विनाशकी कथा भी मैंने आपसे कही। भक्तोंको अभय प्रदान करनेवाली वे भगवती ऐसे प्रभाववाली हैं!॥ ४८—४९॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे सुरथराजसमाधिवैश्ययोर्देवी-
| ७२२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३५ |
|---|
| यः शृणोति नरो नित्यमेतदाख्यानमुत्तमम्।<br>सम्प्राप्नोति नरः सत्यं संसासुखमद्भुतम्॥ ५०<br><br>ज्ञानदं मोक्षदं चैव कीर्तिदं सुखदं तथा।<br>पावनं श्रवणान्नूनमेतदाख्यानमद्भुतम्॥ ५१<br><br>अखिलार्थप्रदं नृणां सर्वधर्मसमावृतम्।<br>धर्मार्थकाममोक्षाणां कारणं परमं मतम्॥ ५२<br><br>सूत उवाच<br>जनमेजयेन राज्ञासौ पृष्टः सत्यवतीसुतः।<br>उवाच संहितां दिव्यां व्यासः सर्वार्थतत्त्ववित्॥ ५३<br><br>चरितं चण्डिकायास्तु शुम्भदैत्यवधाश्रितम्।<br>कथयामास भगवान्कृष्णः कारुणिको मुनिः।<br>इति वः कथितः सारः पुराणानां मुनीश्वराः॥ ५४ | जो मनुष्य उनके इस उत्तम आख्यानको नित्य सुनता है, वह संसारमें अद्भुत सुख प्राप्त करता है, यह सत्य है। इस पवित्र और अद्भुत आख्यानका श्रवण करनेसे यह ज्ञान, मोक्ष, कीर्ति और सुख प्रदान करता है। यह मनुष्योंकी सभी कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला तथा समस्त धर्मोंका सार और धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्तिका परम कारण बताया गया है॥ ५०—५२॥<br><br>सूतजी बोले— राजा जनमेजयके पूछनेपर सभी अर्थ-तत्त्वोंको जाननेवाले सत्यवतीपुत्र व्यासने उनसे यह दिव्य देवीभागवतसंहिता कही। परम दयालु भगवान् कृष्णद्वैपायन मुनि व्यासने शुम्भदैत्यके वधकी कथापर आधारित देवी चण्डिकाके चरित्रका वर्णन किया था। हे मुनीश्वरो! समस्त पुराणोंका सारस्वरूप यह इतिहास मैंने आपलोगोंसे कह दिया॥ ५३-५४॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे सुरथराजसमाधिवैश्ययोर्देवी-
भक्त्येष्टप्राप्तिवर्णनं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः॥ ३५॥
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॥ पंचमः स्कन्धः समाप्तः॥
श्रुतिस्मृती तु नेत्रे द्वे पुराणं हृदयं स्मृतम्। श्रुतिस्मृतिभ्यां हीनोऽन्धः काणः स्यादेकया विना॥
पुराणहीनाद्धृच्छून्यात् काणान्धावपि तौ वरौ। श्रुतिस्मृत्युदितो धर्मः पुराणे परिगीयते॥
यस्य धर्मेऽस्ति जिज्ञासा यस्य पापाद्भयं महत्। श्रोतव्यानि पुराणानि धर्ममूलानि तेन वै॥
चतुर्दशसु विद्यासु पुराणं दीप उत्तमः। अन्धोऽपि न तदालोकात् संसाराब्धौ क्वचित् पतेत्॥
विद्वानोंके श्रुति-स्मृति—ये दो नेत्र हैं और पुराण हृदय है। इनमेंसे जिसे श्रुति-स्मृतिमेंसे किसी एकका ज्ञान नहीं है; वह काना, दोनोंके ज्ञानसे हीन अन्धा है, किंतु जो पुराणरूपी विद्यासे हीन है वह तो हृदयहीन या शून्य होनेके कारण इन दोनोंसे भी निकृष्ट है। श्रुति तथा स्मृतियोंमें कहा गया धर्म पुराणमें प्रतिपादित है। जिसकी धर्ममें जिज्ञासा या रुचि हो, जो पापोंसे डरता हो, उसे पुराणोंका श्रवण करना चाहिये; क्योंकि वे ही धर्मके मूल हैं। चौदहों विद्याओंमें पुराण-विद्या ही उत्तम दीपक है। इसके आलोक—प्रकाशमें स्थित अन्धा भी संसार-सागरमें कभी नहीं गिरता।
[ स्कन्दपु० का० २।९६-९७, ९९-१०० ]
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण
षष्ठः स्कन्धः
अथ प्रथमोऽध्यायः
त्रिशिराकी तपस्यासे चिन्तित इन्द्रद्वारा तपभंगहेतु अप्सराओंको भेजना
| ऋषय ऊचुः<br>सूत सूत महाभाग मिष्टं ते वचनामृतम्।<br>न तृप्ताः स्मो वयं पीत्वा द्वैपायनकृतं शुभम्॥ १<br><br>पुनस्त्वां प्रष्टुमिच्छामः कथां पौराणिकीं शुभाम्।<br>वेदेऽपि कथितां रम्यां प्रसिद्धां पापनाशिनीम्॥ २ | ऋषिगण बोले—हे महाभाग सूतजी! आपकी वाणीरूपी अत्यन्त मधुर सुधाका पान करके अभी हम सन्तुप्त नहीं हुए हैं। कृष्णद्वैपायन वेदव्यासजीने जिस उत्तम श्रीमद्देवीभागवत-महापुराणका प्रणयन किया है; उस पुराणकी मंगलमयी, वेदवर्णित, मनोहर, प्रसिद्ध और पापोंका नाश करनेवाली कथाको हम आपसे पुनः पूछना चाहते हैं॥ १-२॥ |
|---|---|
| वृत्रासुर इति ख्यातो वीर्यवांस्त्वष्टुरात्मजः।<br>स कथं निहतः संख्ये वासवेन महात्मना॥ ३<br><br>त्वष्टा वै सुरपक्षीयस्तत्पुत्रो बलवत्तरः।<br>शक्रेण घातितः कस्माद् ब्रह्मयोनिर्महाबलः॥ ४<br><br>देवाः सत्त्वगुणोत्पन्ना मानुषा राजसाः स्मृताः।<br>तिर्यञ्चस्तामसाः प्रोक्ताः पुराणागमवादिभिः॥ ५<br><br>विरोधोऽत्र महान् भाति नूनं शतमखेन ह।<br>छलेन बलवान् वृत्रः शक्रेण विनिपातितः॥ ६<br><br>विष्णुः प्रेरयिता तत्र स तु सत्त्वधरः परः।<br>प्रविष्टः पविमध्ये स छद्मना भगवान् प्रभुः॥ ७<br><br>सन्धिं विधाय स ह्येवं मन्त्रितोऽसौ महाबलः।<br>हरिभ्यां सत्यमुत्सृज्य जलफेनेन शातितः॥ ८ | त्वष्टाका वृत्रासुर नामसे विख्यात पराक्रमी पुत्र महात्मा इन्द्रके द्वारा क्यों मारा गया? त्वष्टा तो देवपक्षके थे और उनका पुत्र अत्यन्त बलवान् था, ब्राह्मणवंशमें उत्पन्न उस महाबलीका इन्द्रके द्वारा क्यों वध किया गया? पुराणों और शास्त्रोंके तत्त्वज्ञलोगोंने देवताओंको सत्त्वगुणसे, मनुष्योंको रजोगुणसे और पशु-पक्षी आदि तिर्यक् योनियोंको तमोगुणसे उत्पन्न कहा है, परंतु यहाँ तो महान् विरोध प्रतीत होता है कि बलवान् वृत्रासुर सौ यज्ञोंके कर्ता इन्द्रके द्वारा छलपूर्वक मारा गया और इसके लिये भगवान् विष्णुद्वारा प्रेरणा दी गयी जो कि स्वयं महान् सत्त्वगुणी हैं तथा वे परम प्रभु छलपूर्वक वज्रमें प्रविष्ट हुए! सन्धि करके उस महाबली वृत्रको पहले आश्वस्त कर दिया गया, किंतु पुनः विष्णु और इन्द्रने सत्य (सन्धिकी बात)-को छोड़कर जलके फेनसे उसे मार डाला!॥ ३–८॥ |
| कृतमिन्द्रेण हरिणा किमेतत्सत साहसम्।<br>महान्तोऽपि च मोहेन वञ्चिताः पापबुद्धयः॥ ९ | हे सूतजी! इन्द्र और विष्णुके द्वारा ऐसा दुःसाहस क्यों किया गया? महान् लोग भी मोहमें फँसकर पापबुद्धि हो जाते हैं॥ ९॥ |
| ७२४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ |
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| अन्यायवर्तिनोऽत्यर्थं भवन्ति सुरसत्तमाः।<br>सदाचारेण युक्तेन देवाः शिष्टत्वमागताः॥ १०॥<br>एवं विशिष्टधर्मेण शिष्टत्वं कीदृशं पुनः।<br>हत्वा वृत्रं तु विश्वस्तं शक्रेण छद्मना पुनः॥ ११॥<br>प्राप्तं पापफलं नो वा ब्रह्महत्यासमुद्भवम्।<br>किं च त्वया पुरा प्रोक्तं वृत्रासुरवधः कृतः॥ १२॥<br>श्रीदेव्या इति तच्चापि चित्तं मोहयतीह नः। | श्रेष्ठ देवगण भी घोर अन्याय-मार्गके अनुगामी हो जाते हैं, जबकि सदाचारके कारण ही देवताओंको विशिष्टता प्राप्त है॥ १०॥<br>इन्द्रके द्वारा विश्वासमें लेकर वृत्रासुरकी हत्या कर दी गयी—ऐसे विशिष्ट धर्मके द्वारा उनका सदाचार कहाँ रह गया? उन्हें इस ब्रह्महत्या-जनित पापका फल मिला या नहीं? आपने पहले कहा था कि वृत्रासुरका वध स्वयं देवीने ही किया था—इससे हमारा चित्त और भी मोहमें पड़ गया है॥ ११-१२½॥ |
| सूत उवाच<br>शृण्वन्तु मुनयो वृत्तं वृत्रासुरवधाश्रयम्॥ १३॥<br>यथेन्द्रेण च सम्प्राप्तं दुःखं हत्यासमुद्भवम्।<br>एवमेव पुरा पृष्टो व्यासः सत्यवतीसुतः॥ १४॥<br>पारीक्षितेन राज्ञापि स यदाह च तद् ब्रुवे। | सूतजी बोले—हे मुनिगण! वृत्रासुरके वधसे सम्बन्धित और उस हत्यासे इन्द्रको प्राप्त महान् दुःखकी कथा सुनें। ऐसा ही पूर्वकालमें परीक्षित्पुत्र राजा जनमेजयने सत्यवतीनन्दन व्यासजीसे पूछा था; तब उन्होंने जो कहा, उसे मैं कहता हूँ॥ १३-१४½॥ |
| जनमेजय उवाच<br>कथं वृत्रासुरः पूर्वं हतो मघवता मुने॥ १५॥<br>सहायं विष्णुमासाद्य छद्मना सात्त्विकेन ह।<br>कथं च देव्या निहतो दैत्योऽसौ केन हेतुना॥ १६॥<br>कथमेकवधो द्वाभ्यां कृतः स्यान्मुनिपुङ्गव।<br>तदेतच्छ्रोतुमिच्छामि परं कौतूहलं हि मे॥ १७॥<br>महतां चरितं शृण्वन् को विरज्येत मानवः।<br>कथयाम्बावैभवं त्वं वृत्रासुरवधाश्रितम्॥ १८॥ | जनमेजय बोले—हे मुने! सत्त्वगुणसे सम्पन्न इन्द्रने भगवान् विष्णुकी सहायता लेकर वृत्रासुरको पूर्वकालमें छलपूर्वक क्यों मारा? देवीके द्वारा उस दैत्यका क्यों और किस प्रकार वध किया गया? हे मुनिश्रेष्ठ! एक व्यक्तिका दो लोगोंके द्वारा कैसे वध किया गया—इसे मैं सुनना चाहता हूँ; मुझे महान् कौतूहल है॥ १५—१७॥<br>कौन मनुष्य महापुरुषोंके चरित्रको सुननेसे विरत होगा। अतः आप वृत्रासुरके वधपर आधारित जगदम्बाके माहात्म्यको कहिये॥ १८॥ |
| व्यास उवाच<br>धन्योऽसि राजंस्तव बुद्धिरीदृशी<br>जाता पुराणश्रवणेऽतिसादरा।<br>पीत्वामृतं देववरास्तु सर्वथा<br>पाने वितृष्णाः प्रभवन्ति वै पुनः॥ १९॥<br>दिने दिने तेऽधिकभक्तिभावः<br>कथासु राजन् महनीयकीर्तेः।<br>श्रोता यदैकप्रवणः शृणोति<br>वक्ता तदा प्रीतमना ब्रवीति॥ २०॥<br>युद्धं पुरा वासववृत्रयोर्यद्<br>वेदे प्रसिद्धं च तथा पुराणे।<br>दुःखं सुरेन्द्रेण तथैव लब्धं<br>हत्वा रिपुं त्वाष्ट्रमपापमेव॥ २१॥ | व्यासजी बोले—हे राजन्! आप धन्य हैं, जो कि आपकी इस प्रकारकी बुद्धि पुराणश्रवणमें अत्यन्त आदरपूर्वक लगी हुई है। श्रेष्ठ देवगण अमृतका पान करके पूर्ण तृप्त हो जाते हैं, परंतु आप इस कथामृतका बार-बार पान करके भी अतृप्त ही हैं। हे राजन्! महान् कीर्तिवाले आपका भक्तिभाव कथाओंमें दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। श्रोता जब एकाग्रमनसे सुनता है तब वक्ता भी प्रसन्नमनसे कथा कहता है॥ १९-२०॥<br>पूर्वकालमें इन्द्र तथा वृत्रासुरका जो युद्ध हुआ था और निरपराध शत्रु वृत्रासुरका वध करके देवराज इन्द्रको जो दुःख प्राप्त हुआ था, वह वेद और पुराणमें प्रसिद्ध है॥ २१॥ |
| अ० १ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७२५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चित्रं किमत्र नृपते हरिवज्रभृद्भ्यां<br> यच्छद्मना विनिहतस्त्रिशिरोऽथ वृत्रः।<br>मायाबलेन मुनयोऽपि विमोहितास्ते<br> चक्रुश्च निन्द्यमनिशं किल पापभीताः॥ २२ | जब मायाके बलसे मुनिगण भी मोहमें पड़ जाते हैं और वे पापभीरु होकर निरन्तर निन्दनीय कर्म करने लग जाते हैं तब हे राजन्! विष्णु और वज्रधारी इन्द्रने छलसे त्रिशिरा और वृत्रासुरका वध कर दिया तो इसमें आश्चर्यकी क्या बात है?॥ २२॥ |
| विष्णुः सदैव कपटेन जघान दैत्यान्<br> सत्त्वात्ममूर्तिरपि मोहमवाप्य कामम्।<br>कोऽन्योऽस्ति तां भगवतीं मनसापि जेतुं<br> शक्तः समस्तजनमोहकरीं भवानीम्॥ २३ | सत्त्वगुणके मूर्तिमान् विग्रह होते हुए भी भगवान् विष्णुने जिनकी मायासे मोहित होकर सदैव छलपूर्वक दैत्योंका संहार किया तब भला ऐसा कौन प्राणी होगा जो सब लोगोंको मोहमें डाल देनेवाली उन भगवती भवानीको अपने मनोबलसे जीतनेमें सक्षम हो सके!॥ २३॥ |
| मत्स्यादियोनिषु सहस्रयुगेषु सद्यः<br> साक्षाद्भवत्यपि यया विनियोजितोऽत्र।<br>नारायणो नरसखो भगवाननन्तः<br> कार्यं करोति विहिताविहितं कदाचित्॥ २४ | भगवतीकी ही प्रेरणासे नरऋषिके सखा नारायण भगवान् अनन्त हजारों युगोंमें मत्स्यादि योनियोंमें अवतार लेते हैं और कभी अनुकूल तथा कभी प्रतिकूल कार्य करते हैं॥ २४॥ |
| देहं धनं गृहमिदं स्वजना मदीयं<br> पुत्राः कलत्रमिति मोहमुपेत्य सर्वः।<br>पुण्यं करोत्यथ च पापचयं करोति<br> मायागुणैरतिबलैर्विकलीकृतो यत्॥ २५ | यह मेरा शरीर है, यह मेरा धन है, यह मेरा घर है, ये मेरे स्त्री-पुत्र और बन्धु-बान्धव हैं—इस मोहमें पड़कर सभी प्राणी पुण्य तथा पापकर्म करते रहते हैं; क्योंकि अत्यन्त बलशाली मायागुणोंसे वे मोहित कर दिये गये हैं॥ २५॥ |
| न जातु मोहं क्षपितुं नरः क्षमः<br> कश्चिद्भवोद्भूप परावरार्थवित्।<br>विमोहितस्तैस्त्रिभिरेव मूलतो<br> वशीकृतात्मा जगतीतले भृशम्॥ २६ | हे राजन्! इस पृथ्वीपर कार्य और कारणका विज्ञ कोई भी व्यक्ति [उन जगदम्बाकी मायाके] मोहसे छुटकारा नहीं पा सकता; क्योंकि भगवती महामायाके तीनों गुणोंसे मोहित होकर वह पूर्णरूपसे सदा उनके अधीन रहता है॥ २६॥ |
| अथ तौ मायया विष्णुवासवौ मोहितौ भृशम्।<br>जघ्नतुश्छद्मना वृत्रं स्वार्थसाधनतत्परौ॥ २७<br><br>तदहं सम्प्रवक्ष्यामि वृत्तान्तमवनीपते।<br>कारणं पूर्ववैरस्य वृत्रवासवयोर्मिथः॥ २८ | इसलिये [उन्हीं देवीकी] मायासे मोहित होकर अपना स्वार्थ साधनेमें तत्पर रहनेवाले विष्णु और इन्द्रने छलपूर्वक वृत्रासुरको मार डाला। हे पृथ्वीपते! अब मैं वृत्रासुर और इन्द्रके पारस्परिक पूर्ववैरके कारणकी कथा बताता हूँ॥ २७-२८॥ |
| त्वष्टा प्रजापतिर्ह्यासीद्देवश्रेष्ठो महातपाः।<br>देवानां कार्यकर्ता च निपुणो ब्राह्मणप्रियः॥ २९ | देवताओंमें श्रेष्ठ त्वष्टा नामके एक प्रजापति थे। वे महान् तपस्वी, देवताओंका कार्य करनेवाले, अति कुशल तथा ब्राह्मणोंके प्रिय थे॥ २९॥ |
| स पुत्रं वै त्रिशिरसमिन्द्रद्वेषात्किलासृजत् ।<br>विश्वरूपेति विख्यातं नाम्ना रूपेण मोहनम्॥ ३० | उन्होंने इन्द्रसे द्वेषके कारण तीन मस्तकोंसे सम्पन्न एक पुत्र उत्पन्न किया, जो विश्वरूप नामसे विख्यात हुआ। वह परम मनोहर रूपवाला था॥ ३०॥ |
| ७२६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्रिभिः स वदनैः श्रेष्ठैर्व्यरोचत मनोहरैः ।<br>त्रिभिर्भिन्नानि कार्याणि मुखैः समकरोन्मुनिः ॥ ३१<br><br>वेदानेकेन सोऽधीते सुरां चैकेन सोऽपिबत् ।<br>तृतीयेन दिशः सर्वा युगपच्च निरीक्षते ॥ ३२ | अपने तीन श्रेष्ठ तथा मनोहर मुखोंके कारण वह अत्यन्त शोभासम्पन्न दिखायी देता था। वह मुनि अपने तीन मुखोंसे तीन भिन्न-भिन्न कार्य करता था। वह एक मुखसे वेदाध्ययन करता था, एक मुखसे मधुपान करता था और तीसरे मुखसे सब दिशाओंका एक साथ निरीक्षण करता था॥ ३१-३२॥ |
| त्रिशिरा भोगमुत्सृज्य तपश्चक्रे सुदुष्करम् ।<br>तपस्वी स मृदुर्दान्तो धर्ममेव समाश्रितः ॥ ३३ | वह त्रिशिरा भोगका त्याग करके मृदु, संयमी और धर्मपरायण तपस्वी होकर अत्यन्त कठोर तप करने लगा॥ ३३॥ |
| पञ्चाग्निसाधनं काले पादपाग्रे निवेशनम् ।<br>जलमध्ये निवासं च हेमन्ते शिशिरे तथा ॥ ३४<br><br>निराहारो जितात्मासौ त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।<br>तपश्चचार मेधावी दुष्करं मन्दबुद्धिभिः ॥ ३५ | ग्रीष्मकालमें पंचाग्नि तापते, वृक्षकी डालीमें पैरके बल अधोमुख लटके रहते एवं हेमन्त और शिशिर ऋतुमें जलमें स्थित रहते थे। सब कुछ त्याग करके जितेन्द्रिय भावसे निराहार रहकर उस बुद्धिमान् [त्रिशिरा]-ने मन्दबुद्धि प्राणियोंके लिये अत्यन्त दुष्कर तपस्या आरम्भ कर दी॥ ३४-३५॥ |
| तं च दृष्ट्वा तपस्यन्तं खेदमाप शचीपतिः ।<br>विषादमगमत्तत्र शक्रोऽयं मास्मभूदिति ॥ ३६ | उसको तप करते देखकर शचीपति इन्द्र दुःखित हुए। उन्हें यह विषाद हुआ कि कहीं यह इन्द्र न बन जाय॥ ३६॥ |
| दृष्ट्वा तस्य तपो वीर्यं सत्यं चामिततेजसः ।<br>चिन्तां च महतीं प्राप ह्यनिशं पाकशासनः ॥ ३७<br><br>विवर्धमानस्त्रिशिरा मामयं शातयिष्यति ।<br>नोपेक्ष्यः सर्वथा शत्रुर्वर्धमानबलो बुधैः ॥ ३८<br><br>तस्मादुपायः कर्तव्यस्तपोनाशाय साम्प्रतम् ।<br>कामस्तु तपसां शत्रुः कामान्नश्यति वै तपः ॥ ३९<br><br>तथैवाद्य प्रकर्तव्यं भोगासक्तो भवेद्यथा । | उस अत्यन्त तेजस्वी [विश्वरूप]-का तप, पराक्रम और सत्य देखकर इन्द्र निरन्तर इस प्रकार चिन्तित रहने लगे—उत्तरोत्तर वृद्धिको प्राप्त होता हुआ यह त्रिशिरा मुझे ही समाप्त कर देगा, इसीलिये बुद्धिमानोंने कहा है कि बढ़ते हुए पराक्रमवाले शत्रु की कभी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। इसलिये इसके तपके नाशका उपाय इसी समय करना चाहिये। कामदेव तपस्वियोंका शत्रु है, कामसे ही तपका नाश होता है। अतः मुझे वैसा ही करना चाहिये, जिससे यह भोगोंमें आसक्त हो जाय॥ ३७-३९ ½॥ |
| इति सञ्चिन्त्य मनसा बुद्धिमान्बलमर्दनः ॥ ४०<br><br>आज्ञापयत्सोऽप्सरसस्त्वाष्ट्रपुत्रप्रलोभने ।<br>उर्वशीं मेनकां रम्भां घृताचीं च तिलोत्तमाम् ॥ ४१<br><br>समाहूयाब्रवीच्छक्रस्तास्तदा रूपगर्विताः ।<br>प्रियं कुरुध्वं मे सर्वाः कार्येऽद्य समुपस्थिते ॥ ४२ | ऐसा मनमें विचारकर बल नामक दैत्यका नाश करनेवाले उन बुद्धिमान् इन्द्रने त्वष्टाके पुत्र त्रिशिराको प्रलोभनमें डालनेके लिये अप्सराओंको आज्ञा दी। उन्होंने उर्वशी, मेनका, रम्भा, घृताची, तिलोत्तमा आदिको बुलाकर कहा—अपने रूपपर गर्व करनेवाली हे अप्सराओ! आज मेरा कार्य आ पड़ा है, तुम सब मेरे उस प्रिय कार्यको सम्पन्न करो॥ ४०-४२॥ |
| यत्तो मेऽद्य महाञ्छत्रुस्तपस्तपति दुर्जयः ।<br>कार्यं कुरुत गच्छध्वं प्रलोभयत माचिरम् ॥ ४३ | मेरा एक महान् दुर्धर्ष शत्रु संयत होकर तपस्या कर रहा है। शीघ्र ही उसके पास जाओ और उसे प्रलोभित करो; इस प्रकार शीघ्र ही मेरा कार्य करो॥ ४३॥ |
| अ० १ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७२७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शृङ्गारवेशैर्विविधैर्भावैर्देहसमुद्भवैः ।<br>प्रलोभयत भद्रं वः शमयध्वं ज्वरं मम ॥ ४४ | अनेक प्रकारके शृंगार-वेशों तथा शरीरके हाव-भावोंसे उसे प्रलोभित करो और मेरे मानसिक सन्तापको शान्त करो; तुमलोगोंका कल्याण हो ॥ ४४ ॥ |
| अस्वस्थोऽहं महाभागास्तस्य ज्ञात्वा तपोबलम् ।<br>बलवानासनं मेऽद्य ग्रहीष्यत्यविलम्बितः ॥ ४५ | हे महाभागा अप्सराओ! उसके तपोबलको जानकर मैं व्याकुल हो गया हूँ, वह बलवान् शीघ्र ही मेरा पद छीन लेगा ॥ ४५ ॥ |
| भयं मे समुपायातं क्षिप्रं नाशयताबलाः ।<br>उपकुर्वन्तु सहिताः कार्येऽद्य समुपस्थिते ॥ ४६ | हे अबलाओ! मेरे सामने यह भय आ गया है, तुमलोग शीघ्र ही इसका नाश कर दो। इस कार्यके आ पड़नेपर तुम सब मिलकर आज मेरा उपकार करो ॥ ४६ ॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं नार्य ऊचुस्तं प्रणताः पुरः ।<br>मा भयं कुरु देवेश यतिष्यामः प्रलोभने ॥ ४७ | उनके इस वचनको सुनकर नारियों (अप्सराओं)-ने उन्हें नमन करते हुए कहा—हे देवराज! आप भय न करें, हम उसे प्रलोभनमें डालनेका प्रयत्न करेंगी ॥ ४७ ॥ |
| यथा न स्याद्भयं तस्मात्तथा कार्यं महाद्युते ।<br>नृत्यगीतविहारैश्च मुनेस्तस्य प्रलोभने ॥ ४८<br><br>कटाक्षैरङ्गभेदैश्च मोहयित्वा मुनिं विभो ।<br>लोलुपं वशमस्माकं करिष्यामो नियन्त्रितम् ॥ ४९ | हे महातेजस्विन्! जिस प्रकारसे आपको भय न हो, हम वैसा ही करेंगी। उस मुनिको लुभानेके लिये हम नृत्य, गीत और विहार करेंगी। हे विभो! कटाक्षों और अंगोंकी विविध भंगिमाओंसे मुनिको मोहित करके उन्हें लोलुप, अपने वशीभूत तथा नियन्त्रणमें कर लेंगी ॥ ४८-४९ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्याभाष्य हरिं नार्यो ययुस्त्रिशिरसोऽन्तिकम् ।<br>कुर्वन्त्यो विविधान्भावान्कामशास्त्रोचितानपि ॥ ५० | व्यासजी बोले—इन्द्रसे ऐसा कहकर वे अप्सराएँ त्रिशिराके समीप गयीं और कामशास्त्रमें कहे गये विभिन्न प्रकारके हाव-भावका प्रदर्शन करने लगीं ॥ ५० ॥ |
| गायन्त्यस्तालभेदैस्ता नृत्यन्त्यः पुरतो मुनेः ।<br>तं प्रलोभयितुं चक्रुर्नानाभावान्वराङ्गनाः ॥ ५१ | वे अप्सराएँ मुनिके सम्मुख अनेक प्रकारके तालोंमें गाती और नाचती हुई उन्हें मोहित करनेके लिये विविध प्रकारके हाव-भाव करती थीं ॥ ५१ ॥ |
| नापश्यत्स तपोराशिरङ्गनानां विडम्बनम् ।<br>इन्द्रियाणि वशे कृत्वा मूकान्धबधिरः स्थितः ॥ ५२ | किंतु उन तपस्वीने अप्सराओंकी चेष्टाको देखातक नहीं और इन्द्रियोंको वशमें करके वे गूँगे, अन्धे और बहरेकी तरह बैठे रहे ॥ ५२ ॥ |
| दिनानि कतिचित्तस्थुर्नार्यस्तस्याश्रमे वरे ।<br>कुर्वन्त्यो गाननृत्यादिप्रपञ्चानतिमोहदान् ॥ ५३ | वे अप्सराएँ गान, नृत्य आदि मोहित करनेवाले प्रपंच करती हुई कुछ दिनोंतक उनके श्रेष्ठ आश्रममें रहीं ॥ ५३ ॥ |
| न चचाल यदा कामं ध्यानाच्च त्रिशिरा मुनिः ।<br>परावृत्य तदा देव्यः पुनः शक्रमुपस्थिताः ॥ ५४ | जब उनकी कामचेष्टाओंसे मुनि त्रिशिराका ध्यान विचलित नहीं हुआ, तब वे अप्सराएँ पुनः लौटकर इन्द्रके सम्मुख उपस्थित हुईं ॥ ५४ ॥ |
| कृताञ्जलिपुटाः सर्वा देवराजमथाब्रुवन् ।<br>श्रान्ता दीना भयत्रस्ता विवर्णवदना भृशम् ॥ ५५ | अत्यन्त थकी हुई, दीन अवस्थावाली, भयभीत और उदास मुखवाली उन सबने हाथ जोड़कर देवराजसे इस प्रकार कहा— ॥ ५५ ॥ |
| ७२८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ |
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| देवदेव महाराज यत्नश्च परमः कृतः।<br>न स शक्यो दुराधर्षो धैर्याच्चालयितुं विभो॥ ५६ | हे देवदेव! हे महाराज! हे विभो! हमने महान् प्रयत्न किया, परंतु हम उस दुर्धर्ष मुनिको धैर्यसे विचलित करनेमें समर्थ नहीं हो पायीं॥ ५६॥ |
| उपायोऽन्यः प्रकर्तव्यः सर्वथा पाकशासन।<br>नास्माकं बलमेतस्मिंस्तापसे विजितेन्द्रिये॥ ५७ | हे पाकशासन! आपको कोई दूसरा ही उपाय करना चाहिये, उन जितेन्द्रिय तपस्वीपर हमारा कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ सकता॥ ५७॥ |
| दिष्ट्या वयं न शप्ताः स्म यदनेन महात्मना।<br>मुनिना वह्नितुल्येन तपसा द्योतितेन हि॥ ५८ | हमारा बड़ा भाग्य है कि तपस्यासे अग्निके समान प्रकाशित होनेवाले उन महात्मा मुनिने हमें शाप नहीं दिया॥ ५८॥ |
| विसृज्याप्सरसः शक्रश्चिन्तयामास मन्दधीः।<br>तस्यैव च वधोपायं पापबुद्धिरसाम्प्रतम्॥ ५९ | अप्सराओंको विदा करके क्षुद्रबुद्धि तथा पापबुद्धि इन्द्र उसके ही वधका अनुचित उपाय सोचने लगे॥ ५९॥ |
| विसृज्य लोक लज्जां स तथा पापभयं भृशम्।<br>चकार पापबुद्धिं तु तद्वधाय महीपते॥ ६० | हे राजन्! लोक-लज्जा और महान् पापके भयको छोड़कर उन्होंने उसके वधके लिये अपनी बुद्धिको पापमय बना दिया॥ ६०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे
त्रिशिरसस्तपोभङ्गार्थं देवराजेन्द्रद्वारा नानोपायचिन्तनवर्णनं
नाम प्रथमोऽध्यायः॥ १॥
### अथ द्वितीयोऽध्यायः
**इन्द्रद्वारा त्रिशिराका वध, क्रुद्ध त्वष्टाद्वारा अथर्ववेदोक्त मन्त्रोंसे**
**हवन करके वृत्रासुरको उत्पन्न करना और उसे**
**इन्द्रके वधके लिये प्रेरित करना**
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| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| अथ स लोभमुपेत्य सुराधिपः<br>समधिगम्य गजासनसंस्थितः।<br>त्रिशिरसं प्रति दुष्टमतिस्तदा<br>मुनिमपश्यदमयपराक्रमम् ॥ १ | व्यासजी बोले—इस प्रकार लोभके वशीभूत होकर पापबुद्धि देवराज इन्द्रने ऐरावत हाथीपर सवार हो त्रिशिराके पास जाकर उस अमेय पराक्रमवाले मुनिको देखा॥ १॥ |
| तमभिवीक्ष्य दृढासनसंस्थितं<br>जितगिरं सुसमाधिवशं गतम्।<br>रविविभावसुसन्निभमोजसा<br>सुरपतिः परमापदमभ्यगात् ॥ २ | उसे दृढ़ आसनपर बैठे, वाणीको वशमें किये, पूर्ण समाधिमें स्थित और सूर्य तथा अग्निके समान तेजस्वी देखकर देवराज इन्द्र बहुत दुःखित हुए॥ २॥ |
| कथमसौ विनिहन्तुमहो मया<br>मुनिरपापमतिः किल सम्मतः।<br>रिपुरयं सुसमिद्धतपोबलः<br>कथमुपेक्ष्य इहासनकामुकः ॥ ३ | यह मुनि निष्पापबुद्धि है; इसे मारनेमें मैं कैसे समर्थ हो सकूँगा? तपोबलसे अत्यन्त समृद्ध तथा मेरा आसन प्राप्त करनेकी इच्छावाले इस शत्रु की उपेक्षा भी कैसे करूँ—ऐसा सोचकर देवसंघके |
| अ० २ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७२९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इति विचिन्त्य पविं परमायुधं<br>प्रति मुमोच मुनिं तपसि स्थितम्।<br>शशिदिवाकरसन्निभमाशुगं<br>त्रिशिरसं सुरसङ्घपतिः स्वयम्॥ ४ | स्वामी इन्द्रने अपने तीव्रगामी तथा श्रेष्ठ आयुध वज्रको सूर्य-चन्द्रमाके समान तेजस्वी, तपमें स्थित मुनि त्रिशिराके ऊपर चला दिया॥ ३-४॥ |
| तदभिघातहतः स धरातले<br>किल पपात ममार च तापसः।<br>शिखरिणः शिखरं कुलिशार्दितं<br>निपतितं भुवि चाद्भुतदर्शनम्॥ ५ | उसके प्रहारसे घायल होकर वे तपस्वी उसी प्रकार पृथ्वीपर गिर पड़े और निष्प्राण हो गये, जैसे वज्रसे विदीर्ण होकर पर्वतोंके शिखर पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं; यह घटना देखनेमें बड़ी अद्भुत थी॥ ५॥ |
| तं निहत्य मुदमाप सुरेश-<br>श्चुक्रुशुश्च मुनयस्तु संस्थिताः।<br>हा हतेति भृशमार्तनिस्वनाः<br>किं कृतं शतमखेन पापिना॥ ६ | उनको मारकर इन्द्र प्रसन्न हो गये, परंतु वहाँ स्थित अन्य मुनिगण आर्तस्वरमें चिल्लाने लगे कि हाय! हाय! सौ यज्ञ करनेवाले पापी इन्द्रने यह क्या कर डाला!॥ ६॥ |
| विनापराधं तपसां निधिर्हतः<br>शचीपतिः पापमतिर्दुरात्मा।<br>फलं किलायं तरसा कृतस्य<br>प्राप्नोतु पापी हननोद्भवस्य॥ ७ | पापबुद्धि और दुष्टात्मा शचीपति इन्द्रने इस निरपराध तपोनिधिको मार डाला। इस हत्याजनित पापका फल यह पापी अब शीघ्र ही प्राप्त करे॥ ७॥ |
| तं निहत्य तरसा सुरराजो<br>निजगाम निजमन्दिरमाशु।<br>स हतोऽपि विरराज महात्मा<br>जीवमान इव तेजसां निधिः॥ ८ | उन्हें मारकर देवराज तुरंत ही अपने भवनको जानेके लिये उद्यत हुए। तेजके निधि वे महात्मा (त्रिशिरा) मर जानेपर भी जीवितकी भाँति प्रतीत होते थे॥ ८॥ |
| तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ जीवन्तमिव वृत्रहा।<br>चिन्तामापातिखिन्नाङ्गः किं वा जीवेदयं पुनः॥ ९ | उसे जीवितकी भाँति भूमिपर गिरा हुआ देखकर अति उदास मनवाले वे वृत्रहन्ता इन्द्र इस चिन्तामें पड़ गये कि कहीं यह फिर जीवित न हो जाय॥ ९॥ |
| विमृश्य मनसातीव तक्षाणं पुरतः स्थितम्।<br>मघवा वीक्ष्य तं प्राह स्वकार्यसदृशं वचः॥ १० | मनमें बहुत देरतक विचार करनेके बाद इन्द्रने सामने खड़े तक्षा (बढ़ई)-को देखकर अपने कार्यके अनुरूप बात कही॥ १०॥ |
| तक्षंश्छिन्धि शिरांस्यस्य कुरुष्व वचनं मम।<br>मा जीवतु महातेजा भाति जीवन्निव स्वयम्॥ ११<br>इत्याकर्ण्य वचस्तस्य तक्षोवाच विगर्हयन्। | हे तक्षन्! मेरा कहा हुआ करो; इसके सिर काट लो, जिससे यह जीवित न रहे। यह महातेजस्वी जीवित न होते हुए भी जीवितकी भाँति प्रतीत होता है। उनकी यह बात सुनकर तक्षाने धिक्कारते हुए कहा—॥ ११ १/२॥ |
| तक्षोवाच<br>महास्कन्धो भृशं भाति परशुर्न तरिष्यति॥ १२<br>ततो नाहं करिष्यामि कार्यमेतद्विगर्हितम्।<br>त्वया वै निन्दितं कर्म कृतं सद्भिर्विगर्हितम्॥ १३<br>अहं बिभेमि पापाद्वै मृतस्यैव च मारणे।<br>मृतोऽयं मुनिरस्त्येव शिरसः कृन्तनेन किम्॥ १४<br>भयं किं तेऽत्र सञ्जातं पाकशासन कथ्यताम्। | तक्षा बोला— ये अति विशाल कन्धेवाले प्रतीत हो रहे हैं। मेरा परशु इस कन्धेको काट नहीं सकेगा। अतः मैं इस निन्दनीय कार्यको नहीं करूँगा, आपने तो निन्दित और सत्पुरुषोंद्वारा गर्हित कर्म कर डाला है, मैं पापसे डरता हूँ; फिर मरे हुएको क्यों मारूँ? ये मुनि तो मर गये हैं, फिर इनका सिर काटनेसे क्या प्रयोजन? हे पाकशासन! कहिये, इनसे आपको क्या भय उत्पन्न हुआ है?॥ १२-१४ १/२॥ |
| ७३० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ |
|---|
| इन्द्र उवाच<br>सजीव इव देहोऽयमाभाति विशदाकृतिः॥ १५<br>तस्माद् बिभेमि मा जीवेन्मुनिः शत्रुरयं मम। | **इन्द्र बोले—**यह निर्मल आकृतिवाली देह सजीवकी भाँति दिखायी देती है। यह मेरा शत्रु मुनि पुनः न जीवित हो जाय, इसलिये मैं डरता हूँ॥ १५ १/२॥ |
| तक्षोवाच<br>नात्र किं त्रपसे विद्वन् क्रूरेणानेन कर्मणा॥ १६<br>ऋषिपुत्रमिमं हत्वा ब्रह्महत्याभयं न किम्। | **तक्षा बोला—**हे विद्वन्! क्या इस क्रूर कर्मको करते हुए आपको लज्जा नहीं आती? इस ऋषिपुत्रको मारकर क्या आपको ब्रह्महत्याका भय नहीं है?॥ १६ १/२॥ |
| इन्द्र उवाच<br>प्रायश्चित्तं करिष्यामि पश्चात्तापक्षयाय वै॥ १७<br>शत्रुस्तु सर्वथा वध्यश्छलेनापि महामते। | **इन्द्र बोले—**मैं बादमें पापके नष्ट होनेके लिये प्रायश्चित्त कर लूँगा। हे महामते! शत्रुको तो सब प्रकारसे छलके द्वारा भी मार देना चाहिये॥ १७ १/२॥ |
| तक्षोवाच<br>त्वं लोभाभिहतः पापं करोषि मघवन्निह॥ १८<br>तं विनाहं कथं पापं करोमि वद मे विभो। | **तक्षा बोला—**हे इन्द्र! आप लोभके वशीभूत होकर पाप कर रहे हैं। हे विभो! बतायें, मैं उसके बिना पाप क्यों करूँ?॥ १८ १/२॥ |
| इन्द्र उवाच<br>मखेषु खलु भागं ते करिष्यामि सदैव हि॥ १९<br>शिरः पशोस्तु ते भागं यज्ञे दास्यन्ति मानवाः।<br>शुल्कनानेन छिन्धि त्वं शिरांस्यस्य कुरु प्रियम्॥ २० | **इन्द्र बोले—**मैं सदैवके लिये तुम्हारे यज्ञभागकी व्यवस्था कर दूँगा। मनुष्य यज्ञभागके रूपमें पशुका सिर तुम्हें देंगे। इस शुल्कके बदलेमें तुम इसके सिर काट दो और मेरा प्रिय कार्य कर दो॥ १९-२०॥ |
| व्यास उवाच<br>एतच्छ्रुत्वा महेन्द्रस्य वचस्तक्षा मुदान्वितः।<br>कुठारेण शिरांस्यस्य चकर्त सुदृढेन हि॥ २१ | **व्यासजी बोले—**देवराज इन्द्रका यह वचन सुनकर प्रसन्न हो बढ़ईने अपने सुदृढ़ कुठारसे उसके सिर काट डाले॥ २१॥ |
| छिन्नानि त्रीणि शीर्षाणि पतितानि यदा भुवि।<br>तेभ्यस्तु पक्षिणः क्षिप्रं विनिष्पेतुः सहस्रशः॥ २२<br>कलविङ्कास्तित्तिरयस्तथैव च कपिञ्जलाः।<br>पृथक्पृथग्विनिष्पेतर्मुखतस्तरसा तदा॥ २३ | कटे हुए तीनों सिर जब भूमिपर गिरे तब उनमेंसे हजारों पक्षी शीघ्रतापूर्वक निकल पड़े। तब गौरैया, तित्तिर और कपिंजल पक्षी शीघ्रतापूर्वक उसके अलग-अलग मुखोंसे निकले॥ २२-२३॥ |
| येन वेदानधीते स्म सोमं च पिबते तथा।<br>तस्माद्वक्त्रात्किलोत्पेतुः सद्य एव कपिञ्जलाः॥ २४<br>येन सर्वा दिशः कामं पिबन्निव निरीक्षते।<br>तस्मात्तु तित्तिरास्तत्र निःसृतास्तिग्मतेजसः॥ २५<br>यत्सुरापं तु तद्वक्त्रं तस्मात्तु चटकाः किल।<br>विनिष्पेतुस्त्रिशिरस एवं ते विहगा नृप॥ २६ | जिस मुखसे वह वेदपाठ और सोमपान करता था, उस मुखसे तत्काल बहुत-से कपिंजल पक्षी निकले; जिससे वह सभी दिशाओंका निरीक्षण करता था, उससे अत्यन्त तेजस्वी तित्तिर निकले और हे राजन्! जिससे वह मधुपान करता था, उस मुखसे गौरैया पक्षी निकले। इस प्रकार त्रिशिरासे वे पक्षी निकले॥ २४—२६॥ |
| एवं विनिःसृतान्दृष्ट्वा तेभ्यः शक्रस्तदाण्डजान्।<br>मुमोद मनसा राजन् जगाम त्रिदिवं पुनः॥ २७ | हे राजन्! इस प्रकार उन मुखोंसे पक्षियोंको निकला हुआ देखकर इन्द्रके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई; वे पुनः स्वर्गको चल दिये॥ २७॥ |
| गते शक्रे तु तक्षापि स्वगृहं तरसा ययौ।<br>यज्ञभागं परं लब्ध्वा मुदमाप महीपते॥ २८ | हे पृथिवीपते! इन्द्रके चले जानेपर तक्षा भी शीघ्र ही अपने घर चल दिया। श्रेष्ठ यज्ञभाग पाकर वह बहुत प्रसन्न था॥ २८॥ |
| इन्द्रोऽथ स्वगृहं गत्वा हत्वा शत्रुं महाबलम्।<br>मेने कृतार्थमात्मानं ब्रह्महत्यामचिन्तयन्॥ २९ | इन्द्रने भी अपने महाबली शत्रुको मारकर अपने भवन जा करके ब्रह्महत्याकी चिन्ता न करते हुए अपनेको कृतकृत्य मान लिया॥ २९॥ |
अ० २ ] षष्ठ स्कन्ध ७३१
अ० २ ] षष्ठ स्कन्ध ७३१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तं श्रुत्वा निहतं त्वष्टा पुत्रं परमधार्मिकम्।<br>चुकोपातीव मनसा वचनं चेदमब्रवीत्॥ ३० | उस परम धार्मिक पुत्रको मारा गया सुनकर त्वष्टाने मनमें अत्यन्त क्रोधित हो यह वचन कहा— |
| अनागसं मुनिं यस्मात्पुत्रं निहतवान्मम।<br>तस्मादुत्पादयिष्यामि तद्वधार्थं सुतं पुनः॥ ३१ | जिसने मेरे निरपराध मुनिवृत्तिवाले पुत्रको मार डाला है, उसके वधके लिये मैं पुनः पुत्र उत्पन्न करूँगा। देवतालोग मेरे पराक्रम और तपोबलको देख लें; वह पापात्मा भी अपनी करनीका महान् फल जान ले॥ ३०—३२॥ |
| सुराः पश्यन्तु मे वीर्यं तपसश्च बलं तथा।<br>जानातु सर्व पापात्मा स्वकृतस्य फलं महत्॥ ३२ | |
| इत्युक्त्वाग्निं जुहावाथ मन्त्रैराथर्वणोदितैः।<br>पुत्रस्योत्पादनार्थाय त्वष्टा क्रोधसमाकुलः॥ ३३ | ऐसा कहकर क्रोधसे अत्यन्त व्याकुल त्वष्टा पुत्रकी उत्पत्तिके लिये अथर्ववेदोक्त मन्त्रोंसे अग्निमें हवन करने लगे॥ ३३॥ |
| कृते होमेऽष्टरात्रं तु सन्दीप्ताच्च विभावसौ।<br>प्रादुर्बभूव तरसा पुरुषः पावकोपमः॥ ३४ | आठ रात्रियोंतक प्रज्वलित अग्निमें हवन करनेपर सहसा अग्निसदृश एक पुरुष प्रकट हुआ॥ ३४॥ |
| तं दृष्ट्वाग्रे सुतं त्वष्टा तेजोबलसमन्वितम्।<br>वेगात्प्रकटितं वह्नेर्दीप्यमानमिवानलम्॥ ३५ | वेगपूर्वक अग्निसे प्रकट हुए और अग्निके सदृश प्रकाशमान तथा तेज-बलसे युक्त उस पुत्रको अपने सम्मुख देखकर त्वष्टाने कहा—हे इन्द्रशत्रु! मेरे तपोबलसे तुम शीघ्र बढ़ जाओ॥ ३५-३६॥ |
| उवाच वचनं त्वष्टा सुतं वीक्ष्य पुरःस्थितम्।<br>इन्द्रशत्रो विवर्धस्व प्रतापात्तपसो मम॥ ३६ | |
| इत्युक्ते वचने त्वष्ट्रा क्रोधप्रज्वलितेन च।<br>सोऽवर्धत दिवं स्तब्ध्वा वैश्वानरसमद्युतिः॥ ३७ | क्रोधसे जाज्वल्यमान त्वष्टाके ऐसा कहते ही अग्निके समान कान्तिवाला वह पुत्र द्युलोकको स्तब्ध करता हुआ बड़ा होने लगा॥ ३७॥ |
| जातः स पर्वताकारः कालमृत्युसमः स्वराट्।<br>किं करोमीति तं प्राह पितरं परमातुरम्॥ ३८ | बढ़ते-बढ़ते वह पर्वताकार विशाल और काल पुरुषके समान भयानक हो गया। उसने अत्यन्त दुःखित अपने पितासे कहा—मैं क्या करूँ? हे नाथ! मेरा नामकरण कीजिये। हे सुव्रत! मुझे कार्य बताइये, आप चिन्तित क्यों हैं? मुझे अपने दुःखका कारण बताइये। मैं आज ही आपके शोकका नाश कर दूँगा—ऐसा मेरा दृढ़ संकल्प है। जिस पुत्रके रहते पिता दुःखी हो, उस पुत्रसे क्या लाभ! मैं शीघ्र ही समुद्रको पी जाऊँगा, पर्वतोंको चूर-चूर कर दूँगा और उगते हुए प्रचण्ड तेजस्वी सूर्यको रोक दूँगा। मैं देवताओंसहित इन्द्रको तथा यमको अथवा अन्य किसी भी देवताको मार डालूँगा। इन सबको तथा पृथिवीको भी उखाड़कर समुद्रमें फेंक दूँगा॥ ३८—४२॥ |
| कुरु मे नामकं नाथ कार्यं कथय सुव्रत।<br>चिन्तातुरोऽसि कस्मात्त्वं ब्रूहि मे शोककारणम्॥ ३९ | |
| नाशयाम्यद्य ते शोकमिति मे व्रतमाहितम्।<br>तेन जातेन किं भूयः पिता भवति दुःखितः॥ ४० | |
| पिबामि सागरं सद्यश्चूर्णयामि धराधरान्।<br>उद्यन्तं वारयाम्यद्य तरणिं तिग्मतेजसम्॥ ४१ | |
| हन्मीन्द्रं ससुरं सद्यो यमं वा देवतान्तरम्।<br>क्षिपामि सागरे सर्वान्समुत्पाट्य च मेदिनीम्॥ ४२ | |
| इत्याकर्ण्य वचस्तस्य त्वष्टा पुत्रस्य पेशलम्।<br>प्रत्युवाचातिमुदितस्तं सुतं पर्वतोपमम्॥ ४३ | उसका यह प्रिय वचन सुनकर त्वष्टाने प्रसन्न हो पर्वतके समान विशाल उस पुत्रसे कहा—॥ ४३॥ |
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| वृजिनात्रातुमधुना यस्माच्छक्तोऽसि पुत्रक।<br>तस्माद् वृत्र इति ख्यातं तव नाम भविष्यति॥ ४४<br>भ्राता तव महाभाग त्रिशिरा नाम तापसः।<br>त्रीणि तस्य च शीर्षाणि ह्यभवन्वीर्यवन्ति च॥ ४५<br>वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञः सर्वविद्याविशारदः।<br>संस्थितस्तपसि प्रायस्त्रिलोकीविस्मयप्रदे॥ ४६<br>शक्रेण तु हतः सोऽद्य वज्रघातेन साम्प्रतम्।<br>विनापराधं सहसा छिन्नानि मस्तकानि च॥ ४७<br>तस्मात्त्वं पुरुषव्याघ्र जहि शक्रं कृतागसम्।<br>ब्रह्महत्यायुतं पापं निस्त्रपं दुर्मतिं शठम्॥ ४८ | हे पुत्र! तुम अभी वृजिन (कष्ट)-से त्राण दिलानेमें समर्थ हो, इसलिये तुम्हारा ‘वृत्र’—यह नाम प्रसिद्ध होगा। हे महाभाग! तुम्हारा त्रिशिरा नामका एक तपस्वी भाई था। उसके अत्यन्त शक्तिशाली तीन सिर थे। वह वेद-वेदांगोंके तत्त्वको जाननेवाला, सभी विद्याओंमें निपुण और तीनों लोकोंको आश्चर्यमें डाल देनेवाली तपस्यामें रत था। इन्द्रने वज्रका प्रहार करके उस निरपराधको मार डाला और उसके मस्तक काट डाले। इसलिये हे पुरुषसिंह! तुम उस ब्रह्म-हत्यारे, पापी, निर्लज्ज, दुष्टबुद्धि तथा मूर्ख इन्द्रको मार डालो॥ ४४-४८॥ |
| इत्युक्त्वा च तदा त्वष्टा पुत्रशोकसमाकुलः।<br>आयुधानि च दिव्यानि चकार विविधानि च॥ ४९<br>ददावस्मै सहस्राक्षवधाय प्रबलानि च।<br>खड्गशूलगदाशक्तितोमरप्रमुखानि वै॥ ५०<br>शार्ङ्गं धनुस्तथा बाणं परिघं पट्टिशं तथा।<br>चक्रं दिव्यं सहस्रारं सुदर्शनसमप्रभम्॥ ५१<br>तूणीरौ चाक्षयौ दिव्यौ कवचं चातिसुन्दरम्।<br>रथं मेघप्रतीकाशं दृढं भारसहं जवम्॥ ५२<br>युद्धोपकरणं सर्वं कृत्वा पुत्राय पार्थिव।<br>दत्त्वासौ प्रेरयामास त्वष्टा क्रोधसमन्वितः॥ ५३ | ऐसा कहकर पुत्रशोकसे व्याकुल त्वष्टाने विविध प्रकारके दिव्य तथा प्रबल आयुधोंका निर्माण किया और इन्द्रका वध करनेके लिये उस महाबली (वृत्र)-को दे दिया। उनमें खड्ग, शूल, गदा, शक्ति, तोमर, शार्ङ्गधनुष, बाण, परिघ, पट्टिश, सुदर्शन चक्रके समान कान्तिमान् हजार अरोंवाला दिव्य चक्र, दो दिव्य तथा अक्षय तरकस और अत्यन्त सुन्दर कवच एवं मेघके समान श्याम आभावाला, सुदृढ़, भार सहनेमें समर्थ और तीव्रगामी रथ था। इस प्रकार हे राजन्! समस्त युद्धसामग्री तैयार करके क्रोधसे व्याकुल त्वष्टाने अपने पुत्रको देकर उसे भेज दिया॥ ४९-५३॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे त्रिशिरवधानन्तरं वृत्रोत्पत्तिवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
अथ तृतीयोऽध्यायः
वृत्रासुरका देवलोकपर आक्रमण, बृहस्पतिद्वारा इन्द्रकी भर्त्सना करना और वृत्रासुरको अजेय बतलाना, इन्द्रकी पराजय, त्वष्टाके निर्देशसे वृत्रासुरका ब्रह्माजीको प्रसन्न करनेके लिये तपस्यारत होना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| कृतस्वस्त्ययनो वृत्रो ब्राह्मणैर्वेदपारगैः।<br>निर्जगाम रथारूढो हन्तुं शक्रं महाबलः॥ १ | [हे राजन्!] वेदोंमें पारंगत ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर महाबली वृत्रासुर रथपर सवार हो इन्द्रको मारनेके लिये चला॥ १॥ |
| तदैव राक्षसाः क्रूराः पुरा देवपराजिताः।<br>समाजग्मुश्च सेवार्थं वृत्रं ज्ञात्वा महाबलम्॥ २ | उस समय बहुत-से क्रूर राक्षस जो पहले देवताओंसे पराजित हो गये थे, वृत्रासुरको महान् बलशाली जानकर उसकी सेवाके लिये आ गये॥ २॥ |
| अ० ३ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७३३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इन्द्रदूतास्तु तं दृष्ट्वा युद्धाय तु समागतम्।<br>वेगादागत्य वृत्तान्तं शशंसुस्तस्य चेष्टितम्॥ ३<br><br>दूता ऊचुः<br>स्वामिञ्छीघ्रमिहायाति वृत्रो नाम रिपुस्तव।<br>बलवान्स्यन्दने रूढस्त्वष्ट्रा चोत्पादितः किल॥ ४<br><br>अभिचारेण नाशार्थं तव क्रोधान्वितेन वै।<br>पुत्रघाताभितप्तेन दुःसहो राक्षसैर्युतः॥ ५ | इन्द्रके दूत उसे युद्धके लिये आया देखकर शीघ्रतापूर्वक [इन्द्रके पास] आकर सम्पूर्ण वृत्तान्त और उसकी गतिविधि बताने लगे॥ ३॥<br><br>दूत बोले— हे स्वामिन्! वृत्र नामका आपका बलवान् और दुर्धर्ष शत्रु रथपर आरूढ़ होकर राक्षसोंके साथ शीघ्र ही यहाँ आ रहा है; पुत्रशोकसे सन्तप्त और क्रोधाभिभूत त्वष्टाने आपके नाशके लिये अभिचारकर्मसे उसे उत्पन्न किया है॥ ४-५॥ |
| यतं कुरु महाभाग शीघ्रमायाति साम्प्रतम्।<br>मेरुमन्दरसंकाशो घोरशब्दोऽतिदारुणः॥ ६<br><br>एतस्मिन्नन्तरे तत्र भीता देवगणा भृशम्।<br>आगत्योचुः सुरपतिं शृण्वन्तं दूतभाषितम्॥ ७ | हे महाभाग! शीघ्र ही [रक्षाका] उपाय कीजिये। सुमेरु और मन्दराचलके समान अत्यन्त भयंकर प्रतीत होनेवाला वह (वृत्रासुर) घोर गर्जन करता हुआ अब शीघ्र यहाँ आ रहा है॥ ६॥<br><br>इसी बीच अत्यन्त भयभीत देवगण वहाँ आ करके दूतोंकी बात सुन रहे देवराज इन्द्रसे इस प्रकार कहने लगे॥ ७॥ |
| गणा ऊचुः<br>मघवन् दुर्निमित्तानि भवन्ति त्रिदशालये।<br>बहूनि भयशंसीनि पक्षिणां विरुतानि च॥ ८<br><br>काकगृध्रास्तथा श्येनाः कङ्काद्या दारुणाः खगाः।<br>रुदन्ति विकृतैः शब्दैरुत्कोरैर्भवनेनोपरि॥ ९<br><br>चीचीकूचीति निनदान्कुर्वन्ति विहगा भृशम्।<br>वाहनानां च नेत्रेभ्यो जलधाराः पतन्त्यधः॥ १०<br><br>श्रूयतेऽतिमहाञ्छब्दो रुदतीनां निशासु च।<br>राक्षसीनां महाभाग भवनोपरि दारुणः॥ ११<br><br>प्रपतन्ति ध्वजास्तूर्णं विना वातेन मानद।<br>प्रभवन्ति महोत्पाता दिवि भूम्यन्तरिक्षजाः॥ १२<br><br>कृष्णाम्बरधरा नार्यो भ्रमन्ति च गृहे गृहे।<br>यान्तु यान्तु गृहात्तूर्णं कुर्वन्त्यो विकृताननाः॥ १३<br><br>रात्रौ स्वप्नेषु कान्तानां सुप्तानां निजमन्दिरे।<br>केशाँल्लुनन्ति राक्षस्यो भीषयन्त्यो भृशातुराः॥ १४ | गण बोले— हे इन्द्र! इस समय स्वर्गमें अनेक प्रकारके अपशकुन हो रहे हैं। पक्षियोंके बहुत ही डरावने शब्द हो रहे हैं। कौए, गिद्ध, बाज और चील आदि क्रूर पक्षी भवनोंके ऊपर बैठकर भयानक स्वरोंमें रोते हैं और अन्य पक्षी भी बार-बार चीची-कूची—ऐसे शब्द कर रहे हैं। [हाथी, घोड़े आदि] वाहनोंकी आँखोंसे लगातार जल (अश्रु)-की धाराएँ नीचे गिर रही हैं। हे महाभाग! भवनोंके ऊपरी भागमें रातमें रोती हुई राक्षसियोंका महाभयानक शब्द सुनायी देता है। हे मानद! हवाके बिना ही ध्वजाएँ टूट-टूटकर गिर पड़ती हैं। स्वर्ग, पृथ्वी और आकाशमें महान् उत्पात हो रहे हैं। काले वस्त्र धारण की हुई भयानक मुखवाली स्त्रियाँ ‘निकल जाओ; घरसे शीघ्र निकल जाओ’—ऐसा कहती हुई घर-घरमें घूमती हैं। रातमें अपने घरमें सोयी हुई स्त्रियोंको भयभीत करती हुई भयानक राक्षसियाँ स्वप्नोंमें उनके बाल नोचती हैं॥ ८—१४॥ |
| एवंविधानि देवेश भूकम्पोल्कादयस्तथा।<br>गोमायवो रुदन्ति स्म निशायां भवनाङ्गणे॥ १५<br><br>सरटानां च जालानि प्रभवन्ति गृहे गृहे।<br>अङ्गप्रस्फुरणादीनि दुर्निमित्तानि सर्वशः॥ १६ | हे देवेन्द्र! इसी प्रकार भूकम्प और उल्कापात आदि उपद्रव भी हो रहे हैं, रात्रिमें हमारे भवनोंके आँगनमें सियार रुदन करते हैं। गिरगिटोंके समूह घर-घरमें उत्पन्न हो रहे हैं, सर्वथा अनिष्टके सूचक अंग-प्रस्फुरण आदि भी होते हैं॥ १५-१६॥ |
| ७३४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| व्यास उवाच<br>इति तेषां वचः श्रुत्वा चिन्तामाप सुरेश्वरः ।<br>बृहस्पतिं समाहूय पप्रच्छ च मनोगतम् ॥ १७ | व्यासजी बोले—उन लोगोंका यह वचन सुनकर इन्द्र चिन्तित हो उठे और बृहस्पतिको बुलाकर उन्होंने अपनी मनोगत बात पूछी॥ १७॥ |
| इन्द्र उवाच<br>ब्रह्मन् किमुत घोराणि निमित्तानि भवन्ति वै ।<br>वाताश्च दारुणा वान्ति प्रपतन्त्युल्काः खतः ॥ १८<br>सर्वज्ञोऽसि महाभाग समर्थो विघ्ननाशने ।<br>बुद्धिमाञ्छास्त्रतत्त्वज्ञो देवतानां गुरुस्तथा ॥ १९<br>कुरु शान्तिं विधानज्ञ शत्रुक्षयविधायिनीम् ।<br>यथा मे न भवेद्दुःखं तथा कार्यं विधीयताम् ॥ २० | इन्द्र बोले—हे ब्रह्मन्! ये भयानक अपशकुन क्यों हो रहे हैं? भयानक आँधियाँ चलती हैं और आकाशसे उल्कापात होते हैं। हे महाभाग! आप सर्वज्ञ, विघ्नका नाश करनेमें समर्थ, बुद्धिमान्, शास्त्रोंके तत्त्वोंको जाननेवाले और देवताओंके गुरु हैं। इसलिये हे विधानज्ञ! आप हमारी शान्तिके लिये शत्रुओंका नाश करनेवाला कोई शान्तिकर्म कीजिये। जिस प्रकार मुझे दुःख न हो, आप वैसा कार्य कीजिये॥ १८—२०॥ |
| बृहस्पतिरुवाच<br>किं करोमि सहस्राक्ष त्वयाद्य दुष्कृतं कृतम् ।<br>अनागसं मुनिं हत्वा किं फलं समुपार्जितम् ॥ २१ | बृहस्पति बोले—हे सहस्र नेत्रोंवाले इन्द्र! मैं क्या करूँ? तुमने बहुत बड़ा पाप कर डाला है। निरपराध मुनिको मारकर तुमने क्या लाभ प्राप्त कर लिया?॥ २१॥ |
| अत्युग्रं पुण्यपापानां फलं भवति सत्वरम् ।<br>विचार्य खलु कर्तव्यं कार्यं तद्भूतिमिच्छता ॥ २२<br>परोपतापनं कर्म न कर्तव्यं कदाचन ।<br>न सुखं विन्दते प्राणी परपीडापरायणः ॥ २३ | पुण्य और पापका अत्यन्त उग्र फल शीघ्र ही प्राप्त होता है, इसलिये ऐश्वर्यकी इच्छा रखनेवालोंको विचारपूर्वक कार्य करना चाहिये। दूसरेको कष्ट पहुँचानेका कृत्य कभी नहीं करना चाहिये। दूसरेको कष्ट देनेमें संलग्न प्राणी कभी सुख नहीं पाता॥ २२-२३॥ |
| मोहाल्लोभाद् ब्रह्महत्या कृता शक्र त्वयाधुना ।<br>तस्य पापस्य सहसा फलमेतदुपागतम् ॥ २४ | हे इन्द्र! तुमने मोह और लोभके वशीभूत होकर ब्रह्महत्या कर डाली, उसी पापका यह फल आज सहसा उपस्थित हो गया है॥ २४॥ |
| अवध्यः सर्वदेवानां जातोऽसौ वृत्रसंज्ञकः ।<br>हन्तुं त्वां स समायाति दानवैर्बहुभिर्वृतः ॥ २५ | वृत्र नामवाला यह असुर जन्मसे ही देवताओंसे अवध्य है; बहुत-से दानवोंसे घिरा हुआ वह तुम्हें मारनेके लिये चला आ रहा है॥ २५॥ |
| आयुधानि च सर्वाणि वज्रतुल्यानि वासव ।<br>त्वष्ट्रा दत्तानि दिव्यानि गृहीत्वा समुपस्थितः ॥ २६ | हे इन्द्र! त्वष्टाके द्वारा दिये हुए उन सभी वज्रतुल्य तथा दिव्य आयुधोंको लेकर वह उपस्थित हो रहा है॥ २६॥ |
| समागच्छति दुर्धर्षो रथारूढः प्रतापवान् ।<br>देवेन्द्र प्रलयं कुर्वन्नास्य मृत्युर्भविष्यति ॥ २७ | दुर्धर्ष तथा प्रतापी वह रथपर आरूढ़ होकर प्रलय मचाते हुए चला आ रहा है। हे देवेन्द्र! उसकी मृत्यु नहीं होगी॥ २७॥ |
| कोलाहलस्तदा जातस्तथा ब्रुवति वाक्पतौ ।<br>गन्धर्वाः किन्नरा यक्षा मुनयश्च तपोधनाः ॥ २८<br>सदनानि विहायैवामराः सर्वे पलायिताः ।<br>तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं शक्रश्चिन्तापरायणः ॥ २९ | बृहस्पति ऐसा कह ही रहे थे कि वहाँ कोलाहल मच गया। गन्धर्व, किन्नर, यक्ष, मुनि, तपस्वी और सभी देवता अपने-अपने भवन छोड़कर भाग चले। उस महान् आश्चर्यको देखकर इन्द्र चिन्तित हो उठे॥ २८-२९॥ |
| अ० ३ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७३५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| आज्ञापयामास तदा सेनोद्योगाय सेवकान्।<br>आनयध्वं वसून् रुद्रानश्विनौ च दिवाकरान् ॥ ३०<br>पूषणं च भगं वायुं कुबेरं वरुणं यमम्।<br>विमानेषु समारुह्य सायुधाः सुरसत्तमाः ॥ ३१<br>समागच्छन्तु तरसा शत्रुरायाति साम्प्रतम्।<br>इत्याज्ञाप्य सुरपतिः समारुह्य गजोत्तमम् ॥ ३२ | तब उन्होंने सेवकोंको सेना तैयार करनेका आदेश दिया। 'वसुओं, रुद्रों, अश्विनीकुमारों, आदित्यों, पूषा, भग, वायु, कुबेर, वरुण और यमको बुलाओ। सभी श्रेष्ठ देवता आयुधोंके साथ विमानोंपर आरूढ़ होकर यहाँ शीघ्र आ जायें; क्योंकि अब शत्रु आने ही वाला है'—ऐसी आज्ञा देकर देवराज अपने श्रेष्ठ गजराज ऐरावतपर सवार होकर बृहस्पतिको आगे करके अपने भवनसे बाहर निकले ॥ ३०—३२ १/२ ॥ |
| बृहस्पतिं पुरोधाय निर्गतो निजमन्दिरात्।<br>तथैव त्रिदशाः सर्वे स्वं स्वं वाहनमास्थिताः॥ ३३<br>युद्धाय कृतसंकल्पा निर्ययुः शस्त्रपाणयः।<br>वृत्रोऽथ दानवैर्युक्तः सम्प्राप्तो मानसोत्तरम् ॥ ३४<br>पर्वतं देवतावासं रम्यं पादपशोभितम्।<br>इन्द्रोऽप्यागत्य संग्रामं चकार मानसोत्तरे ॥ ३५ | वैसे ही अन्य सभी देवता भी हाथोंमें शस्त्र लेकर अपने-अपने वाहनोंपर सवार होकर युद्धका संकल्प करके चल पड़े। उधर वृत्रासुर भी विशाल दानवी सेनाके साथ वृक्षोंसे सुशोभित, रमणीय तथा देवताओंसे सेवित मानसरोवरके उत्तरवर्ती पर्वतपर आ गया। बृहस्पतिको आगे करके सभी देवताओंके साथ इन्द्रने भी उस मानसोत्तर पर्वतपर आकर संग्राम किया ॥ ३३—३५ १/२ ॥ |
| पर्वते देवतायुक्तो वाचस्पतिपुरःसरः।<br>तत्राभूद्दारुणं युद्धं वृत्रवासवयोस्तदा ॥ ३६<br>गदास परिघैः पाशैर्बाणैः शक्तिपरश्वधैः।<br>मानुषेण प्रमाणेन संग्रामः शरदां शतम् ॥ ३७ | तब गदा, तलवार, परिघ, पाश, बाण, शक्ति और परशु आदि युद्धास्त्रोंके द्वारा वृत्रासुर और इन्द्रमें भयानक युद्ध हुआ। मनुष्यों और विशुद्ध हृदयवाले ऋषियोंके लिये अत्यन्त भयकारी वह युद्ध मानववर्षकी गणनासे सौ वर्षोंतक चला ॥ ३६—३७ १/२ ॥ |
| बभूव भयदो नृणामृषीणां भावितात्मनाम्।<br>वरुणः प्रथमं भग्नस्ततो वायुगणः किल ॥ ३८<br>यमो विभावसुः शक्रः सर्वे ते निर्गता रणात्।<br>पलायनपरान्दृष्ट्वा देवानिन्द्रपुरोगमान् ॥ ३९<br>वृत्रोऽपि पितरं प्रागादाश्रमस्थं मुदान्वितम्।<br>प्रणम्य प्राह त्वष्टारं पितः कार्यं मया कृतम् ॥ ४० | उस युद्धमें सबसे पहले वरुण और उसके बाद मरुद्गण पलायन कर गये। इसी प्रकार यम, अग्नि, इन्द्र—जो भी थे वे सभी युद्धसे निकल भागे। इन्द्र आदि प्रमुख देवताओंको भागकर जाते देखकर वृत्रासुर भी प्रसन्नतापूर्वक आश्रमस्थित अपने पिताके पास गया और उन्हें प्रणाम करके बोला—हे पिताजी! मैंने [आपका] कार्य कर दिया ॥ ३८—४० ॥ |
| देवा विनिर्जिताः सर्वे सेन्द्राः समरसंस्थिताः।<br>विद्रुतास्ते गताः स्थानं यथा सिंहान्मृगा गजाः ॥ ४१<br>इन्द्रः पदातिरगमन्मयानीतो गजोत्तमः।<br>ऐरावतोऽयं भगवन् गृहाण द्विरदोत्तमम् ॥ ४२ | युद्धभूमिमें आये हुए इन्द्रसहित सभी देवता मुझसे पराजित हो गये। वे सब उसी प्रकार भयभीत होकर अपने स्थानोंको भाग गये, जैसे सिंहसे डरकर हाथी और मृग भाग जाते हैं। इन्द्र तो पैदल ही भाग गये; मैं हाथियोंमें श्रेष्ठ इस ऐरावतको ले आया हूँ। हे भगवन्! आप इस गजश्रेष्ठको ग्रहण करें ॥ ४१-४२ ॥ |
| न हतास्ते मया यस्मादयुक्तं भीतमारणम्।<br>आज्ञापय पुनस्तात किं करोमि तवेप्सितम् ॥ ४३ | मैंने उन सबको इसलिये नहीं मारा; क्योंकि डरे हुएको मारना अनुचित होता है। हे तात! आप पुनः आज्ञा कीजिये कि मैं आपका कौन-सा इच्छित कार्य करूँ? ॥ ४३ ॥ |