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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 736 of 889

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Page 736
अ० १ ]षष्ठ स्कन्ध७२७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शृङ्गारवेशैर्विविधैर्भावैर्देहसमुद्भवैः ।<br>प्रलोभयत भद्रं वः शमयध्वं ज्वरं मम ॥ ४४अनेक प्रकारके शृंगार-वेशों तथा शरीरके हाव-भावोंसे उसे प्रलोभित करो और मेरे मानसिक सन्तापको शान्त करो; तुमलोगोंका कल्याण हो ॥ ४४ ॥
अस्वस्थोऽहं महाभागास्तस्य ज्ञात्वा तपोबलम् ।<br>बलवानासनं मेऽद्य ग्रहीष्यत्यविलम्बितः ॥ ४५हे महाभागा अप्सराओ! उसके तपोबलको जानकर मैं व्याकुल हो गया हूँ, वह बलवान् शीघ्र ही मेरा पद छीन लेगा ॥ ४५ ॥
भयं मे समुपायातं क्षिप्रं नाशयताबलाः ।<br>उपकुर्वन्तु सहिताः कार्येऽद्य समुपस्थिते ॥ ४६हे अबलाओ! मेरे सामने यह भय आ गया है, तुमलोग शीघ्र ही इसका नाश कर दो। इस कार्यके आ पड़नेपर तुम सब मिलकर आज मेरा उपकार करो ॥ ४६ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं नार्य ऊचुस्तं प्रणताः पुरः ।<br>मा भयं कुरु देवेश यतिष्यामः प्रलोभने ॥ ४७उनके इस वचनको सुनकर नारियों (अप्सराओं)-ने उन्हें नमन करते हुए कहा—हे देवराज! आप भय न करें, हम उसे प्रलोभनमें डालनेका प्रयत्न करेंगी ॥ ४७ ॥
यथा न स्याद्भयं तस्मात्तथा कार्यं महाद्युते ।<br>नृत्यगीतविहारैश्च मुनेस्तस्य प्रलोभने ॥ ४८<br><br>कटाक्षैरङ्गभेदैश्च मोहयित्वा मुनिं विभो ।<br>लोलुपं वशमस्माकं करिष्यामो नियन्त्रितम् ॥ ४९हे महातेजस्विन्! जिस प्रकारसे आपको भय न हो, हम वैसा ही करेंगी। उस मुनिको लुभानेके लिये हम नृत्य, गीत और विहार करेंगी। हे विभो! कटाक्षों और अंगोंकी विविध भंगिमाओंसे मुनिको मोहित करके उन्हें लोलुप, अपने वशीभूत तथा नियन्त्रणमें कर लेंगी ॥ ४८-४९ ॥
व्यास उवाच<br>इत्याभाष्य हरिं नार्यो ययुस्त्रिशिरसोऽन्तिकम् ।<br>कुर्वन्त्यो विविधान्भावान्कामशास्त्रोचितानपि ॥ ५०व्यासजी बोले—इन्द्रसे ऐसा कहकर वे अप्सराएँ त्रिशिराके समीप गयीं और कामशास्त्रमें कहे गये विभिन्न प्रकारके हाव-भावका प्रदर्शन करने लगीं ॥ ५० ॥
गायन्त्यस्तालभेदैस्ता नृत्यन्त्यः पुरतो मुनेः ।<br>तं प्रलोभयितुं चक्रुर्नानाभावान्वराङ्गनाः ॥ ५१वे अप्सराएँ मुनिके सम्मुख अनेक प्रकारके तालोंमें गाती और नाचती हुई उन्हें मोहित करनेके लिये विविध प्रकारके हाव-भाव करती थीं ॥ ५१ ॥
नापश्यत्स तपोराशिरङ्गनानां विडम्बनम् ।<br>इन्द्रियाणि वशे कृत्वा मूकान्धबधिरः स्थितः ॥ ५२किंतु उन तपस्वीने अप्सराओंकी चेष्टाको देखातक नहीं और इन्द्रियोंको वशमें करके वे गूँगे, अन्धे और बहरेकी तरह बैठे रहे ॥ ५२ ॥
दिनानि कतिचित्तस्थुर्नार्यस्तस्याश्रमे वरे ।<br>कुर्वन्त्यो गाननृत्यादिप्रपञ्चानतिमोहदान् ॥ ५३वे अप्सराएँ गान, नृत्य आदि मोहित करनेवाले प्रपंच करती हुई कुछ दिनोंतक उनके श्रेष्ठ आश्रममें रहीं ॥ ५३ ॥
न चचाल यदा कामं ध्यानाच्च त्रिशिरा मुनिः ।<br>परावृत्य तदा देव्यः पुनः शक्रमुपस्थिताः ॥ ५४जब उनकी कामचेष्टाओंसे मुनि त्रिशिराका ध्यान विचलित नहीं हुआ, तब वे अप्सराएँ पुनः लौटकर इन्द्रके सम्मुख उपस्थित हुईं ॥ ५४ ॥
कृताञ्जलिपुटाः सर्वा देवराजमथाब्रुवन् ।<br>श्रान्ता दीना भयत्रस्ता विवर्णवदना भृशम् ॥ ५५अत्यन्त थकी हुई, दीन अवस्थावाली, भयभीत और उदास मुखवाली उन सबने हाथ जोड़कर देवराजसे इस प्रकार कहा— ॥ ५५ ॥