देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
Page 742 of 889
Read in contextPage 742
| अ० ३ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७३३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| इन्द्रदूतास्तु तं दृष्ट्वा युद्धाय तु समागतम्।<br>वेगादागत्य वृत्तान्तं शशंसुस्तस्य चेष्टितम्॥ ३<br><br>दूता ऊचुः<br>स्वामिञ्छीघ्रमिहायाति वृत्रो नाम रिपुस्तव।<br>बलवान्स्यन्दने रूढस्त्वष्ट्रा चोत्पादितः किल॥ ४<br><br>अभिचारेण नाशार्थं तव क्रोधान्वितेन वै।<br>पुत्रघाताभितप्तेन दुःसहो राक्षसैर्युतः॥ ५ | इन्द्रके दूत उसे युद्धके लिये आया देखकर शीघ्रतापूर्वक [इन्द्रके पास] आकर सम्पूर्ण वृत्तान्त और उसकी गतिविधि बताने लगे॥ ३॥<br><br>दूत बोले— हे स्वामिन्! वृत्र नामका आपका बलवान् और दुर्धर्ष शत्रु रथपर आरूढ़ होकर राक्षसोंके साथ शीघ्र ही यहाँ आ रहा है; पुत्रशोकसे सन्तप्त और क्रोधाभिभूत त्वष्टाने आपके नाशके लिये अभिचारकर्मसे उसे उत्पन्न किया है॥ ४-५॥ |
| यतं कुरु महाभाग शीघ्रमायाति साम्प्रतम्।<br>मेरुमन्दरसंकाशो घोरशब्दोऽतिदारुणः॥ ६<br><br>एतस्मिन्नन्तरे तत्र भीता देवगणा भृशम्।<br>आगत्योचुः सुरपतिं शृण्वन्तं दूतभाषितम्॥ ७ | हे महाभाग! शीघ्र ही [रक्षाका] उपाय कीजिये। सुमेरु और मन्दराचलके समान अत्यन्त भयंकर प्रतीत होनेवाला वह (वृत्रासुर) घोर गर्जन करता हुआ अब शीघ्र यहाँ आ रहा है॥ ६॥<br><br>इसी बीच अत्यन्त भयभीत देवगण वहाँ आ करके दूतोंकी बात सुन रहे देवराज इन्द्रसे इस प्रकार कहने लगे॥ ७॥ |
| गणा ऊचुः<br>मघवन् दुर्निमित्तानि भवन्ति त्रिदशालये।<br>बहूनि भयशंसीनि पक्षिणां विरुतानि च॥ ८<br><br>काकगृध्रास्तथा श्येनाः कङ्काद्या दारुणाः खगाः।<br>रुदन्ति विकृतैः शब्दैरुत्कोरैर्भवनेनोपरि॥ ९<br><br>चीचीकूचीति निनदान्कुर्वन्ति विहगा भृशम्।<br>वाहनानां च नेत्रेभ्यो जलधाराः पतन्त्यधः॥ १०<br><br>श्रूयतेऽतिमहाञ्छब्दो रुदतीनां निशासु च।<br>राक्षसीनां महाभाग भवनोपरि दारुणः॥ ११<br><br>प्रपतन्ति ध्वजास्तूर्णं विना वातेन मानद।<br>प्रभवन्ति महोत्पाता दिवि भूम्यन्तरिक्षजाः॥ १२<br><br>कृष्णाम्बरधरा नार्यो भ्रमन्ति च गृहे गृहे।<br>यान्तु यान्तु गृहात्तूर्णं कुर्वन्त्यो विकृताननाः॥ १३<br><br>रात्रौ स्वप्नेषु कान्तानां सुप्तानां निजमन्दिरे।<br>केशाँल्लुनन्ति राक्षस्यो भीषयन्त्यो भृशातुराः॥ १४ | गण बोले— हे इन्द्र! इस समय स्वर्गमें अनेक प्रकारके अपशकुन हो रहे हैं। पक्षियोंके बहुत ही डरावने शब्द हो रहे हैं। कौए, गिद्ध, बाज और चील आदि क्रूर पक्षी भवनोंके ऊपर बैठकर भयानक स्वरोंमें रोते हैं और अन्य पक्षी भी बार-बार चीची-कूची—ऐसे शब्द कर रहे हैं। [हाथी, घोड़े आदि] वाहनोंकी आँखोंसे लगातार जल (अश्रु)-की धाराएँ नीचे गिर रही हैं। हे महाभाग! भवनोंके ऊपरी भागमें रातमें रोती हुई राक्षसियोंका महाभयानक शब्द सुनायी देता है। हे मानद! हवाके बिना ही ध्वजाएँ टूट-टूटकर गिर पड़ती हैं। स्वर्ग, पृथ्वी और आकाशमें महान् उत्पात हो रहे हैं। काले वस्त्र धारण की हुई भयानक मुखवाली स्त्रियाँ ‘निकल जाओ; घरसे शीघ्र निकल जाओ’—ऐसा कहती हुई घर-घरमें घूमती हैं। रातमें अपने घरमें सोयी हुई स्त्रियोंको भयभीत करती हुई भयानक राक्षसियाँ स्वप्नोंमें उनके बाल नोचती हैं॥ ८—१४॥ |
| एवंविधानि देवेश भूकम्पोल्कादयस्तथा।<br>गोमायवो रुदन्ति स्म निशायां भवनाङ्गणे॥ १५<br><br>सरटानां च जालानि प्रभवन्ति गृहे गृहे।<br>अङ्गप्रस्फुरणादीनि दुर्निमित्तानि सर्वशः॥ १६ | हे देवेन्द्र! इसी प्रकार भूकम्प और उल्कापात आदि उपद्रव भी हो रहे हैं, रात्रिमें हमारे भवनोंके आँगनमें सियार रुदन करते हैं। गिरगिटोंके समूह घर-घरमें उत्पन्न हो रहे हैं, सर्वथा अनिष्टके सूचक अंग-प्रस्फुरण आदि भी होते हैं॥ १५-१६॥ |