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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 733 of 889

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Page 733

| ७२४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ |
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| अन्यायवर्तिनोऽत्यर्थं भवन्ति सुरसत्तमाः।<br>सदाचारेण युक्तेन देवाः शिष्टत्वमागताः॥ १०॥<br>एवं विशिष्टधर्मेण शिष्टत्वं कीदृशं पुनः।<br>हत्वा वृत्रं तु विश्वस्तं शक्रेण छद्मना पुनः॥ ११॥<br>प्राप्तं पापफलं नो वा ब्रह्महत्यासमुद्भवम्।<br>किं च त्वया पुरा प्रोक्तं वृत्रासुरवधः कृतः॥ १२॥<br>श्रीदेव्या इति तच्चापि चित्तं मोहयतीह नः। | श्रेष्ठ देवगण भी घोर अन्याय-मार्गके अनुगामी हो जाते हैं, जबकि सदाचारके कारण ही देवताओंको विशिष्टता प्राप्त है॥ १०॥<br>इन्द्रके द्वारा विश्वासमें लेकर वृत्रासुरकी हत्या कर दी गयी—ऐसे विशिष्ट धर्मके द्वारा उनका सदाचार कहाँ रह गया? उन्हें इस ब्रह्महत्या-जनित पापका फल मिला या नहीं? आपने पहले कहा था कि वृत्रासुरका वध स्वयं देवीने ही किया था—इससे हमारा चित्त और भी मोहमें पड़ गया है॥ ११-१२½॥ |
| सूत उवाच<br>शृण्वन्तु मुनयो वृत्तं वृत्रासुरवधाश्रयम्॥ १३॥<br>यथेन्द्रेण च सम्प्राप्तं दुःखं हत्यासमुद्भवम्।<br>एवमेव पुरा पृष्टो व्यासः सत्यवतीसुतः॥ १४॥<br>पारीक्षितेन राज्ञापि स यदाह च तद् ब्रुवे। | सूतजी बोले—हे मुनिगण! वृत्रासुरके वधसे सम्बन्धित और उस हत्यासे इन्द्रको प्राप्त महान् दुःखकी कथा सुनें। ऐसा ही पूर्वकालमें परीक्षित्पुत्र राजा जनमेजयने सत्यवतीनन्दन व्यासजीसे पूछा था; तब उन्होंने जो कहा, उसे मैं कहता हूँ॥ १३-१४½॥ |
| जनमेजय उवाच<br>कथं वृत्रासुरः पूर्वं हतो मघवता मुने॥ १५॥<br>सहायं विष्णुमासाद्य छद्मना सात्त्विकेन ह।<br>कथं च देव्या निहतो दैत्योऽसौ केन हेतुना॥ १६॥<br>कथमेकवधो द्वाभ्यां कृतः स्यान्मुनिपुङ्गव।<br>तदेतच्छ्रोतुमिच्छामि परं कौतूहलं हि मे॥ १७॥<br>महतां चरितं शृण्वन् को विरज्येत मानवः।<br>कथयाम्बावैभवं त्वं वृत्रासुरवधाश्रितम्॥ १८॥ | जनमेजय बोले—हे मुने! सत्त्वगुणसे सम्पन्न इन्द्रने भगवान् विष्णुकी सहायता लेकर वृत्रासुरको पूर्वकालमें छलपूर्वक क्यों मारा? देवीके द्वारा उस दैत्यका क्यों और किस प्रकार वध किया गया? हे मुनिश्रेष्ठ! एक व्यक्तिका दो लोगोंके द्वारा कैसे वध किया गया—इसे मैं सुनना चाहता हूँ; मुझे महान् कौतूहल है॥ १५—१७॥<br>कौन मनुष्य महापुरुषोंके चरित्रको सुननेसे विरत होगा। अतः आप वृत्रासुरके वधपर आधारित जगदम्बाके माहात्म्यको कहिये॥ १८॥ |
| व्यास उवाच<br>धन्योऽसि राजंस्तव बुद्धिरीदृशी<br>जाता पुराणश्रवणेऽतिसादरा।<br>पीत्वामृतं देववरास्तु सर्वथा<br>पाने वितृष्णाः प्रभवन्ति वै पुनः॥ १९॥<br>दिने दिने तेऽधिकभक्तिभावः<br>कथासु राजन् महनीयकीर्तेः।<br>श्रोता यदैकप्रवणः शृणोति<br>वक्ता तदा प्रीतमना ब्रवीति॥ २०॥<br>युद्धं पुरा वासववृत्रयोर्यद्<br>वेदे प्रसिद्धं च तथा पुराणे।<br>दुःखं सुरेन्द्रेण तथैव लब्धं<br>हत्वा रिपुं त्वाष्ट्रमपापमेव॥ २१॥ | व्यासजी बोले—हे राजन्! आप धन्य हैं, जो कि आपकी इस प्रकारकी बुद्धि पुराणश्रवणमें अत्यन्त आदरपूर्वक लगी हुई है। श्रेष्ठ देवगण अमृतका पान करके पूर्ण तृप्त हो जाते हैं, परंतु आप इस कथामृतका बार-बार पान करके भी अतृप्त ही हैं। हे राजन्! महान् कीर्तिवाले आपका भक्तिभाव कथाओंमें दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। श्रोता जब एकाग्रमनसे सुनता है तब वक्ता भी प्रसन्नमनसे कथा कहता है॥ १९-२०॥<br>पूर्वकालमें इन्द्र तथा वृत्रासुरका जो युद्ध हुआ था और निरपराध शत्रु वृत्रासुरका वध करके देवराज इन्द्रको जो दुःख प्राप्त हुआ था, वह वेद और पुराणमें प्रसिद्ध है॥ २१॥ |