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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 729 of 889

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Page 729

७२० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३५

वीक्ष्य स्वप्ने च तौ देवीं प्रीतियुक्तौ बभूवतुः।<br>जलाहारैस्तृतीये तु स्थितौ संवत्सरे तु तौ ॥ २४स्वप्नमें देवीका दर्शन प्राप्तकर दोनों प्रेमभावसे परिपूर्ण हो गये। अब वे दोनों तीसरे वर्षमें मात्र जलके आहारपर रहने लगे ॥ २४ ॥
एवं वर्षत्रयं कृत्वा ततस्तौ वैश्यपार्थिवौ।<br>चक्रतुस्तौ तदा चिन्तां चित्ते दर्शनलालसौ ॥ २५इस प्रकार तीन वर्षतक तपस्या करनेके पश्चात् वे दोनों—राजा और वैश्य मनमें देवीके साक्षात् दर्शनकी लालसासे चिन्तित हो उठे ॥ २५ ॥
प्रत्यक्षं दर्शनं देव्या न प्राप्तं शान्तिदं नृणाम्।<br>देहत्यागं करिष्यावो दुःखितौ भृशमातुरौ ॥ २६अत्यन्त दुःखी तथा व्याकुल होकर उन दोनोंने निश्चय किया कि मनुष्योंको शान्ति प्रदान करनेवाली देवीका प्रत्यक्ष दर्शन नहीं प्राप्त हुआ, अतः अब हम शरीरका त्याग कर देंगे ॥ २६ ॥
इति सञ्चिन्त्य मनसा राजा कुण्डं चकार ह।<br>त्रिकोणं सुस्थिरं सौम्यं हस्तमात्रप्रमाणतः ॥ २७<br><br>संस्थाप्य पावकं राजा तथा वैश्योऽतिभक्तिमान्।<br>जुहावासौ निजं मांसं छित्त्वा छित्त्वा पुनः पुनः॥ २८<br><br>तथा वैश्योऽपि दीप्तेऽग्नौ स्वमांसं प्राक्षिपत्तदा।<br>रुधिरेण बलिं चास्यै ददतुस्तौ कृतोद्यमौ ॥ २९<br><br>तदा भगवती दत्त्वा प्रत्यक्षं दर्शनं तयोः।<br>प्राह प्रतिभरोद्भ्रान्तौ दृष्ट्वा तौ दुःखितौ भृशम्॥ ३०ऐसा मनमें विचारकर राजाने एक हाथ प्रमाणका त्रिभुजाकार, सुन्दर तथा सुस्थिर अग्निकुण्ड बनाया। उसमें अग्निकी स्थापना करके राजा अपना मांस काट-काटकर बार-बार हवन करने लगे। साथ ही अत्यन्त भक्तिमान् वह वैश्य भी प्रदीप्त अग्निमें अपना मांस डालने लगा। तत्पश्चात् वे दोनों जब अपने रुधिरसे इन देवीको बलि देनेके लिये उद्यत हुए तब भगवती उन दोनोंको प्रेम-भक्तिमें तन्मय और अत्यन्त दुःखी देखकर उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देकर उनसे कहने लगीं— ॥ २७–३० ॥
देव्युवाच<br>वरं वरय भो राजन् यत्ते मनसि वाञ्छितम्।<br>तुष्टाहं तपसा तेऽद्य भक्तोऽसि त्वं मतो मम ॥ ३१<br><br>वैश्यं प्राह तदा देवी प्रसन्नाहं महामते।<br>किं तेऽभीष्टं ददाम्यद्य प्रार्थयाशु मनोगतम्॥ ३२**देवी बोलीं—**हे राजन्! अपना मनोभिलषित वर माँगो, मैं आज तुम्हारी तपस्यासे सन्तुष्ट हूँ। अब मैंने समझ लिया कि तुम मेरे भक्त हो। उसके बाद देवीने वैश्यसे कहा—हे महामते! मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हारा अभीष्ट क्या है? तुम्हारे मनमें जो भी हो माँग लो, मैं उसे दूँगी ॥ ३१-३२ ॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं राजा तामुवाच मुदान्वितः।<br>देहि मेऽद्य निजं राज्यं हतशत्रुबलं बलात्॥ ३३**व्यासजी बोले—**उनके इस वचनको सुनकर प्रसन्न मनवाले राजाने उनसे कहा कि बलपूर्वक मैं शत्रुओंका नाशकर अपना राज्य प्राप्त करूँ—मुझे आज यह वरदान दीजिये ॥ ३३ ॥
तमुवाच तदा देवी गच्छ राजन् निजं गृहम्।<br>शत्रवः क्षीणसत्त्वास्ते गमिष्यन्ति पराजिताः॥ ३४<br><br>मन्त्रिणस्ते समागम्य ते पतिष्यन्ति पादयोः।<br>कुरु राज्यं महाभाग नगरे स्वं यथासुखम्॥ ३५तब देवीने उनसे कहा—हे राजन्! अपने घरको जाओ, तुम्हारे शत्रु शीघ्र ही क्षीण बलवाले होकर पराजित हो जायेंगे। हे महाभाग! तुम्हारे मन्त्रिगण आकर तुम्हारे पैरोंपर गिरेंगे। अब आप अपने नगरमें सुखपूर्वक राज्य करें। हे राजन्! अपने विस्तृत