देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
Page 743 of 889
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| ७३४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| व्यास उवाच<br>इति तेषां वचः श्रुत्वा चिन्तामाप सुरेश्वरः ।<br>बृहस्पतिं समाहूय पप्रच्छ च मनोगतम् ॥ १७ | व्यासजी बोले—उन लोगोंका यह वचन सुनकर इन्द्र चिन्तित हो उठे और बृहस्पतिको बुलाकर उन्होंने अपनी मनोगत बात पूछी॥ १७॥ |
| इन्द्र उवाच<br>ब्रह्मन् किमुत घोराणि निमित्तानि भवन्ति वै ।<br>वाताश्च दारुणा वान्ति प्रपतन्त्युल्काः खतः ॥ १८<br>सर्वज्ञोऽसि महाभाग समर्थो विघ्ननाशने ।<br>बुद्धिमाञ्छास्त्रतत्त्वज्ञो देवतानां गुरुस्तथा ॥ १९<br>कुरु शान्तिं विधानज्ञ शत्रुक्षयविधायिनीम् ।<br>यथा मे न भवेद्दुःखं तथा कार्यं विधीयताम् ॥ २० | इन्द्र बोले—हे ब्रह्मन्! ये भयानक अपशकुन क्यों हो रहे हैं? भयानक आँधियाँ चलती हैं और आकाशसे उल्कापात होते हैं। हे महाभाग! आप सर्वज्ञ, विघ्नका नाश करनेमें समर्थ, बुद्धिमान्, शास्त्रोंके तत्त्वोंको जाननेवाले और देवताओंके गुरु हैं। इसलिये हे विधानज्ञ! आप हमारी शान्तिके लिये शत्रुओंका नाश करनेवाला कोई शान्तिकर्म कीजिये। जिस प्रकार मुझे दुःख न हो, आप वैसा कार्य कीजिये॥ १८—२०॥ |
| बृहस्पतिरुवाच<br>किं करोमि सहस्राक्ष त्वयाद्य दुष्कृतं कृतम् ।<br>अनागसं मुनिं हत्वा किं फलं समुपार्जितम् ॥ २१ | बृहस्पति बोले—हे सहस्र नेत्रोंवाले इन्द्र! मैं क्या करूँ? तुमने बहुत बड़ा पाप कर डाला है। निरपराध मुनिको मारकर तुमने क्या लाभ प्राप्त कर लिया?॥ २१॥ |
| अत्युग्रं पुण्यपापानां फलं भवति सत्वरम् ।<br>विचार्य खलु कर्तव्यं कार्यं तद्भूतिमिच्छता ॥ २२<br>परोपतापनं कर्म न कर्तव्यं कदाचन ।<br>न सुखं विन्दते प्राणी परपीडापरायणः ॥ २३ | पुण्य और पापका अत्यन्त उग्र फल शीघ्र ही प्राप्त होता है, इसलिये ऐश्वर्यकी इच्छा रखनेवालोंको विचारपूर्वक कार्य करना चाहिये। दूसरेको कष्ट पहुँचानेका कृत्य कभी नहीं करना चाहिये। दूसरेको कष्ट देनेमें संलग्न प्राणी कभी सुख नहीं पाता॥ २२-२३॥ |
| मोहाल्लोभाद् ब्रह्महत्या कृता शक्र त्वयाधुना ।<br>तस्य पापस्य सहसा फलमेतदुपागतम् ॥ २४ | हे इन्द्र! तुमने मोह और लोभके वशीभूत होकर ब्रह्महत्या कर डाली, उसी पापका यह फल आज सहसा उपस्थित हो गया है॥ २४॥ |
| अवध्यः सर्वदेवानां जातोऽसौ वृत्रसंज्ञकः ।<br>हन्तुं त्वां स समायाति दानवैर्बहुभिर्वृतः ॥ २५ | वृत्र नामवाला यह असुर जन्मसे ही देवताओंसे अवध्य है; बहुत-से दानवोंसे घिरा हुआ वह तुम्हें मारनेके लिये चला आ रहा है॥ २५॥ |
| आयुधानि च सर्वाणि वज्रतुल्यानि वासव ।<br>त्वष्ट्रा दत्तानि दिव्यानि गृहीत्वा समुपस्थितः ॥ २६ | हे इन्द्र! त्वष्टाके द्वारा दिये हुए उन सभी वज्रतुल्य तथा दिव्य आयुधोंको लेकर वह उपस्थित हो रहा है॥ २६॥ |
| समागच्छति दुर्धर्षो रथारूढः प्रतापवान् ।<br>देवेन्द्र प्रलयं कुर्वन्नास्य मृत्युर्भविष्यति ॥ २७ | दुर्धर्ष तथा प्रतापी वह रथपर आरूढ़ होकर प्रलय मचाते हुए चला आ रहा है। हे देवेन्द्र! उसकी मृत्यु नहीं होगी॥ २७॥ |
| कोलाहलस्तदा जातस्तथा ब्रुवति वाक्पतौ ।<br>गन्धर्वाः किन्नरा यक्षा मुनयश्च तपोधनाः ॥ २८<br>सदनानि विहायैवामराः सर्वे पलायिताः ।<br>तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं शक्रश्चिन्तापरायणः ॥ २९ | बृहस्पति ऐसा कह ही रहे थे कि वहाँ कोलाहल मच गया। गन्धर्व, किन्नर, यक्ष, मुनि, तपस्वी और सभी देवता अपने-अपने भवन छोड़कर भाग चले। उस महान् आश्चर्यको देखकर इन्द्र चिन्तित हो उठे॥ २८-२९॥ |