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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 734 of 889

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Page 734

| अ० १ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७२५ |
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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
चित्रं किमत्र नृपते हरिवज्रभृद्भ्यां<br> यच्छद्मना विनिहतस्त्रिशिरोऽथ वृत्रः।<br>मायाबलेन मुनयोऽपि विमोहितास्ते<br> चक्रुश्च निन्द्यमनिशं किल पापभीताः॥ २२जब मायाके बलसे मुनिगण भी मोहमें पड़ जाते हैं और वे पापभीरु होकर निरन्तर निन्दनीय कर्म करने लग जाते हैं तब हे राजन्! विष्णु और वज्रधारी इन्द्रने छलसे त्रिशिरा और वृत्रासुरका वध कर दिया तो इसमें आश्चर्यकी क्या बात है?॥ २२॥
विष्णुः सदैव कपटेन जघान दैत्यान्<br> सत्त्वात्ममूर्तिरपि मोहमवाप्य कामम्।<br>कोऽन्योऽस्ति तां भगवतीं मनसापि जेतुं<br> शक्तः समस्तजनमोहकरीं भवानीम्॥ २३सत्त्वगुणके मूर्तिमान् विग्रह होते हुए भी भगवान् विष्णुने जिनकी मायासे मोहित होकर सदैव छलपूर्वक दैत्योंका संहार किया तब भला ऐसा कौन प्राणी होगा जो सब लोगोंको मोहमें डाल देनेवाली उन भगवती भवानीको अपने मनोबलसे जीतनेमें सक्षम हो सके!॥ २३॥
मत्स्यादियोनिषु सहस्रयुगेषु सद्यः<br> साक्षाद्भवत्यपि यया विनियोजितोऽत्र।<br>नारायणो नरसखो भगवाननन्तः<br> कार्यं करोति विहिताविहितं कदाचित्॥ २४भगवतीकी ही प्रेरणासे नरऋषिके सखा नारायण भगवान् अनन्त हजारों युगोंमें मत्स्यादि योनियोंमें अवतार लेते हैं और कभी अनुकूल तथा कभी प्रतिकूल कार्य करते हैं॥ २४॥
देहं धनं गृहमिदं स्वजना मदीयं<br> पुत्राः कलत्रमिति मोहमुपेत्य सर्वः।<br>पुण्यं करोत्यथ च पापचयं करोति<br> मायागुणैरतिबलैर्विकलीकृतो यत्॥ २५यह मेरा शरीर है, यह मेरा धन है, यह मेरा घर है, ये मेरे स्त्री-पुत्र और बन्धु-बान्धव हैं—इस मोहमें पड़कर सभी प्राणी पुण्य तथा पापकर्म करते रहते हैं; क्योंकि अत्यन्त बलशाली मायागुणोंसे वे मोहित कर दिये गये हैं॥ २५॥
न जातु मोहं क्षपितुं नरः क्षमः<br> कश्चिद्भवोद्भूप परावरार्थवित्।<br>विमोहितस्तैस्त्रिभिरेव मूलतो<br> वशीकृतात्मा जगतीतले भृशम्॥ २६हे राजन्! इस पृथ्वीपर कार्य और कारणका विज्ञ कोई भी व्यक्ति [उन जगदम्बाकी मायाके] मोहसे छुटकारा नहीं पा सकता; क्योंकि भगवती महामायाके तीनों गुणोंसे मोहित होकर वह पूर्णरूपसे सदा उनके अधीन रहता है॥ २६॥
अथ तौ मायया विष्णुवासवौ मोहितौ भृशम्।<br>जघ्नतुश्छद्मना वृत्रं स्वार्थसाधनतत्परौ॥ २७<br><br>तदहं सम्प्रवक्ष्यामि वृत्तान्तमवनीपते।<br>कारणं पूर्ववैरस्य वृत्रवासवयोर्मिथः॥ २८इसलिये [उन्हीं देवीकी] मायासे मोहित होकर अपना स्वार्थ साधनेमें तत्पर रहनेवाले विष्णु और इन्द्रने छलपूर्वक वृत्रासुरको मार डाला। हे पृथ्वीपते! अब मैं वृत्रासुर और इन्द्रके पारस्परिक पूर्ववैरके कारणकी कथा बताता हूँ॥ २७-२८॥
त्वष्टा प्रजापतिर्ह्यासीद्देवश्रेष्ठो महातपाः।<br>देवानां कार्यकर्ता च निपुणो ब्राह्मणप्रियः॥ २९देवताओंमें श्रेष्ठ त्वष्टा नामके एक प्रजापति थे। वे महान् तपस्वी, देवताओंका कार्य करनेवाले, अति कुशल तथा ब्राह्मणोंके प्रिय थे॥ २९॥
स पुत्रं वै त्रिशिरसमिन्द्रद्वेषात्किलासृजत् ।<br>विश्वरूपेति विख्यातं नाम्ना रूपेण मोहनम्॥ ३०उन्होंने इन्द्रसे द्वेषके कारण तीन मस्तकोंसे सम्पन्न एक पुत्र उत्पन्न किया, जो विश्वरूप नामसे विख्यात हुआ। वह परम मनोहर रूपवाला था॥ ३०॥