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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 731 of 889

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Page 731
७२२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३५

| यः शृणोति नरो नित्यमेतदाख्यानमुत्तमम्।<br>सम्प्राप्नोति नरः सत्यं संसासुखमद्भुतम्॥ ५०<br><br>ज्ञानदं मोक्षदं चैव कीर्तिदं सुखदं तथा।<br>पावनं श्रवणान्नूनमेतदाख्यानमद्भुतम्॥ ५१<br><br>अखिलार्थप्रदं नृणां सर्वधर्मसमावृतम्।<br>धर्मार्थकाममोक्षाणां कारणं परमं मतम्॥ ५२<br><br>सूत उवाच<br>जनमेजयेन राज्ञासौ पृष्टः सत्यवतीसुतः।<br>उवाच संहितां दिव्यां व्यासः सर्वार्थतत्त्ववित्॥ ५३<br><br>चरितं चण्डिकायास्तु शुम्भदैत्यवधाश्रितम्।<br>कथयामास भगवान्कृष्णः कारुणिको मुनिः।<br>इति वः कथितः सारः पुराणानां मुनीश्वराः॥ ५४ | जो मनुष्य उनके इस उत्तम आख्यानको नित्य सुनता है, वह संसारमें अद्भुत सुख प्राप्त करता है, यह सत्य है। इस पवित्र और अद्भुत आख्यानका श्रवण करनेसे यह ज्ञान, मोक्ष, कीर्ति और सुख प्रदान करता है। यह मनुष्योंकी सभी कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला तथा समस्त धर्मोंका सार और धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्तिका परम कारण बताया गया है॥ ५०—५२॥<br><br>सूतजी बोले— राजा जनमेजयके पूछनेपर सभी अर्थ-तत्त्वोंको जाननेवाले सत्यवतीपुत्र व्यासने उनसे यह दिव्य देवीभागवतसंहिता कही। परम दयालु भगवान् कृष्णद्वैपायन मुनि व्यासने शुम्भदैत्यके वधकी कथापर आधारित देवी चण्डिकाके चरित्रका वर्णन किया था। हे मुनीश्वरो! समस्त पुराणोंका सारस्वरूप यह इतिहास मैंने आपलोगोंसे कह दिया॥ ५३-५४॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे सुरथराजसमाधिवैश्ययोर्देवी-
भक्त्येष्टप्राप्तिवर्णनं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः॥ ३५॥

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॥ पंचमः स्कन्धः समाप्तः॥


श्रुतिस्मृती तु नेत्रे द्वे पुराणं हृदयं स्मृतम्। श्रुतिस्मृतिभ्यां हीनोऽन्धः काणः स्यादेकया विना॥
पुराणहीनाद्धृच्छून्यात् काणान्धावपि तौ वरौ। श्रुतिस्मृत्युदितो धर्मः पुराणे परिगीयते॥
यस्य धर्मेऽस्ति जिज्ञासा यस्य पापाद्भयं महत्। श्रोतव्यानि पुराणानि धर्ममूलानि तेन वै॥
चतुर्दशसु विद्यासु पुराणं दीप उत्तमः। अन्धोऽपि न तदालोकात् संसाराब्धौ क्वचित् पतेत्॥

विद्वानोंके श्रुति-स्मृति—ये दो नेत्र हैं और पुराण हृदय है। इनमेंसे जिसे श्रुति-स्मृतिमेंसे किसी एकका ज्ञान नहीं है; वह काना, दोनोंके ज्ञानसे हीन अन्धा है, किंतु जो पुराणरूपी विद्यासे हीन है वह तो हृदयहीन या शून्य होनेके कारण इन दोनोंसे भी निकृष्ट है। श्रुति तथा स्मृतियोंमें कहा गया धर्म पुराणमें प्रतिपादित है। जिसकी धर्ममें जिज्ञासा या रुचि हो, जो पापोंसे डरता हो, उसे पुराणोंका श्रवण करना चाहिये; क्योंकि वे ही धर्मके मूल हैं। चौदहों विद्याओंमें पुराण-विद्या ही उत्तम दीपक है। इसके आलोक—प्रकाशमें स्थित अन्धा भी संसार-सागरमें कभी नहीं गिरता।

[ स्कन्दपु० का० २।९६-९७, ९९-१०० ]