देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context| ७३० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ |
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| इन्द्र उवाच<br>सजीव इव देहोऽयमाभाति विशदाकृतिः॥ १५<br>तस्माद् बिभेमि मा जीवेन्मुनिः शत्रुरयं मम। | **इन्द्र बोले—**यह निर्मल आकृतिवाली देह सजीवकी भाँति दिखायी देती है। यह मेरा शत्रु मुनि पुनः न जीवित हो जाय, इसलिये मैं डरता हूँ॥ १५ १/२॥ |
| तक्षोवाच<br>नात्र किं त्रपसे विद्वन् क्रूरेणानेन कर्मणा॥ १६<br>ऋषिपुत्रमिमं हत्वा ब्रह्महत्याभयं न किम्। | **तक्षा बोला—**हे विद्वन्! क्या इस क्रूर कर्मको करते हुए आपको लज्जा नहीं आती? इस ऋषिपुत्रको मारकर क्या आपको ब्रह्महत्याका भय नहीं है?॥ १६ १/२॥ |
| इन्द्र उवाच<br>प्रायश्चित्तं करिष्यामि पश्चात्तापक्षयाय वै॥ १७<br>शत्रुस्तु सर्वथा वध्यश्छलेनापि महामते। | **इन्द्र बोले—**मैं बादमें पापके नष्ट होनेके लिये प्रायश्चित्त कर लूँगा। हे महामते! शत्रुको तो सब प्रकारसे छलके द्वारा भी मार देना चाहिये॥ १७ १/२॥ |
| तक्षोवाच<br>त्वं लोभाभिहतः पापं करोषि मघवन्निह॥ १८<br>तं विनाहं कथं पापं करोमि वद मे विभो। | **तक्षा बोला—**हे इन्द्र! आप लोभके वशीभूत होकर पाप कर रहे हैं। हे विभो! बतायें, मैं उसके बिना पाप क्यों करूँ?॥ १८ १/२॥ |
| इन्द्र उवाच<br>मखेषु खलु भागं ते करिष्यामि सदैव हि॥ १९<br>शिरः पशोस्तु ते भागं यज्ञे दास्यन्ति मानवाः।<br>शुल्कनानेन छिन्धि त्वं शिरांस्यस्य कुरु प्रियम्॥ २० | **इन्द्र बोले—**मैं सदैवके लिये तुम्हारे यज्ञभागकी व्यवस्था कर दूँगा। मनुष्य यज्ञभागके रूपमें पशुका सिर तुम्हें देंगे। इस शुल्कके बदलेमें तुम इसके सिर काट दो और मेरा प्रिय कार्य कर दो॥ १९-२०॥ |
| व्यास उवाच<br>एतच्छ्रुत्वा महेन्द्रस्य वचस्तक्षा मुदान्वितः।<br>कुठारेण शिरांस्यस्य चकर्त सुदृढेन हि॥ २१ | **व्यासजी बोले—**देवराज इन्द्रका यह वचन सुनकर प्रसन्न हो बढ़ईने अपने सुदृढ़ कुठारसे उसके सिर काट डाले॥ २१॥ |
| छिन्नानि त्रीणि शीर्षाणि पतितानि यदा भुवि।<br>तेभ्यस्तु पक्षिणः क्षिप्रं विनिष्पेतुः सहस्रशः॥ २२<br>कलविङ्कास्तित्तिरयस्तथैव च कपिञ्जलाः।<br>पृथक्पृथग्विनिष्पेतर्मुखतस्तरसा तदा॥ २३ | कटे हुए तीनों सिर जब भूमिपर गिरे तब उनमेंसे हजारों पक्षी शीघ्रतापूर्वक निकल पड़े। तब गौरैया, तित्तिर और कपिंजल पक्षी शीघ्रतापूर्वक उसके अलग-अलग मुखोंसे निकले॥ २२-२३॥ |
| येन वेदानधीते स्म सोमं च पिबते तथा।<br>तस्माद्वक्त्रात्किलोत्पेतुः सद्य एव कपिञ्जलाः॥ २४<br>येन सर्वा दिशः कामं पिबन्निव निरीक्षते।<br>तस्मात्तु तित्तिरास्तत्र निःसृतास्तिग्मतेजसः॥ २५<br>यत्सुरापं तु तद्वक्त्रं तस्मात्तु चटकाः किल।<br>विनिष्पेतुस्त्रिशिरस एवं ते विहगा नृप॥ २६ | जिस मुखसे वह वेदपाठ और सोमपान करता था, उस मुखसे तत्काल बहुत-से कपिंजल पक्षी निकले; जिससे वह सभी दिशाओंका निरीक्षण करता था, उससे अत्यन्त तेजस्वी तित्तिर निकले और हे राजन्! जिससे वह मधुपान करता था, उस मुखसे गौरैया पक्षी निकले। इस प्रकार त्रिशिरासे वे पक्षी निकले॥ २४—२६॥ |
| एवं विनिःसृतान्दृष्ट्वा तेभ्यः शक्रस्तदाण्डजान्।<br>मुमोद मनसा राजन् जगाम त्रिदिवं पुनः॥ २७ | हे राजन्! इस प्रकार उन मुखोंसे पक्षियोंको निकला हुआ देखकर इन्द्रके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई; वे पुनः स्वर्गको चल दिये॥ २७॥ |
| गते शक्रे तु तक्षापि स्वगृहं तरसा ययौ।<br>यज्ञभागं परं लब्ध्वा मुदमाप महीपते॥ २८ | हे पृथिवीपते! इन्द्रके चले जानेपर तक्षा भी शीघ्र ही अपने घर चल दिया। श्रेष्ठ यज्ञभाग पाकर वह बहुत प्रसन्न था॥ २८॥ |
| इन्द्रोऽथ स्वगृहं गत्वा हत्वा शत्रुं महाबलम्।<br>मेने कृतार्थमात्मानं ब्रह्महत्यामचिन्तयन्॥ २९ | इन्द्रने भी अपने महाबली शत्रुको मारकर अपने भवन जा करके ब्रह्महत्याकी चिन्ता न करते हुए अपनेको कृतकृत्य मान लिया॥ २९॥ |