छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
About this granth
The Chandogya Upanishad (छान्दोग्योपनिषद्) is an ancient and extensive Upanishad of the Samaveda. The preface to this Gita Press edition places it within the Talavakara Brahmana of the Samaveda, the same branch as the Kena Upanishad, which is why the two share a peace invocation. Its eight chapters set out spiritual knowledge together with the meditations and rites connected with it.
Famous passages include the meditation on Om as the udgitha, the Shandilya vidya, the stories of Satyakama Jabala and Raikva, the doctrine of the five fires, Uddalaka Aruni's teaching 'tat tvam asi' to his son Shvetaketu, the dialogue of Sanatkumara and Narada on the infinite (bhuma), the meditation on the small space in the heart, and the tale of Indra and Virochana learning about the Self from Prajapati. Many of the Brahma Sutras rest on these passages.
This is volume three of the Gita Press, Gorakhpur Upanishad-bhashya series (book code 582), giving the text, Shankara's commentary and a Hindi translation of both. Its imprint records 32,000 copies printed between Samvat 1993 and 2050 and an eighth edition of 5,000 in Samvat 2052. It has 978 pages.
एकोनविंश खण्ड
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श्रद्धा ही जानने योग्य है
यदा वै श्रद्दधात्यथ मनुते नाश्रद्दधन्मनुते श्रद्दध-
देव मनुते श्रद्धा त्वेव विजिज्ञासितव्येति । श्रद्धां
भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[ सनत्कुमार— ] 'जिस समय मनुष्य श्रद्धा करता है तभी वह मनन करता है; बिना श्रद्धा किये कोई मनन नहीं करता । अपितु श्रद्धा करनेवाला ही मनन करता है । अतः श्रद्धाको ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद— ] 'भगवन् ! मैं श्रद्धाके विज्ञानकी इच्छा करता हूँ' ॥१॥
| आस्तिक्यबुद्धिः श्रद्धा ॥१॥ | आस्तिक्य बुद्धिका नाम श्रद्धा है ॥ १ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये एकोन-
विंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १९ ॥
विंश खण्ड
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निष्ठा ही जानने योग्य है
यदा वै निस्तिष्ठत्यथ श्रद्दधाति नानिस्तिष्ठञ्छ्रद्द-
धाति निस्तिष्ठन्नेव श्रद्दधाति निष्ठा त्वेव विजिज्ञा-
सितव्येति । निष्ठां भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[ सनत्कुमार— ] जिस समय पुरुषकी निष्ठा होती है तभी वह श्रद्धा करता है; बिना निष्ठाके कोई श्रद्धा नहीं करता, अपितु निष्ठा करनेवाला ही श्रद्धा करता है। अतः निष्ठाको ही विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये।' [ नारद— ] 'भगवन् ! मैं निष्ठाको विशेषरूपसे जानना चाहता हूँ' ॥ १ ॥
| निष्ठा गुरुशुश्रूषादिस्तत्परत्वं <br> ब्रह्मविज्ञानाय ॥ १ ॥ | निष्ठा गुरुशुश्रूषा आदिको कहते हैं। उसमें ब्रह्मविज्ञानके लिये तत्पर रहना ॥ १ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
विंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २० ॥
एकविंश
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कृति ही जानने योग्य है
यदा वै करोत्यथ निस्तिष्ठति नाकृत्वा निस्तिष्ठति कृत्वैव निस्तिष्ठति कृतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति । कृतिं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[ सनत्कुमार— ] 'जिस समय मनुष्य करता है उस समय वह निष्ठा भी करने लगता है; बिना किये किसीकी निष्ठा नहीं होती, पुरुष करनेपर ही निष्ठावान् होता है । अतः कृतिकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ?' [ नारद— ] 'भगवन् ! मैं कृतिकी विशेष-रूपसे जिज्ञासा करता हूँ' ॥ १ ॥
| यदा वै करोति । कृतिरिन्द्रियसंयमश्चित्तैकाग्रताकरणं च । सत्यां हि तस्यां निष्ठादीनि यथोक्तानि भवन्ति विज्ञानावसानानि ॥ १ ॥ | जिस समय मनुष्य करता है । 'कृति' इन्द्रियसंयम और चित्तकी एकाग्रता करनेको कहते हैं । उसके होनेपर ही उपर्युक्त [विपरीत क्रमसे] निष्ठासे लेकर विज्ञानपर्यन्त समस्त साधन होते हैं ॥ १ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये एकविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २१ ॥
द्वाविंशं
सुख ही जानने योग्य है
यदा वै सुखं लभतेऽथ करोति नासुखं लब्ध्वा करोति सुखमेव लब्ध्वा करोति सुखं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति । सुखं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[सनत्कुमार—] 'जब मनुष्यको सुख प्राप्त होता है तभी वह करता है; बिना सुख मिले कोई नहीं करता, अपितु सुख पाकर (पानेकी आशा रखकर) ही करता है; अतः सुखकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये।' [नारद—] 'भगवन् ! मैं सुखकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करता हूँ' ॥१॥
| सापि कृतिर्यदा सुखं लभते | वह कृति भी, जिस समय सुख मिलता है अर्थात् जिस समय ऐसा |
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| सुखं निरतिशयं वक्ष्यमाणं | मानता है कि मुझे आगे बतलाया जानेवाला निरतिशय सुख प्राप्त |
| लब्धव्यं मयेति मन्यते तदा | करना चाहिये, तभी होती है। जिस प्रकार लौकिक कृति दृष्टफलजनित |
| भवतीत्यर्थः । यथा दृष्टफल- | सुखके लिये होती है उसी प्रकार इस प्रसंगमें भी बिना सुख मिले |
| सुखाकृतिस्तथेहापि नासुखं | कोई नहीं करता। यद्यपि वह फल भविष्यत्कालिक होता है तो भी |
| लब्ध्वा करोति । भविष्यदपि | 'लब्ध्वा' (पाकर) ऐसा [पूर्वकालिक क्रियारूपसे] कहा जाता |
| फलं लब्ध्वेत्युच्यते तदुद्दिश्य | है, क्योंकि उसीके उद्देश्यसे प्रवृत्ति होनी सम्भव है। |
| प्रवृत्त्युपपत्तेः । |
७८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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| अथेदानीं कृत्यादिषूत्तरोत्तरेषु सत्सु सत्यं स्वयमेव प्रतिभासत इति न तद्विज्ञानाय पृथग्यत्नः कार्य इति प्राप्तं तत इदमूच्यते—सुखं त्वेव विजिज्ञासितव्यमित्यादि । सुखं भगवो विजिज्ञास इत्यभिमुखीभूतायाह ॥ १ ॥ | अब यह प्राप्त होता है कि—कृतिसे लेकर उत्तरोत्तर साधनोंके होनेपर सत्य स्वयं ही अनुभव हो जायगा, उसके विज्ञानके लिये पृथक् प्रयत्न नहीं करना चाहिये—इसीसे यह कहा गया है कि 'सुखकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये' इत्यादि । फिर 'भगवन् ! मैं सुखकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करता हूँ' इस प्रकार [ सुखविज्ञानके प्रति ] अभिमुख हुए नारदजीसे सनत्कुमारजी कहते हैं ॥ १ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये द्वाविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २२ ॥
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त्रयोविंश खण्ड
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भूमा ही जानने योग्य है
यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति । भूमानं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[सनत्कुमार—] ‘निश्चय जो भूमा है वही सुख है, अल्पमें सुख नहीं है। सुख भूमा ही है। भूमाकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये।’ [नारद—] ‘भगवन्! मैं भूमाकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करता हूँ ॥ १ ॥
| यो वै भूमा महन्निरतिशयं बह्विति पर्यायास्तत्सुखम् । ततोऽर्वाक्सातिशयत्वादल्पम् । अतस्तस्मिन्नल्पे सुखं नास्ति । अल्पस्याधिकतृष्णाहेतुत्वात् । तृष्णा च दुःखबीजम् । न हि दुःखबीजं सुखं दृष्टं ज्वरादि लोके । तस्माद्युक्तं नाल्पे सुखमस्तीति । अतो भूमैव सुखम् । तृष्णादिदुःखबीजत्वासम्भवाद्भुम्नः ॥ १ ॥ | निश्चय जो भूमा है—महान्, निरतिशय और बहु—ये इसके पर्याय हैं—वही सुख है। उससे नीचेके पदार्थ सातिशय (न्यूनाधिक) होनेके कारण अल्प हैं। अतः उस अल्पमें सुख नहीं है; क्योंकि अल्प तो अधिक तृष्णाका हेतु है और तृष्णा दुःखका बीज है। तथा लोकमें दुःखके बीजभूत ज्वरादि सुखरूप नहीं देखे गये। अतः ‘अल्पमें सुख नहीं है’ यह कथन ठीक ही है। इसलिये भूमा ही सुखरूप है; क्योंकि भूमामें दुःखके बीजभूत तृष्णादिका होना असम्भव है ॥ १ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये त्रयोविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २३ ॥
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चतुर्विंश खण्ड
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भूमाके स्वरूपका प्रतिपादन
| किंलक्षणोऽसौ भूमेत्याह— | यह भूमा किन लक्षणोंवाला है, सो बतलाते हैं— |
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यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यम्। स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति। स्वे महिम्नि यदि वा न महिम्नीति ॥ १ ॥
[सनत्कुमार—] 'जहाँ कुछ और नहीं देखता, कुछ और नहीं सुनता तथा कुछ और नहीं जानता वह भूमा है। किंतु जहाँ कुछ और देखता है, कुछ और सुनता है एवं कुछ और जानता है वह अल्प है। जो भूमा है वही अमृत है और जो अल्प है वह मर्त्य है।'
[नारद—] 'भगवन् ! वह (भूमा) किसमें प्रतिष्ठित है?'
[सनत्कुमार—] 'अपनी महिमामें, अथवा अपनी महिमामें भी नहीं है' ॥ १ ॥
| यत्र यस्मिन्भूम्नि तत्त्वे नान्यद्द्रष्टव्यमन्येन करणेन द्रष्टान्यो विभक्तो दृश्यात्पश्यति तथा नान्यच्छृणोति। नामरूपयोरेवान्तर्भावाद्विषयभेदस्य, तद्ग्राहक- | जहाँ—जिस भूमातत्त्वमें दृश्यसे भिन्न कोई अन्य द्रष्टा किसी अन्य द्रष्टव्य विषयको अन्य इन्द्रियके द्वारा नहीं देखता और न कुछ सुनता ही है। विषयभेदका अन्तर्भाव नाम और रूपमें ही हो जाता है; अतः उनका ग्रहण |
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| खण्ड २४] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७८७ |
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| संस्कृत (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी भाष्यार्थ |
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| योरेवेह दर्शनश्रवणयोर्ग्रहणम्, अन्येषां चोपलक्षणार्थत्वेन। मननं त्वत्रोक्तं द्रष्टव्यं नान्यन्मनुत इति, प्रायशो मननपूर्वकत्वाद्विज्ञानस्य। तथा नान्यद्विजानाति; एवंलक्षणो यः भूमा। | करनेवाली दर्शन और श्रवण इन दो इन्द्रियोंका ही यहाँ अन्य इन्द्रियोंके उपलक्षणार्थ ग्रहण किया गया है। किंतु मननका यहाँ 'नान्यन्मनुते' ऐसा कहकर अलग उल्लेख किया गया है—ऐसा जानना चाहिये, क्योंकि विज्ञान प्रायः मननपूर्वक हुआ करता है; तथा जहाँ कुछ और जानता भी नहीं—जो ऐसे लक्षणोंवाला है वह भूमा है। |
| किमत्र प्रसिद्धान्यदर्शनाभावो भूम्युच्यते नान्यत्पश्यतीत्यादिना ? अथान्यन्न पश्यत्यात्मानं पश्यतीत्येतत् ? | गुरु—यहाँ [यह विचारना है कि] 'नान्यत्पश्यति' इत्यादि वाक्यसे भूमामें लोकप्रसिद्ध अन्य दर्शनका अभाव बतलाया गया है अथवा अन्यको नहीं देखता, इसलिये अपनेको ही देखता है—यह बतलाया गया है ? |
| किं चातः ? | शिष्य—इससे क्या [हानि-लाभ] है ! |
| यद्यन्यदर्शनाद्यभावमात्रमित्युच्यते तदा द्वैतसंव्यवहारविलक्षणो भूमेत्युक्तं भवति। अथान्यदर्शनविशेषप्रतिषेधेनात्मानं पश्यतीत्युच्यते तदैकस्मिन्नेव | गुरु—यदि इस वाक्यद्वारा अन्य पदार्थके दर्शनादिका अभाव ही बतलाया गया हो तब तो यह बात कही जाती है कि भूमा द्वैतव्यवहारसे विलक्षण है और यदि अन्यदर्शनविशेषका प्रतिषेध करके यह कहा गया हो कि वह अपनेको देखता है तो एकमें |
५८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ५८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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| क्रियाकारकफलभेदोऽभ्युपगतो भवेत् । <br> यद्येवं को दोषः स्यात् ? <br><br> नन्वयमेव दोषः संसारावि-वृत्तिः । क्रियाकारकफलभेदो हि संसार इति । आत्मैकत्व एव क्रियाकारकफलभेदः संसारवि-लक्षण इति चेत् ? न; आत्मनो निर्विशेषैकत्वाभ्युपगमे दर्शना-दिक्रियाकारकफलभेदाभ्युपगमस्य शब्दमात्रत्वात् । <br><br> अन्यदर्शनाद्यभावोक्तिपक्षेऽपि यत्रेत्यन्यन्न पश्यतीति च विशे-षणे अनर्थके स्यातामिति चेत् ? दृश्यते हि लोके यत्र शून्ये गृहेऽन्यन्न पश्यतीत्युक्ते स्तम्भा-दीनात्मानं च न पश्यतीति न गम्यते। एवमिहापीति चेत् ? | ही क्रिया, कारक और फलरूप भेद मानना हो जाता है। <br> **शिष्य—**यदि ऐसा ही हो तो उसमें दोष क्या होगा ? <br><br> **गुरु—**उसके संसारकी निवृत्ति न होना—बस यही दोष है, क्योंकि क्रिया, कारक और फलरूप भेद ही संसार है। यदि कहो कि आत्माका एकत्व होनेपर भी उसमें जो क्रिया, कारक और फलरूप भेद है वह संसारसे विलक्षण है तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि आत्माका निर्विशेष एकत्व स्वीकार करनेपर जो उसमें दर्शनादि क्रिया, कारक और फलरूप भेद स्वीकार करना है वह तो शब्दमात्र है। <br><br> **शिष्य—**किंतु अन्य दर्शनादि-का अभाव प्रतिपादन करनेके पक्षमें भी 'यत्र' और 'अन्यन्न पश्यति' ये दो विशेषण निरर्थक होंगे। लोकमें यह देखा ही जाता है कि जहाँ सूने घरमें 'किसी औरको नहीं देखता' ऐसा कहा जाता है वहाँ यह नहीं समझा जाता कि उस घरके स्तम्भादि और अपनेको भी नहीं देखता। यदि ऐसा ही यहाँ भी हो तो ? |
| खण्ड २४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७८९ |
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| न; तत्त्वमसीत्येकत्वोपदेशादधिकरणाधिकर्तव्यभेदानुपपत्तेः। तथा सदेकमेवाद्वितीयं सत्यमिति षष्ठे निर्धारितत्वात्। "अदृश्येऽनात्म्ये" (तै० उ० २।७।१) "न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य" (क० उ० ६।९) "विज्ञातारमरे केन विजानीयात्" (बृ० उ० २।४।१४) इत्यादिश्रुतिभ्यः स्वात्मनि दर्शनाद्यनुपपत्तिः। | गुरु— ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि 'तू वह है' इस प्रकार एकत्वका उपदेश होनेके कारण आधार-आधेयरूप भेदका होना सम्भव नहीं है। इसी प्रकार छठे अध्यायमें भी यह निश्चय किया जा चुका है कि 'एकमात्र अद्वितीय सत् ही सत्य है'। तथा "देखनेमें न आने-वाले शरीररहित····आत्मामें" "इसका रूप दृष्टिमें नहीं आता" "अरे ! विज्ञाताको किसके द्वारा जाने" इत्यादि श्रुतियोंसे भी स्वात्मामें दर्शनादिका होना सम्भव नहीं है। |
| यत्रेति विशेषणमनर्थकं प्राप्तमिति चेत् ? | शिष्य— किंतु इस प्रकार 'यत्र' यह विशेषण व्यर्थ सिद्ध होता है ? |
| न, अविद्याकृतभेदापेक्षत्वात्। यथा सत्यैकत्वाद्वितीयत्वबुद्धिं प्रकृतामपेक्ष्य सदेकमेवाद्वितीयमिति संख्याद्यनर्हमप्युच्यते, एवं भूम्न्येकस्मिन्नेव यत्रेति विशेषणम्। अविद्यावस्थायामन्यदर्शनानुवादेन च भूम्नस्तदभावत्वलक्षणस्य विवक्षितत्वान्नान्यत्पश्यतीति विशेषणम्। तस्मात्संसारव्यवहारो भूम्नि नास्तीति समुदायार्थः। | गुरु— नहीं, क्योंकि यह अविद्याकृत भेदकी अपेक्षासे है। जिस प्रकार प्रासङ्गिक सत्य एकत्व और अद्वितीयत्वबुद्धिकी अपेक्षासे—संख्या आदिके योग्य न होनेपर भी—'सत् एक और अद्वितीय है' ऐसा कहा जाता है उसी प्रकार एक ही भूमामें 'यत्र' यह विशेषण है। तथा अविद्यावस्थामें अन्य दर्शनका अनुवाद होनेके कारण भूमाको उसके अभावत्वरूप लक्षण-वाला बतलाना इष्ट होनेसे 'नान्यत्पश्यति' ऐसा विशेषण दिया गया है। अतः सारांश यह है कि भूमामें संसारव्यवहार नहीं है। |
७१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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| अथ यत्राविद्याविषयेऽन्योऽन्येनान्यत्पश्यतीति तदल्पमविद्याकालभावीत्यर्थः । यथा स्वप्नदृश्यं वस्तु प्राक् प्रबोधात्तत्कालभावीति तद्वत् । तत एव तन्मर्त्यं विनाशि स्वप्नवस्तुवदेव तद्विपरीतो भूमा यस्तदमृतम् । तच्छब्दोऽमृतत्वपरः । | किंतु जहाँ अविद्याके राज्यमें अन्य अन्यको अन्यके द्वारा देखता है वह अल्प है, तात्पर्य यह है कि वह केवल अविद्याके समय ही रहनेवाला है । जिस प्रकार स्वप्नमें दिखलायी देनेवाली वस्तु जागनेसे पूर्व स्वप्नकालमें ही रहनेवाली होती है उसी प्रकार [ उसे जानना चाहिये । इसीसे वह स्वप्नके पदार्थके समान ही मर्त्य—विनाशी है । उसके विपरीत जो भूमा है वह अमृत । 'तत्' शब्द अमृतत्वपरक है [ इसीसे नपुंसकलिङ्गका प्रयोग किया गया ] । |
| स तर्ह्येवंलक्षणो भूमा हे भगवन् कस्मिन् प्रतिष्ठित इत्युक्तवन्तं नारदं प्रत्याह सनत्कुमारः—स्वे महिम्नीति; स्व आत्मीये महिम्नि माहात्म्ये विभूतौ प्रतिष्ठितो भूमा। यदि प्रतिष्ठामिच्छसि क्वचिद्यदि वा परमार्थमेव पृच्छसि न महिम्न्यपि प्रतिष्ठित इति ब्रूमः । | 'तो, हे भगवन् ! वह ऐसे लक्षणवाला भूमा किसमें प्रतिष्ठित है ?' इस प्रकार पूछते हुए नारदजीसे सनत्कुमारजीने कहा—'अपनी महिमामें।' तो वह भूमा 'स्वे'—अपनी 'महिम्नि'—महिमा अर्थात् विभूतिमें प्रतिष्ठित है । और यदि कहीं उसकी प्रतिष्ठा जानना चाहते हो—अथवा यदि परमार्थतः ही पूछते हो तो हमारा यह कथन है कि वह अपनी महिमामें भी प्रतिष्ठित नहीं |
खण्ड २४] शाङ्करभाष्यार्थ ७९१
| अप्रतिष्ठितोऽनाश्रितो भूमा क्वचिदपीत्यर्थः ॥ १ ॥ | है। तात्पर्य यह है कि 'भूमा अप्रतिष्ठित है अर्थात् कहीं भी आश्रित नहीं है' ॥ १ ॥ |
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| यदि स्वमहिम्नि प्रतिष्ठितो भूमा कथं तर्ह्यप्रतिष्ठ उच्यते, शृणु | 'यदि भूमा अपनी महिमामें प्रतिष्ठित है तो उसे अप्रतिष्ठित क्यों कहा जाता है?' सुनो— |
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गोअश्वमिह महिमेत्याचक्षते हस्तिहिरण्यं दासभार्यं क्षेत्राण्यायतनानीति नाहमेवं ब्रवीमि ब्रवीमीति होवाचान्यो ह्यन्यस्मिन्प्रतिष्ठित इति ॥ २ ॥
‘इस लोकमें ‘गौ, अश्व आदिको महिमा कहते हैं तथा हाथी, सुवर्ण, दास, भार्या, क्षेत्र और घर—इनका नाम भी महिमा है। किन्तु मेरा ऐसा कथन नहीं है, क्योंकि अन्य पदार्थ अन्यमें प्रतिष्ठित होता है। मैं तो यह कहता हूँ’—ऐसा सनत्कुमारजीने कहा ॥ २ ॥
| गोअश्वादीह महिमेत्याचक्षते ।<br><br>गावश्चाश्वाश्च गोअश्वं द्वन्द्वैकवद्भावः। सर्वत्र गवाश्वादि महिमेति प्रसिद्धम्। तदाश्रितस्तत्प्रतिष्ठश्चैत्रो भवति यथा नाहमेवं | 'इस लोकमें गो-अश्वादिको महिमा कहते हैं। गो और अश्वको 'गोअश्व' कहते हैं। इन दोनों शब्दोंका द्वन्द्व समासमें एकवद्भाव* हुआ है। सर्वत्र गौ और अश्व आदि ही महिमा हैं इस प्रकार प्रसिद्ध है। जिस प्रकार चैत्र [नामका कोई पुरुष] उनके |
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* यहाँ यह प्रश्न होता है कि 'गावश्च अश्वाश्च' ऐसा विग्रह करके पुंल्लिङ्ग एवं बहुवचनान्त शब्दोंका द्वन्द्वसमास हुआ है, ऐसी दशामें 'गोअश्वम्' यह एकवचनान्त नपुंसकलिङ्ग प्रयोग कैसे हुआ ? इसीका उत्तर देते हुए कहते हैं कि एकवद्भाव हुआ है। 'द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम्' इस पाणिनिसूत्रसे यहाँ एकवद्भाव किया गया है, इससे एकवचनान्त हो गया है तथा जहाँ एकवद्भाव होता है वहाँ 'स नपुंसकम्' इस सूत्रके अनुसार नपुंसकता भी हो जाती है।
७९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
७९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| स्वतोऽन्यं महिमानमाश्रितो भूमा चैत्रवदिति ब्रवीम्यत्र हेतुत्वेनान्यो ह्यन्यस्मिन्प्रतिष्ठित इति व्यवहितेन सम्बन्धः। किं त्वेवं ब्रवीमीति होवाच स एवेत्यादि ॥ २ ॥ | आश्रित और उनमें प्रतिष्ठित होता है उसी प्रकार चैत्रके समान ही भूमा भी अपनेसे भिन्न महिमामें आश्रित है--ऐसा मैं नहीं कहता। यहाँ 'क्योंकि अन्य पदार्थ अन्यमें प्रतिष्ठित होता है' इस व्यवधानयुक्त वाक्यसे इसका हेतुरूपसे सम्बन्ध है। किंतु मैं तो यह कहता हूँ, ऐसा कहकर सनत्कुमारजीने 'स एव अधस्तात्' इत्यादि कहा ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये चतुर्विंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २४ ॥
पञ्चविंश खण्ड
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सर्वत्र भूमा ही है
| कस्मात्पुनःक्वचिन्न प्रतिष्ठितः ? <br><br> इत्युच्यते—यस्मात्— | तो फिर ऐसा क्यों कहा जाता है वह कहीं प्रतिष्ठित नहीं है ? <br><br> सो बतलाते हैं; क्योंकि— |
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स एवाधस्तात्स उपरिष्टात्स पश्चात्स पुरस्तात्स दक्षिणतः स उत्तरतः स एवेद१ँसर्वमित्यथातोऽहङ्कारादेश एवाहमेवाधस्तादहमुपरिष्टादहं पश्चादहं पुरस्तादहं दक्षिणतोऽहमुत्तरतोऽहमेवेद१ँसर्वमिति ॥ १ ॥
वही नीचे है, वही ऊपर है, वही पीछे है, वही आगे है, वही दायीं ओर है, वही बायीं ओर है और वही यह सब है। अब उसीमें अहंकारादेश किया जाता है—मैं ही नीचे हूँ, मैं ही ऊपर हूँ, मैं ही पीछे हूँ, मैं ही आगे हूँ, मैं ही दायीं ओर हूँ, मैं ही बायीं ओर हूँ और मैं ही यह सब हूँ ॥ १ ॥
| स एव भूमाधस्तान्न तद्व्यतिरेकेणान्यद्विद्यते यस्मिन्प्रतिष्ठितः स्यात् तथोपरिष्टादित्यादि समानम् । सति भूम्नोऽन्यस्मिन्भूमा हि प्रतिष्ठितः स्यान्न तु तदस्ति । स एव तु सर्वम् । अतस्तस्मादसौ न क्वचित्प्रतिष्ठितः । | क्योंकि वह भूमा ही नीचे है, उससे भिन्न कोई और ऐसी वस्तु नहीं है जिसपर वह प्रतिष्ठित हो । इसी प्रकार 'उपरिष्टात्' इत्यादिका अर्थ भी समझना चाहिये । भूमासे भिन्न कोई और पदार्थ हो तो भूमा उसपर प्रतिष्ठित हो; किंतु ऐसा है नहीं । सब कुछ वही है । अतः इसीसे वह कहीं अन्यत्र प्रतिष्ठित नहीं है । |
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७९४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७९४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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| यत्र नान्यत्पश्यतीत्यधिकर- <br> णाधिकर्तव्यतानिर्देशात्स एवा- <br> धस्तादिति च परोक्षनिर्देशाद्- <br> द्रष्टुर्जीवादन्यो भूमा स्यादि- <br> त्याशङ्का कस्यचिन्मा भूदित्यथा- <br> तोऽनन्तरमहङ्कारादेशोऽहङ्कारे- <br> णादिश्यत इत्यहङ्कारादेशः । <br> द्रष्टुरनन्यत्वदर्शनार्थं भूमैव <br> निर्दिश्यतेऽहङ्कारेणाहमेवाध- <br> स्तादित्यादिना ॥१॥ | 'जहाँ कुछ और नहीं देखता, इस वाक्यसे आधार-आधेयताका निर्देश होनेसे तथा 'वही नीचे है' इत्यादि वाक्यसे परोक्ष निर्देश होनेसे किसीको ऐसी शङ्का न हो जाय कि भूमा द्रष्टा जीवसे भिन्न है 'इसलिये अब—इसके पश्चात् अहंकारादेश किया जाता है । अहंकाररूपसे आदेश (उपदेश) किया जाता है इसलिये इसे अहंकारादेश कहा है । द्रष्टासे अभिन्नत्व दिखलानेके लिये भूमाका ही 'मैं ही नीचे हूँ' इत्यादि वाक्यद्वारा अहंकाररूपसे निर्देश किया जाता है ॥ १ ॥ |
<div align="center">—:०:—</div>| अहङ्कारेण देहादिसङ्घातो- <br> ऽप्यादिश्यतेऽविवेकिभिरित्यतस्त- <br> दाशङ्का मा भूदिति— | अविवेकी लोग अहंकारसे देहादि संघातका भी आदेश करते हैं; अतः ऐसी आशङ्का न हो इसलिये— |
अथात आत्मादेश एव आत्मैवाधस्तादात्मोपरिष्टा-
दात्मा पश्चादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणत आत्मोत्तरत
आत्मैवेदꣳसर्वमिति। स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं
विजानन्नात्मरतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्दः स
स्वराड्भवति तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति अथ
खण्ड २५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७९५
येऽन्यथातो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति तेषाꣳ सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवति ॥ २ ॥
अब आत्मरूपसे ही भूमाका आदेश किया जाता है । आत्मा ही नीचे है, आत्मा ही ऊपर है, आत्मा ही पीछे है, आत्मा ही आगे है, आत्मा ही दायीं ओर है, आत्मा ही बायीं ओर है और आत्मा ही यह सब है । वह यह इस प्रकार देखनेवाला, इस प्रकार मनन करनेवाला तथा विशेषरूपसे इस प्रकार जाननेवाला आत्मरति, आत्मक्रीड, आत्ममिथुन और आत्मानन्द होता है; वह स्वराट् है; सम्पूर्ण लोकोंमें उसकी यथेच्छ गति होती है । किंतु जो इससे विपरीत जानते हैं वे अन्यराट् (जिनका राजा अपनेसे भिन्न कोई और है, ऐसे) और क्षय्यलोक (क्षयशील लोकोंको प्राप्त होनेवाले) होते हैं । उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें स्वेच्छागति नहीं होती ॥ २ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| अथानन्तरमात्मादेश आत्मनैव केवलेन सत्स्वरूपेण शुद्धेनादिश्यते । आत्मैव सर्वतः सर्वमित्येवमेकमजं सर्वतो व्योमवत्पूर्णमनन्यशून्यं पश्यन्स वा एष विद्वान्मननविज्ञानाभ्यामात्मरतिरात्मन्येव रती रमणं यस्य सोऽयमात्मरतिः। तथात्मक्रीडः। देहमात्रसाधना रतिर्बाह्यसाधना क्रीडा । लोके स्त्रीभिः सखिभिश्च | अब आगे आत्मादेश है अर्थात् केवल सत्स्वरूप शुद्ध आत्माके द्वारा ही आदेश किया जाता है । सब ओर सब कुछ आत्मा ही है । इस प्रकार आकाशके समान सर्वत्र पूर्ण एक अज और अनन्य आत्माको देखनेवाला वह यह विद्वान् मनन और विज्ञानके कारण आत्मरति—आत्मामें ही जिसकी रति अर्थात् रमण है ऐसा आत्मरति और आत्मक्रीड होता है । रतिका साधन केवल देह है और क्रीडा बाह्य साधनवाली होती है, क्योंकि लोकमें 'स्त्रियों और मित्रोंके साथ क्रीडा |
७९६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७
७९६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७
| क्रीडतीति दर्शनात् । न तथा विदुष । किं तर्ह्यात्मविज्ञाननिमित्तमेवोभयं भवतीत्यर्थः । | करता है' ऐसा प्रयोग देखा जाता है; किंतु विद्वान्की क्रीडा ऐसी नहीं होती। तो कैसी होती है ? उसकी तो ये [ रति और क्रीडा ] दोनों ही आत्मविज्ञानके ही कारण होती हैं। |
| मिथुनं द्वन्द्वजनितं सुखं तदपि द्वन्द्वनिरपेक्षं यस्य विदुषः । तथात्मानन्दः शब्दादिनिमित्त आनन्दोऽविदुषां न तथास्य विदुषः किं तर्ह्यात्मनिमित्तमेव सर्वं सर्वदा सर्वप्रकारेण च । देहजीवितभोगादिनिमित्तबाह्यवस्तुनिरपेक्ष इत्यर्थः । | मिथुन यह दोसे होनेवाला सुख है, वह भी जिस विद्वान्का दोकी अपेक्षासे रहित है [ उसे आत्ममिथुन कहते हैं ]; तथा आत्मानन्द—अविद्वानोंका आनन्द शब्दादि विषयजनित होता है, विद्वान्का आनन्द वैसा नहीं होता । तो कैसा होता है ?—वह सारा-का-सारा सर्वदा सब प्रकार आत्माके ही कारण होता है। तात्पर्य यह है कि वह देह, जीवन और भोगादिकी निमित्तभूत बाह्य वस्तुओंकी अपेक्षासे रहित होता है। |
| स एवंलक्षणो विद्वाञ्जीवन्नेव स्वाराज्येऽभिषिक्तः पतितेऽपि देहे स्वराडेव भवति । यत एवं भवति तत एव तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति । प्राणादिषु पूर्वभूमिषु तत्रास्येति | इस प्रकारके लक्षणोंवाला वह विद्वान् जीवित रहता हुआ ही स्वाराज्यपर अभिषिक्त हो जाता है तथा देहपात होनेपर भी स्वराट् ही होता है। क्योंकि ऐसा है इसीसे उसकी सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छगति होती है। प्राणादि पूर्व भूमिकाओंमें इस उपासककी उनसे परिच्छिन्न ही |
खण्ड २५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| तावन्मात्रपरिच्छिन्नकामचारत्वमुक्तमन्यराजत्वं चार्थप्राप्तं सातिशयत्वाद्यथाप्राप्तस्वाराज्यकामचारत्वानुवादेन तन्निवृत्तिरिहोच्यते स स्वराडित्यादिना ।<br><br>अथ पुनर्येऽन्यथात उक्तदर्शनादन्यथा वैपरीत्येन यथोक्तमेव वा सम्यङ् न विदुस्तेऽन्यराजानो भवन्ति । अन्यः परो राजा स्वामी येषां तेऽन्यराजनस्ते किञ्च क्षय्यलोकाः क्षय्यो लोको येषां ते क्षय्यलोकाः । भेददर्शनस्याल्पविषयत्वात् । अल्पं च तन्मर्त्यमित्यवोचाम । तस्माद्येद्वैतदर्शिनस्ते क्षय्यलोकाः स्वदर्शनानुरूपेणैव भवन्त्यत एव तेषां सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवति ॥ २ ॥ | स्वेच्छागति बतलायी गयी थी । अतः सातिशय होनेके कारण वहाँ उसका अन्यराजत्व स्वतः सिद्ध है। अब यथाप्राप्त स्वाराज्य और काम-चारत्वका अनुवाद करते हुए यहाँ 'स स्वराड् भवति' इत्यादि वाक्यसे उसकी निवृत्तिका निरूपण किया जाता है ।<br><br>किंतु जो इससे अन्यथा—उपर्युक्त दृष्टिसे अन्य प्रकार अर्थात् इसके विपरीत जानते हैं अथवा इसीको सम्यक् प्रकारसे नहीं जानते वे अन्यराट् होते हैं । अन्य अर्थात् पर है राजा—स्वामी जिनका उन्हें 'अन्यराट्' कहते हैं । इसके सिवा वे क्षय्यलोक—जिनका लोक क्षय्य है ऐसे वे क्षय्यलोक होते हैं, क्योंकि भेददृष्टि अल्पविषयक है । ओर जो अल्प है वह मर्त्य है—ऐसा हम पहले कह चुके हैं । अतः जो द्वैतदर्शी हैं वे अपनी दृष्टिके अनुरूप ही क्षय्यलोक होते हैं। अतः उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें स्वेच्छागति नहीं होती ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
पञ्चविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २५ ॥
षड्विंश खण्ड
इस प्रकार जाननेवालेके लिये फलका उपदेश
तस्य ह वा एतस्यैवं पश्यत एवं मन्वानस्यैवं विजानत आत्मतः प्राण आत्मत आशात्मतः स्मर आत्मत आकाश आत्मतस्तेज आत्मत आप आत्मत आविर्भावतिरोभावावात्मतोऽन्नमात्मतो बलमात्मतो विज्ञानमात्मतो ध्यानमात्मतश्चित्तमात्मतः संकल्प आत्मतो मन आत्मतो वागात्मतो नामात्मतो मन्त्रा आत्मतः कर्माण्यात्मत एवेदꣳसर्वमिति ॥ १ ॥
उस इस प्रकार देखनेवाले, इस प्रकार मनन करनेवाले और इस प्रकार जाननेवाले इस विद्वान्के लिये आत्मासे प्राण, आत्मासे आशा, आत्मासे स्मृति, आत्मासे आकाश, आत्मासे तेज, आत्मासे जल, आत्मासे आविर्भाव और तिरोभाव, आत्मासे अन्न, आत्मासे बल, आत्मासे विज्ञान, आत्मासे ध्यान, आत्मासे चित्त, आत्मासे संकल्प, आत्मासे मन, आत्मासे वाक्, आत्मासे नाम, आत्मासे मन्त्र, आत्मासे कर्म और आत्मासे ही यह सब हो जाता है ॥ १ ॥
| तस्य ह वा एतस्येत्यादि स्वाराज्यं प्राप्तस्य प्रकृतस्य विदुष इत्यर्थः । प्राक्सदात्मविज्ञानात्स्वात्मनोऽन्यस्मात्सतः प्राणादे- | 'तस्य ह वा एतस्य' इत्यादिका यह तात्पर्य है कि स्वाराज्यको प्राप्त हुए इस प्रकृत विद्वान्के लिये सबका आत्मस्वरूपसे ज्ञान होनेके पूर्व प्राणसे लेकर नामपर्यन्त पदार्थोंके उत्पत्ति और प्रलय स्वात्मासे भिन्न |
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खण्ड २६] शाङ्करभाष्यार्थ ७९९
| नर्नामान्तस्योत्पत्तिप्रलयावभूताम्। सदात्मविज्ञाने तु सतीदानीं स्वात्मत एव संवृत्तौ तथा सर्वोऽप्यन्यं व्यवहार आत्मत एव विदुषः ॥ १ ॥ | सतसे होते थे। किन्तु अब सत्का आत्मत्व ज्ञात होनेपर वे अपने आत्मासे ही हो गये। इसी प्रकार विद्वान्का और भी सब व्यवहार आत्मासे ही होने लगता है ॥१॥ |
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किञ्च-- | तथा—
तदेष श्लोको न पश्यो मृत्युं पश्यति न रोगं नोत दुःखताᳵसर्वᳵ ह पश्यः पश्यति सर्वमाप्नोति सर्वश इति। स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा नवधा चैव पुनश्चैकादशः स्मृतः शतं च दश चैकश्च सहस्राणि च विँशतिराहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षस्तस्मै मृदितकषायाय तमसस्पारं दर्शयति भगवान्सनत्कुमारस्तँस्कन्द इत्याचक्षते तँस्कन्द इत्याचक्षते ॥ २ ॥
इस विषयमें यह मन्त्र है—विद्वान् न तो मृत्युको देखता है, न रोगको और न दुःखत्वको ही। वह विद्वान् सबको [ आत्मरूप ही ] देखता है; अतः सबको प्राप्त हो जाता है। वह एक होता है; फिर वही तीन, पाँच, सात और नौ रूप हो जाता है। फिर वही ग्यारह कहा गया है तथा वही सौ, दश, एक सहस्र और बीस भी होता है। आहारशुद्धि (विषयोपलब्धिरूप विज्ञानकी शुद्धि) होनेपर अन्तःकरणकी शुद्धि होती है, अन्तःकरणकी शुद्धि होनेपर निश्चल स्मृति होती है तथा स्मृतिकी प्राप्ति होनेपर सम्पूर्ण ग्रन्थियोंकी निवृत्ति हो जाती है। [इस प्रकार] जिनकी वासनाएँ क्षीण हो गयी थीं उन (नारदजी) को भगवान् सनत्कुमारने अज्ञानान्धकारका पार दिखलाया।