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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

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DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 803 of 978

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Page 803

खण्ड २६] शाङ्करभाष्यार्थ ७९९

नर्नामान्तस्योत्पत्तिप्रलयावभूताम्। सदात्मविज्ञाने तु सतीदानीं स्वात्मत एव संवृत्तौ तथा सर्वोऽप्यन्यं व्यवहार आत्मत एव विदुषः ॥ १ ॥सतसे होते थे। किन्तु अब सत्‌का आत्मत्व ज्ञात होनेपर वे अपने आत्मासे ही हो गये। इसी प्रकार विद्वान्‌का और भी सब व्यवहार आत्मासे ही होने लगता है ॥१॥

किञ्च-- | तथा—

तदेष श्लोको न पश्यो मृत्युं पश्यति न रोगं नोत दुःखताᳵसर्वᳵ ह पश्यः पश्यति सर्वमाप्नोति सर्वश इति। स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा नवधा चैव पुनश्चैकादशः स्मृतः शतं च दश चैकश्च सहस्राणि च विँशतिराहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षस्तस्मै मृदितकषायाय तमसस्पारं दर्शयति भगवान्सनत्कुमारस्तँस्कन्द इत्याचक्षते तँस्कन्द इत्याचक्षते ॥ २ ॥

इस विषयमें यह मन्त्र है—विद्वान् न तो मृत्युको देखता है, न रोगको और न दुःखत्वको ही। वह विद्वान् सबको [ आत्मरूप ही ] देखता है; अतः सबको प्राप्त हो जाता है। वह एक होता है; फिर वही तीन, पाँच, सात और नौ रूप हो जाता है। फिर वही ग्यारह कहा गया है तथा वही सौ, दश, एक सहस्र और बीस भी होता है। आहारशुद्धि (विषयोपलब्धिरूप विज्ञानकी शुद्धि) होनेपर अन्तःकरणकी शुद्धि होती है, अन्तःकरणकी शुद्धि होनेपर निश्चल स्मृति होती है तथा स्मृतिकी प्राप्ति होनेपर सम्पूर्ण ग्रन्थियोंकी निवृत्ति हो जाती है। [इस प्रकार] जिनकी वासनाएँ क्षीण हो गयी थीं उन (नारदजी) को भगवान् सनत्कुमारने अज्ञानान्धकारका पार दिखलाया।