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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages
Page 747Permalink
खण्ड ७ ]शाङ्करभाष्यार्थ७४३

| विज्ञानं वाव ध्यानाद्भूयः। विज्ञानं शास्त्रार्थविषयं ज्ञानं तस्य ध्यानकारणत्वाद्ध्यानाद्भूयस्त्वम्। कथं च तस्य भूयस्त्वमित्याह। विज्ञानेन वा ऋग्वेदं विजानात्ययमृग्वेद इति प्रमाणतया यस्यार्थज्ञानं ध्यानकारणम्। तथा यजुर्वेदमित्यादि समानम्। किञ्च पश्वादींश्च धर्माधर्मौ शास्त्रसिद्धौ साध्वसाधुनी लोकतः स्मार्ते वादृष्टविषयं च सर्वं विज्ञानेनैव विजानातीत्यर्थः। तस्माद्युक्तं ध्यानाद्विज्ञानस्य भूयस्त्वम्। अतो विज्ञानमुपास्स्वेति ॥ १ ॥ | विज्ञान ही ध्यानसे श्रेष्ठ है। विज्ञान शास्त्रार्थविषयक ज्ञानको कहते हैं; ध्यानका कारण होनेके कारण ध्यानकी अपेक्षा उसकी श्रेष्ठता है। उसकी श्रेष्ठता किस प्रकार है ? यह बतलाते हैं—विज्ञानसे ही पुरुष ऋग्वेदको 'यह ऋग्वेद है' इस प्रकार प्रमाणरूपसे जानता है, जिसका अर्थज्ञान ध्यानका कारण है। तथा यजुर्वेद इत्यादि शेष अर्थ भी इसी प्रकार समझना चाहिये। यही नहीं, पशु आदिको, शास्त्रसिद्ध धर्म और अधर्मको, लोकदृष्टिसे अथवा स्मृतियोंद्वारा निर्णीत शुभ और अशुभको एवं सम्पूर्ण अदृष्ट विषयको भी वह विज्ञानसे ही जानता है—ऐसा इसका तात्पर्य है। अतः ध्यानसे विज्ञानकी श्रेष्ठता ठीक ही है। इसलिये तुम विज्ञानकी उपासना करो ॥ १ ॥ |

-: ० :-

स यो विज्ञानं ब्रह्मेत्युपास्ते विज्ञानवतो वै स लोकाञ्ज्ञानवतोऽभिसिध्यति यावद्विज्ञानस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो विज्ञानं ब्रह्म त्युपास्तेऽस्ति भगवो विज्ञानाद्भूय इति विज्ञानाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥

७४४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७

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७४४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७


वह जो विज्ञानकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है उसे विज्ञानवान् एवं ज्ञानवान् लोकोंकी प्राप्ति होती है। जहाँतक विज्ञानकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है जो कि विज्ञानकी 'यह ब्रह्म है ऐसी उपासना करता है। [ नारद— ] 'भगवन् ! क्या विज्ञानसे भी श्रेष्ठ कुछ है?' [ सनत्कुमार— ] 'विज्ञानसे श्रेष्ठ भी है ही।' ( नारद— ) 'भगवान् मुझे वही बतलावें' ॥ २ ॥

| शृणूपासनफलं विज्ञानवतो विज्ञानं येषु लोकेषु तान्विज्ञानवतो लोकाञ्ज्ञानवतश्चाभिसिध्यत्यभिप्राप्नोति। विज्ञानं शास्त्रार्थविषयं ज्ञानमन्यविषयं नैपुण्यं तद्भिर्युक्ताँल्लोकान् प्राप्नोतीत्यर्थः। यावद्विज्ञानस्येत्यादि पूर्ववत् ॥ २ ॥ | इस उपासनाका फल श्रवण करो—विज्ञानवान् अर्थात् जिन लोकोंमें विज्ञान है उन्हें तथा ज्ञानवान् लोकोंको अभिसिद्ध—प्राप्त कर लेता है। विज्ञान शास्त्रार्थविषयक तथा अन्य विषय-सम्बन्धी निपुणताका नाम है, उनसे सम्पन्न पुरुषोंसे युक्त लोकोंको प्राप्त कर लेता है—ऐसा इसका तात्पर्य है। 'यावद्विज्ञानस्य गतम्' इत्यादि शेष वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है ॥ २ ॥ |

—: ० :—

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
सप्तमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ७ ॥

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अष्टम खण्ड

विज्ञानसे बलकी श्रेष्ठता

बलं वाव विज्ञानाद्भूयोऽपि ह शतं विज्ञानवतामेको बलवानाकम्पयते । स यदा बली भवत्यथोत्थाता भवत्युत्तिष्ठन् परिचरिता भवति परिचरन्नुपसत्ता भवत्युपसीदन् द्रष्टा भवति श्रोता भवति मन्ता भवति बोद्धा भवति कर्ता भवति विज्ञाता भवति । बलेन वै पृथिवी तिष्ठति बलेनान्तरिक्षं बलेन द्यौर्बलेन पर्वता बलेन देवमनुष्या बलेन पशवश्च वयांसि च तृण-वनस्पतयः श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकं बलेन लोकस्तिष्ठति बलमुपास्स्वेति ॥ १ ॥

बल ही विज्ञानकी अपेक्षा उत्कृष्ट है । सौ विज्ञानवानोंको भी एक बलवान् हिला देता है । जिस समय यह पुरुष बलवान् होता है तभी उठनेवाला भी होता है, उठकर [ अर्थात् उठनेवाला होनेपर ] ही परिचर्या करनेवाला होता है तथा परिचर्या करनेवाला होनेपर ही उपसदन [ समीप गमन ] करनेवाला होता है; और उपसदन करनेपर ही दर्शन करनेवाला होता है, श्रवण करनेवाला होता है, मनन करने-वाला होता है, बोधवान् होता है, कर्ता होता है एवं विज्ञाता होता है । बलसे ही पृथिवी स्थित है; बलसे ही अन्तरिक्ष, बलसे ही द्युलोक, बलसे ही पर्वत, बलसे ही देवता और मनुष्य, बलसे ही पशु, पक्षी, तृण, वन-स्पति, श्वापद और कीट-पतंग एवं पिपीलिकापर्यन्त समस्त प्राणी स्थित हैं तथा बलसे ही लोक स्थित है । तुम बलकी उपासना करो ॥ १ ॥

७४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७

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७४६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७
बलं वाव विज्ञानाद्भूयः ।बल ही विज्ञानसे उत्कृष्ट है।
बलमित्यन्नोपयोगजनितं मनसो विज्ञेये प्रतिभानसामर्थ्यम् । अनशनात् "ऋगादीनि न वै मा प्रतिभान्ति भोः" (छा० उ० ६।७।२) इति श्रुतेः। शरीरेऽपि तदेवोत्थानादि सामर्थ्यं यस्माद्विज्ञानवतां शतमप्येकः प्राणी बलवानाकम्पयते यथा हस्ती मत्तो मनुष्याणां शतं समुदितमपि ।अन्नके उपयोगसे प्राप्त हुई मनकी विज्ञेय पदार्थके प्रतिभानकी शक्तिका नाम 'बल' है; क्योंकि अनशन करनेके कारण "भगवन् ! मुझे ऋगादिका प्रतिभान नहीं होता" ऐसी [छठे अध्यायमें श्वेतकेतुका वाक्यरूप] श्रुति है। शरीरमें भी वह बल ही उठने आदिका सामर्थ्य है, क्योंकि सौ विज्ञानवानोंको भी एक ही बलवान् प्राणी इस प्रकार कम्पायमान कर देता है जैसे एकत्रित हुए सौ मनुष्योंको एक मत्त हाथी ।
यस्मादेवमन्नाद्युपयोगनिमित्तं बलं तस्मात्स पुरुषो यदा बली बलेन तद्वान्भवत्यथोत्थातोत्थानस्य कर्तोत्तिष्ठंश्च गुरूणामाचार्यस्य च परिचरिता परिचरणस्य शुश्रूषायाः कर्ता भवति परिचरन्नुपसत्ता तेषां समीपगोऽन्तरङ्गः प्रियो भवतीत्यर्थः ।क्योंकि अन्नादिके उपयोगके कारण होनेवाला बल ऐसा है इसलिये यह पुरुष जिस समय बली अर्थात् बलसे बलयुक्त होता है तो वह उत्थाता अर्थात् उत्थान करनेवाला होता है । उत्थान करनेवाला होकर वह गुरुजन और आचार्यका परिचारक-परिचर्या यानी शुश्रूषा करनेवाला होता है ! परिचर्या करनेपर उपसत्ति करनेवाला-उनके समीप पहुँचनेवाला-उनका अन्तरङ्ग अर्थात् प्रिय होता है ।
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खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७४७

| उपसीदंश्च सामीप्यं गच्छन्नेकाग्रतयाचार्यस्यान्यस्य चोपदेष्टुर्गुरोर्द्रष्टा भवति । ततस्तदुक्तस्य श्रोता भवति । तत इदमेभिरुक्तमेवमुपपद्यत इत्युपपत्तितो मन्ता भवति मन्वानश्च बोद्धा भवत्येवमेवेदमिति । तत एवं निश्चित्य तदुक्तार्थस्य कर्तानुष्ठाता भवति विज्ञातानुष्ठानफलस्यानुभविता भवतीत्यर्थः । किञ्च बलस्य माहात्म्यं बलेन वै पृथिवी तिष्ठतीत्याद्यृज्वर्थम् ॥ १ ॥ | उपसन्न होने अर्थात् समीप जानेपर वह एकाग्रभावसे आचार्य अथवा किसी अन्य उपदेश करनेवाले गुरुका दर्शन करनेवाला होता है । फिर वह उनके कथनको श्रवण करनेवाला होता है । तत्पश्चात् 'इनका यह कथन इस प्रकार उपपन्न है' इस प्रकार युक्तिपूर्वक मनन करनेवाला होता है । तथा मनन करनेपर 'यह बात ऐसी ही है' इस प्रकार उसे जाननेवाला होता है । फिर इस प्रकार निश्चय कर वह उनकी कही हुई बातका कर्ता—अनुष्ठान करनेवाला होता है, तथा विज्ञाता यानी अनुष्ठानके फलका अनुभव करनेवाला होता है—ऐसा इसका तात्पर्य है । इसके सिवा बलकी महिमा इस प्रकार है—बलसे पृथिवी स्थित है—इत्यादि शेष अर्थ सरल है ॥१॥ |

—: ० :—

स यो बलं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्बलस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो बलं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो बलाद्भूय इति बलाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥

७४८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७

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७४८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

वह जो कि बलकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है, उसकी जहाँतक बलकी गति है, स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि बलकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है । [ नारद— ] 'भगवन् ! क्या बलसे भी उत्कृष्ट कुछ है ?' [ सनत्कुमार— ] बलसे उत्कृष्ट भी है ही।' [ नारद— ] 'भगवान् मेरे प्रति उसीका वर्णन करें' ॥ २ ॥


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये-
ऽष्टमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ८ ॥

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नवम खण्ड

बलकी अपेक्षा अन्नकी प्रधानता

अन्नं वाव बलाद्भूयस्तस्माद्यद्यपि दशरात्रीर्नाश्नी-
याद्यद्यु ह जीवेदथवाऽद्रष्टाऽश्रोताऽमन्ताऽबोद्धाऽकर्ताऽविज्ञाता
भवत्यथान्नस्यायै द्रष्टा भवति श्रोता भवति मन्ता
भवति बोद्धा भवति कर्ता भवति विज्ञाता भवत्यन्नमु-
पास्स्वेति ॥ १ ॥

अन्न ही बलसे उत्कृष्ट है। इसीसे यदि दश दिन भोजन न करे और जीवित भी रह जाय तो भी वह अद्रष्टा, अश्रोता, अमन्ता, अबोद्धा अकर्ता और अविज्ञाता हो ही जाता है। फिर अन्नकी प्राप्ति होनेपर ही वह द्रष्टा होता है, श्रोता होता है, मनन करनेवाला होता है, बोद्धा होता है, कर्ता होता है और विज्ञाता होता है। तुम अन्नकी उपासना करो ॥ १ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
अन्नं वाव बलाद्भूयः; बलहेतुत्वात्। कथमन्नस्य बलहेतुत्वम्? इत्युच्यते—यस्माद्बलकारणमन्नं तस्माद्यद्यपि कश्चिद्दशरात्रीर्नाश्रीयात्सोऽन्नोपयोगनिमित्तस्य बलस्य हान्या म्रियते न चेन्म्रिय-अन्न ही बलसे उत्कृष्ट है, क्योंकि यह बलका कारण है। अन्न बलका कारण किस प्रकार है ? यह बतलाते हैं—क्योंकि अन्न बलका कारण है इसलिये यदि कोई पुरुष दश राततक भोजन न करे तो वह अन्नके उपयोगसे होनेवाले बलके क्षीण हो जानेके कारण मर जाता है; और यदि न
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७५०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
यते यद्यु ह जीवेद् दृश्यन्ते हि मासमप्यनश्नन्तो जीवन्तोऽथवा स जीवन्नप्यद्रष्टा भवति गुरोरपि तत एवाश्रोतेत्यादि पूर्वविपरीतं सर्वं भवति । <br><br> अथ यदा बहून्यहान्यनशितो दर्शनादिक्रियास्वसमर्थः सन्नन्नस्यायी । आगमनमायोऽन्नस्य प्राप्तिरित्यर्थः सा यस्य विद्यते सोऽन्नस्यायी । 'आय' इत्येतद्वर्णव्यत्ययेन । अथान्नस्याया इत्यपि पाठ एवमेवार्थः । द्रष्टेत्यादिकार्यश्रवणात् । दृश्यते ह्यन्नोपयोगे दर्शनादिसामर्थ्यं न तदप्राप्तावतोऽन्नमुपास्स्वेति ॥ १ ॥मरे—जीवित रह जाय, क्योंकि महीनेभर न खानेवाले भी जीवित रहते देखे जाते हैं, तो [ऐसी अवस्थामें] जीवित रहनेपर वह गुरुका भी दर्शन न करनेवाला हो जाता है तथा उनसे श्रवण करनेवाला भी नहीं रहता—इत्यादि सब बात पहलेसे विपरीत हो जाती है। <br><br> फिर जब बहुत दिन भोजन न करनेपर दर्शनादि क्रियाओंमें असमर्थ रहनेपर अन्नका आयी—आगमनका नाम ‘आय’ अर्थात् ‘अन्नकी प्राप्ति’ है, वह जिसे होती है उसे ‘अन्नका आयी’ कहते हैं। श्रुतिमें जो ‘आयै’ ऐसा पाठ है वह ‘आयी’ का वर्णव्यत्यय करके है तथा ‘अन्नस्याया’ ऐसा पाठ भी इसी अर्थमें समझना चाहिये, क्योंकि श्रुति द्रष्टा-श्रोता आदि कार्यका प्रतिपादन करती है। अन्नका उपयोग करनेपर ही दर्शनादिकी शक्ति देखी जाती है—उसकी अप्राप्ति होनेपर नहीं। अतः तुम अन्नकी उपासना करो ॥ १ ॥
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—: ० :—

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खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५१


स योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्तेऽन्नवतो वै स लोकान्पान-
वतोऽभिसिध्यति यावदन्नस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो
भवति योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवोऽन्नाद्भूय
इत्यन्नाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २॥

वह जो कि अन्नकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है उसे अन्नवान् और पानवान् लोकोंकी प्राप्ति होती है। जहाँतक अन्नकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि अन्नकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। [नारद—] 'भगवन् ! क्या अन्नसे बढ़कर भी कुछ है?' [सनत्कुमार—] 'अन्नसे बढ़कर भी है ही।' [नारद—] 'भगवन् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ २ ॥

| फलं चान्नवतः प्रभूतान्नान्वौ स लोकान्पानवतः प्रभूतोदकां-श्चान्नपानयोर्नित्यसम्बन्धाल्लो-कानभिसिध्यति । समानमन्यत् ॥ २ ॥ | ( उसे प्राप्त होनेवाला ) फल—वह अन्नवान्—अधिक अन्नवाले और पानवान्—बहुत जलवाले लोकोंको, क्योंकि अन्न और जलका नित्य सम्बन्ध है, प्राप्त होता है। शेष पूर्ववत् है ॥ २ ॥ |

— : ० : —

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
नवमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥

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दशम खण्ड


अन्नकी अपेक्षा जलका महत्त्व

आपो वावान्नाद्भूयस्यस्तस्माद्यदा सुवृष्टिर्न भवति व्याधीयन्ते प्राणा अन्नं कनीयो भविष्यतीत्यथ यदा सुवृष्टिर्भवत्यानन्दिनः प्राणा भवन्त्यन्नं बहु भविष्यतीत्याप एवेमा मूर्ता येयं पृथिवी यदन्तरिक्षं यद्द्यौर्यत्पर्वता यद्देवमनुष्या यत्पशवश्च वयांसि च तृणवनस्पतयः श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकमाप एवेमा मूर्ता अप उपास्स्वेति ॥ १ ॥

जल ही अन्नकी अपेक्षा उत्कृष्ट है। इसीसे जब सुवृष्टि नहीं होती तो प्राण [ इसलिये ] दुखी हो जाते हैं कि अन्न थोड़ा होगा। और जब सुवृष्टि होती है तो यह सोचकर कि खूब अन्न होगा प्राण प्रसन्न हो जाते हैं। यह जो पृथिवी है मूर्तिमान् जल ही है तथा जो अन्तरिक्ष, जो द्युलोक, जो पर्वत, जो देव-मनुष्य, जो पशु और पक्षी तथा जो तृण, वनस्पति, श्वापद और कीट-पतंग-पिपीलिकापर्यन्त प्राणी हैं वे भी मूर्तिमान् जल ही हैं। अतः तुम जलकी उपासना करो ॥ १ ॥

आपो वावान्नाद्भूयस्योऽन्नकारणत्वात्। यस्मादेवं तस्माद्यदा यस्मिन्काले सुवृष्टिः सस्यहिता शोभना वृष्टिर्न भवति तदाअन्नका कारण होनेसे जल ही अन्नकी अपेक्षा उत्कृष्ट है। क्योंकि ऐसा है, इसीलिये जिस समय सुवृष्टि—अन्नके लिये हितावह सुन्दर वृष्टि नहीं होती उस समय
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खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५३


| व्याधीयन्ते प्राणा दुःखिनो भवन्ति। किन्निमित्तम् ? इत्याह— अन्नमस्मिन् संवत्सरे नः कनी- योऽल्पतरं भविष्यतीति ।<br><br>अथ पुनर्यदा सुवृष्टिर्भवति तदानन्दिनः सुखिनो हृष्टाः प्राणाः प्राणिनो भवन्त्यन्नं बहु प्रभूतं भविष्यतीति । अप्सम्भव- त्वान्मूर्तस्यान्नस्याप एवेमा मूर्ता मूर्तभेदाकारपरिणता इति मूर्ता येयं पृथिवी यदन्तरिक्ष- मित्यादि, आप एवेमा मूर्ता अतोऽप उपास्स्वेति ॥ १ ॥ | प्राण व्यथित—दुःखी होते हैं । किसलिये दुःखी होते हैं ? यह श्रुति बतलाती है—इस वर्ष हमारे लिये थोड़ा अन्न होगा—इसलिये ।<br><br>और फिर जिस समय सुवृष्टि होती है उस समय प्राण अर्थात् प्राणी सुखी—हर्षित होते हैं कि [ इस बार ] बहुत-सा यानी खूब अन्न होगा। क्योंकि मूर्त्त अन्न जलसे उत्पन्न हुआ है इसलिये यह मूर्त्त अर्थात् मूर्तिमान् भेदके आकारमें परिणत हो जानेके कारण जो मूर्त्ति- मती हैं वह यह पृथिवी और अन्त- रिक्ष इत्यादि मूर्तिमान् जल ही हैं । अतः तुम जलकी उपासना करो ॥ १ ॥ |


स योऽपो ब्रह्मेत्युपास्त आप्नोति सर्वान्कामाꣳस्तृप्तिमान् भवति यावदपां गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति योऽपो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवोऽद्भ्यो भूय इत्यद्भ्यो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २॥

वह जो कि जलकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है, सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और तृप्तिमान् होता है । जहाँतक जलकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि जलकी

७५४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७

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७५४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। [ नारद—] 'भगवान् ! क्या जलसे भी श्रेष्ठ कुछ है ?' [ सनत्कुमार—] 'जलसे श्रेष्ठ भी है ही।' [ नारद—] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ २ ॥

| फलं स योऽपो ब्रह्मेत्युपास्त आप्नोति सर्वान्कामान्काम्यान्मूर्तिमतो विषयान्नित्यर्थः । अप्संभवत्वाच्च तृप्तेरम्बुपासनात्तृप्तिमांश्च भवति । समानमन्यत् ॥ २ ॥ | [ इस उपासनाका ] फल—वह जो कि 'जल ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है सम्पूर्ण कामनाओंको—काम्य वस्तुओंको अर्थात् मूर्तिमान् विषयोंको प्राप्त कर लेता है। तथा तृप्ति भी जलजनित होनेके कारण जलकी उपासना करनेसे वह तृप्तिमान् होता है। शेष सब पूर्ववत् है ॥२॥ |

—:•:—

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
दशमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १० ॥

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एकादश खण्ड

जलकी अपेक्षा तेजकी प्रधानता

तेजो वावाद्भ्यो भूयस्तद्वा एतद्वायुमागृह्याकाश-
मभितपति तदाहुर्निशोचति नितपति वर्षिष्यति वा
इति तेज एव तत्पूर्वं दर्शयित्वाथापः सृजते तदेतदूर्ध्वा-
भिश्च तिरश्चीभिश्च विद्युद्भिराह्रादाश्चरन्ति तस्मा-
दाहुर्विद्योतते स्तनयति वर्षिष्यति वा इति तेज एव
तत्पूर्वं दर्शयित्वाथापः सृजते तेज उपास्स्वेति ॥ १ ॥

तेज ही जलकी अपेक्षा उत्कृष्टतर है। वह यह तेज जिस समय वायुको निश्चल कर आकाशको सब ओरसे तप्त करता है उस समय लोग कहते हैं—'गर्मी हो रही है, बड़ा ताप है, वर्षा होगी।' इस प्रकार तेज ही पहले अपनेको उद्भूत हुआ दिखलाकर फिर जलकी उत्पत्ति करता है। वह यह तेज ही वर्षाका हेतु है। जब ऊर्ध्वगामी और तिर्यग्गामी विद्युत्‌के सहित गड़गड़ाहटके शब्द फैल जाते हैं, तब उससे प्रभावित होकर लोग कहते हैं—'बिजली चमकती है, बादल गर्जता है, वर्षा होगी।' इस प्रकार तेज ही पहले अपनेको प्रदर्शित कर फिर जलको उत्पन्न करता है। अतः तेजकी उपासना करो ॥ १ ॥

तेजो वावाद्भ्यो भूयः, तेजसोऽप्कारणत्वात् । कथ-मप्कारणत्वम् ? इत्याह— यस्मादब्योनिस्तेजस्तस्मा-त्तद्वा एतत्तेजो वायुमा-तेज ही जलकी अपेक्षा उत्कृष्टतर है, क्योंकि तेज जलका कारण है। वह जलका कारण किस प्रकार है ? यह बतलाते हैं—क्योंकि तेज जलका कारण है इसलिये वह यह

७५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ७

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७५६छान्दोग्योपनिषद्[अध्याय ७

| गृह्णावष्टभ्य स्वात्मना निश्चलीकृत्य वायुमाकाशमभितपत्याकाशमभिव्याप्तवत्तपति यदा तदाहुर्लौकिका निशोचति सन्तपति सामान्येन जगन्नितपति देहानतो वर्षिष्यति वा इति । प्रसिद्धं हि लोके कारणमभ्युद्यतं दृष्टवतः कार्यं भविष्यतीति विज्ञानम् । तेज एव तत्पूर्वमात्मानमुद्भूतं दर्शयित्वाथानन्तरमपः सृजतेऽतोऽप्स्रष्टृत्वादूढ्योऽद्भ्यस्तेजः । | तेज जिस समय वायुको आगृहीत—आश्रित कर अर्थात् अपनेद्वारा वायुको निश्चल कर आकाशको अभितप्त करता है—आकाशको सब ओरसे व्याप्त करके संतप्त करता है उस समय लौकिक पुरुष कहते हैं—'जगत् सामान्यरूपसे संतप्त हो रहा है, देहोंमें अत्यन्त ताप है; अतः वर्षा होगी। कारणको अभ्युदित हुआ देखनेवालोंको ऐसी बुद्धि होना कि 'कार्य होगा' लोकमें प्रसिद्ध ही है। [इस प्रकार] तेज ही पहले अपनेको उद्भूत हुआ दिखलाकर फिर उसके पश्चात् जल उत्पन्न कर देता है। इस प्रकार जलका स्रष्टा होनेके कारण जलकी अपेक्षा तेज उत्कृष्टतर है। |
| किञ्चान्यत्तदेतत्तेज एव स्तनयित्नुरूपेण वर्षहेतुर्भवति । कथम् ? ऊर्ध्वाभिश्चोर्ध्वगाभिर्विद्युद्भिस्तिरश्चीभिश्च तिर्यग्गताभिश्च सहाह्रादाः स्तनयनशब्दाश्चरन्ति । तस्मात्तद्दर्शनादाहुर्लौकिका विद्योतते स्तनयति वर्षिष्यति वा | इसके सिवा [दूसरे प्रकारसे भी] तेज ही बिजलीके रूपमें वर्षाका हेतु होता है। किस प्रकार—ऊर्ध्वा—ऊर्ध्वगामिनी और तिरश्ची—तिर्यग्गामिनी बिजलियोंके सहित 'आह्राद'—गड़गड़ाहटके शब्द फैल जाते हैं; अतः ऐसा देखकर लौकिक पुरुष कहते हैं—'बिजली चमकती है, बादल गर्जता है, वर्षा, होगी' इत्यादि |

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खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५७


| इत्याद्युक्तार्थम् । अतस्तेज उपास्स्वेति ॥ १ ॥ | वाक्यका अर्थ ऊपर कहा जा चुका है।<br><br>अतः तुम तेजकी उपासना करो ॥ १ ॥ |

स यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्ते तेजस्वी वै स तेजस्वतो लोकान्भास्वतोऽपहततमस्कानभिसिध्यति यावत्तेजसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति । यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवस्तेजसो भूय इति तेजसो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥

वह जो कि तेजकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है वह तेजस्वी होकर तेजःसम्पन्न, प्रकाशमान और तमोहीन लोकोंको प्राप्त करता है। जहाँतक तेजकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि तेजकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। [नारद—] भगवन् ! क्या तेजसे भी बढ़कर कुछ है ?' [सनत्कुमार—] 'तेजसे बढ़कर भी है ही।' [नारद—] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ २ ॥

| तस्य तेजस उपासनफलं तेजस्वी वै भवति । तेजस्वत एव च लोकान्भास्वतः प्रकाशवतोऽपहततमस्कान्वा ह्याध्यात्मिकाज्ञानाद्यपनीततमस्कानभिसिध्यति । ऋज्वर्थमन्यत् ॥ २ ॥ | उस तेजकी उपासनाका फल—वह निश्चय तेजस्वी हो जाता है तथा जो तेजःसम्पन्न ही लोक हैं उन भास्वान्—प्रकाशवान् और अपहततमस्क—बाह्य— [रात्रि आदि] और आध्यात्मिक—अज्ञानादि ऐसे अन्धकारोंसे रहित लोकोंको प्राप्त कर लेता है। शेष सबका अर्थ सरल है ॥ २ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये एकादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ११ ॥

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द्वादश खण्ड

-: ० :-

तेजसे आकाशकी प्रधानता

आकाशो वाव तेजसो भूयानाकाशे वै सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राण्यग्निराकाशेनाह्वयत्याकाशेन शृणोत्याकाशेन प्रतिशृणोत्याकाशे रमत आकाशे न रमत आकाशे जायत आकाशमभिजायत आकाशमुपास्स्वेति ॥ १ ॥

आकाश ही तेजसे बढ़कर है । आकाशमें ही सूर्य, चन्द्र ये दोनों तथा विद्युत्, नक्षत्र और अग्नि स्थित हैं । आकाशके द्वारा ही एक-दूसरेको पुकारते हैं, आकाशसे ही सुनते हैं, आकाशसे ही प्रतिश्रवण करते हैं, आकाशमें ही रमण करते हैं, आकाशमें ही रमण नहीं करते, आकाशमें ही [ सब पदार्थ ] उत्पन्न होते हैं और आकाशकी ओर ही [सब जीव एवं अङ्कुरादि] बढ़ते हैं । तुम आकाशकी उपासना करो ॥ १ ॥

| आकाशो वाव तेजसो भूयान् । वायुसहितस्य तेजसः कारणत्वाद्व्योम्नो वायुमागृह्येति तेजसा सहोक्तो वायुरिति पृथगिह नोक्तस्तेजसः । कारणं हि लोके कार्याद्भूयो दृष्टम् । यथा घटादिभ्यो मृत्तथाकाशो वायु- | आकाश ही तेजसे बढ़कर है, क्योंकि आकाश वायुसहित तेजका कारण है ‘वायुमागृह्य’ ऐसा कहकर वायुका तेजके साथ वर्णन किया जा चुका है, इसलिये यहाँ तेजसे अलग उसका पृथक् उल्लेख नहीं किया गया। लोकमें कार्यकी अपेक्षा कारण ही उत्कृष्ट देखा गया है, जिस प्रकार कि घटादिकी अपेक्षा मृत्तिका। इसी प्रकार आकाश वायु- |

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[खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ ७५९


शाङ्करभाष्यम्शाङ्करभाष्यार्थ
सहितस्य तेजसः कारणमिति ततो भूयान् । कथम् ? आकाशे वै सूर्याचन्द्रमसावुभौ तेजोरूपौ विद्युन्नक्षत्राण्यग्निश्च तेजोरूपाण्याकाशेऽन्तः । यच्च यस्यान्र्तवर्ति तदल्पं भूय इतरत् ।<br><br>किञ्चाकाशेनाह्वयति चान्यमन्य आहूतश्चेतर आकाशेन शृणोत्यन्योक्तं च शब्दमन्यः प्रतिशृणोत्याकाशे रमते क्रीडत्यन्योन्यं सर्वस्तस्तथा न रमते चाकाशे वध्वादिवियोग आकाशे जायते न मूर्ते नावष्टब्धे । तथाकाशमभिलक्ष्याङ्कुरादि जायते न प्रतिलोमम् । अत आकाशमुपास्स्व ॥ १ ॥सहित तेजका कारण है, इसलिये उससे बड़ा है। किस प्रकार बड़ा है—आकाशमें ही तेजःस्वरूप सूर्य और चन्द्रमा—ये दोनों हैं तथा आकाशके भीतर ही तेजोमय विद्युत्, नक्षत्र और अग्नि हैं। जो जिसके भीतर होता है वह छोटा होता है और दूसरा उससे बड़ा होता है।<br><br>इसके सिवा आकाशसे ही एक व्यक्ति दूसरेको पुकारता है; किसीके द्वारा पुकारे जानेपर आकाशसे ही दूसरा पुरुष श्रवण करता है तथा दूसरेके कहे हुए शब्दको आकाशके द्वारा ही अन्य पुरुष श्रवण करता है। सब लोग आकाशमें ही एक दूसरेके साथ रमण—क्रीडा करते हैं और स्त्री *आदिका वियोग हो जानेपर आकाशमें ही (खेदका अनुभव करते हुए) रमण नहीं करते। आकाशमें ही जीव उत्पन्न होता है, मूर्त पदार्थमें या अवरुद्ध स्थानमें नहीं तथा आकाशको लक्ष्य करके ही अङ्कुरादि उत्पन्न होते हैं, विपरीत दशामें नहीं। इसलिये तुम आकाशकी उपासना करो ॥ १ ॥

* 'स्त्री आदि' शब्दसे यहाँ सम्पूर्ण भोग्य वस्तुएँ उपलक्षित हैं। तात्पर्य यह है कि भोग्य पदार्थके प्राप्त होनेपर जो आनन्द होता है उसका भोग आकाशमें ही होता है और उसका वियोग होनेपर जो खेद होता है उसकी अनुभूति भी आकाशमें ही होती है।

७६० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७

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७६० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७

स य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्त आकाशवतो वै स लोकान्प्रकाशवतोऽसम्बाधानुरुगायवतोऽभिसिध्यति यावदाकाशस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगव आकाशाद्भूय इत्याकाशाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥

वह जो कि आकाशकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है वह आकाशवान्, प्रकाशवान्, पीड़ारहित और विस्तारवाले लोकोंको प्राप्त करता है। जहाँतक आकाशकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि आकाशकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। [नारद—] 'भगवन् ! क्या आकाशसे बढ़कर भी कुछ है?' [ सनत्कुमार—] 'आकाशसे बढ़कर भी है ही।' [ नारद—] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ २ ॥

| फलं शृण्वाकाशवतो वै विस्तारयुक्तान् स विद्वाँल्लोकान् प्रकाशवतः प्रकाशाकाशयोर्नित्यसम्बन्धात्प्रकाशवतश्च लोकान् सम्बाधान् सम्बाधनं सम्बाधः सम्बाधोऽन्योऽन्यपीडा तद्रहितानसम्बाधानुरुगायवतो विस्तीर्णगतीन्विस्तीर्णप्रचाराँल्लोकानभिसिध्यति। यावदाकाशस्येत्याद्युक्तार्थम् ॥ २ ॥ | [ इसका ] फल सुनो—वह विद्वान् आकाशवान् यानी विस्तारयुक्त लोकोंको तथा 'प्रकाशवान्'—क्योंकि प्रकाश और आकाशका नित्य सम्बन्ध है अतः प्रकाशयुक्त लोकोंको, 'असम्बाध'—सम्बाधनका नाम सम्बाध और सम्बाध परस्परकी पीड़ाको कहते हैं, उससे रहित असम्बाध और 'उरुगायवान्'—विस्तीर्ण गतिवाले अर्थात् विस्तृत प्रचारवाले लोकोंको प्राप्त होता है। 'यावदाकाशस्य' आदि वाक्यका अर्थ पहले कहे हुएके समान है ॥२॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१२॥

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त्रयोदश खण्ड

आकाशकी अपेक्षा स्मरणका महत्त्व

स्मरो वावाकाशाद्भूयस्तस्माद्यद्यपि बहव आसीरन्न स्मरन्तो नैव ते कञ्चन शृणुयुर्न मन्वीरन्न विजानीरन्यदा वाव ते स्मरेयुरथ शृणुयुरथ मन्वीरन्नथ विजानीरन्स्मरेण वै पुत्रान्विजानाति स्मरेण पशून्स्मरमुपास्स्वेति ॥ १ ॥

स्मर (स्मरण) ही आकाशसे बढ़कर है। इसीसे यद्यपि बहुत-से लोग [एक स्थानपर] बैठे हों तो भी स्मरण न करनेपर वे न कुछ सुन सकते हैं, न मनन कर सकते हैं और न जान ही सकते हैं। जिस समय वे स्मरण करते हैं उसी समय सुन सकते हैं, उसी समय मनन कर सकते हैं और उसी समय जान सकते हैं। स्मरण करनेसे ही पुरुष पुत्रोंको पहचानता है और स्मरणसे ही पशुओंको। तुम स्मरकी उपासना करो ॥ १ ॥


| स्मरो वावाकाशाद्भूयः । स्मरणं स्मरोऽन्तःकरणधर्मः । स आकाशाद्भूयानिति द्रष्टव्यं लिङ्गव्यत्ययेन । स्मर्तुः स्मरणे हि सत्याकाशादि सर्वमर्थवत्, स्मरणवतो | स्मर ही आकाशसे बढ़कर है। स्मरणका नाम 'स्मर' है, यह अन्तःकरणका धर्म है। वह आकाशकी अपेक्षा 'भूयान्' (बढ़कर) है—ऐसा लिङ्गपरिवर्तन करके* समझना चाहिये। स्मरण करनेवालेकी स्मृति होनेपर ही आकाशादि सब सार्थक |


※ मूल श्रुति में 'भूयः' यह नपुंसकलिंग है। किंतु 'स्मर' शब्द पुल्लिंग है, अतः उसका विशेषण होनेके कारण 'भूयः' के स्थानमें 'भूयान्' ऐसा पुँल्लिङ्ग पाठ कर लेना चाहिये।

७६२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७

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७६२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

| भोग्यत्वात् । असति तु स्मरणे सदप्यसदेव, सत्त्वकार्याभावात् । नापि सत्त्वं स्मृत्यभावे शक्यमाकाशादीनामवगन्तुमित्यतः स्मरणस्याकाशाद्भूयस्त्वम् । <br><br> दृश्यते हि लोके स्मरणस्य भूयस्त्वं यस्मात्, तस्माद्यद्यपि समुदिता बहव एकस्मिन्नासीरन्नुपविशेयुः, ते तत्रासीना अन्योन्यभाषितमपि न स्मरन्तश्चेत्स्युः, नैव ते कञ्चन शब्दं शृणुयुः, तथा न मन्वीरन्, मन्तव्यं चेत्स्मरेयुस्तदा मन्वीरन्, स्मृत्यभावान्न मन्वीरन्; तथा न विजानीरन् । यदा वाव ते स्मरेयुर्मन्तव्यं विज्ञातव्यं श्रोतव्यं च, अथ शृणुयुरथ मन्वीरन्नथ विजानीरन् । तथा स्मरेण वै—मम पुत्रा एते—इति पुत्रान्विजानाति, स्मरेण पशून् । अतो | होते हैं, क्योंकि वे स्मृतिमान्‌के ही योग्य हैं । स्मृतिके न होनेपर तो विद्यमान वस्तु भी अविद्यमान ही है, क्योंकि उसकी सत्ताके कार्यका अभाव है । स्मृतिका अभाव होनेपर आकाशादिकी सत्ताका ज्ञान भी नहीं हो सकता । इसीसे स्मरणकी आकाशसे उत्कृष्टता है । <br><br> क्योंकि लोकमें स्मृतिकी उत्कृष्टता देखी जाती है, इसलिये यद्यपि बहुत-से लोग एक स्थानपर बैठे हों वे एक-दूसरेसे भाषण करते हुए भी, यदि स्मृतियुक्त नहीं होते तो कोई शब्द श्रवण नहीं कर सकते । इसी प्रकार मनन भी नहीं कर सकते । यदि वे मन्तव्य विषयका स्मरण करते तो मनन कर सकते थे, अतः स्मृतिका अभाव होनेके कारण मनन भी नहीं कर सकते और न जान ही सकते हैं । जिस समय वे मन्तव्य, विज्ञातव्य अथवा श्रोतव्य विषयका स्मरण करते हैं तभी उसे सुन सकते, मनन कर सकते और जान सकते हैं । इसी प्रकार स्मरण करनेसे ही 'ये मेरे पुत्र हैं' इस प्रकार पुत्रोंको जानते हैं और स्मरणसे ही पशुओंको । |