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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

११२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

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११२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १
अतो वयमपि स्वर्गं लोकं सामाभिसंस्थापयामः। स्वर्गलोकप्रतिष्ठं साम जानीम इत्यर्थः। स्वर्गसंस्तावं स्वर्गत्वेन संस्तवनं संस्तावो यस्य तत्साम स्वर्गसंस्तावं हि यस्मात् "स्वर्गो वै लोकः साम वेद" इति श्रुतिः ॥५॥अतः हम भी सामको स्वर्गलोकमें ही स्थापित करते हैं। अर्थात् सामको स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित समझते हैं, क्योंकि साम स्वर्गसंस्ताव अर्थात् जिसका स्वर्गरूपसे संस्तवन किया गया है, ऐसा स्वर्गसंस्ताव है "निश्चय स्वर्गलोक ही साम है ऐसा जानता है" यह श्रुति भी है ॥ ५ ॥
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तंह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाचाप्रतिष्ठितं वै किल ते दाल्भ्य साम यस्त्वेतर्हि ब्रूयान्मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति ॥६॥

उस चिकितानपुत्र दालभ्यसे शालवान्‌के पुत्र शिलकने कहा—'हे दालभ्य ! तेरा साम निश्चय ही अप्रतिष्ठित है। जो इस समय कोई सामवेत्ता यह कह दे कि 'तेरा मस्तक पृथिवीपर गिर जाय' तो निश्चय ही तेरा मस्तक गिर जायगा ॥ ६ ॥

तमितरः शिलकः शालावत्य-उस चैकितायन दाल्भ्यसे दूसरे
श्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाच—शालावत्य शिलकने कहा—'हे दाल्भ्य ! निश्चय ही तेरा साम
अप्रतिष्ठितमसंस्थितं परावरीय-अप्रतिष्ठित-असंस्थित अर्थात् उत्तरोत्तर उत्कृष्टरूपसे असमाप्त गतिवाला
स्त्वेनासमामगति सामेत्यर्थः। वाहै।' 'वै' और 'किल' इन निपातों-
इत्यागमं स्मारयति किलेति च।से श्रुति आगम यानी उपदेश-
दाल्भ्य ते तव साम। यस्त्व-परम्पराका स्मरण कराती है। यदि
सहिष्णुः सामविदेतर्ह्येतस्मिन्कालेइस समय कोई असहिष्णु सामवेत्ता अप्रतिष्ठित सामको 'यह प्रतिष्ठित
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खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थे ११३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
ब्रूयात्कश्चिद्विपरीतविज्ञानमप्रतिष्ठितं साम प्रतिष्ठितमिति एवं वादापराधिनं मूर्धा शिरस्ते विपतिष्यति विस्पष्टं पतिष्यतीति । एवमुक्तस्यापराधिनस्तथैव तद्विपतेन्न संशयो न त्वहं ब्रवीमीत्यभिप्रायः ।है' इस प्रकार कहनेका अपराध करनेवाले तुझ विपरीत विज्ञानवान्से कहे कि 'तेरा मस्तक गिर जायगा—स्पष्टतया पतित हो जायगा' तो इस प्रकार कहे जानेपर तुझ अपराधीका मस्तक उसी प्रकार गिर पड़ेगा—इसमें संशय नहीं। तात्पर्य यह है कि मैं तो ऐसा कहता नहीं हूँ [यदि कोई अन्य कह देगा तो अवश्य ऐसा ही होगा]।'
ननु मूर्धपातार्हं चेदपराधं कृतवानतः परेणानुक्तस्यापि पतेन्मूर्धा न चेदपराध्युक्तस्यापि नैव पतति । अन्यथाकृताभ्यागमः कृतनाशश्च स्याताम् ।शंका—यदि मस्तक गिरनेयोग्य पाप किया है तब तो दूसरेके न कहनेपर भी मस्तक गिर ही जायगा और यदि वह ऐसा अपराधी नहीं है तो कहनेपर भी नहीं गिर सकता; नहीं तो बिना कियेकी प्राप्ति और किये हुएका नाश ये दो दोष प्राप्त होंगे।
नैष दोषः; कृतस्य कर्मणः शुभाशुभस्य फलप्राप्तेर्देशकालनिमित्तापेक्षत्वात् । तत्रैवं सति मूर्धपातनिमित्तस्याप्यज्ञानस्य पराभिव्याहारनिमित्तापेक्षत्वमिति ॥ ६ ॥समाधान—यह दोष नहीं है, क्योंकि किये हुए शुभ और अशुभ कर्मोंके फलकी प्राप्ति देश, काल और निमित्तकी अपेक्षावाली होती है । ऐसी स्थितिमें मूर्धपातका निमित्तभूत जो अज्ञान है, वह भी दूसरेके कथनरूप निमित्तकी अपेक्षावाला ही है ॥ ६ ॥

११४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

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११४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १
एवमुक्तो दाल्भ्य आह—ऐसा कहे जानेपर दाल्भ्यने कहा—

हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति विद्धीति होवा-
चामुष्य लोकस्य का गतिरित्ययं लोक इति होवा-
चास्य लोकस्य का गतिरिति न प्रतिष्ठां लोकमति-
नयेदिति होवाच प्रतिष्ठां वयं लोकꣳसामाभिसꣳस्था-
पयामः प्रतिष्ठासꣳस्तावꣳहि सामेति ॥ ७ ॥

मैं यह बात श्रीमान्‌से जानना चाहता हूँ; इसपर [शिलकने] कहा—'जान लो।' तब 'उस लोककी गति क्या है?' ऐसा पूछे जानेपर उसने 'यह लोक' ऐसा कहा। फिर 'इस लोककी गति क्या है?' ऐसा प्रश्न होनेपर 'इस प्रतिष्ठाभूत लोकका अतिक्रमण करके सामको अन्यत्र नहीं ले जाना चाहिये' ऐसा कहा। हम प्रतिष्ठाभूत इस लोकमें सामको स्थित करते हैं [अर्थात् यहीं उसकी चरम स्थितिका निश्चय करते हैं]; क्योंकि सामका प्रतिष्ठारूपसे ही स्तवन किया गया है॥ ७ ॥

हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानि यत्प्रतिष्ठं सामेत्युक्तः प्रत्युवाच शालावत्यो विद्धीति होवाच। अमुष्य लोकस्य का गतिरिति पृष्टो दाल्भ्येन शालावत्योऽयं लोक इति होवाच। अयं हि लोको यागदानहोमादिभिरमुं लोकं पुष्यतीति। "अतः प्रदानं देवा उपजीवन्ति"'जिसमें साम प्रतिष्ठित है यह बात मैं श्रीमान्‌से जानना चाहता हूँ' ऐसा कहे जानेपर शालावत्यने उत्तर दिया—'जान लो।' 'उस लोककी गति क्या है?' इस प्रकार दाल्भ्यसे पूछे जानेपर शालावत्यने 'यह लोक' ऐसा कहा; क्योंकि यह लोक ही याग, दान और होमादिके, द्वारा उस लोकका पोषण करता है। इस विषयमें "अतः दानके आश्रयसे देवगण जीवित रहते हैं"
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खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५


इति हि श्रुतयः । प्रत्यक्षं हि सर्वभूतानां धरणी प्रतिष्ठेति । अतः साम्नोऽप्ययं लोकः प्रतिष्ठैवेति युक्तम् ।ऐसी श्रुतियाँ भी हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंकी प्रतिष्ठा पृथिवी है—यह प्रत्यक्ष ही है। अतः सामकी भी यही लोकप्रतिष्ठा है—ऐसा मानना उचित ही है।
अस्य लोकस्य का गतिः ? इत्युक्त आह शालावत्यः । न प्रतिष्ठामिमं लोकमतीत्य नयेत्साम कश्चित् । अतो वयं प्रतिष्ठां लोकं सामाभिसंस्थापयामः । यस्मात्प्रतिष्ठासंस्तावं हि प्रतिष्ठात्वेन संस्तुतं सामेत्यर्थः । "इयं वै रथन्तरम्" इति च श्रुतिः ॥ ७ ॥'इस लोककी गति क्या है?' इस प्रकार पूछे जानेपर शालावत्यने कहा—'किसीको भी प्रतिष्ठाभूत इस लोकका अतिक्रमण करके सामको अन्यत्र नहीं ले जाना चाहिये, अतः हम प्रतिष्ठाभूत इस लोकमें ही सामको सब प्रकारसे स्थापित करते हैं, क्योंकि साम प्रतिष्ठासंस्ताव—प्रतिष्ठारूपसे स्तुत है । "यह [ पृथिवी ] ही रथन्तर साम है" ऐसी श्रुति भी है ॥ ७ ॥

तꣳह प्रवाहणो जैविलिरुवाचान्तवद्वै किल ते शालावत्य साम यस्त्वैतर्हि ब्रूयान्मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति विद्धीति होवाच ॥ ८ ॥

तब उससे जीवलके पुत्र प्रवाहणने कहा—'हे शालावत्य ! निश्चय ही तुम्हारा साम अन्तवान् है । यदि कोई ऐसा कह दिया कि तुम्हारा मस्तक गिर जाय तो तुम्हारा मस्तक गिर जाता।' [शालावत्यने कहा—] 'मैं इसे श्रीमान्‌से जानना चाहता हूँ।' इसपर प्रवाहणने 'जान लो' ऐसा कहा ॥ ८ ॥

११६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

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११६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

तमेवमुक्तवन्तं ह प्रवाहणो जैविलिरुवाचान्तवद्वै किल ते शालावत्य सामत्यादि पूर्ववत् । ततः शालावत्य आह—हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति विद्धीति होवाच ॥ ८ ॥इस प्रकार कहनेवाले उस शालावत्यके प्रति जीवळके पुत्र प्रवाहणने 'हे शालावत्य ! तुम्हारा साम निश्चय ही अन्तवान् है' इत्यादि पूर्ववत् कहा। तब शालावत्यने कहा—'मैं इसे श्रीमान्‌से जानना चाहता हूँ।' तब दूसरे (प्रवाहण) ने कहा—'जान लो' ॥ ८ ॥

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये अष्टमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ८ ॥

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नवम खण्ड

शिलककी उक्ति—आकाश ही सबका आश्रय है

इतरोऽनुज्ञात आह—प्रवाहणकी अनुमति पाकर शिलकने कहा—

अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् ॥ १ ॥

‘इस लोककी क्या गति है ?’ इसपर प्रवाहणने कहा—आकाश, क्योंकि ये समस्त भूत आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं, आकाशमें ही लयको प्राप्त होते हैं और आकाश ही इनसे बड़ा है; अतः आकाश ही इनका आश्रय है ॥ १ ॥

| अस्य लोकस्य का गतिरिति आकाश इति होवाच प्रवाहणः । आकाश इति च पर आत्मा “आकाशो वै नाम” ( छा० उ० ८।१४।१) इति श्रुतेः । तस्य हि कर्म सर्वभूतोत्पादकत्वम् । तस्मिन्नेव हि भूतप्रलयः । “तत्तेजोऽसृजत” (६।२।३), “तेजः परस्यां देवतायाम्” (६।८।६) इति हि वक्ष्यति । | ‘इस लोककी गति क्या है । इसपर प्रवाहणने कहा-‘आकाश’ । यहाँ ‘आकाश’ शब्दसे परमात्मा विवक्षित है । [ भूताकाश नहीं ] जैसा कि “आकाश ही नाम [ और रूपका निर्वाह करनेवाला है ]” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है । सम्पूर्ण भूतोंको उत्पन्न करना यह उसीका कार्य है और उसीमें भूतोंका प्रलय होता है; जैसा कि श्रुति “उसने तेजको रचा” “तेज पर देवतामें लीन होता है” इत्यादि प्रकारसे आगे कहेगी । |

११८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

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११८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि । स्थावरजङ्गमान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते तेजोऽबन्नादिक्रमेण सामर्थ्यात् । आकाशं प्रत्यस्तं यान्ति प्रलयकाले तेनैव विपरीतक्रमेण । हि यस्मादाकाश एवैभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ज्यायान्महत्तरोज्ञतः स सर्वेषां भूतानां परमयनं परायणं प्रतिष्ठा त्रिष्वपि कालेष्वित्यर्थः।१। | “आत्मन आकाशः सम्भूतस्तत्तेजोऽसृजत” इत्यादि श्रुतियोंके बलसे ये सम्पूर्ण चराचर भूत तेज, जल और अन्न इस क्रमसे आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं; और प्रलयकालमें उसी विपरीतक्रमसे आकाशमें ही लीन हो जाते हैं, क्योंकि आकाश ही इन समस्त भूतोंसे बड़ा है। अतः वही समस्त भूतोंका परायण—परम आश्रय अर्थात् तीनों कालोंमें उनकी प्रतिष्ठा है ॥ १ ॥ |

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आकाशसंज्ञक उद्गीथकी उत्कृष्टता और उसकी उपासनाका फल

स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकाञ्जयति य एतदेवं विद्वान्परोवरीयांसमुद्गीथमुपास्ते ॥ २ ॥

वह यह उद्गीथ परम उत्कृष्ट है, यह अनन्त है । जो इसे इस प्रकार जाननेवाला विद्वान् इस परमोत्कृष्ट ( परमात्मभूत ) उद्गीथकी उपासना करता है उसका जीवन परमोत्कृष्ट हो जाता है और वह उत्तरोत्तर उत्कृष्ट लोकोंको अपने अधीन कर लेता है ॥ २ ॥

| यस्मात्परं परं वरीयो वरीयसोऽप्येष वरः परश्च वरीयांश्च परोवरीयानुद्गीथः परमात्मा संपन्न इत्यर्थः । अत एव स एषोऽनन्तोऽविद्यमानान्तः । | क्योंकि उत्तरोत्तर उत्कृष्ट—श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठ अर्थात् पर और उत्कृष्टरूप यह उद्गीथ ही परमात्मभावसे सम्पन्न होता है, इसलिये वह यह उद्गीथ अनन्त—जिसका कोई अन्त नहीं है, ऐसा है । |

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खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ११५

| तमेतं परोवरीयांसं परमात्मभूतमनन्तमेवं विद्वान्परोवरीयांसमुद्गीथमुपास्ते; तस्यैतत्फलमाह—परोवरीयः परं परं वरीयो विशिष्टतरं जीवनं हास्य विदुषो भवति दृष्टं फलमदृष्टं च परोवरीयस उत्तरोत्तरविशिष्टतरानेव ब्रह्माकाशान्ताँल्लोकाञ्जयति य एतदेवं विद्वानुद्गीथमुपास्ते ॥ २ ॥ | उस इस परम उत्कृष्ट परमात्मभूत अनन्त उद्गीथको इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान् इस परमोत्कृष्ट उद्गीथकी उपासना करता है, उसके लिये श्रुति यह फल बतलाती है—जो इसे इस प्रकार जाननेवाला विद्वान् उद्गीथकी उपासना करता है उस विद्वान्को यह दृष्ट फल होता है कि उस विद्वान्का जीवन उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर हो जाता है तथा अदृष्ट फल यह होता है कि वह उत्तरोत्तर ब्रह्माकाशपर्यन्त विशिष्ट लोकोंको जीत लेता है ॥२॥ |

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तꣳहैतमतिधन्वा शौनक उदरशाण्डिल्यायोक्त्वोवाच यावत्त एनं प्रजायामुद्गीथं वेदिष्यन्ते परोवरीयो हैभ्यस्तावदस्मिँल्लोके जीवनं भविष्यति ॥ ३ ॥

शुनकके पुत्र अतिधन्वाने उस इस उद्गीथका उदरशाण्डिल्यके प्रति निरूपण कर उससे कहा—जबतक मेरी संततिमेंसे [ मेरे वंशज ] इस उद्गीथको जानेंगे तबतक इस लोकमें उनका जीवन उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर होता जायगा ॥ ३ ॥

| किं च तमेतमुद्गीथं विद्वानतिधन्वा नामतः शुनकस्यापत्यं शौनक उदरशाण्डिल्याय शि- | तथा इस उद्गीथको जाननेवाले अतिधन्वा नामक शौनकने—शुनकके पुत्रने अपने शिष्य उदरशाण्डिल्यके प्रति इस उद्गीथविद्याका |

१२० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १

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१२० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १

प्यायैतमुद्गीथदर्शनमुक्त्वोवाच । यावत्ते तव प्रजायां प्रजासंततावित्यर्थः। एनमुद्गीथं त्वत्संततिजा वेदिष्यन्ते ज्ञास्यन्ति तावन्तं कालं परोवरीयो हैभ्यः प्रसिद्धेभ्यो लौकिकजीवनेभ्य उत्तरोत्तरविशिष्टतरं जीवनं तेभ्यो भविष्यति ॥ ३ ॥वर्णन करके कहा—'जबतक तेरी प्रजामें अर्थात् तेरी संततिमें तेरे गोत्रज इस उद्गीथको जानेंगे तबतक—उतने समयतक उन्हें इन प्रसिद्ध लौकिक जीवनोंकी अपेक्षा उत्तरोत्तर विशिष्टतर जीवन प्राप्त होगा' ॥ ३ ॥

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तथामुष्मिँल्लोके लोक इति । स य एतदेवं विद्वानुपास्ते परोवरीय एव हास्यास्मिँल्लोके जीवनं भवति तथामुष्मिँल्लोके लोक इति लोके लोक इति ॥ ४ ॥

तथा परलोकमें भी उसे [उत्कृष्टसे उत्कृष्ट] लोककी प्राप्ति होती है। जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष इसकी उपासना करता है, उसका जीवन निश्चय ही इस लोकमें उत्कृष्टतर होता है तथा परलोकमें भी उसे [उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर] लोक प्राप्त होता है—परलोकमें उसे [उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर] लोक प्राप्त होता है ॥ ४ ॥

तथादृष्टेऽपि परलोकेऽमुष्मिन्परोवरीयाँल्लोको भविष्यतीत्युक्तवाञ्शाण्डिल्यायातिधन्वा शौनकः। स्यादेतत्फलं पूर्वेषां महा-'तथा अदृष्ट परलोकमें भी उसे उत्तरोत्तर उत्कृष्ट लोककी ही प्राप्ति होगी'—ऐसा शौनकपुत्र अतिधन्वा-ने शाण्डिल्यके प्रति कहा। 'यह फल पूर्वकालिक परम भाग्यशाली
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खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ १२१


भाग्यानां नैदंयुगीनानामित्या-पुरुषोंको प्राप्त होता होगा, वर्तमान युगके पुरुषोंको नहीं हो सकता'
शङ्कानिवृत्तय आह—स यःऐसी आशङ्काकी निवृत्तिके लिये श्रुति कहती है—'इस समय भी इसे
कश्चिदेतदेवं विद्वानुद्गीथमेतर्ह्युपा-इस प्रकार जाननेवाला जो कोई पुरुष उद्गीथकी उपासना करता है
स्ते तस्याप्येवमेव परोवरीय एवउसका भी इस लोकमें उसी प्रकार उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर ही जीवन
हास्यास्मिंल्लोके जीवनं भवतिहोता है तथा परलोकमें भी उसे उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर लोककी ही
तथामुष्मिंल्लोके लोक इति लोकेप्राप्ति होती है ॥ ४ ॥
लोक इति ॥ ४ ॥

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये नवमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥

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दशम खण्ड


उषस्तिका आख्यान

उद्गीथोपासनप्रसङ्गेन प्रस्तावप्रतिहारविषयमप्युपासनं वक्तव्यमितीदमारभ्यते। आख्यायिका तु सुखावबोधार्था।उद्गीथोपासनाके प्रसङ्गसे यहाँ प्रस्ताव एवं प्रतिहारविषयक उपासना भी बतलायी जानी चाहिये, इसीलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है। यहाँ जो आख्यायिका है, वह सरलतासे समझनेके लिये है—

मटचीहतेषु कुरुष्वाटिक्या सह जाययोषस्तिर्ह चाक्रायण इभ्यग्रामे प्रद्राणक उवास ॥ १ ॥

ओले और पत्थर पड़नेसे कुरुदेशके खेतीके चौपट हो जानेपर वहाँ इभ्य ग्रामके भीतर 'आटिकी' (जिसके स्तनादि स्त्रीजनोचित चिह्न प्रकट नहीं हुए हैं ऐसी अल्पवयस्का) पत्नीके साथ चक्रका पुत्र उषस्ति दुर्गतिकी अवस्थामें रहता था ॥ १ ॥

मटचीहतेषु मटच्योऽशनयस्ताभिर्हतेषु नाशितेषु कुरुषु कुरुसस्येष्वित्यर्थः। ततो दुर्भिक्षे जात आटिक्यानुपजातपयोधरादिस्त्रीव्यञ्जनया सह जाययोषस्तिर्ह नामतश्चक्रस्यापत्यं चाक्रायणः। इभो हस्ती तमर्हतीतीभ्य[कुरुओंके] मटचीहत होनेपर— मटची ओले और पत्थरको कहते हैं, उनसे कुरुदेशके अर्थात् कुरुदेशकी खेतीके हत-नष्ट हो जाने तथा उसके कारण दुर्भिक्ष हो जानेपर आटिकी यानी जिसके स्तनादि स्त्रीजनोचित चिह्न प्रकट नहीं हुए हैं ऐसी स्त्रीके साथ उषस्तिनामक चाक्रायण—चक्रका पुत्र इभ्य ग्राममें—इभ हाथीको
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खण्ड १० ]शाङ्करभाष्यार्थ१२३

| ईश्वरो हस्त्यारोहो वा, तस्य ग्राम इभ्यग्रामस्तस्मिन्प्रद्राणकोऽन्नालाभात् । द्रा कुत्सायां गतौ । कुत्सितां गतिं गतोऽन्त्यावस्थां प्राप्त इत्यर्थः । उवासोषितवान् कस्यचिद्गृहमाश्रित्य ॥ १ ॥ | कहते हैं, उसकी पात्रता रखनेवाला व्यक्ति इभ्य—धनी या हाथीवान—कहलाता है, उसके ग्रामको इभ्यग्राम कहते हैं, उसमें अन्न प्राप्त न होनेके कारण प्रद्राणक हो—'द्रा' धातुका प्रयोग कुत्सित गतिके अर्थमें होता है, अतः कुत्सित गति यानी दुरवस्थाको प्राप्त हो किसीके घरका आश्रय लेकर निवास करता था॥१॥ |


स हेभ्यं कुल्माषान्खादन्तं बिभिक्षे तꣳहोवाच ।<br>नेतोऽन्ये विद्यन्ते यच्च ये म इम उपनिहिता इति ॥२॥

उसने घुने हुए उड़द खानेवाले एक महावतसे याचना की। तब उसने उससे कहा—इन जूठे उड़दोंके सिवा मेरे पास और नहीं हैं। जो कुछ एकत्र थे वे सब-के-सब ये मैंने [ अपने भोजनपात्रमें ] रख लिये हैं [ अतः मैं किस प्रकार आपकी याचना पूर्ण करूँ ? ] ॥ २ ॥

| सोऽन्नार्थमटन्निभ्यं कुल्माषान्कुत्सितान्माषान्खादन्तं भक्षयन्तं यदृच्छयोपलभ्य बिभिक्षे याचितवान् । तमुषस्तिं होवाचेभ्यः । नेतोऽस्मान्मया भक्ष्यमाणादुच्छिष्टराशेः कुल्माषा अन्ये न विद्यन्ते । यच्च ये राशौ मे ममोपनिहिताः प्रक्षिप्ता इमे भाजने किं करोमि ? ॥ २ ॥ | अन्नके लिये घूमते-घूमते उसने अकस्मात् एक हाथीवानको घुने उड़द खाते देख उसने याचना की। उस उषस्तिसे हाथीवानने कहा—मेरेद्वारा खाये जाते हुए इन जूठे उड़दोंके समूहके सिवा मेरे पास और उड़द नहीं हैं। जो एकत्रित थे वे सभी मेरे इस पात्रमें गिरा लिये गये हैं, अब मैं क्या करूँ ? ॥ २ ॥ |

१२४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

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१२४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

इत्युक्तः प्रत्युवाचोषस्तिः—ऐसा कहे जानेपर उषस्तिने उत्तर दिया—

एतेषां मे देहीति होवाच तानस्मै प्रददौ हन्तानुपानमित्युच्छिष्टं वै मे पीतँस्यादिति होवाच ॥३॥

तू मुझे इन्हें ही दे दे—ऐसा उषस्तिने कहा। तब महावतने वे उड़द उसे दे दिये और कहा 'यह अनुपान भी लो।' इसपर वह बोला—'इसे लेनेसे मेरेद्वारा निश्चय ही उच्छिष्ट जल पीया जायगा' ॥३॥

एतेषामेतानित्यर्थः, मे मह्यं देहीति होवाच। तान्स इभ्योऽस्मा उषस्तये प्रददौ प्रदत्तवान्। अनुपानाय समीपस्थमुदकं हन्त गृहाणानुपानमित्युक्तः प्रत्युवाच-उच्छिष्टं वै मे ममेदमुदकं पीतं स्याद्यदि पास्यामि ॥ ३ ॥'एतेषाम्' इस षष्ठ्यन्त पदका अर्थ 'एतान्' (इन्हें) है। अर्थात् 'तू मुझे इन उड़दोंको ही दे' ऐसा उषस्तिने कहा। तब उस महावतने उषस्तिको वे उड़द दे दिये तथा पीनेके लिये पास रखे हुए जलको लेकर बोला—'भाई ! अनुपान भी ले लो।' ऐसा कहे जानेपर उषस्तिने कहा—'यदि मैं इस जलको पीऊँगा तो निश्चय ही मेरेद्वारा यह उच्छिष्ट जल पिया जायगा [अर्थात् मुझे उच्छिष्ट जल पीनेका दोष प्राप्त होगा] ॥ ३ ॥

-: ० :-

इत्युक्तवन्तं प्रत्युवाचेतरः—इस प्रकार कहनेवाले उस उषस्तिसे दूसरे (महावत) ने कहा—

न स्विदेतेऽप्युच्छिष्टा इति न वा अजीविष्यमिमानखादन्निति होवाच कामो म उदकपानमिति ॥४॥

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खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५


‘क्या ये (उड़द) भी उच्छिष्ट नहीं हैं?’ उसने कहा—‘इन्हें बिना खाये तो मैं जीवित नहीं रह सकता था, जलपान तो मुझे यथेच्छ मात्रामें मिलता है’॥ ४ ॥

| किं न स्विदेते कुल्माषा अप्युच्छिष्टा इत्युक्त आहोपस्तिर्न वा अजीविष्यं न जीविष्यामीमान्कुल्माषानखादन्नभक्षयन्निति होवाच। काम इच्छातः मे ममोदकपानं लभ्यत इत्यर्थः। <br><br> अतश्चैतामवस्थां प्राप्तस्य विद्याधर्मयशोवतः स्वात्मपरोपकारसमर्थस्यैतदपि कर्म कुर्वतो नागःस्पर्श इत्यभिप्रायः। तस्यापि <br><br> जीवितं प्रत्युपायान्तरेऽजुगुप्सिते सति जुगुप्सितमेतत्कर्म दोषाय। ज्ञानावलेपेन कुर्वतो नरकपातः स्यादेवेत्यभिप्रायः, प्रद्राणकशब्दश्रवणात् ॥ ४ ॥ | ‘क्या ये उड़द भी उच्छिष्ट नहीं हैं?’ ऐसा कहे जानेपर उषस्तिने कहा—‘इन उड़दोंको बिना खाये-बिना भक्षण किये तो मैं जीवित नहीं रह सकता था। जलपान तो मुझे इच्छानुसार मिल जाता है।’ <br><br> अतः इसका यह अभिप्राय है कि इस अवस्थाको प्राप्त हुए, विद्या, धर्म और यशसे सम्पन्न तथा अपने और दूसरोंके उपकारमें समर्थ पुरुषको ऐसा कर्म करते हुए भी पापका स्पर्श नहीं हो सकता। उसके भी जीवनका यदि कोई अन्य अनिन्द्य उपाय हो तो यह निन्दनीय कर्म दोषके ही लिये होगा। ज्ञानाभिमानवश ऐसा कर्म करनेवाले पुरुषका भी नरकमें पतन होगा ही—यह इसका अभिप्राय है; क्योंकि श्रुतिमें ‘प्रद्राणक’ शब्दका प्रयोग है*॥४॥ |


* चाक्रायणने ‘प्रद्राणक’ अर्थात् अत्यन्त आपद्ग्रस्त होनेपर ही उच्छिष्ट भोजन किया था—इससे यह सिद्ध होता है कि विधिका व्यतिक्रम जीवनरक्षाका कोई वैध साधन न रहनेपर ही किया जा सकता है अन्यथा कदापि नहीं।

१२६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

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१२६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

स ह खादित्वातिशेषाञ्जायाया आजहार साग्र एव सुभिक्षा बभूव तान्प्रतिगृह्य निदधौ ॥ ५ ॥

उन्हें खाकर वह बचे हुए उड़दोंको अपनी पत्नीके लिये ले आया। वह पहले ही खूब भिक्षा प्राप्त कर चुकी थी। अतः उसने उन्हें लेकर रख दिया ॥ ५ ॥

| तांश्च स खादित्वातिशेषानतिशिष्टान्जायायै कारुण्यादाजहार। साटिक्यग्र एव कुल्माषप्राप्तेः सुभिक्षा शोभनभिक्षा लब्धाभेत्येतद्बभूव संवृत्ता। तथापि स्त्रीस्वाभाव्यादनवज्ञाय तान्कुल्माषान्पत्युर्हस्तात्प्रतिगृह्य निदधौ निक्षिप्तवती ॥ ५ ॥ | उन्हें खाकर वह बचे हुए उड़दोंको करुणावश अपनी भार्याके लिये ले आया। वह आटिकी उड़दोंके मिलनेसे पूर्व ही सुभिक्षा—शोभनभिक्षा हो चुकी थी अर्थात् अन्न प्राप्त कर चुकी थी। तथापि स्त्रीस्वभाववश, [पतिके दिये हुए] उन उड़दोंकी अवहेलना न करके उन्हें पतिके हाथसे लेकर रख दिया ॥ ५ ॥ |

स ह प्रातः संजिहान उवाच यद्बतान्नस्य लभेमहि लभेमहि धनमात्राँराजासौ यक्ष्यते स मा सर्वैरात्विज्यैर्वृणीतेति ॥ ६ ॥

उसने प्रातःकाल शय्यात्याग करनेके अनन्तर कहा—यदि हमें कुछ अन्न मिल जाता तो हम कुछ धन प्राप्त कर लेते, क्योंकि वह राजा यज्ञ करनेवाला है, वह समस्त ऋत्विक्कर्मोंके लिये मेरा वरण कर लेगा ॥ ६ ॥

| स तस्याः कर्म जानन्प्रातरुषःकाले संजिहानः शयनं निद्रां | वह अपनी पत्नीके उस कार्यको कि इसने उड़द बचा रखे हैं, जानता था, अतः प्रातःसमय—उषःकालमें शय्या अथवा निद्राका त्याग करनेके अनन्तर उस |

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खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ १२७

| वा परित्यजन्नुवाच पत्न्याः शृण्वन्त्याः, यद्यदि बतेतिखिद्यमानोऽन्नस्य स्तोकं लभेमहि तद्भुङ्क्तवान्नं समर्थो गत्वा लभेमहि धनमात्रां धनस्याल्पम्। ततोऽस्माकं जीवनं भविष्यतीति।<br><br>धनलाभे च कारणमाह—<br>राजासौ नातिदूरे स्थाने यक्ष्यते। यजमानत्वात्तस्यात्मनेपदम्। स च राजा मा मां पात्रमुपलभ्य सर्वैरात्विज्यैर्ऋत्विकर्मभिर्ऋत्विकर्मप्रयोजनायेत्यर्थो वृणीतेति ॥ ६ ॥ | अपनी पत्नीके सुनते हुए कहा—'यदि [ भूखसे ] खिन्न होते हुए हमें थोड़ा-सा अन्न मिल जाता—यहाँ 'बत' अव्ययका तात्पर्य है 'खिन्न होते हुए'—तो उस अन्नको खाकर सामर्थ्यवान् हो [ कुछ दूर ] जाकर हम धनकी मात्रा अर्थात् थोड़ा-सा धन प्राप्त कर लेते और उससे हमारा जीवन-निर्वाह हो जाता ।<br><br>धनलाभमें कारण बतलाता है—यहाँसे थोड़ी ही दूरपर वह राजा यज्ञ करेगा । यजमान होनेके कारण उसके लिये 'यक्ष्यते' ऐसा आत्मनेपदका प्रयोग किया गया है*। वह राजा मुझे सुपात्र समझकर समस्त आर्त्विज्यों —ऋत्विक्कर्मोंके लिये अर्थात् ऋत्विक्कर्मोंको करानेके प्रयोजनसे वरण कर लेगा ॥ ६ ॥ |

—:००:—

तं जायोवाच हन्त पत इम एव कुल्माषा इति तान्खादित्वामुं यज्ञं विततमेयाय ॥ ७ ॥

उससे उसकी पत्नीने कहा—'स्वामिन् ! [ आपके दिये हुए ] वे उड़द ही ये मौजूद हैं; [इन्हें लीजिये ] ।' उषस्ति उन्हें खाकर ऋत्विजोंद्वारा विस्तारपूर्वक किये जानेवाले उस यज्ञमें गया ॥ ७ ॥


* क्योंकि यजनरूप क्रियाका फल उस राजाको ही प्राप्त होनेवाला था ।

१२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १

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१२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १

| एवमुक्तवन्तं जायोवाच— हन्त गृहाण हे पत इम एव ये मद्धस्ते विनिश्क्षिप्तास्त्वया कुल्माषा इति। तान्खादित्वामुं यज्ञं राज्ञो विततं विस्तारितमृत्विग्भिरेयाय ॥ ७ ॥ | इस प्रकार कहते हुए उषस्तिसे उसकी पत्नीने कहा—'हे स्वामिन्! आप इन उड़दोंको ही लीजिये जिन्हें आपने मेरे हाथमें दिया था। उषस्ति उन्हें खाकर राजाके उस वितत-ऋत्विजोंद्वारा विस्तारपूर्वक सम्पादित होनेवाले यज्ञमें गया ॥ ७ ॥ |


राजयज्ञमें उषस्ति और ऋत्विजोंका संवाद

तत्रोद्गातॄनास्तावे स्तोष्यमाणानुपोपविवेश स ह प्रस्तोतारमुवाच ॥ ८ ॥

वहाँ [जाकर वह] आस्ताव (स्तुति) के स्थानमें स्तुति करते हुए उद्गाताओंके समीप बैठ गया और उसने प्रस्तोतासे कहा—॥ ८ ॥

| तत्र च गत्वोद्गातॄनुद्गातृपुरुषानागत्य स्तुवन्त्यस्मिन्नित्यास्तावस्तस्मिन्नास्तावे स्तोष्यमाणानुपोपविवेश समीप उपविष्टस्तेषामित्यर्थः। उपविश्य स ह प्रस्तोतारमुवाच ॥ ८ ॥ | और वहाँ जाकर वह उद्गाता लोगोंके पास आ आस्तावमें—जिस स्थानमें (प्रस्तोतागण) स्तुति करते हैं, उसे आस्ताव कहते हैं, उसमें—स्तुति करते हुए उद्गाताओंके समीप बैठ गया। तथा वहाँ बैठकर उसने प्रस्तोतासे कहा—॥ ८ ॥ |


प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ॥ ९ ॥

हे प्रस्तोतः! जो देवता प्रस्ताव-भक्तिमें अनुगत है यदि तू उसे बिना जाने प्रस्तवन करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा ॥ ९ ॥

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खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ १२९


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
हे प्रस्तोतरित्यामन्त्र्याभिमुखीकरणाय । या देवता प्रस्तावं प्रस्तावभक्तिमनुगतान्वायत्ता तां चेद्देवतां प्रस्तावभक्तेरविद्वान्सन् प्रस्तोष्यसि विदुषो मम समीपे ।‘हे प्रस्तोतः !’—इस प्रकार अपनी ओर लक्ष्य करानेके लिये सम्बोधन करते हुए [वह बोला—] ‘जो देवता प्रस्तावमें—प्रस्तावभक्तिमें अन्वायत्त यानी अनुगत है, यदि उस प्रस्तावभक्तिके देवताको बिना जाने ही तू उसका, उसे जाननेवाले मेरे समीप, प्रस्तवन करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा ।’
तत्परोक्षेऽपि चेद्विपतेत्तस्य मूर्धा कर्ममात्रविदामनधिकार एव कर्मणि स्यात् । तच्चानिष्टम्, अविदुषामपि कर्मदर्शनात्, दक्षिणमार्गश्रुतेश्च । अनधिकारे चाविदुषामुत्तर एवैको मार्गः श्रूयेत । न च स्मार्तकर्मनिमित्त एव दक्षिणः पन्थाः, “यज्ञेन दानेन” इत्यादिश्रुतेः । 'तथोक्तस्य मया' इति च विशेषणाद्विद्वत्समक्षमेव कर्मण्यनधिकारो न सर्वत्राग्नि-यदि यह माना जाय कि देवतां-ज्ञानियोंके परोक्षमें भी मस्तक गिर जायगा तो केवल कर्मका ही ज्ञान रखनेवालोंका कर्ममें अनधिकार ही सिद्ध होगा । और यह बात माननीय नहीं है, क्योंकि कर्म तो अविद्वानोंको भी करते देखा जाता है और दक्षिणमार्गका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है । और यदि उनका अधिकार न होता तो श्रुतिमें एकमात्र उत्तरमार्गका ही प्रतिपादन किया होता, क्योंकि दक्षिण मार्ग केवल स्मार्त कर्मके ही कारण प्राप्त होनेवाला नहीं है, जैसा कि “यज्ञसे दानसे” इत्यादि श्रुतिसे भी सिद्ध होता है । तथा ‘मेरेद्वारा इस प्रकार कहे हुए’ इस वाक्यद्वारा विशेषरूपसे निरूपण किये जानेके कारण भी विद्वान्के सामने ही उसे कर्मका अधिकार नहीं है । अग्निहोत्र

१३० | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय १

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१३०छान्दोग्योपनिषद्[अध्याय १

| होत्रस्मार्तकर्ममध्ययनादिषु च, अनुज्ञायास्तत्र तत्र दर्शनात् । कर्ममात्रविदामप्यधिकारः सिद्धः कर्मणीति । मूर्धा ते विपतिष्यतीति ॥ ९ ॥ | स्मार्त्त कर्म और अध्ययनादि समस्त कर्मोंमें ऐसा नियम नहीं है, क्योंकि जहाँ-तहाँ [ अविद्वान्‌के लिये भी ] कर्मानुष्ठानकी आज्ञा देखी जाती है। अतः यह सिद्ध हुआ कि केवल कर्ममात्रका ज्ञान करनेवालोंका भी कर्ममें अधिकार है ॥ ९ ॥ |

—: o :—

एवमेवोद्गातारमुवाचोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ॥ १० ॥ एवमेव प्रतिहर्तारमुवाच प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ते ह समारतास्तूष्णीमासांचक्रिरे ॥११॥

इसी प्रकार उसने उद्गातासे भी कहा—'हे उद्गातः ! जो देवता उद्गीथमें अनुगत है यदि तू उसे बिना जाने उद्गान करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा' ॥ १० ॥ इसी प्रकार प्रतिहर्तासे भी कहा—'हे प्रतिहर्तः ! जो देवता प्रतिहारमें अनुगत है यदि तू उसे बिना जाने प्रतिहरण करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा।' तब वे प्रस्तोता आदि अपने-अपने कर्मोंसे उपरत हो मौन होकर बैठ गये ॥ ११ ॥

| एवमेवोद्गातारं प्रतिहर्तारमुवाचेत्यादि समानमन्यत् । ते प्रस्तोत्रादयः कर्मभ्यः समारता उपरताः सन्तो मूर्धपातभयात्तूष्णीमासांचक्रिरेऽन्यच्चाकुर्वन्तः, अर्थित्वात् ॥ १०-११ ॥ | इसी प्रकार उद्गातासे तथा प्रतिहर्तासे कहा—इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् है। तब वे प्रस्तोता आदि कर्मसे समारत अर्थात् उपरत हो मस्तक गिर जानेके भयसे चुप होकर बैठ गये और अर्थी होनेके कारण उन्होंने कुछ और नहीं किया ॥ १०-११ ॥ |

-: * :--

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये दशमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १० ॥

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एकादश खण्ड

—: ० :—

राजा और उषस्तिका संवाद

अथ हैनँ यजमान उवाच भगवन्तं वा अहं विविदिषाणीत्युषस्तिरस्मि चाक्रायण इति होवाच ॥ १ ॥

तब उससे यजमानने कहा—'मैं आप पूज्य-चरणको जानना चाहता हूँ।' इसपर उसने कहा—'मैं चक्रका पुत्र उषस्ति हूँ' ॥ १ ॥

| अथानन्तरं हैनमुषस्तिं यजमानो राजोवाच । भगवन्तं वै पूजावन्तमहं विविदिषाणि वेदितुमिच्छामीत्युक्त उषस्तिरस्मि चाक्रायणस्तवापि श्रोत्रपथमागतो यदीति होवाचोक्तवान् ॥ १ ॥ | तदनन्तर उस उषस्तिसे यजमान राजाने कहा—'मैं भगवान्‌को—पूजनीयको जानना चाहता हूँ।' ऐसा कहे जानेपर उसने कहा—'यदि तुमने सुना हो तो मैं चक्रका पुत्र उषस्ति हूँ' ॥ १ ॥ |

—: ❀ :—

स होवाच भगवन्तं वा अहमेभिः सर्वैरात्विज्यैः पर्यैषिषं भगवतो वा अहमवित्त्यान्यानवृषि ॥ २ ॥

मैंने इन समस्त ऋत्विक्कर्मोंके लिये श्रीमान्‌को खोजा था। श्रीमान्‌के न मिलनेसे ही मैंने दूसरे ऋत्विजोंका वरण किया था ॥ २ ॥

| स ह यजमान उवाच—सत्यमेवमहं भगवन्तं बहुगुणमश्रौषं सर्वैश्च ऋत्विक्कर्मभिरात्विज्यैः पर्यैषिषं पर्येषणं कृतवानस्मि । | उस यजमानने कहा—'यह ठीक ही है, मैंने श्रीमान्‌को बहुत गुणवान् सुना है। मैंने सम्पूर्ण ऋत्विक्कर्मोंके लिये आपकी खोज |

छा० उ० ५—