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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 130 of 978

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Page 130
१२६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

स ह खादित्वातिशेषाञ्जायाया आजहार साग्र एव सुभिक्षा बभूव तान्प्रतिगृह्य निदधौ ॥ ५ ॥

उन्हें खाकर वह बचे हुए उड़दोंको अपनी पत्नीके लिये ले आया। वह पहले ही खूब भिक्षा प्राप्त कर चुकी थी। अतः उसने उन्हें लेकर रख दिया ॥ ५ ॥

| तांश्च स खादित्वातिशेषानतिशिष्टान्जायायै कारुण्यादाजहार। साटिक्यग्र एव कुल्माषप्राप्तेः सुभिक्षा शोभनभिक्षा लब्धाभेत्येतद्बभूव संवृत्ता। तथापि स्त्रीस्वाभाव्यादनवज्ञाय तान्कुल्माषान्पत्युर्हस्तात्प्रतिगृह्य निदधौ निक्षिप्तवती ॥ ५ ॥ | उन्हें खाकर वह बचे हुए उड़दोंको करुणावश अपनी भार्याके लिये ले आया। वह आटिकी उड़दोंके मिलनेसे पूर्व ही सुभिक्षा—शोभनभिक्षा हो चुकी थी अर्थात् अन्न प्राप्त कर चुकी थी। तथापि स्त्रीस्वभाववश, [पतिके दिये हुए] उन उड़दोंकी अवहेलना न करके उन्हें पतिके हाथसे लेकर रख दिया ॥ ५ ॥ |

स ह प्रातः संजिहान उवाच यद्बतान्नस्य लभेमहि लभेमहि धनमात्राँराजासौ यक्ष्यते स मा सर्वैरात्विज्यैर्वृणीतेति ॥ ६ ॥

उसने प्रातःकाल शय्यात्याग करनेके अनन्तर कहा—यदि हमें कुछ अन्न मिल जाता तो हम कुछ धन प्राप्त कर लेते, क्योंकि वह राजा यज्ञ करनेवाला है, वह समस्त ऋत्विक्कर्मोंके लिये मेरा वरण कर लेगा ॥ ६ ॥

| स तस्याः कर्म जानन्प्रातरुषःकाले संजिहानः शयनं निद्रां | वह अपनी पत्नीके उस कार्यको कि इसने उड़द बचा रखे हैं, जानता था, अतः प्रातःसमय—उषःकालमें शय्या अथवा निद्राका त्याग करनेके अनन्तर उस |