ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ५-८ ] अध्याय ४ ,३६५
सूत्र ५-८ ] अध्याय ४ ,३६५
पास पहुँचा देता है, इस प्रकार श्रुतिमे स्पष्ट कहा जानेके कारण यही सिद्ध
होता है कि विद्युत्-लोकसे आगे ब्रह्मलोकतक वही विद्युत्-लोकमें प्रकट अमानव पुरुष
उनको पहुँचाता है, बीचके लोकोंके जो अभिमानी देवता हैं, उनका इतना ही
काम है कि वे अपने लोकोमे होकर जानेके लिये उनको मार्ग दे दे और अन्य
आवश्यक सहयोग करें।
सम्बन्ध- ब्रह्मविद्याका उपासक अधिकारी विद्वान् वहाँ ब्रह्मलोकमे जिनको
प्राप्त होता है, वह परब्रह्म है या सबसे पहले उत्पन्न होनेवाला ब्रह्मा ? इसका
निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है, यहाँ पहले बादरि
आचार्यकी ओरसे सातवें सूत्रसे ग्यारहवें सूत्रतक पूर्वपक्षकी स्थापना की जाती है—
कार्यं बादरिरस्य गत्युपपत्तेः ॥ ४ । ३ । ७ ॥
बादरिः=आचार्य बादरिका मत है कि; कार्यम्=कार्यब्रह्मको, अर्थात्
हिरण्यगर्भको (प्राप्त होते हैं); गत्युपपत्तेः=क्योंकि गमन करनेके कथनकी
उपपत्ति; अस्य=इस कार्यब्रह्मके लिये ही (हो सकती है)।
व्याख्या-श्रुतिमें जो लोकान्तरमे गमनका कथन है, वह परब्रह्म परमात्माकी
प्राप्तिके लिये उचित नहीं है; क्योंकि परब्रह्म परमात्मा तो सभी जगह है, उनको
पानेके लिये लोकान्तरमें जानेकी क्या आवश्यकता है, अतः यही सिद्ध होता है
कि इन ब्रह्मविद्याकी उपासना करनेवालोंके लिये जो प्राप्त होनेवाला ब्रह्म है, वह
परब्रह्म नहीं; किन्तु कार्यब्रह्म ही है; क्योंकि इस कार्यब्रह्मकी प्राप्तिके लिये
लोकान्तरमें जाकर उसे प्राप्त करनेका कथन सर्वथा युक्तिसंगत है।
सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे अपने पक्षको दृढ करते हैं—
विशेषितत्वाच्च ॥ ४ । ३ । ८ ॥
च=तथा; विशेषितत्वात्=विशेषण देकर स्पष्ट कहा गया है, इसलिये भी
(कार्यब्रह्मकी प्राप्ति मानना ही उचित है)।
व्याख्या-'मानस पुरुष इनको ब्रह्मलोकोमे ले जाता है' (बृह०उ० ६।२।१५)
इस श्रुतिमें ब्रह्मलोकमे बहुवचनका प्रयोग किया गया है तथा ब्रह्मलोकोंमें ले जाने-
की बात कही गयी है, ब्रह्मको प्राप्त होनेकी बात नहीं कही गयी, इस प्रकार
विशेषरूपमे स्पष्ट कहा जानेके कारण भी यही सिद्ध होता है कि कार्यब्रह्मको
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ही प्राप्त होता है, क्योंकि वह लोकोंका स्वामी है; अतः भोग्यभूमि अनेक होनेके
कारण लोकोंके साथ बहुवचनका प्रयोग उचित ही है ।
सम्बन्ध—दूसरी श्रुतिमें जो यह कहा है कि वह अमानव पुरुष इनको
ब्रह्मके समीप ले जाता है, वह कथन कार्यब्रह्म माननेसे उपयुक्त नहीं होता;
क्योंकि श्रुतिका उद्देश्य यदि कार्यब्रह्मकी प्राप्ति बताना होता तो ब्रह्मके समीप
पहुँचा देता है, ऐसा कथन होना चाहिये था ! इसपर कहते हैं—
सामीप्यात्तु तद्व्यपदेशः ॥ ४ । ३ । ९ ॥
तद्व्यपदेशः = वह कथन; तु = तो; सामीप्यात् = ब्रह्मकी समीपताके कारण
ब्रह्मके लिये हो सकता है ।
व्याख्या—'जो सबसे पहले ब्रह्माको रचता है; तथा जो उसको समस्त
वेदोंका ज्ञान प्रदान करता है, परमात्म-ज्ञानविषयक बुद्धिको प्रकट करनेवाले
उस प्रसिद्ध परमदेव परमेश्वरकी मैं मुमुक्षु साधक शरण ग्रहण करता
हूँ ।'* (श्वेता० उ० ६ । १८) इस श्रुतिकथनके अनुसार ब्रह्मा उस परब्रह्मका
पहला कार्य होनेके कारण ब्रह्माको 'ब्रह्म' कहा गया है, ऐसा मानना
युक्तिसंगत हो सकता है ।
सम्बन्ध—गीतामें कहा है कि ब्रह्माके लोकतक सभी लोक पुनरावृत्तिशील हैं
(गीता ८ । १६)। इस प्रसङ्गमें ब्रह्माकी आयु पूर्ण हो जानेपर वहाँ जानेवालों-
का वापस लौटना अनिवार्य है और श्रुतिमें देवयानमार्गसे जानेवालोंका वापस
न लौटना स्पष्ट कहा है; इसलिये कार्यब्रह्मकी प्राप्ति न मानकर परब्रह्मकी प्राप्ति
मानना ही उचित मालूम होता है, इसपर पूर्वपक्षकी ओरसे कहा जाता है—
कार्यात्यये तदध्यक्षेण सहातः परमभिधानात् ॥ ४ । ३ । १० ॥
कार्यात्यये = कार्यरूप ब्रह्मलोकका नाश होनेपर; तदध्यक्षेण = उसके स्वामी
ब्रह्माके; सह = सहित; अतः = इससे; परम् = श्रेष्ठ परब्रह्म परमात्माको; अभिधानात् =
प्राप्त होनेका कथन है, इसलिये ( पुनरावृत्ति नहीं होगी ) ।
व्याख्या—'जिन्होंने उपनिषदोंके विज्ञानद्वारा उनके अर्थभूत परमात्माका
भलीभाँति निश्चय कर लिया है तथा कर्मफल और आसक्तिके त्यागरूप योगसे,
- यह मन्त्र पृष्ठ ६६ मे अर्थसहित आ गया है ।