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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र ५-७ ] अध्याय २ १३३

सूत्र ५-७ ] अध्याय २ १३३
मान्यताके अनुसार पुरुष असङ्ग, चैतन्यमात्र, निष्क्रिय, निर्विकार, उदासीन,
निर्मल तथा नित्यशुद्ध बुद्ध मुक्तस्वभाव है; उसके लिये प्रकृतिदर्शनरूप भोग तथा
उससे विमुक्त होनारूप अपवर्ग दोनोंकी ही आवश्यकता नहीं है। इसलिये उनका
माना हुआ प्रयोजन व्यर्थ ही है। अतः प्रधानकी लोकरचनाके कार्यमें
स्वाभाविक प्रवृत्ति मानना निरर्थक है।
सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे सांख्यमतकी मान्यतामें दोष दिखाते हैं-
पुरुषाश्मवदिति चेत्तथापि ॥ २ । २ । ७ ॥
चेत् इति=यदि ऐसा कहो कि; पुरुषाश्मवत्=अंधे और पंगु पुरुषो तथा
लोह और चुम्बकके संयोगकी भाँति (प्रकृति-पुरुषकी समीपता ही प्रकृतिको
सृष्टिरचनामें प्रवृत्त कर देती है); तथापि=तो ऐसा माननेपर भी (सांख्यसिद्धान्त-
की सिद्धि नहीं होती)।
व्याख्या-'जैसे पंगु और अंधे परस्पर मिल जायें और अंधेके कंधेपर
बैठकर पंगु उसे राह बताया करे तो दोनों गन्तव्य स्थानपर पहुँच जाते हैं तथा
लोहे और चुम्बकका संयोग होनेपर लोहेमें क्रियाशक्ति आ जाती है उसी प्रकार
पुरुष और प्रकृतिका संयोग ही सृष्टिरचनाका कारण है।* पुरुषकी समीपतामात्रसे
जड प्रकृति जगत्की उत्पत्ति आदिके कार्यमें प्रवृत्त हो जाती है।' सांख्यवादियोंकी
कही हुई यह बात मान ली जाय तो भी इससे सांख्यसिद्धान्तकी पुष्टि नहीं होती;
क्योंकि पंगु और अंधे दोनों चेतन हैं, एक गमनशक्तिसे रहित होनेपर भी बौद्धिक आदि
अन्य शक्तियोंसे सम्पन्न है; अंधा पुरुष देखनेकी शक्तिसे हीन होनेपर भी गमन एवं बुद्धि
आदिकी शक्तिसे युक्त है। एक प्रेरणा देता है तो दूसरा उसे समझकर उसके अनुसार
चलता है। अतः वहाँ भी चेतनका सहयोग स्पष्ट ही है। इसी प्रकार चुम्बक
और लोहेको एक दूसरेके समीप लानेके लिये एक तीसरे चेतन पुरुषकी
आवश्यकता होती है। चेतनके सहयोग बिना न तो लोहा चुम्बकके समीप
जायगा और न उसमे क्रियाशक्ति उत्पन्न होगी। समीपता प्राप्त होनेपर भी दोनो
एक-दूसरेसे सट जायेंगे, लोहेमें किसी प्रकारकी आवश्यक क्रियाका संचार
नहीं होगा, अतः ये दोनो दृष्टान्त इसी बातकी पुष्टि करते हैं कि चेतनकी प्रेरणा

  • पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतः सर्गः ॥
    (सा० कारिका० २१)

१३४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
होनेसे ही जड प्रधान सृष्टि-कार्यमे प्रवृत्त हो सकता है, अन्यथा नहीं; परन्तु
सांख्यमतमें तो पुरुष असङ्ग और उदासीन माना गया है, अतः वह प्रेरक हो
नहीं सकता। इसलिये केवल जड प्रकृतिके द्वारा जगत्की उत्पत्ति किसी प्रकार
भी सिद्ध नहीं हो सकती।
सम्बन्ध—अब प्रधानकारणवादके विरोधमे दूसरी युक्ति देते हैं—
अङ्गित्वानुपपत्तेश्च ॥ २ । २ । ८ ॥
अङ्गित्वानुपपत्तेः=अङ्गाङ्गिभाव ( सत्त्वादि गुणोंके उत्कर्ष और अपकर्ष )
की सिद्धि न होनेके कारण; च=भी ( केवल प्रधान इस जगत्का कारण नहीं
माना जा सकता ) ।
व्याख्या—पहले यह बताया गया है, सांख्यमतमे तीनो गुणोंकी साम्यावस्थाका
नाम ‘प्रधान’ है। यदि गुणोंकी यह साम्यावस्था स्वाभाविक मानी जाय, तब तो
कभी भी भंग न होगी, अतएव गुणोंमें विषमता न होनेके कारण अङ्गाङ्गिभाव-
की सिद्धि न हो सकेगी; क्योंकि उन गुणोंमें ह्रास और वृद्धि होनेपर ही बढ़े
हुए गुणको अङ्गी और घटे हुए गुणको अङ्ग माना जाता है। यदि उन गुणोंकी
विषमता ( ह्रास-वृद्धि ) को ही स्वाभाविक माना जाय तब तो सदा जगत्की
सृष्टिका ही क्रम चलता रहेगा, प्रलय कभी होगा ही नहीं। यदि पुरुषकी
प्रेरणासे प्रकृतिके गुणोंमें क्षोभ होना मान लें तब तो पुरुषको असङ्ग और निष्क्रिय
मानना नहीं बन सकेगा। यदि परमेश्वरको प्रेरक माना जाय तब तो यह
ब्रह्म कारणवादको ही स्वीकार करना होगा। इस प्रकार सांख्यमतके अनुसार
गुणोंका अङ्गाङ्गिभाव सिद्ध न होनेके कारण जड प्रधानको जगत्का कारण मानना
असङ्गत है।
सम्बन्ध—यदि अन्य प्रकारसे गुणोंकी साम्यावस्था भंग होकर प्रकृतिके द्वारा
जगत्की उत्पत्ति होती है, ऐसा मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इसपर
कहते हैं—
अन्यथानुमितौ च ज्ञशक्तिवियोगात् ॥ २ । २ । ९ ॥
अन्यथा=दूसरे प्रकारसे; अनुमितौ=साम्यावस्था भंग होनेका अनुमान
कर लेनेपर; च=भी; ज्ञशक्तिवियोगात्=प्रधानमे ज्ञान-शक्ति न होनेके कारण
( गृह, घट, पट आदिकी भाँति बुद्धिपूर्वक रची जानेवाली वस्तुओंकी उत्पत्ति
उसके द्वारा नहीं हो सकती ) ।