ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ५१-५२ ] अध्याय ३ २९३
सूत्र ५१-५२ ] अध्याय ३ २९३
अतएव जिस साधकको मृत्युके पहले कभी भी परमात्माका साक्षात्कार हो
जाता है, जो उस परमेश्वरके तत्त्वको भलीभाँति जान लेता है, जिसकी ब्रह्मलोक-
पर्यन्त किसी भी लोकके सुख-भोगमे किञ्चिन्मात्र भी वासना नहीं रही है, वह
किसी भी लोकविशेषमे नहीं जाता, वह तो तत्काल ही उस परब्रह्म परमात्माको
प्राप्त हो जाता है। (बृह० ३। ४। ४। ६ तथा क० उ० २। ३। १४) प्रारब्धभोगके
अन्तमे उसके स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीरोके तत्त्व उसी प्रकार अपने-अपने कारण-
तत्त्वोमे विलीन हो जाते हैं, जिस प्रकार मृत्युके बाद प्रत्येक मनुष्यके स्थूल
शरीरके तत्त्व पाँचो भूतोमे विलीन हो जाते है (मु० उ० ३।२।७)।
सम्बन्ध—ऐसा होनेमें क्या प्रमाण है ? इस जिज्ञासापर कहते है—
परेण च शब्दस्य ताद्विध्यं भूयस्त्वात्त्वनु-
बन्धः ॥ ३ । ३ । ५२ ॥
परेण=बादवाले मन्त्रोसे (यह सिद्ध होता है); च=तथा; शब्दस्य=
उसमे कहे हुए शब्दसमुदायका; ताद्विध्यम्=उसी प्रकारका भाव है; तु=
किन्तु अन्य साधकोके; भूयस्त्वात्=दूसरे भावोकी अधिकतासे; अनुबन्धः=
सूक्ष्म और कारणशरीरसे सम्बन्ध रहता है (इस कारण वे ब्रह्मलोकमें
जाते हैं)।
व्याख्या—मुण्डकोपनिषद्मे पहले तो यह बात कही है कि—
वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः ।
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥
'वेदान्तशास्त्रके ज्ञानद्वारा जिन्होंने वेदान्तके अर्थभूत परब्रह्म परमात्माके
स्वरूपका निश्चय कर लिया है, कर्मफलरूप समस्त भोगोके त्यागरूप योगसे
जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है, वे सब साधक मरणकालमें ब्रह्म-
लोकोंमें जाकर परम अमृतस्वरूप होकर सर्वथा मुक्त हो जाते हैं।'
(३।२।६)। इसके बाद अगले मन्त्रमे, जिनको इस शरीरका नाश
होनेसे पहले ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है, उनके विषयमे इस प्रकार कहा है—
गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु ।
कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ॥
२९४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
'उनकी पंद्रह कलाएँ अर्थात् प्राणोंके सहित सब इन्द्रियाँ अपने-अपने
देवताओमे विलीन हो जाती है, जीवात्मा और उसके समस्त कर्मसंस्कार- ये
सब-के-सब परम अविनाशी परमात्मामे एक हो जाते है।' ( ३ । २ । ७ )।
फिर नदी और समुद्रका दृष्टान्त देकर बताया है कि 'तथा विद्वांनामरूपाद्विमुक्तः
परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ।'-'वह ब्रह्मको जाननेवाला विद्वान् नाम-रूपको यहीं
छोड़कर परात्पर ब्रह्ममें विलीन हो जाता है।' ( ३ । २ । ८ ) । इस प्रकार
शुद्ध अन्तःकरणवाले अधिकारियोके लिये ब्रह्मलोककी प्राप्ति बतानेके बाद साक्षात्
ब्रह्मको जान लेनेवाले विद्वान्का यहीं नाम-रूपसे मुक्त होकर परब्रह्ममे विलीन हो
जाना सूचित करनेवाले शब्दसमुदाय पूर्वसूत्रमे कही हुई बातको स्पष्ट करते है ।
इसलिये यह सिद्ध होता है कि जिनके अन्तःकरणमे ब्रह्मलोकके महत्त्वका भाव
है, वहाँ जानेके सङ्कल्पसे जिनका सूक्ष्म और कारण-शरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद
नहीं हुआ, ऐसे ही साधक ब्रह्मलोकोंमें जाते हैं। जिनको यहीं ब्रह्मसाक्षात्कार
हो जाता है, वे नहीं जाते । यह अवान्तर फल-भेद होना उचित ही है।
सम्बन्ध-यहाँतक मुक्तिविषयक फलभेदके प्रकरणको समाप्त करके अब
शरीरपातके बाद आत्माकी सत्ता और कर्मफलका भोग न माननेवाले नास्तिकोंके
मतका खण्डन करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं-
एक आत्मनः शरीरे भावात् ॥ ३ । ३ । ५३ ॥
एके=कई एक कहते है कि; आत्मनः =आत्माका; शरीरे =शरीर होनेपर
ही; भावात् =भाव होनेके कारण ( शरीरसे भिन्न आत्माकी सत्ता नहीं है )।
व्याख्या-कई एक नास्तिकोका कहना है कि जबतक शरीर है, तभीतक
इसमे चेतन आत्माकी प्रतीति होती है, शरीरके अभावमे आत्मा प्रत्यक्ष नहीं है ।
इससे यही सिद्ध होता है कि शरीरसे भिन्न आत्मा नहीं है, अतएव मरनेके
बाद, आत्मा परलोकमे जाकर कर्मोंका फल भोगता है या ब्रह्मलोकमे जाकर
मुक्त हो जाता है, ये सभी बातें असङ्गत हैं ।
सम्बन्ध-इसके उत्तरमें सूत्रकार कहते हैं--
व्यतिरेकस्तद्भावाभावित्वान्न तूपलब्धिवत् ॥ ३ । ३ । ५४ ॥
व्यतिरेकः =शरीरसे आत्मा भिन्न है; तद्भावाभावित्वात् =क्योंकि शरीर
रहते हुए भी उसमे आत्मा नहीं रहता, इसलिये; न =आत्मा शरीर नहीं है;