ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ३-६ ] अध्याय १ ४९
सूत्र ३-६ ] अध्याय १ ४९
सम्बन्ध—प्रकृतिका वाचक शब्द उस प्रकरणमें नहीं है, यह तो ठीक है ?
परन्तु जीवात्माका वाचक 'आत्म' शब्द तो वहाँ है ही; अतः उसीको द्युलोक
आदिका आधार माना जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते हैं—
प्राणभृच्च ॥ १ । ३ । ४ ॥
प्राणभृत् = प्राणधारी जीवात्मा; च = भी; ( न= ) द्युलोक आदिका आधार
नहीं हो सकता; ( क्योंकि उसका वाचक शब्द भी इस प्रकरणमे नहीं है ) ।
व्याख्या—जैसे प्रकृतिका वाचक शब्द इस प्रकरणमे नहीं है, वैसे ही
जीवात्माका बोधक शब्द भी नहीं प्रयुक्त हुआ है । 'आत्मा' शब्द अन्यत्र
जीवात्माके अर्थमे प्रयुक्त होनेपर भी इस प्रकरणमे वह जीवात्माका वाचक नहीं
है; क्योकि मु० उ० ( २ । २ । ७ ) मे इसके लिये 'आनन्दरूप' और 'अमृत'
विशेषण दिये गये हैं; जो कि परब्रह्म परमात्माके ही अनुरूप है । इसलिये
प्राणधारी जीवात्मा भी द्युलोक आदिका आधार नहीं माना जा सकता ।
सम्बन्ध—उपर्युक्त अभिप्रायकी सिद्धिके लिये दूसरा कारण देते हैं—
भेदव्यपदेशात् ॥ १ । ३ । ५ ॥
भेदव्यपदेशात् = यहाँ कहे हुए आत्माको जीवात्मासे भिन्न बताये जानेके
कारण; ( प्राणभृत् न= ) प्राणधारी जीवात्मा सबका आधार नहीं है ।
व्याख्या—इसी मन्त्र ( मु० उ० २ । २ । ५ ) मे यह बात कही गयी है कि 'उस
आत्माको जानो ।' अतः ज्ञातव्य आत्मासे उसको जाननेवाला भिन्न होगा ही ।
इसी प्रकार आगेवाले मन्त्र ( मु० उ० ३ । १ । ७ ) मे उस आत्माको जाननेवालेकी
हृदय-गुफामे छिपा हुआ बताया गया है । इससे भी ज्ञातव्य आत्माकी भिन्नता
सिद्ध होती है; इसलिये इस प्रकरणमें बतलाया हुआ द्युलोक आदिका आधार
परब्रह्म परमेश्वर ही है, जीवात्मा नहीं ।
सम्बन्ध—यहाँ जीवात्मा और जड प्रकृति दोनो ही द्युलोक आदिके आधार
नहीं हैं, इसमें दूसरा कारण बताते हैं—
प्रकरणात् ॥ १ । ३ । ६ ॥
प्रकरणात् = यहाँ परब्रह्म परमात्माका प्रकरण है, इसलिये; ( भी यही सिद्ध
होता है कि जीवात्मा और जड प्रकृति द्युलोक आदिके आधार नहीं है ) ।
वे० द० ४—
५० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
व्याख्या—इस प्रकरणमे आगे-पीछेके सभी मन्त्रोमे उस परमात्माको सर्वाधार,
सबका कारण, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् बताकर उसीको जीवात्माके लिये
प्राप्तव्य ब्रह्म कहा है; इसलिये यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा और परमात्मा
एक दूसरेसे भिन्न है तथा यहाँ बतलाया हुआ स्वर्ग और पृथिवी आदिका आधार
वह परब्रह्म ही है; जीव या जड प्रकृति नहीं।
सम्बन्ध—इसके सिवा--
स्थित्यदनाभ्यां च ॥ १ । ३ । ७ ॥
स्थित्यदनाभ्याम् = एककी शरीरमे साक्षीरूपसे स्थिति और दूसरेके द्वारा
सुख-दुःखप्रद विषयका उपभोग बताया गया है, इसलिये; च = भी ( जीवात्मा
और परमात्माका भेद सिद्ध होता है)।
व्याख्या—मुण्डकोपनिषद् ( ३ । १ । १ ) मे कहा है—
'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥'
'एक साथ रहते हुए परस्पर सख्यभाव रखनेवाले दो पक्षी
( जीवात्मा और परमात्मा ) एक ही शरीररूप वृक्षका आश्रय लेकर रहते है।
उन दोनोमेसे एक ( जीवात्मा ) तो उस वृक्षके कर्मफलरूप सुख-दुःखोंका
स्वाद ले-लेकर ( आसक्तिपूर्वक ) उपभोग करता है, किन्तु दूसरा ( परमात्मा )
न खाता हुआ केवल देखता रहता है।' इस वर्णनमे जीवात्माको कर्मफलका
भोक्ता तथा परमात्माको केवल साक्षीरूपसे स्थित रहनेवाला बताया गया है। इससे
दोनोका भेद स्पष्ट है। अतः इस प्रकरणमे द्युलोक, पृथिवी आदि समस्त जड-
चेतनात्मक जगत्का आधार परब्रह्म परमेश्वर ही सिद्ध होता है, जीवात्मा
नहीं।
सम्बन्ध—पूर्व प्रकरणमें यह बात कही गयी कि जिसे द्युलोक और पृथिवी
आदिका आधार बताया गया है, उसीको 'आत्मा' कहा गया है; अतः वह
परब्रह्म परमात्मा ही है, जीवात्मा नही। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि
छान्दोग्योपनिषद्के सातवें अध्यायमें नारदजीके द्वारा आत्माका स्वरूप पूछे
जानेपर सनत्कुमारजीने क्रमशः नाम, वाणी, मन, संकल्प, चित्त, ध्यान, विज्ञान,
बल, अन्न, जल, तेज, आकाश, स्मरण और आशाको उत्तरोत्तर बड़ा बताया