ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ३२ ] अध्याय ३ २४९
सूत्र ३२ ] अध्याय ३ २४९
इन सब कारणोंसे यही सिद्ध होता है कि वह सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ,
सर्वान्तर्यामी, सर्वाधार, सबका स्वामी परमात्मा अपनी दोनों प्रकृतियोंसे अत्यन्त
विलक्षण और परम श्रेष्ठ है; क्योंकि इन श्रुतियोंमें कहा हुआ उन परमात्माका
स्वरूप दिव्य, अलौकिक और उपाधिरहित है तथा उस परब्रह्मको जाननेका फल
परम शान्तिकी प्राप्ति,* सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त होना† तथा अमृतको
प्राप्त होना बताया गया है ।‡
सम्बन्ध—यहाँतक यह सिद्ध किया गया कि उस परब्रह्म परमात्माका
अपनी अपरा और परा नामक प्रकृतियोंके साथ अभेद भी है और भेद भी ।
अब यह जिज्ञासा होती है कि इन दोनोंमेंसे अभेदपक्ष उत्तम है या भेदपक्ष ?
अतः इसका निर्णय करनेके लिये सूत्रकार कहते हैं—
सामान्यात्तु ॥ ३ । २ । ३२ ॥
सामान्यात् = श्रुतिमें भेद-वर्णन और अभेद-वर्णन दोनों समानभावसे हैं
इससे; तु = तो (यही निश्चय होता है कि भेद और अभेद दोनों ही पक्ष मान्य हैं)।
व्याख्या—परब्रह्म परमात्माको सबका ईश्वर§, अधिपति×, प्रेरक+, शासक-
और अन्तर्यामी= बतानेवाली भेदप्रतिपादक श्रुतियाँ जिस प्रकार प्रमाणभूत हैं,
उसी प्रकार ‘तत्त्वमसि’ (छा० उ० ६ । ८ वेंसे १६ वें खण्डतक)—‘वह
ब्रह्म तू है’, ‘अयमात्मा ब्रह्म’ (बृह० उ० २ । ५ । १९)—‘यह आत्मा
- तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति। (श्वेता० उ० ४ । ११)
‘ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति ।’ (श्वेता० उ० ४ । १४)
‘तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥’
(क० उ० २ । २ । १३)
† ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानिः । (श्वेता० उ० १ । ११)
‡ तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय । (श्वेता० उ० ३ । ८)
§ ‘एष सर्वेश्वरः’ (मा० उ० ६)
× ‘एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिः ।’ (बृह० उ० ४ । ४ । २२)
- ‘भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा’ (श्वेता० उ० १ । १२)
- ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः’
(बृह० उ० ३ । ८ । ९)
= ‘एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ।’ (बृह० उ० ३ । ७ । ३)