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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र २-६ ] अध्याय २ १६३

सूत्र २-६ ] अध्याय २ १६३
श्रुति-वाक्योंसे आकाशकी अनन्तता सिद्ध होती है, इसलिये भी आकाशकी उत्पत्ति
नहीं हो सकती।
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि उक्त श्रुतिमे जिस प्रकार आकाश-
की उत्पत्ति बतानेवाले वाक्य हैं, उसी प्रकार वायु, अग्नि आदिकी उत्पत्ति
बतानेवाले शब्द भी हैं; फिर यह कैसे माना जा सकता है कि आकाशके लिये तो
कहना गौण है और दूसरोंके लिये मुख्य है, इसपर पूर्वपक्षकी ओरसे उत्तर
दिया जाता है—
स्याच्चैकस्य ब्रह्मशब्दवत् ॥ २ । ३ । ५ ॥
च=तथा; ब्रह्मशब्दवत्=ब्रह्मशब्दकी भाँति; एकस्य=किसी एक शब्दका
प्रयोगः स्यात्=गौण भी हो सकता है।
व्याख्या—दूसरी जगह एक ही प्रकरणमे पहले तो कहा है कि 'तपसा
चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते ।'—'ब्रह्म विज्ञानमय तपसे वृद्धिको प्राप्त होता है,
उससे अन्न उत्पन्न होता है।' (मु० उ० १ । १ । ८) उसके बाद कहा है कि—
यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्य ज्ञानमयं तपः ।
तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ॥
(मु० उ० १ । १ । ९)
अर्थात् 'जो सर्वज्ञ, सबको जाननेवाला है, जिसका ज्ञानमय तप है, उससे
यह ब्रह्म और नाम, रूप एवं अन्न उत्पन्न होता है।' इस प्रकरणमें जैसे
पहले ब्रह्म शब्द मुख्य अर्थमे प्रयुक्त हुआ है और पीछे उसी ब्रह्म शब्दका
गौण अर्थमे प्रयोग किया गया है, उसी प्रकार श्रुतिमे किसी एक शब्द ( आकाश
आदि ) का गौण अर्थमें प्रयोग भी हो सकता है ।
सम्बन्ध—इस प्रकार पूर्वपक्षकी उत्थापना करके अब दो सूत्रोंद्वारा उसका
समाधान करते हैं—
प्रतिज्ञाहानिरव्यतिरेकाच्छब्देभ्यः ॥ २ । ३ । ६ ॥
अव्यतिरेकात्=ब्रह्मके कार्यसे आकाशको अलग न माननेसे ही;
प्रतिज्ञाऽहानिः=एकके ज्ञानमे सबके ज्ञानसम्बन्धी प्रतिज्ञाकी रक्षा हो सकती है;
शब्देभ्यः=श्रुतिके शब्दोंसे यही सिद्ध होता है।
व्याख्या—उपनिषदोंमे जो एकको जाननेसे सबका ज्ञान हो जानेकी
प्रतिज्ञा की गयी है और उस प्रसङ्गमें जो कारण-कार्यके उदाहरण दिये गये हैं,

१६४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
(छा० उ० ६ । १ । १ से ६ तक) उन सबकी विरोधरहित सिद्धि आकाशको
ब्रह्मके कार्यसे अलग न माननेपर ही हो सकती है, अन्यथा नहीं; क्योंकि वहाँ
मिट्टी और सुवर्ण आदिका दृष्टान्त देकर उनके किसी एक कार्यके ज्ञानसे कारणके
ज्ञानद्वारा सबका ज्ञान होना बताया है । अतः यदि आकाशको ब्रह्मका कार्य
न मानकर ब्रह्मसे अलग मानेंगे तो कारणरूप ब्रह्मको जान लेनेपर भी आकाश
जाना हुआ नहीं होगा; इससे प्रतिज्ञाकी हानि होगी । इतना ही नहीं, 'यह सब
ब्रह्म ही है' (मु० उ० २ । २ । ११) 'यह सब इस ब्रह्मका स्वरूप है' (छा०
उ० ६ । ८ । ७) 'यह सब निःसन्देह ब्रह्म ही है; क्योंकि उत्पत्ति, स्थिति और
प्रलय उसीमे होते हैं' (छा० उ० ३ । १४ । १) इत्यादि श्रुतिवाक्योसे भी यही
सिद्ध होता है कि आकाश उस ब्रह्मका ही कार्य है ।
यावद्विकारं तु विभागो लोकवत् ॥ २ । ३ । ७ ॥
तु=तथा; लोकवत्=साधारण लौकिक व्यवहारकी भाँति; यावद्विकारम्=
विकारमात्र सब कुछ; विभागः=ब्रह्मका ही विभाग (कार्य) है ।
व्याख्या-जिस प्रकार लोकमे यह बात देखी जाती है कि कोई पुरुष
देवदत्तके पुत्रोका परिचय देते समय कहता है—'ये सब-के-सब देवदत्तके पुत्र
हैं।' फिर वह उनमेसे किसी एक या दोका ही नाम लेकर यदि कहे कि 'इनकी
उत्पत्ति देवदत्तसे हुई है' तो भी उन सबकी उत्पत्ति देवदत्तसे ही मानी जायगी,
उसी प्रकार जब समस्त विकारात्मक जगत्‌को उस ब्रह्मका कार्य बता दिया गया,
तब आकाश उससे अलग कैसे रह सकता है । अतः तेज आदिकी सृष्टि बताते
समय यदि आकाशका नाम छूट गया तो भी यही सिद्ध होता है कि आकाश भी
अन्य तत्त्वोंकी भाँति ब्रह्मका कार्य है और वह उससे उत्पन्न होता है । वायु और
आकाशको अमृत कहनेका तात्पर्य देवताओंकी भाँति उन्हें अन्यकी अपेक्षा
चिरस्थायी बतानामात्र है ।
सम्बन्ध—इस प्रकार आकाशका उत्पन्न होना सिद्ध करके उसीके उदाहरणसे
यह निश्चय किया जाता है कि वायु भी उत्पन्न होता है—
एतेन मातरिश्वा व्याख्यातः ॥ २ । ३ । ८ ॥