ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र २५-२७] अध्याय १ ७९
सूत्र २५-२७] अध्याय १ ७९
सम्बन्ध-अब उक्त बातकी सिद्धिके लिये ही दूसरा प्रमाण देते हैं-
आत्मकृतेः ॥ १ । ४ । २६ ॥
आत्मकृतेः = स्वयं अपनेको जगतरूपमें प्रकट करनेका वर्णन होनेसे (ब्रह्म
ही जगत्का उपादान कारण सिद्ध होता है) ।
व्याख्या-तैत्तिरीयोपनिषद् (२ । ७) में कहा है कि 'प्रकट होनेसे पहले
यह जगत् अव्यक्तरूपमें था, उसीसे ही यह प्रकट हुआ है, उस परब्रह्म परमेश्वर-
ने स्वयं अपनेको ही इस जगत्के रूपमें प्रकट किया।' इस प्रकार कर्त्ता और
कर्मके रूपमें उस एक ही परमात्माका वर्णन होनेसे स्पष्ट ही श्रुतिका यह कथन
हो जाता है कि ब्रह्म ही इसका निमित्त और उपादान कारण है ।
सम्बन्ध-यहाँ यह शङ्का होती है कि परमात्मा तो पहलेसे ही नित्य
कर्त्तारूपमें स्थित है, वह कर्म कैसे हो सकता है ? इसपर कहते हैं-
परिणामात् ॥ १ । ४ । २७ ॥
परिणामात् = श्रुतिमें उनके जगतरूपमें परिणत होनेका वर्णन होनेसे (यही
मानना चाहिये कि वह ब्रह्म ही इस जगत्का कर्त्ता है और वह स्वयं ही इस
रूपमें बना है) ।
व्याख्या-तैत्तिरीयोपनिषद् (२ । ६) में कहा है कि 'तत्सृष्ट्वा तदेवानु-
प्राविशत् । तदनुप्रविश्य सच त्यच्चाभवत् । निरुक्तं चानिरुक्तं च । निलयनं चा-
निलयनं च । विज्ञानं चाविज्ञानं च । सत्यं चानृतं च । सत्यमभवत् । यदिदं किञ्च ।
तत्सत्यमित्याचक्षते ।' अर्थात् 'उस जगत्की रचना करनेके अनन्तर वह
परमात्मा स्वयं उसमें साथ-साथ प्रविष्ट हो गया । उसमें प्रविष्ट होकर वह स्वयं
ही सत् (मूर्त्त) और त्यत् (अमूर्त्त) भी हो गया । बतानेमें आनेवाले और न
आनेवाले, आश्रय देनेवाले और न देनेवाले तथा चेतन और जड, सत्य और
मिथ्या इन सबके रूपमें सत्यस्वरूप परमात्मा ही हो गया । जो कुछ भी यह
दीखता और अनुभवमें आता है, वह सत्य ही है, इस प्रकार ज्ञानीजन कहते हैं।'
इस प्रकार श्रुतिने परब्रह्म परमात्माके ही सब रूपोंमें परिणत होनेका प्रतिपादन
किया है; इसलिये वही इस जगत्का उपादान और निमित्त कारण है । परिणाम-
का अर्थ यहाँ विकार नहीं है । जैसे सूर्य अपनी अनन्त किरणोंका सब ओर
प्रसार करते हैं, उसी प्रकार परमेश्वर अपनी अनन्त-अचिन्त्य ऐश्वर्यशक्तियोंका
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-विक्षेप करते है; उनके इस शक्तिविक्षेपसे ही विचित्र जगत्का प्रादुर्भाव स्वतः
होने लगता है। अतः यही समझना चाहिये कि निर्विकार एकरस परमात्मा
अपने स्वरूपसे अच्युत एवं अविकृत रहते हुए ही अपनी अचिन्त्य शक्तियोंद्वारा
जगत्के रूपमें प्रकट हो जाते हैं; अतः उनका कर्ता और कर्म होना-उपादान
एवं निमित्त कारण होना सर्वथा सुसंगत है।
सम्बन्ध-इसीके समर्थनमें सूत्रकार दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं-
योनिश्च हि गीयते ॥ १ । ४ । २८ ॥
हि=क्योंकि; योनिः = (वेदान्तमे ब्रह्मको) योनि; च=भी; गीयते=कहा
जाता है ( इसलिये ब्रह्म ही उपादान कारण है ) ।
व्याख्या-'योनि'का अर्थ उपादान कारण होता है। उपनिषदोंमे अनेक
स्थलोंपर परब्रह्म परमात्माको 'योनि' कहा गया है; जैसे-'कर्तारमीशं पुरुषं
ब्रह्मयोनिम्' ( मु० उ० ३ । १ । ३ ) अर्थात् 'जो सबके कर्ता, सबके शासक
तथा ब्रह्माजीकी भी योनि ( उपादान कारण ) परम पुरुषको देखता है।' 'भूत-
योनिं परिपश्यन्ति धीराः' (मु० उ० १ । १ । ६)-'उस समस्त प्राणियों-
की योनि (उपादान कारण) को ज्ञानीजन सर्वत्र परिपूर्ण देखते है।' इस प्रकार
स्पष्ट शब्दोंमे परब्रह्म परमात्माको समस्त भूत-प्राणियोंकी 'योनि' बताया गया है;
इसलिये वही सम्पूर्ण जगत्का उपादान कारण है। 'यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते
'च' (मु० उ० १ । १ । ७) इत्यादि मन्त्रके द्वारा यह बताया गया है कि
'जैसे मकड़ी अपने शरीरसे ही जालेको बनाती और फिर उसीमे निगल लेती है,
'उसी प्रकार अक्षरब्रह्मसे यह सम्पूर्ण जगत् प्रकट होता है।' इसके अनुसार भी
यही सिद्ध होता है कि एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही इस जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण
जगत्का निमित्त और उपादान कारण है। अतः यह समस्त चराचर विश्व
भगवान्का ही स्वरूप है। ऐसा समझकर मनुष्यको उनके भजन-स्मरणमें लग
जाना चाहिये; और सबके साथ व्यवहार करते समय भी इस बातको सदा
ध्यानमें रखना चाहिये।
सम्बन्ध-इस प्रकार अपने मतकी स्थापना और अपनेसे विरुद्ध मतोंका
खण्डन करनेके पश्चात् इस अध्यायके अन्तमें सूत्रकार कहते हैं-