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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र २०-२३ ] अध्याय १ ६१

सूत्र २०-२३ ] अध्याय १ ६१
है, इसलिये; ( 'दहर' शब्दसे यहाँ जीवात्माका ही ग्रहण है ) इति=ऐसा मानना
चाहिये; तदुक्तम्=तो इसका उत्तर दिया जा चुका है ।
व्याख्या-‘श्रुतिमे दहराकाशको अत्यन्त अल्प ( लघु ) बताया गया है ।
इससे भी यही सिद्ध होता है कि वह जीवात्मा है; क्योकि उसीका स्वरूप ‘अणु’
माना गया है ।'' परन्तु ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये; क्योकि, इसका उत्तर पहले
( सूत्र १ । २ । ७ मे ) दिया जा चुका है । अतः वारम्बार उसीको दुहराने-
की आवश्यकता नहीं है ।
सम्बन्ध-पूर्वसूत्रमे उठायी हुई शङ्काका उत्तर प्रकारान्तरसं दिया जाता है-
अनुकृतेस्तस्य च ॥ १ । ३ । २२ ॥
तस्य=उस जीवात्माका; अनुकृतेः=अनुकरण करनेके कारण; च=भी;
( परमात्माको अल्प परिमाणवाला कहना उचित है ) ।
व्याख्या-मनुष्यके हृदयका माप अङ्गुष्ठके बराबर माना गया है; उसीमे
जीवात्माके साथ परमात्माके प्रविष्ट होनेकी बात श्रुतिमे इस प्रकार बतायी गयी है-
'ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे ।' ( क० उ० १ । ३ । १ )
अर्थात् 'शुभ कर्मोंके फलरूप मनुष्य-शरीरमे परब्रह्मके निवास-स्थानरूप
हृदयाकाशके अन्तर्गत बुद्धिरूप गुहामे छिपे हुए सत्यका पान करनेवाले दो
( जीवात्मा और परमात्मा ) है ।' 'तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ।' ( तै० उ० २ । ६ )
'परमात्मा उस जड-चेतनात्मक संपूर्ण जगत्‌की रचना करके स्वयं भी
जीवात्माके साथ उसमें प्रविष्ट हो गया ।' तथा-'सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव
जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत् ।' ( छा० उ० ६ । ३ । ३ )
'उस परमात्माने त्रिविध तत्त्वरूप देवता अर्थात् उनके कार्यरूप मनुष्य-
शरीरमे जीवात्माके सहित प्रविष्ट होकर नाम-रूपका विस्तार किया ।' इत्यादि ।
इस प्रकार उस परमात्माको जीवात्माका अनुकरण करनेवाला बताया जानेके कारण
भी उसे अल्प परिमाणवाला कहना सर्वथा उचित ही है । इसी भावको लेकर
वेदोमे जगह-जगह परमात्माका स्वरूप 'अणोरणीयान्'-छोटे-से-छोटा तथा
'महतो महीयान्'-बडे-से-बड़ा बताया गया है ।
सम्बन्ध-इस विषयमे स्मृतिका भी प्रमाण देते हैं-
अपि च स्मर्यते ॥ १ । ३ । २३ ॥

६२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
च=इसके सिवा; स्मर्यते अपि=यही बात स्मृतिमे भी कही गयी है ।
व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वर सबके हृदयमे स्थित है और वह छोटे-से भी छोटा
है—ऐसा वर्णन स्मृतियोंमें इस प्रकार आया है—'सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः।'
( गीता १५। १५ ) । 'हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।' ( गीता १३। १७ ) ।
'ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।' ( गीता १८। ६१ ) । 'अविभक्तं
च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।' ( गीता १३। १६ ) । 'अणोरणीयांसम्।'
( गीता ८। ९) इत्यादि। ऐसा वर्णन होनेके कारण उस सर्वव्यापी परब्रह्म परमेश्वरको
स्थानकी अपेक्षासे छोटे आकारवाला कहना उचित ही है । अतः 'दहर'
शब्दसे परब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है, जीवात्माका नहीं।
सम्बन्ध—उपर्युक्त विवेचन पढकर यह जिज्ञासा होती है कि कठोपनिषद्
( २। १ । १२, १३ तथा २ । ३ । १७ ) में जिसे अङ्गुष्ठके बराबर
बताया गया है, वह जीवात्मा हे या परमात्मा ? अतः इसका निर्णय करनेके
लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
शब्दादेव प्रमितः ॥ १ । ३ । २४ ॥
शब्दात्=( उक्त प्रकरणमे आये हुए ) शब्दसे; एव=ही; ( यह सिद्ध
होता है कि ) प्रमितः=अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला पुरुष ( परमात्मा ही है ) ।
व्याख्या—कठोपनिषद्मे कहा है कि 'अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि
तिष्ठति।' ( २ । १ । १२ ) तथा 'अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः ।
ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः ॥' ( २ । १ । १३ ) । अर्थात्
'अङ्गुष्ठके बराबर मापवाला परम पुरुष शरीरके मध्यभाग ( हृदय ) में स्थित है।'
तथा अङ्गुष्ठके बराबर मापवाला परम पुरुष धूमरहित ज्योतिकी भाँति एकरस
है, वह भूत, वर्तमान और भविष्यपर शासन करनेवाला है । वह आज भी
है और कल भी रहेगा; अर्थात् वह नित्य सनातन है।' इस प्रकरणमे जिसे
अङ्गुष्ठके बराबर मापवाला पुरुष बताया गया है, वह परब्रह्म परमात्मा ही है;
यह बात उन्हीं मन्त्रोमे कहे हुए शब्दोंसे सिद्ध होती है । क्योंकि वहाँ उस
पुरुषको भूत, वर्तमान और भविष्यमे होनेवाली समस्त प्रजाका शासक, धूमरहित
अग्निके सदृश एकरस और सदा रहनेवाला बताया गया है तथा आगे चलकर
उसीको विशुद्ध अमृतस्वरूप जाननेके लिये कहा गया है ( २ । ३ । १७ ) ।