ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र १-३ ] अध्याय ४ ३३७
सूत्र १-३ ] अध्याय ४ ३३७
सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे इसी बातको सिद्ध करते हैं—
लिङ्गाच्च ॥ ४ । १ । २ ॥
लिङ्गात्=स्मृतिके वर्णनरूप लिङ्ग (प्रमाण) से; च=भी (यही बात सिद्ध
होती है)।
व्याख्या-भगवद्गीतामे जगह-जगह यह बात कही है कि 'सर्वेषु कालेषु
मामनुस्मर'—'सब कालमे मेरा स्मरण कर।' (गीता ८ । ७)। 'परमं पुरुषं
दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ।' 'बार-बार चिन्तन करता हुआ साधक परम
पुरुषको प्राप्त होता है।' (गीता ८ । ८)। 'जो सदा अनन्यचित्त होकर
मुझे नित्य स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगीके लिये मै सुलभ हूँ।'* (गीता
८ । १४) 'मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।'—'मुझमे मन लगाकर
नित्य योगयुक्त होकर जो मेरी उपासना करते हैं।' (गीता १२ । २) इसी
प्रकार दूसरी स्मृतियोमे भी कहा है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि ब्रह्मविद्याका
निरन्तर अभ्यास करते रहना चाहिये।
सम्बन्ध-उस परम प्राप्य परब्रह्मका किस भावसे निरन्तर चिन्तन करना
चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राहयन्ति च ॥ ४ । १ । ३ ॥
आत्मा=वह मेरा आत्मा है; इति=इस भावसे; तु=ही; उपगच्छन्ति =
ज्ञानीजन उसे जानते या प्राप्त करते हैं; च=और; ग्राहयन्ति=ऐसा ही ग्रहण
कराते या समझाते हैं।
व्याख्या—'यह आत्मा ब्रह्म है, यह आत्मा चार पादवाला है' इत्यादि
(मा० उ० २) 'सबका अन्तर्वर्ती यह तेरा आत्मा है।' (बृह०
उ० ३ । ४ । १ ) 'यह तेरा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है।' (बृह०
उ० ३ । ७ । ३ ) इसी प्रकार उद्दालकने अपने पुत्र श्वेतकेतुसे बार-बार कहा
है कि 'वह सत्य है, वह आत्मा है, वह तू है।' (छा० उ० ६ । ८ से १६ वें खण्ड-
तक) 'जो आत्मामें स्थित हुआ आत्माका अन्तर्यामी है, जिसको आत्मा नहीं जानता,
जिसका आत्मा शरीर है, वह तेरा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है।' (बृह० उ०
- अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥
वे० द० २२—
३३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
३ । ७ । २२) । इस प्रकार श्रुतिमे उस परब्रह्म परमात्माको अपना अन्तर्यामी
आत्मा मानकर उपासना करनेका विधान आता है तथा भगवद्गीतामें भी भगवान्-
ने अपनेको सबका अन्तर्यामी बताया है (गीता १८ । ६१) । दूसरी श्रुतिमे
भी उस ब्रह्मको हृदयरूप गुहामे निहित बताकर उसे जाननेवाले विद्वान्की
महिमाका वर्णन किया गया है। (तै० उ० २ । १) इसलिये साधकको उचित
है कि वह परमेश्वरको अपना अन्तर्यामी आत्मा समझकर उसी भावसे उसकी
उपासना करे।
सम्बन्ध—क्या प्रतीकोपासनामें भी ऐसी ही भावना करनी चाहिये ?
इस जिज्ञासापर कहते हैं—
न प्रतीके न हि सः ॥ ४ । १ । ४ ॥
प्रतीके=प्रतीकमे; न=आत्मभाव नहीं करना चाहिये; हि=क्योकि; सः=
वह; न=उपासकका आत्मा नहीं है।
व्याख्या—'मन ही ब्रह्म है, इस प्रकार उपासना करे।' (छा० उ० ३ ।
१८ । १) 'आकाश ब्रह्म है, ऐसी उपासना करे।' (छा० उ० ३ । १८ । १)
'आदित्य ब्रह्म है, यह आदेश है।' (छा० उ० ३ । १९ । १) इस प्रकार
जो भिन्न-भिन्न पदार्थोंमे ब्रह्मरूपसे उपासना करनेका कथन है, वही प्रतीकोपासना
है। वहाँ प्रतीकमे आत्मभाव नहीं करना चाहिये; क्योकि वह उपासकका
अन्तरात्मा नहीं है। जैसे मूर्ति आदिमे भगवान्की भावना करके उपासना की जाती
है, उसी प्रकार मन आदि प्रतीकमे भी उपासना करनेका विधान है। भाव यह है कि
पूर्वोक्त मन, आकाश, आदित्य आदिको प्रतीक बनाकर उनमे भगवान्के उद्देश्यसे की
हुई जो उपासना है, उसे परम दयालु पुरुषोत्तम परमात्मा अपनी ही उपासना
मानकर ग्रहण करते है और उपासकको उसकी भावनाके अनुसार फल भी
देते है; इसीलिये वैसी उपासनाका भी विधान किया गया है। परन्तु प्रतीकको
अपना अन्तर्यामी आत्मा नहीं माना जा सकता।
सम्बन्ध—प्रतीकोपासना करनेवालेको प्रतीकमे ब्रह्मभाव करना चाहिये
या ब्रह्ममें उस प्रतीकका भाव करना चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
ब्रह्मदृष्टिरुत्कर्षात् ॥ ४ । १ । ५ ॥