ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र १९-२२ ] अध्याय २ ११५
सूत्र १९-२२ ] अध्याय २ ११५
इतरव्यपदेशाद्धिताकरणादिदोषप्रसक्तिः ॥ २ । १ । २१ ॥
इतरव्यपदेशात्=ब्रह्म ही जीवरूपसे उत्पन्न होता है, ऐसा कहनेसे;
हिताकरणादिदोषप्रसक्तिः=( ब्रह्ममे ) अपना हित न करने या अहित करने
आदिका दोष आ सकता है ।
व्याख्या—श्रुतिमे कहा है कि 'तत्त्वमसि श्वेतकेतो' ( छा० उ० ६ । ८ । ७ )
—'हे श्वेतकेतु ! तू वही है।' 'अयमात्मा ब्रह्म' ( बृह० उ० २ । ५ । १९ )—
'यह आत्मा ब्रह्म है ।' तथा 'सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनानुप्रविश्य
नामरूपे व्याकरोत्' ( छा० उ० ६ । ३ । ३ )—अर्थात् 'उस देवता ( ब्रह्म ),
ने तेज आदि तत्त्वसे निर्मित शरीरमे इस जीवात्मारूपसे प्रवेश करके नाम-
रूपोंको प्रकट किया।' इसके सिवा यह भी कहा गया है कि 'त्वं स्त्री त्वं
पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी' ( श्वेता० ४ । ३ )—'तू स्त्री है, तू पुरुष
है, तू ही कुमार और कुमारी है।' इत्यादि । इस वर्णनसे स्पष्ट है कि ब्रह्म
स्वयं ही जीवरूपसे उत्पन्न हुआ है। इससे ब्रह्ममें अपना हित न करने अथवा
अहित करनेका दोष आता है, जो उचित नहीं है; क्योकि जगत्मे ऐसा कोई
भी प्राणी नहीं देखा जाता जो कि समर्थ होकर भी दुःख भोगता रहे और
अपना हित न करे। यदि वह स्वयं ही जीव बनकर दुःख भोग रहा है, तब
तो सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् परमेश्वरका इस प्रकार अपना हित न करना और
अहित करना अर्थात् अपनेको जन्म-मरणके चक्करमे डाले रहना आदि अनेक
दोष संघटित होने लगेंगे, जो कि सर्वथा अयुक्त हैं; अतः ब्रह्मको जगत्का
कारण मानना उचित नहीं है।
सम्बन्ध—अब उक्त शङ्काका निराकरण करनेके लिये कहते हैं—
अधिकं तु भेदनिर्देशात् ॥ २ । १ । २२ ॥
तु=किन्तु ( ब्रह्म जीव नहीं है, अपितु उससे ); अधिकम्=अधिक है;
भेदनिर्देशात्=क्योंकि जीवात्मासे ब्रह्मका भेद बताया गया है ।
व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद्मे जनक और याज्ञवल्क्यके संवादका वर्णन
है। वहाँ सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि आदि दैवी ज्योतियोका तथा वाणी आदि
आध्यात्मिक ज्योतियोंका वर्णन करनेके पश्चात् इनके अभावमे 'आत्मा' को 'ज्योति'
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अर्थात् प्रकाशक बतलाया है। (बृ० उ० ४ । ३ । ४-६) फिर उस आत्माका
स्वरूप पूछे जानेपर विज्ञानमय जीवको आत्मा बताया। (बृ० उ० ४। ३। ७)
तदनन्तर जाग्रत, स्वप्न तथा सुषुप्ति आदि अवस्थाओके भेदका वर्णन करते हुए
कहा है कि 'यह जीव सुषुप्तिकालमें बाहर-भीतरके ज्ञानसे शून्य होकर परब्रह्म परमात्मासे
संयुक्त होता है।' (बृ० उ० ४ । ३ । २१) तत्पश्चात् मरणकालकी स्थितिका
निरूपण करते हुए बताया है कि 'उस परब्रह्मसे अधिष्ठित हुआ यह एक शरीरसे
दूसरे शरीरमे जाता है।' (बृ० उ० ४ । ३ । ३५) इस वर्णनसे जीव और
ब्रह्मका भेद स्पष्ट हो जाता है। इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद्मे जो यह कहा है
कि 'अनेन जीवेनात्माननुप्रविश्य' इत्यादि; इसका अर्थ जीवरूपसे ब्रह्मका प्रवेश
करना नहीं, अपितु जीवके सहित ब्रह्मका प्रवेश करना है। ऐसा माननेसे ही
श्वेताश्वतरोपनिषद् (४। ६) मे जो जीव और ईश्वरको एक ही शरीररूप
वृक्षपर रहनेवाले दो पक्षियोकी भाँति बताया गया है, वह सङ्गत होता है।
(एवं) कठोपनिषद्मे जो द्विवचनका प्रयोग करके हृदयरूपी गुहामे प्रविष्ट दो तत्त्वो
(जीवात्मा और परमात्मा) का वर्णन किया गया है। श्वेताश्व० (१।९) मे
जो सर्वज्ञ और अल्पज्ञ विशेषण देकर दो अजन्मा आत्माओं (जीव और ईश्वर)
का प्रतिपादन हुआ है तथा श्रुतिमे जो परब्रह्म परमेश्वरको प्रकृति एवं जीवात्मा
दोनोपर शासन करनेवाला कहा गया है, इन सब वर्णनोकी सङ्गति भी जीव
और ब्रह्ममे भेद माननेपर ही हो सकती है। अन्तर्यामि-ब्राह्मणमे तो स्पष्ट शब्दोमे
जीवात्माको ब्रह्मका शरीर कहा गया है (बृ० उ० ३। ७। २२)। मैत्रेयी
ब्राह्मण (बृ० उ० २ । ४ । ५) में परमात्माको जानने तथा ध्यान करने
योग्य बताया है। इस प्रकार वेदमे जीवात्मा और परमात्माके भेदका वर्णन होनेसे
यही सिद्ध होता है कि वह जगत्का कर्ता, धर्ता और सहर्ता परमेश्वर जीव नहीं;
किन्तु उससे अधिक अर्थात् जीवके स्वामी है। 'तत्त्वमसि' 'अयमात्मा ब्रह्म'
इत्यादि वाक्योद्वारा जो जीवको ब्रह्मरूप बताया गया है, वह पूर्ववर्णित कारण
और कार्यकी अनन्यताको लेकर है। परमेश्वर कारण है और जड-चेतनात्मक
जगत् उनका कार्य है। कारणसे कार्य अभिन्न होता है, क्योंकि वह उसकी ही
शक्तिका विस्तार है। इसी दृष्टिसे जीव भी परमात्मासे अभिन्न है। फिर भी उनमे
स्वरूपगत भेद तो है ही। जीव अल्पज्ञ है, ब्रह्म सर्वज्ञ। जीव ईश्वरके अधीन
है, परमात्मा सबके शासक और स्वामी है। अतः जीव और ब्रह्मका अत्यन्त