ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र १८—२० ] अध्याय ४ ३८१
सूत्र १८—२० ] अध्याय ४ ३८१
तो देवलोकोंको प्राप्त होनेवाले कर्माधिकारियोंके सदृश ही ब्रह्मविद्याका भी फल.
हुआ; इसमें विशेषता क्या हुई ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
विकारावर्ति च तथा हि स्थितिमाह ॥ ४ । ४ । १९ ॥
च=इसके सिवा; विकारावर्ति=वह मुक्तात्मा जन्मादि विकारोंसे रहित ब्रह्मरूप
फलका अनुभव करता है; हि=क्योंकि; तथा=उसकी वैसी; स्थितिम्=स्थिति;
आह=श्रुति कहती है ।
व्याख्या—श्रुतिमें ब्रह्मविद्याका मुख्य फल परब्रह्मकी प्राप्ति बताया गया है,
'जो जन्म, जरा आदि विकारोंको न प्राप्त होनेवाला, अजर-अमर, समस्त पापोंसे
रहित तथा कल्याणमय दिव्य गुणोंसे सम्पन्न है ।' ( छा० उ० ८ । १ । ५ )
इसलिये यही सिद्ध होता है कि उसको प्राप्त होनेवाला फल कर्मफलकी भाँति
विकारी नहीं है । ब्रह्मलोकके भोग तो आनुषंगिक फल हैं । ब्रह्मविद्याकी सार्थकता
तो परब्रह्मकी प्राप्ति करानेमे ही है । श्रुतिमें उस मुक्तात्माकी ऐसी ही स्थिति
बतायी गयी है—'यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां
विन्दते । अथ सोऽभयं गतो भवति ।' ( तै० उ० २ । ७ ) अर्थात् 'जब यह
जीवात्मा इस देखनेमें न आनेवाले, शरीररहित, बतलानेमें न आनेवाले तथा
दूसरेका आश्रय न लेनेवाले परब्रह्म परमात्मामें निर्भयतापूर्वक स्थिति लाभ करता
है, तब वह निर्भय पदको प्राप्त हो जाता है ।'
सम्बन्ध—पहले कहे हुए सिद्धान्तको ही प्रमाणसे दृढ करते हैं—
दर्शयतश्चैवं प्रत्यक्षानुमाने ॥ ४ । ४ । २० ॥
प्रत्यक्षानुमाने=श्रुति और स्मृति; च=भी; एवम्=इसी प्रकार; दर्शयतः=
दिखलाती हैं ।
व्याख्या—श्रुतिमें स्पष्ट कहा है कि 'वह परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने
वास्तविक रूपसे सम्पन्न हो जाता है । यह आत्मा है, यही अमृत एवं अभय
है और यही ब्रह्म है ।' ( छा० उ० ८ । ३ । ४ ) ब्रह्मलोक अन्य लोकों-
की भाँति विकारी नहीं है । श्रुतिमे उसे नित्य ( छा० उ० ८ । १३ । १ ),
सब पापोंसे रहित ( छा० उ० ८ । ४ । १ ) तथा रजोगुण आदिसे शून्य—
विशुद्ध ( प्र० उ० १ । १६ ) कहा गया है । गीतामें भी कहा है कि 'इस ज्ञानकी
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उपासना करके मेरे सदृश धर्मोंको अर्थात् निर्लेपता आदि दिव्य कल्याणमय
भावोंको प्राप्त हो जाते हैं; अतः वे न तो जगत्की रचनाके कालमे उत्पन्न
होते हैं और न प्रलयकालमें मरनेका दुःख ही भोगते हैं ।'* इस प्रकार श्रुतियों
और स्मृतियोंमे जगह-जगह मुक्तात्माकी वैसी स्थिति दिखायी गयी है । उसका
जो उन-उन अधिकारीवर्गोंके लोकोंमें जाना-आना और वहाँके भोगोंका उपभोग
करना है, वह लीलमात्र है, बन्धनकारक या पुनर्जन्मका हेतु नहीं है ।
सम्बन्ध—ब्रह्मलोकमें जानेवाले मुक्तात्माका जगत्की उत्पत्ति आदिमें
अधिकार या सामर्थ्य नहीं है, इस पूर्वोक्त बातको इस प्रकरणके अन्तमें पुनः
सिद्ध करते हैं—
भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च ॥ ४ । ४ । २१ ॥
भोगमात्रसाम्यलिङ्गात् = भोगमात्रमें समतारूप लक्षणसे; च = भी ( यही
सिद्ध होता है कि उसका जगत्की रचना आदिमें अधिकार नहीं होता )।
व्याख्या—जिस प्रकार वह ब्रह्म समस्त दिव्य कल्याणमय भोगोंका उपभोग
करता हुआ भी उनसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार यह मुक्तात्मा भी उस
ब्रह्मलोकमें रहते समय, उपासनाकालमें की हुई भावनाके अनुसार प्राप्त हुए
वहाँके दिव्य भोगोंका विना शरीरके स्वप्नकी भाँति केवल संकल्पसे या शरीर-
धारणपूर्वक जाग्रत्की भाँति उपभोग करके भी उनसे लिप्त नहीं होता । इस
प्रकार भोगमात्रमे उस ब्रह्मके साथ उसकी समानता है । इस लक्षणसे भी यही
सिद्ध होता है कि जगत्की रचना आदि कार्यमे उसका ब्रह्मके समान किसी भी
अंशमे अधिकार या सामर्थ्य नहीं है ।
सम्बन्ध—यदि ब्रह्मलोकको प्राप्त होनेवाले मुक्त आत्माकी सामर्थ्य सीमित
है, परमात्माके समान असीम नहीं है, तब तो उसके उपभोगका समय पूर्ण
होनेपर उसका पुनर्जन्म भी हो सकता है ? इसपर कहते हैं—
अनावृत्तिः शब्दादनावृत्तिः शब्दात् ॥ ४ । ४ । २२ ॥
- इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥
( गीता १४ । २ )