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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र १—३ ] अध्याय ३ २११

सूत्र १—३ ] अध्याय ३ २११
गर्भकी उत्पत्ति बताकर कहा है कि इस तरह यह जल पाँचवीं आहुतिमे
‘पुरुष’ संज्ञक होता है । इस प्रकार जन्म ग्रहण करनेवाला मनुष्य जबतक आयु
होती है, तबतक यहाँ जीवित रहता है—इत्यादि ( छा० उ० ५ । ३ । १ से
५ । ९ । २ तक ) ।
इस प्रकरणमे जलके नामसे बीजरूप समस्त तत्त्वोके समुदाय सूक्ष्म शरीरसहित
वीर्यमे स्थित जीवात्मा कहा गया है; अतः वहाँके प्रश्नोत्तरपूर्वक विवेचनसे
यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा जब एक शरीरसे दूसरे शरीरमे जाता है, तब
बीजरूपमे स्थित समस्त तत्त्वोसे युक्त होकर ही प्रयाण करता है ।
सम्बन्ध —‘इस प्रकरणमें तो केवल जलका ही पुरुषरूप हो जाना कहा है, फिर
इसमे सभी सूक्ष्म तत्त्वोंका भी होना कैसे समझा जायगा, यदि श्रुतिको यही बताना
अभीष्ट था तो केवल जलका ही नाम क्यों लिया ?’ इस जिज्ञासापर कहते हैं—
त्र्यात्मकत्वात्तु भूयस्त्वात् ॥ ३ । १ । २ ॥
त्र्यात्मकत्वात्=( शरीर ) तीनों तत्त्वोका सम्मिश्रण है, इसलिये ( जलके
कहनेसे सबका ग्रहण हो जाता है ); तु=तथा; भूयस्त्वात्=वीर्यमे सबसे अधिक
जलका भाग रहता है, इसलिये ( जलके नामसे उसका वर्णन किया गया है ) ।
व्याख्या—जगत्की उत्पत्तिके वर्णनमे कहा जा चुका है कि तीनो तत्त्वोका
सम्मेलन करके उसके बाद परमेश्वरने नाम और रूपोको प्रकट किया ( छा० उ० ६ ।
३ । ३ ) । वहाँ तीन तत्त्वोका वर्णन भी उपलक्षण है, उसमे सभी तत्त्वोका
मिश्रण समझ लेना चाहिये । स्त्रीके गर्भमें जिस वीर्यका आधान किया जाता है,
उसमे सभी भौतिक तत्त्व रहते हैं, तथापि जलकी अधिकता होनेसे यहाँ उसीके
नामसे उसका वर्णन किया गया है । वास्तवमे वह कथन शरीरके बीजभूत सभी
तत्त्वोंको लक्ष्य करानेवाला है । एक शरीरसे दूसरे शरीरमे जाते समय जीव प्राणमें
स्थित होकर जाते हैं और प्राणको आपोमय ( जलरूप ) कहा गया है, अतः उस
‘दृष्टिसे भी यहाँ जलको ही पुरुषरूप बताना सर्वथा सुसङ्गत है। इसलिये यही सिद्ध हुआ
कि जीवात्मा सूक्ष्म तत्त्वोसे युक्त हुआ ही एक शरीरसे दूसरे शरीरमे जाता है ।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातकी पुष्टि करते हैं—
प्राणगतेश्च ॥ ३ । १ । ३ ॥
प्राणगतेः=जीवात्माके साथ प्राणोके गमनका वर्णन होनेसे; च=भी ( यही
बात सिद्ध होती है ) ।

२१२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ .
व्याख्या—प्रश्नोपनिषद्में आश्वलायन मुनिने पिप्पलादसे प्राणके विषयमें
कुछ प्रश्न किये हैं । उनमेंसे एक प्रश्न यह भी है कि 'यह एक शरीरको
छोड़कर जब दूसरे शरीरमें जाता है, तब पहले शरीरसे किस प्रकार निकलता
है ?' (प्र० उ० ३ । १) । उसके उत्तरमें पिप्पलादने कहा है कि 'जब इस
शरीरसे उदानवायु निकलता है, तब यह शरीर ठण्डा हो जाता है, उस
समय जीवात्मा मनमे विलीन हुई इन्द्रियोंको साथ लेकर उदानवायुके सहित दूसरे
शरीरमे चला जाता है । उस समय जीवात्माका जैसा सङ्कल्प होता है, उस
सङ्कल्प और मन-इन्द्रियोंके सहित यह प्राणमे स्थित हो जाता है । वह प्राण
उदानके सहित जीवात्माको उसके सङ्कल्पानुसार भिन्न-भिन्न लोकों ( योनियों )
में ले जाता है ।' (प्र० उ० ३ । १० तक ) इस प्रकार जीवात्माके साथ प्राण और
मन-इन्द्रिय आदिके गमनका वर्णन होनेसे भी यही सिद्ध होता है कि बीजरूप
सभी सूक्ष्म तत्त्वोंके सहित यह जीवात्मा एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है ।
छान्दोग्योपनिषद्में जो पहले-पहल श्रद्धाका हवन बताया गया है, वहाँ
श्रद्धाके नामसे सङ्कल्पका ही हवन समझना चाहिये । भाव यह कि श्रद्धारूप
सङ्कल्पकी आहुतिसे जो उसके सूक्ष्म शरीरका निर्माण हुआ, वही पहला
परिणाम राजा सोम हुआ; फिर उसका दूसरा परिणाम वर्षारूपसे मेघमे
स्थिति है, तीसरे परिणाममे पहुँचकर वह अन्नमे स्थित हुआ; चौथे परिणाम-
मे वीर्यरूपसे उसकी पुरुषमे स्थिति हुई और पाँचवें परिणाममें वह गर्भ होकर
स्त्रीके गर्भाशयमें स्थित हुआ । तदनन्तर वही मनुष्य होकर बाहर आया । इस
प्रकार दोनों स्थलोंके वर्णनकी एकता है । प्राणका सहयोग सभी जगह है; क्योंकि
गति प्राणके अधीन है, प्राणको जलमय बताया ही गया है । इस प्रकार श्रुतिके
समस्त वर्णनकी सङ्गति बैठ जाती है ।
सम्बन्ध—अब दूसरे प्रकारके विरोधका उल्लेख करके उसका निराकरण
करते हैं—
अग्न्यादिगतिश्रुतेरिति चेन्न भाक्तत्वात् ॥ ३ । १ । ४ ॥
चेत्=यदि कहो कि; अग्न्यादिगतिश्रुतेः=अग्नि आदिमें प्रवेश करनेकी
बात दूसरी श्रुतिमे कही है, इसलिये ( यह सिद्ध नहीं होता ); इति न=तो यह
ठीक नहीं है; भाक्तत्वात्=क्योंकि वह श्रुति अन्यविषयक होनेसे गौण है ।