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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र १२--१५ ] अध्याय ४ ३५५

सूत्र १२--१५ ] अध्याय ४ ३५५
सहित जिसमे प्रतिष्ठित है, उस परम अविनाशी परमात्माको जो जान लेता है, हे
सोम्य ! वह सर्वज्ञ महापुरुष उस सर्वरूप परमात्मामे प्रविष्ट हो जाता है।'
(प्र० उ० ४ । ११) ।
इन सब श्रुतिप्रमाणोंसे यही सिद्ध होता है कि उस महापुरुषका लोकान्तर-
मे गमन नहीं होता । तथा जीवात्मासे प्राणोंके उत्क्रमणके निषेधकी यहाँ
आवश्यकता भी नहीं है; इसलिये उस श्रुतिके द्वारा जीवात्मासे प्राणोंके अलग
होनेका निषेध मानना असङ्गत है ।
सम्बन्ध—स्मृति-प्रमाणसे उसी बातको दृढ करते है—
स्मर्यते च ॥ ४ । २ । १४ ॥
च=तथा; स्मर्यते=स्मृतिसे भी (यही सिद्ध होता है)।
व्याख्या—'जिसका मोह सर्वथा नष्ट हो गया है, ऐसा स्थितप्रज्ञ ब्रह्मवेत्ता
ब्रह्ममे स्थित रहता हुआ न तो प्रियको पाकर हर्षित होता है और न अप्रियको
पाकर उद्विग्न ही होता है।' * (गीता ५ । २०) । 'जिनके पाप सर्वथा नष्ट
हो चुके हैं, जो सब प्राणियोंके हितमे संलग्न है तथा जिनके समस्त संशय नष्ट
हो चुके हैं; ऐसे विजितात्मा महापुरुष शान्त ब्रह्मको प्राप्त है।' † (गीता ५ ।
२५) । 'उनके सब ओर ब्रह्म ही वर्तता है।' ‡ (गीता ५ । २६) । इस प्रकार
स्मृतिमें जगह-जगह उन महापुरुषोका जीवनकालमे ही ब्रह्मको प्राप्त होना
कहा गया है तथा जहाँ गमनका प्रकरण आया है, वहाँ शरीरसे समस्त सूक्ष्म
तत्त्वोंको साथ लेकर ही गमन करनेकी बात कही है (१५ । ७) । इसलिये
भी यही सिद्ध होता है कि जिन महापुरुषोको जीवनकालमे ही परब्रह्म परमात्माकी
प्राप्ति हो जाती है, उनका किसी भी परलोकमे गमन नहीं होता है।
सम्बन्ध—जो महात्मा जीवनकालमें परमात्माको प्राप्त हो चुके हैं, वे यदि
परलोकमें नहीं जाते तो शरीरनाशके समय कहाँ रहते हैं ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
तानि परे तथा ह्याह ॥ ४ । २ । १५ ॥

  • न प्रहृष्येत् प्रियं प्राप्य नोद्विजेत् प्राप्य चाप्रियम् ।
    स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ॥
    † लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
    छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥
    ‡ अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥

३५६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
तानि=वे प्राण, अन्तःकरण, पाँच सूक्ष्मभूत तथा इन्द्रियाँ सब-के-
सब; परे=उस परब्रह्ममें ( विलीन हो जाते हैं ); हि=क्योंकि; तथा=ऐसा ही;
आह=श्रुति कहती है ।
व्याख्या—जो महापुरुष जीवनकालमें ही परमात्माको प्राप्त हो जाता है, वह
एक प्रकारसे निरन्तर उस परब्रह्म परमात्मामे ही स्थित रहता है; उससे कभी
अलग नहीं होता तो भी लोकदृष्टिसे शरीरमें रहता है, अतः जब प्रारब्ध पूरा होने-
पर शरीरका नाश हो जाता है, उस समय वह शरीर, अन्तःकरण और इन्द्रिय
आदि सब कलाओंके सहित उस परमात्मामे ही विलीन हो जाता है। श्रुतिमें भी यही
कहा है—'उस महापुरुषका जब देहपात होता है, उस समय पंद्रह कलाएँ
और मनसहित समस्त इन्द्रियोंके देवता—ये सब अपने-अपने अभिमानी देवताओ-
में स्थित हो जाते हैं, उनके साथ जीवन्मुक्तका कोई सम्बन्ध नहीं रहता, उसके
बाद विज्ञानमय जीवात्मा, उसके समस्त कर्म और उपर्युक्त सब देवता—ये सब-
के-सब परब्रह्ममें विलीन हो जाते हैं।' ( मु० उ० ३ । २ । ७ )।
सम्बन्ध—शरीरसम्बन्धी सब तत्त्वोंके सहित वह महापुरुष उस परमात्मामें
किस प्रकार स्थित होता है ? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—
अविभागो वचनात् ॥ ४ । २ । १६ ॥
वचनात्=श्रुतिके कथनसे ( यह मालूम होता है कि ); अविभागः=
विभाग नहीं रहता।
व्याख्या—मरणकालमे साधारण मनुष्योका जीवात्माके सहित उस परमदेवमे
स्थित होना कहा गया है तथा अपने-अपने कर्मानुसार भिन्न-भिन्न योनियोमे
कर्मफलका उपभोग करनेके लिये वहाँसे उनका जाना भी बताया गया है ( क०
उ० २ । ५ । ७ )। इसलिये प्रलयकी भाँति परमात्मामे स्थित होकर भी वे उनसे
विभक्त ही रहते हैं; किंतु यह ब्रह्मज्ञानी महापुरुष तो सब तत्त्वोंके सहित यहीं
परमात्मामें लीन होता है; अतः विभागरहित होकर अपने परम कारणभूत ब्रह्ममे
मिल जाता है । श्रुति भी ऐसा ही वर्णन करती है—'जिस प्रकार बहती हुई
नदियाँ अपना-अपना नाम-रूप छोड़कर समुद्रमे विलीन हो जाती है, उसी
प्रकार ज्ञानी महात्मा नाम-रूपसे रहित होकर उत्तम-से-उत्तम दिव्य परमपुरुष
परमात्माको प्राप्त हो जाता है ।'* ( मु० उ० ३ । २ । ८ )

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