ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र १०—१२ ] अध्याय १ ८९
सूत्र १०—१२ ] अध्याय १ ८९
'जिसमें पाँच पञ्चजन और आकाश भी प्रतिष्ठित है, उसी आत्माको मृत्युसे
रहित मैं विद्वान् अमृतस्वरूप ब्रह्म मानता हूँ।'—इस मन्त्रमे जो संख्यावाचक
'पञ्च-पञ्च' शब्द आये है, इनको लेकर पचीस तत्त्वोंकी कल्पना करना उचित
नहीं है; क्योकि यहाँ ये संख्यावाचक शब्द दूसरे-दूसरे भावको व्यक्त करनेवाले
हैं। इसके सिवा, 'पञ्च-पञ्च'से पचीस संख्या माननेपर भी उक्त मन्त्रमे वर्णित
आकाश और आत्माको लेकर सत्ताईस तत्त्व होते है; जो सांख्यमतकी निश्चित
गणनासे अधिक हो जाते है। अतः यही मानना ठीक है कि वेदमे न तो
सांख्यसम्मत स्वतन्त्र 'प्रधान'का वर्णन है और न पचीस तत्त्वोका ही। जिस
प्रकार श्वेताश्वतरोपनिषद्मे 'अजा' शब्दसे उस परब्रह्म परमेश्वरकी अनादि शक्तिका
वर्णन किया गया है, उसी प्रकार यहाँ 'पञ्च पञ्चजनाः' पदोके द्वारा परमेश्वरकी
अनेकविध कार्य-शक्तियोका वर्णन है।
सम्बन्ध—तब फिर यहाँ 'पञ्च पञ्चजनाः' पदोंके द्वारा किनका ग्रहण होता
है ? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—
प्राणादयो वाक्यशेषात् ॥ १ । ४ । १२ ॥
वाक्यशेषात् = बादवाले मन्त्रमे कहे हुए वाक्यसे; प्राणादयः = ( यहाँ )
प्राण और इन्द्रियाँ ही ग्रहण करने योग्य है।
व्याख्या—उपर्युक्त मन्त्रके बाद आया हुआ मन्त्र इस प्रकार है—'प्राणस्य
प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो ये मनो विदुः । ते निचिक्युर्ब्रह्म
पुराणमग्र्यम्।' ( ४ । ४ । १८ ) अर्थात् 'जो विद्वान् उस प्राणके प्राण,
चक्षुके चक्षु, श्रोत्रके श्रोत्र तथा मनके भी मनको जानते है, वे उस आदि
पुराण-पुरुष परमेश्वरको जानते है।' इसके वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि
पूर्वमन्त्रमे 'पञ्च पञ्चजनाः' पदोके द्वारा पञ्च प्राण, पञ्च ज्ञानेन्द्रिय, पञ्च कर्मेन्द्रिय,
मन तथा बुद्धि आदि परमेश्वरकी कार्यशक्तियोका ही वर्णन है; क्योकि उस
ब्रह्मको ही उक्त मन्त्रमे प्राणका प्राण, चक्षुका चक्षु, श्रोत्रका श्रोत्र तथा मनका भी
मन कहा गया है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि उस परब्रह्मके सम्बन्धसे
ही प्राण आदि अपना कार्य करनेमे समर्थ होते है, इसलिये यहाँ इनके रूपमे
उसीकी शक्तिविशेषका विस्तार बताया गया है।
८८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
सम्बन्ध- "माध्यन्दिनी शाखावालोंके पाठके अनुसार 'प्राणस्य प्राणम्'
इत्यादि मन्त्रमें अन्नका भी वर्णन होनेसे प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन और अन्नको
लेकर पाँचकी संख्या पूर्ण हो जाती है; परन्तु काण्वशाखाके मन्त्रमें 'अन्न'का
वर्णन नहीं है; अतः वहाँ उस परमेश्वरकी पञ्चविध कार्यशक्तियोंकी संख्या कैसे
पूरी होगी ?" ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—
ज्योतिषैकेषामसत्यन्ने ॥ १ । ४ । १३ ॥
एकेषाम्=एक शाखावालोंके पाठमे; अन्ने=अन्नका वर्णन; असति=
न होनेपर; ज्योतिषा=पूर्ववर्णित 'ज्योति'के द्वारा ( संख्या-पूर्ति की जा सकती है)।
व्याख्या—'माध्यन्दिनी' शाखावालोंके पाठके अनुसार इस मन्त्रमें ब्रह्मको
'प्राणका प्राण' आदि बताते हुए 'अन्नका अन्न' भी कहा गया है । अतः उनके
पाठानुसार यहाँ पाँचकी संख्या पूर्ण हो जाती है । परन्तु काण्वशाखावालोंके
पाठमे 'अन्नस्य अन्नम्' इस अंशका ग्रहण नहीं हुआ है; अतः उनके अनुसार
चारका ही वर्णन होनेपर पाँचकी संख्या-पूर्तिमें एककी कमी रह जाती है। अतः सूत्रकार
कहते हैं कि काण्वशाखाके पाठमें अन्नका ग्रहण न होनेसे जो एककी कमी
रहती है, उसकी पूर्ति ४ । ४ । १६ के मन्त्रमे वर्णित 'ज्योति' के द्वारा कर
लेनी चाहिये । वहाँ उस ब्रह्मको 'ज्योतिकी भी ज्योति' बताया गया है । सत्रहवें
मन्त्रका वर्णन तो सङ्केतमात्र है, इसलिये उसमे पाँच संख्याकी पूर्ति करना
आवश्यक नहीं है, तो भी ग्रन्थकारने किसी प्रकार भी प्रसङ्गवश उठनेवाली
शङ्काका निराकरण करनेके लिये यह सूत्र कहा है ।
सम्बन्ध—यहाँ यह शङ्का होती है कि 'श्रुतियोंमें जगत्के कारणका अनेक
प्रकारसे वर्णन आया है । कहीं सत्से सृष्टि बतायी गयी है, कहीं असत्से ।
तथा जगत्की उत्पत्तिके क्रममें भी भेद है । कहीं पहले आकाशकी उत्पत्ति
बतायी है, कहीं तेजकी, कहीं प्राणकी और कहीं अन्य किसीकी । इस प्रकार
वर्णनमें भेद होनेसे वेदवाक्योंद्वारा यह निश्चित नहीं किया जा सकता कि
जगत्का कारण केवल परब्रह्म परमेश्वर ही है तथा सृष्टिका क्रम अमुक प्रकारका
ही है । इसपर कहते हैं—
कारणत्वेन चाकाशादिषु यथाव्यपदिष्टोक्तेः ॥ १ । ४ । १४ ॥