ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्रोंमें उसका उत्तर देकर इस पादकी समाप्ति की जाती है—
३०० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
सम्बन्ध-इस प्रकार चार सूत्रोंद्वारा पूर्वपक्षकी उत्थापना करके अब दो
सूत्रोंमें उसका उत्तर देकर इस पादकी समाप्ति की जाती है—
न वा तत्सहभावाश्रुतेः ॥ ३ । ३ । ६५ ॥
वा=किन्तु; तत्सहभावाश्रुतेः=उन-उन उपासनाओंका समुच्चय बतानेवाली
श्रुति नहीं है, इसलिये; न= उपासनाओका समुच्चय सिद्ध नहीं हो सकता।
व्याख्या—उन-उन उपासनाओके आश्रयभूत जो उद्गीथ आदि अङ्ग हैं, उन
अङ्गोके समाहारकी भाँति उनके साथ उपासनाओका समाहार बतानेवाली कोई श्रुति
नहीं है, इसलिये यह सिद्ध नहीं हो सकता कि उन-उन आश्रयोंके समुच्चयकी
भाँति ही उपासनाओंका भी समुच्चय होना चाहिये; क्योकि उपासनाओका उद्देश्य
भिन्न है, जिस उद्देश्यसे जिस फलके लिये यज्ञादि कर्म किये जाते हैं, उनके
अङ्गोमें की जानेवाली उपासना उनसे भिन्न उद्देश्यसे की जाती है, अतः अङ्गोंके
साथ उपासनाके समुच्चयका सम्बन्ध नहीं है। इसलिये यही सिद्ध होता है
कि उपासनाओंका समुच्चय नहीं बन सकता, उनका अनुष्ठान अलग-अलग ही
करना चाहिये।
सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे इसी सिद्धान्तको दृढ़ करते हैं—
दर्शनाच्च ॥ ३ । ३ । ६६ ॥
दर्शनात्=श्रुतिमे उपासनाओंका समाहार न करना दिखाया गया है, इसलिये;
च=भी ( उनका समाहार सिद्ध नहीं हो सकता )।
व्याख्या—श्रुतिमें कहा है कि 'पूर्वोक्त प्रकारसे रहस्यको जाननेवाला ब्रह्मा
निःसन्देह यज्ञकी, यजमानकी और अन्य ऋत्विजोकी रक्षा करता है।'
(छा० उ० ४ । १७ । १०) इस प्रकार श्रुतिमें विद्याकी महिमाका वर्णन करते
हुए यह दिखाया गया है कि इन उपासनाओंका कर्मके साथ समुच्चय नहीं होता
है; क्योकि यदि उपासनाओंका सर्वत्र समाहार होता तो दूसरे ऋत्विक् भी
उस तत्त्वके ज्ञाता होते और स्वयं ही अपनी रक्षा करते, ब्रह्माको उनकी रक्षा
करनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। इससे यही सिद्ध होता है कि उपासनाएँ
उनके आश्रयभूत कर्मसम्बन्धी अङ्गोके अधीन नहीं हैं, स्वतन्त्र हैं, अतएव
समुच्चय न करके उनका अनुष्ठान अलग ही करना चाहिये।
तीसरा पाद सम्पूर्ण।
चौथा पाद
तीसरे पादमें परमात्माकी प्राप्तिके उपायभूत भिन्न-भिन्न विद्याओंके विषयमें
प्रतीत होनेवाले विरोधको दूर किया गया तथा उन विद्याओंमेंसे किस विद्याके
कौन-से गुण दूसरी विद्यामें ग्रहण किये जा सकते हैं, कौन-से नहीं किये जा
सकते ? इन विद्याओंका अलग-अलग अनुष्ठान करना उचित है या इनमेंसे
कुछका समुच्चय भी किया जा सकता है ? इत्यादि विषयोंपर विचार करके
सिद्धान्तका प्रतिपादन किया गया ।
अब ब्रह्मज्ञान परमात्माकी प्राप्तिका स्वतन्त्र साधन है या नही ? उसके
अन्तरङ्ग साधन कौन-से हैं और बहिरङ्ग कौन-से हैं ? इन सब बातोंपर विचार
करके सिद्धान्तका प्रतिपादन करनेके लिये चौथा पाद आरम्भ किया जाता है ।
यहाँ पहले परमात्माकी प्राप्तिरूप पुरुषार्थकी सिद्धि केवल ज्ञानसे ही होती है या
कर्मादिके समुच्चयसे ? इसपर विचार आरम्भ करनेके लिये वेदव्यासजी अपना
निश्चित मत बतलाते हैं--
पुरुषार्थोऽतःशब्दादिति बादरायणः ॥ ३ । ४ । १ ॥
पुरुषार्थः=परब्रह्मकी प्राप्ति; अतः=इससे अर्थात् ब्रह्मज्ञानसे होती है;
शब्दात्=क्योंकि शब्द ( श्रुतिके वचन ) से यही सिद्ध होता है; इति=यह;
बादरायणः=बादरायण कहते हैं ।
व्याख्या--वेदव्यासजी महाराज सबसे पहले अपना मत बतलाते हैं कि
‘तरति शोकमात्मवित्’— आत्मज्ञानी शोक-मोहसे तर जाता है ( छा० उ०
७ । १ । ३ ); ‘तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति
दिव्यम् ।’—ज्ञानी महात्मा नामरूपसे मुक्त होनेपर परात्पर ब्रह्मको प्राप्त हो जाता
है ( मु० उ० ३ । २ । ८ ), ‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’—‘ब्रह्मवेत्ता परमात्माको प्राप्त
हो जाता है’ ( तै० उ० २ । १ ), ‘ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ।’—
‘परम देवको जानकर सब प्रकारके पाशों ( बन्धनों ) से मुक्त हो जाता है’
( श्वेता० उ० ५ । १३ ) । इस प्रकार श्रुतिका कथन होनेसे यही सिद्ध होता है कि
परमात्माकी प्राप्तिरूप परमपुरुषार्थकी सिद्धि इस ब्रह्मज्ञानसे ही होती है ।
३०२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
सम्बन्ध—उपर्युक्त सिद्धान्तसे जैमिनि ऋषिका मतभेद दिखाते हुए
कहते हैं—
शेषत्वात्पुरुषार्थवादो यथान्येष्विति जैमिनिः ॥ ३ । ४ । २ ॥
शेषत्वात् = कर्मका अङ्ग होनेके कारण; पुरुषार्थवादः = ब्रह्मविद्याको पुरुषार्थ-
का हेतु बताना अर्थवादमात्र है; यथा = जिस प्रकार; अन्येषु = यज्ञके दूसरे अङ्गोंमे
फलश्रुति अर्थवाद मानी जाती है; इति = यह; जैमिनिः = जैमिनि आचार्य
कहते हैं ।
व्याख्या—आचार्य जैमिनि यह मानते हैं कि आत्मा कर्मका कर्ता होनेसे
उसके स्वरूपका ज्ञान करानेवाली विद्या भी कर्मका अङ्ग है; इसलिये उसे पुरुषार्थ-
का साधन बताना उसकी प्रशंसा करना है । पुरुषार्थका साधन तो वास्तवमे कर्म
ही है । जिस प्रकार कर्मके दूसरे अङ्गोंकी फलश्रुति उनकी प्रशंसामात्र समझी
जाती है, वैसे ही इसे भी समझना चाहिये ।
सम्बन्ध—विद्या कर्मका अङ्ग है, इस बातको सिद्ध करनेके लिये कारण
बतलाते हैं—
आचारदर्शनात् ॥ ३ । ४ । ३ ॥
आचारदर्शनात् = श्रेष्ठ पुरुषोंका आचार देखनेसे भी यही सिद्ध होता है
कि विद्या कर्मोंका अङ्ग है ।
व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद्मे यह प्रसङ्ग आया है कि 'राजा जनकने एक
समय बहुत दक्षिणावाला यज्ञ किया और उसमे कुरु तथा पाञ्चालदेशके बहुत-से
ब्राह्मण एकत्र हुए थे।' इत्यादि (बृह० उ० ३ । १ । १) छान्दोग्यमें वर्णन आया है कि
राजा अश्वपतिने अपने पास ब्रह्मविद्या सीखनेके लिये आये हुए ऋषियोंसे कहा—
'आपलोग सुने, मेरे राज्यमें न तो कोई चोर है, न कंजूस है, न मद्य
पीनेवाला है, न अग्निहोत्र न करनेवाला है और न कोई विद्याहीन है । यहाँ कोई
परस्त्रीगामी पुरुष ही नहीं है; फिर कुलटा स्त्री कैसे रह सकती है ?* हे पूज्यगण !
मैं अभी यज्ञ करनेवाला हूँ । एक-एक ऋत्विजको जितना धन दूँगा, उतना ही
- न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपः ।
नानाहिताग्निर्नाविद्वान्न स्वैरी स्वैरिणी कुतः ॥