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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्ग ५ ] पूर्वकाण्डम् ७७५

सर्ग ५ ] पूर्वकाण्डम् ७७५


अचरिष्यति तावत्त्वं द्वापरान्ते पुनर्मम । भविष्यति दर्शनं ते गच्छाद्यैव सुखं वस ॥ ६ ।
त्वया कृतं यत्साहाय्यं लङ्कायां मे वनेऽपि च । यत्तत्त्वं धनुगे भुक्त्वा द्वापरे ख्यातिमेष्यसि ॥ ७ ।
तथेति रामवचनाद्रामं सीतां प्रणम्य यः । जगामाश्रित्यैवं शीघ्रं राघवेणातिपूजितः ॥ ८ ।
रामः प्राह हनूमन्तं शृणु तिष्ठ यथासुखम् । यदा सेतौ पणस्वे हि द्वापरान्तेऽर्जुनेन वै ॥ ९ ॥
भविष्यति शरैः सेतुं कर्तुं मे दर्शनं तदा । त्वं लब्धिष्यसि गच्छाद्य सुखं वस मज्जपन् सदा ॥ १० ।
तद्रामवचनं श्रुत्वा नत्वा रामं च लक्ष्मणम् । सीतां प्रणम्य हनुमान गमनायोपचक्रमे ॥ ११ ॥
ततो रामो निजात्कण्ठान्नवरत्नविभूषितम् । हारं ददौ तथा सीता तं ददौ बाहुभूषणे ॥ १२॥
ततो नत्वा रामचन्द्रं सार्द्रनेत्रः स मारुतिः । परिक्रम्य ययौ वेगात्तप्तुं तु हिमपर्वतम् ॥ १३॥
ततोऽङ्गदं रामचन्द्रः पूज्य वस्त्रादिमण्डनैः । प्रेषयामास किष्किन्धां शृङ्गवेरं तु गुहकम् ॥ १४॥
पातालं प्रेषयामास राघवो मकरध्वजम् । वस्त्रादिभिश्चोपचित्वा सुहृदः स्वस्थलानि हि ॥ १५॥
ततो रामः समाहूय यूपकेतुं महामनाः । वस्त्रादिभिश्चोपचित्वा विदिशानगरं प्रति ॥ १६॥
प्रेषयामास सैन्येन सोऽपि नत्वा रघूत्तमम् । जानकीं च ययौ वेगात्स्त्रीपुत्रैः परिवारितः ॥ १७॥
एवं रामः सुबाहुं तं मथुरां प्रैषयत्तदा । एवं रामः पुष्करं च प्रेषयामास बालकम् ॥ १८॥
सैन्येन पुष्करावत्यां तक्षं तक्षशिलाह्वये । ततोऽङ्गदं गजाश्वं च प्रेषयामास राघवः ॥ १९॥
धनरत्नं चित्रकेतुं स्त्रीपुत्रबलवाहनैः । प्रेषयामास श्रीरामस्तोषितं वसनादिभिः ॥ २० ॥
ततो लवं समाहूय समीक्ष्य रघुनन्दनः । वस्त्रालंकारयानाद्यैस्तोष्य स्त्रीपुत्रसंयुतम् ॥ २१॥
उत्तरेषु कुरुष्वेनं प्रेषयामास सेनया । कामधेनुं ददौ सीता लवाय प्रसवे मुदा ॥ २२॥
ततः कुशं समाहूय रामः स्त्रीपुत्रमयुतम् । प्रेषयामास साकेतं सैन्येन पार्थिवैर्युतम् ॥ २३॥

कराएंगे। तुम भी आज ही प्रस्थान कर दो और आनन्दके साथ किसी स्थानपर निवास करो ॥ ५ ॥ ६ ॥ तुमने लङ्का और वनमे मेरी जो सहायता की है उसीके प्रभावसे द्वापरमे तुम मेरे अनुजके रूपमे विख्यात होगे। ७ ॥ रामकी बात स्वीकार करके जाम्बवान् सीताजी तथा रामको प्रणाम करके चल दिये। चलते समय रामने उनका भी अच्छी तरह सम्मान किया ॥ ८ ॥ तदनन्तर हनुमान्जीसे रामने कहा-हे वत्स ! तुम भी आनन्दके साथ इसी लोकमे निवास करो। द्वापर युगके अन्तमे जब तुम्हारी अर्जुनके साथ सेतुविषयक होड़ होगी, उस समय तुम मेरा दर्शन करोगे। अब जाओ और मेरा भजन करते हुए आनन्दके साथ रहो । ९ ॥ १० ॥ रामकी यह बात सुनकर हनुमान्जीने राम-लक्ष्मण तथा सीताको प्रणाम किया और चलनेकी तैयारी कर दी ॥ ११ ॥ चलते समय रामने अपने गलेसे एक रत्नमाला उतारकर हनुमान्जीको दी और सीताने अपना बाहुभूषण उतारकर दे दिया ॥ १२ ॥ इसके पश्चात् हनुमान्जीने आँखोंमें आँसू भरकर भगवान्को प्रणाम किया और परिक्रमा करके तपस्या करनेके लिए हिमवान् पर्वतपर चले गये ॥ १३ ॥ इसके बाद रामने अङ्गदको विविध प्रकारके वस्त्र आभूषण दिये और उन्हें किष्किन्धा भेज दिया निषादराज को शृङ्गवेरपुर भेज दिया ॥ १४ ॥ इसके बाद रामचन्द्रजीने मकरध्वजको पातालपुरी भेजा। मकरध्वजको चलते समय रामने विविध प्रकारकी भेंट दीं। इनके अतिरिक्त और-और मित्रोंको भी आदर-सत्कार करके अपने-अपने स्थानको भेज दिया । १५ । इसके बाद रामने यूपकेतुको बुलाया और विविध प्रकारके वस्त्र-भूषण देकर विदिशानगरोको भेज दिया। यूपकेतुने भी राम तथा सीताको प्रणाम किया और अपनी सेना तथा परिवारको साथ लेकर चल पड़े ॥ १६ । १७ । इसी तरह रामने सुबाहुको मथुरा भेज दिया। पुष्करको भी उनकी सेनाके साथ पुष्करावती तथा तक्षको तक्षशिला भेज दिया। फिर अङ्गदको हस्तिनापुरी-के लिए और चित्रकेतुको स्त्री-सेना तथा वाहनोंके साथ उनकी राजधानीको भेज दिया। चलते समय विविध प्रकारके वस्त्र-आभूषणोंसे रामने इनका भी सत्कार किया । १८-२० ॥ तदनन्तर राम और सीताने लव-को बुलाकर कितने ही प्रकारके वस्त्रआभूषण प्रदान किये और उनको स्त्री तथा पुत्रके साथ उन्हें उत्तरकुरु देशमें

७७६ आनन्दरामायणे [सर्गः ५

रत्नशाणानि पात्राणि क्रीडनञ्च द्विजन्मसु । नानाविधानि वस्त्राणि रामश्चिन्तामणिं ददौ ॥२४॥
मर्त्यपुत्रं कुशं तोष्य राघवो वाक्यमब्रवीत् । वत्स गच्छ मुवं विप्र भूमिं धर्मेण पालय ॥२५॥
तवदानेनृपास्सर्वेस्थास्यन्तीह वशास्तव । भवन्त्वनादराल्पस्य युवत्वञ्चशवालक ॥२६॥
इत्युक्त्वा तन्नृपानाह युष्माभिः कस्य बालकः । मवाने माननीयोऽयं रक्षणीयश्चसर्वशाम् ॥२७॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा नृपास्तं प्रत्यूचुस्ततः । अस्मासु तिष्ठत्स्वल्पोऽस्माकं शताधिकः ॥२८॥
अन्येष्वेव नात्र संशयः मन्य... रक्ष्या वयं त्वया पूर्वं रामोऽयं तद्वद्रक्षकोऽप्ययम् ॥२९॥
रक्षिष्यति मदाऽस्माकं दृष्ट्वाऽबालपराक्रमः । इत्युक्त्वा रामचन्द्रं तं नत्वा सर्वे ते दाक्षिणोत्तराः ॥३०॥
रामेण पूजिताः सम्यक् प्रभावच्छात्रवाहनैः । ययुः कुशं पुरस्कृत्य स्वस्वदेशान्समन्विताः ॥३१॥
कुशोऽपि गच्छन् नत्वा मूर्ध्नि सीताकण्ठार्पितः । वशिष्ठेन रथे स्थित्वा पुरीं गन्तुं प्रचक्रमे ॥३२॥
तदा रामश्च तद्रजकम्पदं वस्त्रापहम् । कुब्जां बडं धोतं बहुकृत्य सादरम् ॥३३॥
पूर्ववैरमनुस्मृत्य नाने... तद्धर्मिणौ ।... रजकोऽभवत् ॥३४॥
मन्थरा पूतना जाता... ... जनकम् ॥३५॥
परिवर्त्य मुखं पृष्ठे ... रुदन् रामं च जानकीम् ॥३६॥
हस्तसङ्केततः सर्वान् ... ... नगरी शुभा श्रीरामाङ्के... ॥३७॥
गत्वा पुरीं महा... ... ॥३८॥

भेज दिया । जिस प्रकार... ॥ २१-२४ ॥ इसके बाद रामने कुशको बुलाया और उस... नाना प्रकारके रत्नों और सेना आदिके साथ अयोध्या भेज दिया ॥ २५ ॥ अपने सब... प्रकारके सकलानि, वस्त्र और चिन्तामणि... रामने कुशसे कहा—हे वत्स ! अब तुम अयोध्या जाओ और... की रक्षा करो । हे पूज्य कुश ! इस जम्बूद्वीप तथा अन्यान्य द्वीपोंके रहनेवाले... करना ॥ २५-२६ ॥ ऐसा कहनेके बाद रामने उन सब राजाओंसे कहा कि... ही मानना और सदा इसकी रक्षा करते रहना ॥ २७ ॥ रामकी बात सुनकर उन राजाओंने कहा कि यह बालक कुश आपके ही तेजसे परिपूर्ण है। इस कारण मेरे लिए यह... है। हे नृपशिरोमणि, हम तो कुछ कह रहे हैं, उसे आप सत्य मानना। जिस प्रकार आप हमारी रक्षा करते आये हैं, उसी तरह यह भी हमारी रक्षा करेगा । यह बालक अवश्य है किन्तु इसका पराक्रम बालकों जैसा नहीं है। ऐसा कहकर उन राजाओंने रामको प्रणाम किया और उन्होंने सब प्रकारके छत्र आभूषण वस्त्र सवारियां आदि देकर उन्हें हंसी खुशी विदा किया । वे सब कुशको आगे करके अपनी विकल सेनाके साथ चल पड़े ॥ २८-३१ ॥ कुशने चलते समय रामको प्रणाम किया फिर माता सीताके गलेमें हाथ डाला । उसके बाद वे गुरु वसिष्ठके साथ रथपर सवार होकर अयोध्यापुरीको चलनेको तैयार हुए ॥ ३२ ॥ उसी समय रामने उस निन्दक रजक, धोबी, तथा दासी मन्थराको सादर बुलाया और कुशके साथ अयोध्यापुरी भेज दिया ॥ ३३ ॥ पिछले वैरका स्मरण करके ही रामचन्द्रजी इन दोनोंको अपने साथ स्वर्गलोक नहीं ले गये । कृष्णावतारमें वह रजक राजा कंसका धोबी होकर उत्पन्न हुआ और दासी मन्थरा पूतना हुई । श्रीकृष्णचन्द्रजीने अपने हाथों इन दोनोंका संहार किया । रथपर बैठकर चलते समय बार-बार मुँह घुमाकर कुश आँसूभरे नेत्रोंसे राम और जानकीकी ओर निहार रहे थे । इधर राम और सीता भी अपने हाथसे कुशको जानेका संकेत कर रहे थे ॥ ३४-३६ ॥ इस तरह संकेत करते हुए कुश अपनी विशाल सेना लिये हुए अयोध्यापुरीको चल पड़े । जब पुरीमें पहुंचे तो वह सारी नगरी रामके वियोगसे रोती सी दिखायी पड़ी ॥ ३७ ॥ अस्तु, कुश पुरीमें गये और बड़े उत्साहके साथ राजसिंहासनपर बैठे । इसके बाद अपने साथ आये हुए राजाओंका उन्होंने

सर्गः ५ ] पूर्णकाण्डम् ७७७


तेऽपि नत्वा कुशं स्वं स्वं स्थलं जग्मुर्नृपोत्तमाः । करभारं ददुस्तस्मै तदाज्ञावशवर्तिनः ॥३९॥
मन्थराप्रभृतौ द्वौ तौ दैवान्पुर्या बहिर्गतौ प्रापुर्जन्यं साकेते नृणां न पुनर्भवाः ॥ ४०॥
अथ रामोऽब्रवीत्सर्वान्वार्नरान् जाह्नवीतटे । मदर्थे श्रमिनः सर्वे यूयं वानरसत्तमाः ॥४१॥
द्वापराग्रे पुनः सर्वे ब्रजे गोपा भविष्यथ ।
युष्माभिः सहिताः प्रीत्या करिष्याम्यशनादिकम् ॥ ४२ ॥
तदाऽब्रवीच्च सौमित्रिं रामः प्रीत्या पुरःस्थितम् महान् श्रमः कृतः पूर्वं सेवायां मम दण्डके ॥४३ ।
भव त्वं द्वापरे ज्येष्ठः शुश्रूषां ते करोम्यहम् । ततस्तानाह राघवः प्राह स्वान्पौराञ्छकपौनपि । ४४॥
सवनिश्च मया सार्धं प्रयातेति दशन्चितः ततो ददौ कल्पवृक्षपारिजातौ सुगन्धिषट् । ४५॥
ततस्तं पुष्पकं प्राह कुबेरं वह सादरम् ।
गच्छायैव तथेत्युक्त्वा रामं नत्वा तु पुष्पकम् ॥ ४६ ॥
सीतां पृष्ट्वा ययौ शीघ्रं राघवेनाभिमन्त्रितम् ततः प्राह रघूश्रेष्ठोमिलां मांडवीं तथा ॥४७॥
श्रुतकीर्ति समाहूय वाल्मीकेश्च मुनेः पुरः युष्माभिर्भर्तृदेहैश्च निजदेहादि वेगतः । ४८।
षोडश्यां दग्ध्वा स्वर्गलोकं गन्तव्यं मम व स्वतः । तथेति राघव प्रोचुस्तदा ताश्चोर्मिलादिकाः ।४९ ।
रामं नत्वा ययुः सर्वाः स्वं स्व तद्व्रतमुद्धय । अथ रामोऽपि तां रात्रि सीताया रुक्ममञ्चके ।५०॥
ऋषिभिः शिवब्रह्म द्यसन्द्रमृयैश्च संगतः । सौमित्राद्याः पत्नीभिः शिशियरे परया मुदा । ५१ ।

इति श्रीमत्कोटिरामचरितांतर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पूर्णकाण्डे
सर्वेषां विसर्जनं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥


पूजन अभिनन्दन करके विदा किया ॥ ३८ ॥ वे राजे भी कुशको प्रणाम करके अपने अपनी नगरीको चले गये और वहाँपर कुशल क्षेमम रहते हुए पूर्ववत् करभार दत्त रहे ॥ ३९। दैववश वह रामनिन्दक धोबी तथा दासी मन्थरा ये दोनों प्रवाहापरान्तेन मरकर अयोध्याके बाहर मरे । इसी लिए उन्हें फिर जन्म लेना पड़ा । वैसे तो अयोध्यामे जो लोग मरते है, उन फिर माताक गर्भम नहीं आना पडता ॥ ४० ॥ उधर सब लोगोंको विदा करके रामने सब वानरोंसे कहा- हे वानरश्रेष्ठगण ! तुम सबने मेरे लिए बड़ा कष्ट उठाया और मेरे साथ मारे-मारे फिरत रहे । आगे चलकर द्वापरमे तुम सब गोप होओगे । उस समय मै तुम्हारे साथ भोजन तथा विविध प्रकारका ल्लायें करूंगा ॥ ४१ । ४२ ॥ इसके बाद रामने लक्ष्मणसे कहा कि उस समय तुमने दण्डकवनमे मेरी सेवा करन समय बड़ा कष्ट उठाया था। अब द्वापर युगमे तुम मेरे ज्येष्ठ भ्राता बलराम होओगे और मै स्वंई तुम्हारी सेवा करूँगा । इसके अनन्तर समस्त वानरों तथा पुरवासियोंसे कहा कि तुम लोग मेरे साथ चलो । तत्पश्चात् रामने कल्पवृक्ष और परिजात ये दोनों वृक्ष इन्द्रको दे दिये फिर पुष्पक विमानसे कहा कि तुम आज ही जाकर आदरपूर्वक कुबरकी सवारीका काम करो । यह सुनकर पुष्पक राम तथा सीताको प्रणाम करके चल पड़ा। प्रस्थान समय भगवान्ने उसका भी अच्छी तरह आदर-सत्कार किया। वाल्मीकिके समक्ष रामने माण्डवी (भरतपत्नी ), उर्मिला (लक्ष्मणकी स्त्री ) तथा श्रुतकीर्ति (शत्रुघ्नकी पत्नी ) से कहा— तुम सब अपने अपने पतिके शरीरके साथ कल अपना शरीर चिताकी अग्निमे जलाकर स्वर्गलोक चले जाना । उर्मिला आदिने भगवान्की आज्ञा स्वीकार कर ली ॥ ४३-४९ ॥ वे रामको प्रणाम करके अपने-अपने तम्बूओमे चली गयीं । इसके अनन्तर राम उस रात्रिमे सीताके साथ एक सुवर्णमय मञ्चपर सो गये । शिव-ब्रह्मा आदि देवता भी ऋषियोंके साथ वहाँ ही ठहर रहे और लक्ष्मण आदि भी अपने अपने स्त्रियोंके साथ सानन्द सोए ॥ ५० । ५१ । इति पूर्णकाण्डराघवविलाससंवादे श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पण्डितरामतेजपाण्डेयकृत 'प्रमोदना'भाषाटीकासहित पूर्णकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥

७७८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

षष्ठः सर्गः

( रामका वैकुण्ठारोहण )
श्रीरामदास उवाच

अथ रामः समुत्थाय प्रभाते सीतया सह । अजमीढं समाहूय मंजुलं वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥
अद्याहं सीतया स्वीयं पदं गच्छामि बन्धुभिः । वानरैः सकलैः पौरैस्त्वया ज्ञेयं तु यज्जलम् ॥ २ ॥
यद्गृहादिकं सर्वं प्रेषणीयं कुशं प्रति । यन्मत्र कीटक्रांतं तन्मया यास्यति वै दिवम् ॥ ३ ॥
अनन्तरं त्वं कुशं गत्वा सर्वं वृत्तं निवेदय । करोत्वौर्ध्वकार्याणि कुशोऽस्माकं सविस्तरम् ॥ ४ ॥
मा करोतु कुशोऽस्माकं खेदं तं त्वं निवारय । इति रामवचः श्रुत्वा साश्रुनेत्रस्तथेति सः ॥ ५ ॥
अजमीढस्तदा प्राह ननाम रघुनायकम् । अथ रामः मुने, पौरैः स्नात्वा भागीरथीजले ॥ ६ ॥
कृत्वा नित्यविधिं पूर्वं हुत्वा वह्निं सविस्तरम् । ददौ दानान्यनेकानि ब्राह्मणेभ्यस्ततस्ततः ॥ ७ ॥
ततः प्रास्थानिकं कर्म चकार स यथाविधि । वह्निं विसर्जयामास वैकुण्ठं प्रति राघवः । ८ ॥
तदा रामस्य पद्मा सा गता दक्षिणहस्ततः । मूर्तिरूपाश्च वेदा वैकुण्ठमायुर्मुदा ॥ ९ ॥
त्रिपदा प्रणवेनैव भोगास्त्वाद्विनिर्गता । नत्वा रामं ययौ शान्तिः क्षमा मेधा धृतिर्दया ॥ १० ॥
तेजो बलं यशः शौर्यं ययौ सर्वं तदा पुरः ततः पौरैः वानराश्च सर्वे भागीरथीजले ॥ ११ ॥
स्नात्वा निरुध्य वायूश्च निजदेहानि तत्यजुः । अथ रामो मुदा गङ्गां स्पृष्ट्वा दर्भासनोपरि ॥ १२ ॥
दर्भपाणिः स्थितस्तूष्णीमुत्तराभिमुखः स्त्रिया । तावत्सर्वे ददृशुस्ते देवा विष्णुं पुरःस्थितम् ॥ १३ ॥
चतुर्भुजं नीलकान्तिं पीतकौशेयधारिणम् कौस्तुभाङ्कितहृदयं श्रीवत्साङ्कोपशोभितम् ॥ १४ ॥
सीता बभूव सा लक्ष्मीर्विष्णोर्वामाङ्कमस्थिता शेषो बभूव सौमित्रिः फणाभिरभिभासुरः ॥ १५ ॥

श्रीरामदासने कहा — सवेरे रामचन्द्रजी सीताके साथ सबेरे उठे तो अजमीढको बुलाकर मीठी बातोंमें समझाकर कहने लगे कि आज मैं सीता बन्धुओं समस्त वानरो और प्रजाजनोंके साथ अपने परमधामकी यात्रा करूंगा ॥ १ ॥ २ ॥ मेरे जितने भी मलूकन्धान आदि वस्त्रगृह हैं, उन्हें कुशके पास अयोध्या भेज देना । बड़े जीवसे लेकर कीट पर्यन्त सब प्राणी मेरे साथ वैकुण्ठ जायँगे। मेरे चले जानेपर तुम कुशके पास चले जाना और मेरा सब समाचार कह सुनाना और यह भी कह देना कि कुश हमारी और्ध्वदैहिक क्रियाओंको खूब अच्छी तरह सम्पन्न करे । यदि मेरे परमधाम जानेके कारण कुश किस प्रकारका खेद करने लगे तो तुम उसे अच्छी तरह समझा देना । रामकी बात सुनकर अजमीढ़ने आँखोंमें आँसू भरकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और भगवान्‌को प्रणाम किया । इसके अनन्तर रामन सबके साथ गङ्गाजीमें स्नान किया, नित्यकृत्य किये, हवन किया और गङ्गातटपर स्थित ब्राह्मणोंको तरह तरहके दान दिये । ३-७ ॥ इसके बाद यात्रासे सम्बन्ध रखनेवाले जितने कर्म थे, वह सब किये । चलते समय हवनकी अग्निको वैकुण्ठधाम भेज दिया ॥ ८ ॥ उस समय रामरूपधारी विष्णुकी लक्ष्मी सात्विकी सीता रामके दक्षिण भागने वैकुण्ठधामको चली गयीं। उस समय सब वेद अपने मूर्तरूपसे वैकुण्ठधामको जा पहुँचे ॥ ९ ॥ रामके प्रणयाम करत ही शान्ति, क्षमा, मति और दया आदि गुण चले गये ॥ १० ॥ तथा तरह तेज, बल, यश और शौर्य आदि भी कुछ कर गये । इसके अनन्तर सब पुरवासियों तथा वानरोंने भी गङ्गाजीमें स्नान और प्राणायाम करके अपन शरीरोंका परित्याग कर दिया । इसके बाद सीताके साथ रामने गङ्गाजलका स्पर्श किया और कुशासनपर बैठे ॥ ११ ॥ १२ ॥ हाथमें कुशा लेकर वे उत्तरकी ओर मुख करके बैठे । उसी समय राम देवताओंके सम्मुख विष्णुभगवान्‌के रूपमें परिणत हो गये ॥ १३ । उन भगवान्‌के चार भुजायें थीं । नीलकमलके समान श्याम शरीर था। वे अपने शरीरपर पीले वस्त्र धारण किये हुए थे । कौस्तुभमणिसे उनका हृदय सुशोभित हो रहा था और श्रीवत्स उसकी निसार शोभा ही दिखा रहा था ॥ १४ ॥ गङ्गाजीके तटपर रामके वामांगमें बैठी हुई सीता लक्ष्मीके