सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ९ ] सारकाण्डम् ७९

सर्गः ९ ] सारकाण्डम् ७९


तदा मां स मुनिः प्राह यदा त्वं वानरोत्तमान् । सीताशुद्धिं कथयसि तदा पक्षौ भविष्यतः ॥ १२८ ॥
पश्यतां निर्गतौ पक्षौ कोमलौ मां क्षणादिह । यदा नीता रावणेन पुरा सीता विहायसा ॥ १२९ ॥
मत्पुत्रेण तदा दृष्टा कथितं चापि मां तदा धिक्कृतः स मया क्रोधान्मा त्वया न विमोचिता ॥ १३० ॥
तदागम्य गतः क्रोधादद्यापि न समागतः । इत्युक्त्वा तान् कपीन् पृष्ट्वा स भवादिगतेस्तदा ॥ १३१ ॥
अथ ते वानराः सर्वं प्रोचुः स्वं स्वं बलं तदा । न कोऽपि गमने शक्तः शतयोजनसागरे ॥ १३२ ॥
तदा स जांबवान् वृद्धः स्तुत्वा तं मारुतिं मुहुः । जन्मकर्मादि संश्राव्य लङ्कां गंतुं दिदेश तम् ॥ १३३ ॥
सोऽपि श्रुत्वा समुद्योगं चकाराथ पवनसुतः । निजभंगद्भूमिसंगतं कृत्वा सस्मार राघवम् ॥ १३४ ॥
एवं गिरीन्द्रे प्रोक्तं किष्किन्धाविषये कृतम् । यत्नि रावरेणेशं पुरा पापप्रणाशनम् ॥ १३५ ॥

इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे सारकाण्डे किष्किन्धाचरित्रोऽष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥


नवमः सर्गः

( हनुमान्का लंकामें जाकर सीताका पता लगाना और लंका जलाना )

श्रीशिव उवाच

अथ उड्डीय हनुमान् ययावाकाशवर्त्मना । तद्दृष्ट्वा नभले ज्ञातुं सुरसां नागमातरम् ॥ १ ॥
प्रेषयामासुस्स्वर्गाः सा शीघ्रं तत्पुरो ययौ । तदा सा मारुतिं प्राह विश त्वं वदनं मम ॥ २ ॥
स प्राह रघुवीरस्य कार्यं कृत्वा विशाम्यहम् । दृष्ट्वा तस्यास्तु निर्बन्धं व्यवर्धत तदा कपिः ॥ ३ ॥
विवर्धितं तथाऽप्यास्यं तदा सूक्ष्मो बभूव ह । अङ्गुष्ठमात्रस्तन्मया स वक्त्रे गत्वा विनिर्गतः ॥ ४ ॥


पास जाकर प्रणाम किया और अपना वृत्तांत उन्हें सुनाया । १२५-१२७॥ तब मुनिने कहा कि जब तुम वानरोंको सीताकी खबर सुनाओगे । उसी समय तुम्हारे पांख पुनः जम जायेंगे। १२८। देखो, मेरे शरीर-से ये कोमल पांखे क्षणभरमें निकल आयीं उस समय जब रावण सीताको आकाशमार्गसे ले जा रहा था ॥ १२९॥ उसी समय मेरे पुत्रने उनका देखा था और मुझसे कहा। तब मैंने उसका बहुत धिक्कारा और कहा--अरे दुष्ट ! तूने सीताको छुड़ाया क्यों नहीं ? १३०॥ तब वह कुपित होकर मेरे पाससे चला गया और आजतक नहीं लौटा। इतना कह तथा वानरसे पूछकर संपाती भी वहांसे चला गया ॥ १३१ ॥ तब वानरलोग परस्पर एक दूसरेसे अपना-अपना बल पूछा तो पता लगा कि सौ योजन विस्तारवाले समुद्रको लाँघनेके लिये कोई समर्थ नहीं है । १३२ । तब वृद्ध जाम्बवान्ने हनुमान्को बारंबार प्रशंसा की। उनका जन्म तथा बल कह सुनाया और उन्हें लङ्का जानेकी आज्ञा दिया ॥ १३३॥ हनुमान्जी भी जाम्बवान्के वचन सुन तथा अपना पुरुषार्थ स्मरण करके पर्वतपर चढ़कर कूदनेको उद्यत हुए । अपने भारसे उन्होंने पर्वतको जमीनपर धसा दिया और रामका स्मरण करने लगे ॥ १३४ ॥ हे गिरिजेन्द्र, इस प्रकार पहिले किया हुआ रामचंद्रका किष्किन्धाचरित्र मैंने तुमको सुना दिया। जो कि श्रवणमात्रसे पापोंका नाश कर देता है ॥ १३५ ॥ इति वाशत्कोटिरामचरितांतर्गत श्रीमदानन्दरामायणे सारकाण्डे किष्किन्धाचरित्रे भाषाटीकायामष्टम सर्गः ॥ ८ ॥

शिवजी बोले--तदनन्तर हनुमान् उड़कर आकाशमार्गसे लंकाको चले यह देखकर उनके बलकी परीक्षा लेनेके लिये देवताओंने नागोंकी माता सुरसाको भेजा। वह शीघ्र मार्गमें हनुमान्जीके सामने आकर खड़ी हो गयी और मुख फाड़कर हनुमान्से कहने लगी कि तू आकर मेरे मुखमें प्रवेश कर मैं तुझे खाऊँगी ॥ १॥ २॥ हनुमान्ने उत्तर दिया कि मैं श्रीरामका कार्य संपादन करके फिर आकर तुम्हारे मुखमें प्रवेश करूँगा। परन्तु उसका अधिक आग्रह देखकर कपिने अपना शरीर बढ़ाया ॥ ३ ॥ यह देखकर सुरस ने भी अपनी काया और अधिक बढ़ायी । तब हनुमान् अंगुष्ठमात्रका सूक्ष्म रूप धरके उसके मुखमें प्रविष्ट होकर

८० | आनन्दरामायणे | [सर्गः २

ज्ञात्वा साऽपि बलं तस्य स्तुत्वा तं प्रययौ दिवम्. अथाब्धिवचनान्मार्गे मैनाकः पर्वतो महान् ॥ ५ ॥
जलमध्यात्प्रादुरभूद्विश्रान्त्यर्थे हनूमतः । नानामणिमयैः शृङ्गैरभ्रम्पोषपरि नगत्कुतिः ॥ ६ ॥
धृत्वा यान्तं हनूमन्तं प्राह मैनाकपर्वतः । आगच्छामृतकल्पानि जग्ध्वा पक्वफलानि च ॥ ७ ॥
विश्रम्यात्र क्षणं पश्चाद्गमिष्यसि यथासुखम् पुरा गिरीणामिंद्रेण युद्धमासीत्सुदारुणम् ॥ ८ ॥
तदा दशरथेनाहं मोचितोऽस्म्यत्र संस्थितः अतस्तदुपकारं हि निस्तर्तुं निर्गतोऽस्म्यहम् ॥ ९ ॥
गच्छतो रामकार्यार्थं तव विश्रान्तिहेतवे तदा तं हनुमानाह रामकार्ये न मे श्रमः ॥१०।
विश्रामः स्वामिकार्येऽत्र न कर्तव्यश्च भक्षणम् । मैनाकस्त्वं पुनः प्राह स्वस्पर्शात्पावयस्व माम् ॥११
तथेति स्पृष्टशिखरः कराग्रेण ययौ कपिः । किञ्चिद्दूरं गतस्यास्य छायां छायाग्रहोऽग्रहीत् ॥१२
सिंहिकानाम सा घोरा जलमध्ये स्थिता मदा। आकाशगामिनां छायामाक्रम्याकृष्य भक्षती ॥१३।
तया गृहीतो हनुमांश्चिन्तयामास वीर्यवान् केनेदं मे कृतं वेगरोधनं विघ्नकारिणा ।.१४।
एवं विचिन्त्य हनुमानधो दृष्टिं प्रसारयन् । तत्र दृष्ट्वा सिंहिकां तां तदस्ये न्यपतत्कपिः । १५।
तस्यांत्रजालं निष्कास्य तां हत्वाऽग्रे ययौ पुनः ततोऽब्धेर्दक्षिणे कूले लंकां कृत्वा तु पार्श्वतः ॥१६॥
पपात पर्लकार्या तत्र तां रावणस्वसाम् । क्रौञ्चा हन्त्वा सिंहिकावल्लङ्कां रात्रौ विवेश सः ।।१७।
तदा लङ्कापुरी नाम्नी राक्षसी तं व्यतर्जयत् । हनुमानपि तां वाममुष्टिनाऽजयदाहनन् १८॥
तदा स्मृत्वा ब्रह्मवाक्यं सा प्राहाश्रुमुखी हरी । ब्रह्मणोक्ता पुरा चाहं यदा त्वां धर्षयेत्कपिः १९।
तदा रामो रावणस्य वधार्थमत्र यास्यति । ज्ञातं मया रावणस्य वधं रामः करिष्यति ।.२०॥
निर्विघ्नया गच्छ लंकामशोके पश्य जानकीम् ततो विवेश हनुमाल्लङ्कां पश्यन्ययौ तदा । २१॥

पार बाहर निकल आये ॥४। तब सुरसा उनका बल जान और स्तुति करके स्वर्गको चली गयीं।
पश्चात् समुद्रके कहनेसे महान् मैनाक पर्वत जलके बीचमेंसे हनुमान्के विश्रामके लिये आधसर द का उठ
खड़ा हुआ। नाना मणिमय शिखरोंक ऊपर मनुष्यका रूप धारण करके मैनाक पर्वत शाल द्वार हनुम त्सं
बोला कि आइए और मरे अमृतकल्प फलोंको खाइए । ५-७। तब ओसू क्षणभर विश्रामकरके सुखपूर्वक
आगे जाइयेगा। पूर्वसमय पर्वतोंका इन्द्रके साथ दारुण युद्ध हुआ था ॥ ८ । उस समय राजा दशरथने मुझे
बचाया था तबसे मै यहाँ आकर रहता हूँ। मै उनके उपकारके उऋण होनेके लिये ही आपके सामने
उपस्थित हुआ हूँ । ९। सो इसलिये कि रामकार्यके लिये जाते हुए आप मेरे ऊपर विश्राम करके जायें तब
मम हनुमान्ने कहा कि क्या रामके कार्यमें मुझे श्रम होगा ? और स्वामीके कार्यमें तो सदा विश्राम ही
रहता है। इसलिये मैं यहाँ ठहरकर भोजन आदि नहीं कर सकता । तब फिर मैनाकने कहा-अच्छा, कृपया आप
अपने हाथसे स्पर्श करके तो मुझे पवित्र कर दे १०, ११। 'तथास्तु' कह हनुमान्‌ह ने उसके शिखरका छूकर
चल पड़े। जब कुछ दूर आये बहत उनकी छायाको किसी छायाग्रहने पकड़ लिया । १२। वह सिंहिका
नामकी घोर राक्षसी थी। जो सदा जलमें रहा करती थी और आकाशमार्गसे उड़ते हुए पक्षियोंकी छाया
पकड़कर खींच लेती और खा जातीथी १३। उसके पकड़नेपर बलवान् हनुमान् सोचने लग कि किसने रामके
काममें विघ्न डालकर किया भंग कर रोक दिया । १४ । यह विचारकर हनुमान्ने नीचे दृष्टि की ता सिंहिका
राक्षसीको देखकर उसके मुखम ही कूद पड़े ॥१५॥ उन्होने उसका आंत निकाल ली और उसे मार डाला।
यहाँसे आगे बढ़ तो समुद्रके दक्षिण किनारे स्थित लङ्काको बगलमें स्थित परलङ्कामे जा पहुँचे । यहाँ
रावणकी लड़की क्रौञ्चानां सिंहिकाके ही समान मारकर रात्रिके समय लङ्कामें प्रवेश किया ।। १६ ।। १७।
तब उन्ह लङ्का नामकी राक्षसी डाँटने लगी । हनुमन्तने उसको भी अवहेलासे बायें हाथका एक मुक्का मारा
॥ १८ । उस समय ब्रह्माके वाक्यका स्मरण करके लङ्का आँखोस आँसू भरकर बोली कि पूर्वकालमें ब्रह्माजीने
मुझस कहा था कि जब कोई वानर तेरा अपमान करेगा ॥ १९ ॥ तब राम रावणका वध करनेके लिए यहाँ

सर्ग ९] सारकाण्डम् [८१


ददर्श लङ्कां तां रम्यां गोपुराट्टालमण्डिताम् । दृढवीथीचतुष्काढ्यां त्रिकूटशिखरस्थिताम् ॥२२॥
पश्यन्ममन्ततः सीतां प्रतिगेहं स मारुतिः । गुहायां निद्रितं कुम्भकर्णं दृष्ट्वा भयानकम् ॥२३॥
दृष्ट्वा विभीषणं रामकीर्तने हृष्टमानसम् । दृष्ट्वा सुलोचनायुक्तं निद्रितं मेघनिःस्वनम् ॥२४॥
ययौ राजगृहं रात्री रावणं मदमि स्थितम् । दृष्ट्वा स्वयं वायुपुत्रो दीपराजीव्र्यलोकयत् । २५॥
अकरोद्वख्रहीनांस्तान् रावणादीन्त्स मारुतिः । उल्मुकेनाकरोद्दग्धं कूर्चं च रावणस्य च । २६ ।
राक्षसीः कोटिशो नग्नाः कृत्वा तोयघटान्कपिः भभंज लीलया तूष्णीं दृप्तान्पुच्छेन तर्जयन् ॥२७॥
महाऽनिविह्वलाः सर्वे प्रोचुस्तेऽथ परस्परम् । क्रुद्धाऽद्य जानकी सत्यं नः प्राणान्तमुपागतम् ॥२८॥
तच्छ्रुत्वा तुष्टचित्तः स ययौ रावणमन्दिरम् । अदृष्ट्वा जानकीं तत्र ययौ पुष्पकमुत्तमम् । २९।
रावणं निद्रितं दृष्ट्वा वेष्टितं स्त्रीकदम्बकैः । दृष्ट्वा मन्दोदरीं तत्र सीतेयमिति शंकितः ।' ३०।।
लक्ष्मणोक्तानि चिह्नानि पर्यस्तस्यां ददर्श न, तथापि सीतासदृशीं दृष्ट्वा व्यग्रमनास्त्वभूत् ॥३१॥

पार्वत्युवाच
कथं मन्दोदरी सीतामदृशी राक्षसीपिता । मानांशांशांशजाः सर्वाः स्त्रियश्चेति श्रुतं मया ॥३२॥

श्रीशिव उवाच
शृणुष्व कारणं देवि सीतेयं विष्णुना चिता । तेनैव विष्णुना पूर्वमियं मन्दोदरी चिता ॥३३॥
एकदा कैकसी माता रावणं प्राह दुःखिता । क्षेपोच्छुन्मोन तल्लिङ्गं गत चाद्य रसातलम् । ३४॥
शिवाराधाय मां देहि आत्मलिंगमनुत्तमम् । तन्मातृवचनं श्रुत्वा गाण्णादरदोन्मुखम् । ३५॥
मामाह रावणो वाक्यं द्वौ वरौ देहि मां प्रभो । आत्मलिंगं च मन्मात्रे पन्त्यर्थं पार्वतीं मम ॥३६ ।


आया । सो अब मैंने जान लिया कि राम रावणका नारंग ।. २० ।। तुमने लङ्काको जीत लिया। जाओ, लङ्कामे घुसकर अशोकवाटिका में जानकीको देखो। तब हनुमान् सीताको खोजते हुए लङ्कामे घुसे ।। २१ ।।
उन्होंने पुरद्वार तथा अटारियोंसे मण्डित रम्य लङ्कानगरीको देखा। वह त्रिकूट पर्वतके शिखरपर स्थित बाजारों, सड़कों तथा चौराहोंसे रमणीक लग रही थी ।। २२ ।। हनुमान् सब ओर प्रत्येक घरमें सीताको ढूँढकर गुफामें सोता हुए कुम्भकर्णको देखा ॥ २३ ॥ उन्होंने रामनामक कीर्तनसे प्रसन्नमना विभीषणको और सुलोचनाके साथ सोए हुए मेघनादको देखा ॥ २४ ॥ तदनन्तर राजभवनमें जाकर रात्रिके समय सभामें स्थित रावणको देखा; यह देखकर वायुपुत्र हनुमान्ने दीपकोंको बुझा दिया ।। २५ ।। हनुमान्जीने उन रावणादिको नग्न करके रावणकी दाढ़ी-मूंछ आदिको लुआठोंसे जलाकर भस्म कर दिया ।। २६ ।। करोड़ों राक्षसियोंको नग्न कर दिया; सिकवेलमे रक्खे घड़ोंको फोड़ डाला और सुपीसे उद्धतर सिपाहियोंको पूंछसे खूब पीटा ।। २७ ।।
अतिशय विह्वल होकर वे सब परस्पर कहने लगे कि सचमुच सीताजी हम लोगोंपर रुष्ट हुई है। अब हम लोगोंका प्राणान्तकाल निकट आ गया है ॥ २८ । यह सुना तो संतुष्टचित्त होकर हनुमान् रावणके महलमें गये । वहाँ भी जानकीको न देखकर पुष्पकविमानपर गये ।। २९ । वहाँ रावणको स्त्रियोंके समूहसे वेष्टित होकर सोता हुआ देखा । साथ ही मन्दोदरीको देखकर 'यही सीता है क्या ?' ऐसी शङ्का करने लगे । ३० ।। परन्तु जब लक्ष्मणके कथनानुसार सीताका मुखाकृति मिलाने लगे तो नहीं मिली । फिर भी उसको सीताके समान देखकर आश्चर्यचकित हुए । ३१ । पार्वतीजीने पूछा - हे सदाशिव ! राक्षसी मन्दोदरी सीताके सदृश कैसे थी ? मैंने तो सुना है कि संसारकी सब स्त्रिये सीताके अंशांशसे उत्पन्न हुई हैं ।। ३२ ।। श्रीशिवजी कहने लगे - एक बार रावणकी माता केकसीने दुःखित होकर रावणसे कहा कि शोपनामके उच्छ्वाससे मेरा नित्य पूजा करनेका शिवलिंग पातालमें चला गया है ।। ३३ ।। ३४ ।। सो तुम एक उत्तम शिवलिंग लाकर मुझे ला दो । माताके बचनको सुना न अपने गाननसे वरदान देनेके लिए राजी करके मुझसे रावणने कहा - हे प्रभो ! मुझको दो वर दीजिए । एकतो मेरी माताके लिए आत्मलिंग और दूसरेसे

८२ आनंदरामायणे [ सर्ग ९

ततस्त्य वचनं श्रुत्वा त्वं दत्ताऽसि गिरीन्द्रजे । दत्त्वाऽऽत्मलिङ्गं संप्रोक्तो मया त्वं यदि रावण । ३७।
मार्गे लिङ्गं भूमिसंस्थं करोषि नह्यहं पुनः । नाग्रे गच्छामि तत्रस्थानान्येव च गमास्यहम् ॥३८
तथेति रावणश्चोक्त्वा देव्या लिङ्गेन सो ययौ । तदा त्वया स्मृतो विष्णुस्तेनाङ्गचन्दनादिना । ३९
कृत्वा मन्दोदरी नारी मयदन्त्येऽर्पिता शुभा । मां निनाय मयः शीघ्रं पाताले स्वीयमद्गृहम् ॥४०॥
ततो द्विजस्वरूपेण विष्णुः प्राह दशाननम् । प्रतारितः शिवेन त्वं दत्त्वा दुर्गां तु कृत्रिमाम् ॥४१।
पाताले मयगेहे सा गोपिताऽस्ति शिवेन हि । विचिन्वंस्ति त्वं स्वर्गलोकं भूलोकं चेति शंकया । ४२॥
स्वीयं मत्वा तु पाताल तत्र त्वं न गवेष्यसि । त्यजेमां कृत्रिमां दुर्गां पश्य तां मयमन्दिरि । ४३॥
गिरीन्द्रजां महाभाग्यां पत्नीं कृत्वा सुखं भज । तद्विप्रवचनं सत्यं मन्वा भामेत्य वै पुनः । ४४।
विहस्य रावणः प्राह ज्ञातं तेऽन्तर्गतं मया । अर्पिता कृत्रिमा देवी मांतां गोप्य स्थात्तले ॥४५॥
त्वयैवास्त्वधुना चेयं त्वहं नेष्यामि गोपिताम् । इत्युक्त्वा त्वां विसृज्याथ पाताल गन्तुमुद्यत ॥४६॥
तावन्मार्गे ह्युपशकायन्तः प्राह द्विजं तदा । आत्मलिंग क्षणं हस्ते धुरुं ध्व वचनान्मम ॥४७॥
यावन्निवर्त्य शकां स्वामहमेष्यामि वेगतः । द्विजवेषधरो विष्णुस्तदा प्राह दशाननम् । ४८
अतिक्रांते मुहूर्तेऽथ लिङ्गं स्थाप्य व्रजाम्यहम् । तथेति रावणश्चोक्त्वा तत्करे लिंगमर्पयत् । ४९।
ततो मूत्रस्य सा धाराऽखण्डिताऽभूच्चिरं प्रिये अतिक्रान्ते मुहूर्तेऽय लिंगे मार्गरगेधसि । ५०
पश्चिमे स्थाप्य भूम्यां स ययौ स्वीयम्थल हरिः ततः स रावणश्चापि मूत्रं कृत्वा यथाविधि । ५१।
लिंगं दृष्ट्वा भूमिस्यं तच्चिञ्चचालयत्तदा । तदा भूम्यां गतं लिङ्गं शिरः किंचित्चचाल न ५२॥
अभूद्गवां कर्णप्रमदर्शी तच्छिद्रस्थले । गतायां तच्छिलाश्चापि कर्णशंकूपमं कृतम् । ५३।

पत्नी बनानेके लिए मुझे पार्वती को दे दीजिए ॥ ३५ । ३६ ॥ हे पार्वतीजी ! उसकी वरप्रार्थना सुनकर मैने तुमको उसे दे दिया और आत्मलिङ्ग भी देकर उससे कहा—हे रावण ! देख यदि तूने इस लिङ्गको मार्गमे कही भी रख दिया तो मै आगे न जाकर वही रह जाऊँगा ॥ ३७ । ३८ ॥ 'बहुत अच्छा' कहकर रावण देवी पार्वती तथा लिङ्कको लेकर चला गया उस समय तुमने विष्णुभगवान्का स्मरण किया तब उन्होने अपने अङ्गके चन्दन आदिसे मन्दोदरीका सुन्दरी स्त्री बनाकर मय दानवको दिया। उसे लेकर मयदानव पातालके अपने मनोहर भवनको चला गया ॥ ३९ । ४० । तब विष्णुभगवान्ने ब्राह्मणका रूप धारण करके रावणसे कहा-हे दशानन ! शिवजीने तुमको ठग लिया उन्होने यह नकली पार्वती तुमको दी है ॥ ४१ ॥ असलको तो शिवजीने पातालमे मयदानवके घरमे छिपा दिया है। उन्होंने यह सोचा कि तुम स्वर्ग तथा भूलोकमे ही खोजोगे ॥ ४२ । अपना समझकर पातालमे न खोजोगे इस कारण तुम इस कृत्रिम दुर्गाको छोड़ दो और मय-दानवके घर जाकर यथार्थ पार्वतीको ढूँढ़ निकालो । ४३ । उस अत्यन्त सुन्दर पार्वतीको पत्नी बनाकर सुख भोगो । विप्रके इस वचनको सच मानकर पुनः रावण मेरे पास आया ॥ ४४ ॥ वह हँसकर बोला कि मैने आपका हृदयगत अभिप्रायको जान लिया है। आपने असली पार्वतीको पातालमे छिपाकर मुझे नकली पार्वती दे दी है ॥ ४५ । इसको अब अपने पास ही रखिए । मै तो उस छिपी हुई पार्वतीको ही ले जाऊँगा इतना कह तथा तुमको यही छोड़कर वह पातालमे जानेके लिए उद्यत हुआ ॥ ४६ ॥ रास्तेमे लघुशङ्का करनेकी इच्छावश उसने ब्राह्मणसे कहा —हे द्विज मेरी प्रार्थना स्वीकार करके क्षणभरके लिए इस शिवलिङ्गको अपने हाथमे लिये रहो ॥ ४७ ॥ मै लघुशङ्का करके तुम्हारे पास आ रहा हूँ । द्विजवेष धारण करनेवाले विष्णुने कहा—हे दशानन ! यदि अधिक देर लगेगी तो मै लिङ्गको वहींपर रखकर चला जाऊँगा । अच्छी बात है, कहकर रावणने शिवलिङ्ग उनके हाथमें दे दिया ॥ ४८ । ४९ ॥ रावण जब लघुशङ्का करने लगा तो बहुत देर तक मूत्रकी अखण्ड धारा छूटती रही । अधिक समय बीत जानेपर मार्गके पश्चिम किनारे लिङ्गको रखकर विष्णुभगवान अपने स्थानको चले गये। उसके पश्चात् रावण भी विधिवत् मूत्रत्याग करके वहीं आया ॥ ५० ॥ ५१ । लिङ्गको जमीनपर रक्खा देखकर उसके सिरको हिलाया, परन्तु भूमिगत लिङ्गका सिर नहीं हिला