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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ८ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ५३३

सर्गः ८ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ५३३

जनकजाजानिरुपययौ पश्चिमाभिमुखः ॥ १६ ॥ अथ मेरोः पश्चिमदिक्संस्थितं माल्यवन्तं
पर्वतं द्विसहस्रयोजनविस्तीर्णं चतुस्त्रिंशत्सहस्रयोजनदीर्घमतिक्रमणीयं स जनकजाजनो नयनगोचरं
चकार ॥ १७ ॥ ततश्चिमनः केतुमालं नाम षष्ठं वर्षं एकत्रिंशत्सहस्रयोजनविस्तीर्णं चतुस्त्रिंशत्स-
हस्रयोजनदीर्घं कामदेवोपास्यलक्ष्म्युपासिकाममर्षाणस्तमनोहरं स रामचन्द्रोऽनुजगाम ॥ १८ ।
तद्वर्षनृपसमूहमुकुटावतंसपरागपूजितचरणारविन्दयुगलः स रघुकुलदीपकः सीतया पुष्पकमण्डि-
तमुदमाप ॥ १९ ॥ अथ मेरोरुत्तरतः स नीलपर्वतं द्विसहस्रयोजनविस्तीर्णं नवतिसहस्रयोजनदीर्घं
रघुकुलतिलको नयनविषयं चकार । २० ॥ अथ रम्यकं नाम सप्तमं वर्षं नवसहस्रयोजनपरिमितं
मत्स्योपास्यमनूणामकशियानमधितिष्ठितः स रघुनन्दन उपजगाम ॥ २१ ॥ तत्रत्यैर्नृपतिभिः स्वको-
शादिपूजितः स रघुनायकः सीतां सुखयन् पुरतोऽनुससार ॥ २२ ॥ तस्योत्तरतः श्वेतपर्वतं द्विसहस्र-
योजनविस्तीर्णमष्टाशीतिसहस्रयोजनदीर्घमतिक्रमणीयं स स्वलोचनविषयं चकार । २३ । अथ
हिरण्मयं नामाष्टमं वर्षं नवसहस्रयोजनपरिमितं कूर्मोपास्यार्यमोपासक्रमधितिष्ठितमतिक्रमणीयं स
समुपययौ । २४ ॥ तद्वर्षगामिन्नृपदंयित्ताभिरांगभूपप्रमपिजेन्यो द्वापि जानकीचरणारविन्दयुगलवीक्षमाणः
स रघुनन्दनो मुदमाप ॥ २५ ॥ तस्योत्तरतः शृङ्गवन्तं पर्वत द्विसहस्रयोजनविस्तीर्णं त्रिसप्ततिसहस्र-
योजनदीर्घं स रघुनन्दनो ददर्श ॥ २६ ॥ अथोत्तरकुरुवर्षं नवमं नवसहस्रयोजनपरिमितं
वाराहोपास्यभूम्युपासिकाममधितिष्ठितमनोहरं स रामचन्द्रस्तमनुययौ ॥ २७ ॥ तद्वर्षवासिकृत्स्न-
पिताववन्नृपमदावनपमपिमुनकाविशिजपदनचरुहद्वंद्वः स रघुनायको मुदमाप । २८ ॥ अथ
रामो लवं जम्बूद्वीपपतिं कृतियानीति निश्चित्य कियदद्दिनं तदधिकारे विजय नाम स्वमन्त्रिणं
स्थापयामास ॥ २९ ॥ एतेषां जम्बूद्वीपांतर्गतवर्षाणां तथा मर्यादापर्वतनववर्षाणां यानि यानि नामानि


राजाओंके साथ साम संग्राम किया और बहुतोंका शरणम आ जानपर क्षमा प्रदान किया तदनन्तर शयन
कर लेते हुए वहांसे लौटकर पश्चिम दिशाकी ओर बढ़े ॥ १६ । इसके बाद मह पर्वतके पश्चिम माल्यवान् पर्वतपर
पहुंचे, जो दो हजार योजन विस्तृत तथा चौंतीस हजार योजना लम्बा था ॥ १७ ॥ इसके आगे केतुमाल नामक
छठ देशमें पहुंचे, जो इकतीस हजार योजन विस्तृत एवं चौंतीस हजार याजन लम्बा था और वहीं कामदेवकी
उपासिकाएँ रहती थीं ॥ १८ जब उस देशके राजाओंने अपना मुकुटाभिमंडित मस्तक रामचन्द्रजीके चरणोंपर
रख दिया तो सीता तथा रामको बड़ा प्रसन्नता हुई ॥ १९ ॥ फिर मेरु पर्वतके उत्तर ओर विराजमान नील
पर्वतको देखा, जो दो हजार योजन विस्तृत तथा नब्बे हजार योजन लम्बा था ॥ २० ॥ इसके अनन्तर रम्यक
नामके सातवें देशमे पहुंचे, जो नौ हजार योजन विस्तृत था । वहीं मत्स्यभगवान्के बहुतस उपासक लोग
रहा करते थे ॥ २१ ॥ वहाँके राजाओने अपना राज्यादि देकर रामकी पूजा की और रघुनाथजी सीताको
प्रसन्न करते हुए आगे बढ़े ॥ २२ ॥ उनके उत्तर ओर रामने श्वेत पर्वतको देखा, जो दो हजार योजन
विस्तृत तथा इक्यासी हजार याजन लम्बा था ॥ २३ । इसके बाद हिरण्मय नामके आठवें देशमे पहुंचे, जहाँ
अधिकांश कूर्म भगवान् तथा सूर्य नारायणक उपासक लोग रहा करते थे ॥ २४ ॥ उस देशके राजाओंकी स्त्रियोन
सब जानकीक चरणोम मस्तक रखकर प्रणाम किया तो रामचन्द्रजाको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ २५ ॥ उसक उत्तर
दो हजार योजन विस्तृत तथा त्रिहत्तर हजार याजन लम्बा शृङ्गवान् नामक पर्वतको देखा ॥ २६ । इसके
अनन्तर नवें देश उत्तर कुरुम पहुंचे, जो हजार योजन लम्बा-चौड़ा था । वहीं वाराह भगवान्के
उपासक तथा भूमिकी उपासिका स्त्रियां रहा करती थीं ॥ २७ ॥ जब उस देशके राजे तथा प्रजाने भयसे
कांपकर रामके चरणोंमें लोट गये, तब रामको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ २८ ॥ इसके बाद रामने जम्बूद्वीपके
राजाको मार डाला और मनमे यह निश्चय किया कि यहाँसे लौटकर अयोध्या पहुंचनेपर लवको जम्बूद्वीपका
अधिपति बनाऊंगा। तबतक कुछ दिनोंके लिए अपने विजय नामके मन्त्रीको वहाँकी देख भाल करनेके लिए
छोड़ दिया ॥ २९ ॥ जम्बूद्वीपके अन्तर्गत जितने राज्य थे, वे सब प्रियव्रत नामक राजाके पौत्रोंके नामसे प्रसिद्ध

४३४आनन्दरामायणे[ सर्गः ८

तानि प्रियव्रतनृपपौत्रनामसूचितानि सन्ति । तेषु ये ये नृपा जायन्ते ते तद्वर्णनामयुक्ता एव
भवन्त्यतः सर्वेषां पृथक् नामानि मयाऽत्र नोच्यन्ते ॥ ३० ॥ एवं जम्बूद्वीपमायामविस्ताराभ्यां
लक्षयोजनपरिमितमनिकपनीयं समवर्तुलं पुष्करपत्रोपमं नववर्षमण्डितं स रघुनायकः स्ववशं चकार
॥ ३१ ॥ मेरुपर्वताग्रेऽष्टपुर्योऽष्टदिक्पालानां संति । तन्पालकाः मुग्धाश्चाग्नियमनिर्रतिवरुणवायु-
कुबेरेशास्ते सर्वे ममाज्ञां परिपालयन्विति निश्चित्य स रघुनायकस्मान प्रति जगाम ॥ ३२ ॥
ता अष्टपुर्यः पृथक् पृथक् सार्धद्विसहस्रयोजनपरिमाणेनायामविस्तारतो ज्ञातव्याः ॥ ३३ ॥
मेरुलक्षयोजनयुक्तो मूर्ध्नि द्वात्रिंशत्सहस्रयोजनविततो मूले षोडशसहस्रयोजनविततश्चाधः षोडश-
सहस्रयोजनमितो भूम्यां प्रविष्टश्चतुरशीतिसहस्रयोजनमितो भूम्या बहिर्धतूरापुष्पवद्दृश्यते ॥ ३४ ॥
तत्र मेरुपर्वतग्रेऽष्टदिक्पुरीणां मध्ये ब्रह्मपुरी दशसहस्रयोजनायामविस्तारतो ज्ञातव्या ॥ ३५ ॥
सर्वे वर्षमर्यादीभूताष्टपर्वता दशसहस्रयोजनसमुन्नता ज्ञातव्याः । ३६ । वर्षदीर्घेना पर्वतासमाना
ज्ञातव्या ॥ ३७ ॥ जम्बूद्वीपस्योपद्वीपानष्टौ हैक उपदिशंति ॥ ३८ । सगरस्तनयानन्वेषण क्षां
महीं परितो निखनद्भिरूपकल्पितान् ॥ ३९ ॥ तद्यथा स्वर्णप्रस्थः चन्द्रशुक्ल आवर्तनो रमणकः
मन्दरहरिणः पाञ्चजन्य सिंहलो लङ्का चेति ॥ ४० । तेषु लङ्कां विना मप्रसु यदा यद्यत्समीपं
यदा तत्र तत्र गत्वा तत्तस्थानुपद्वीपपालकान् श्रीरामचन्द्रः स्ववशांश्चकार । ४१ । भारतेला-
वृतवर्षाभ्यां विना सप्तसु वर्षेष्वसंख्याका नद्यो गिरयश्च संति । तेषां विस्तार को वक्तुं क्षमः ॥४२॥
अथैलावृतसंस्थिता मुख्यनद्य एवोच्यन्त । ४३ ।। अरुणोदाजंबुनदी पयोदसिधुमधुगुड़ान्नांबर-
छाव्यासनाभरणसंज्ञा नदास्तदा पञ्च मधुधास्रान्वस्तथा सीताऽलकनंदाचक्षुर्भद्रेति मेरोरधश्चतुर्दिक्षु
पतिता जाह्नवीभेदाश्चत्वार एवमिलावृतनद्यः ॥४४। तासु मीता पूर्वसमुद्रं चक्षुभद्रा पश्चिमसमुद्रं
महोक्षगसमुद्रमलकनंदा दक्षिणस्यां दिशि शास्ते वर्ष जलनिधि प्रविशति ॥ ४५ ॥ भारतेऽस्मिन्


थे । जहाँका जो राजा था, उसीके नामसे वह राज्य विख्यात था। इसीलिये सबका अलग-अलग नाम मै
नही बतला रहा हूँ ॥ ३० ॥ इस प्रकार एक लक्ष योजन लम्बा चौडा, अतिशय सुन्दर एवं वर्तुलाकार कमल-
पत्रके समान विराजमान जम्बूद्वीपको उन्होंने जीत लिया ॥ ३१ ॥ मेरुपर्वतके आगे आठ दिक्पालोंकी आठ
पुरियां है। वे सब भी मेरी आज्ञाका पालन करें। ऐसा विचारके रामचन्द्रजी आगे बढ़े ॥ ३२ ॥ वे आठों
पुरियाँ अलग-अलग अढाई अढाई हजार योजन लम्बी चौड़ा है। मेरु पर्वत एक लाख योजन ऊँचा है और
उसकी चोटीपर बत्तीस हजार योजन लम्बा चौड़ा मैदान है। नीचे सोलह हजार योजन विस्तृत है और सोलह
ही हजार योजन वह पृथ्वीके भीतर समाया हुआ है चौरासी हजार योजनको लम्बाई चौड़ाईवाला यह
पर्वत धतूरेके फूलकी तरह दीखता है ॥ ३३ ॥ ३४ मेरुपर्वतके आगे पूर्वोक्त आठ पुरियोंके ब्रह्मपुरीकी लंबाई-
चौड़ाई विस्तारम ठीक दस हजार योजन है । ३५ ॥ जिन-जिन पर्वतोंपर वे आठों पुरियाँ हैं, वे प्रत्येक
पर्वत दस-दस हजार योजन ऊँच हैं ॥ ३६ । प्रत्येक पुरीका विस्तार पर्वतके विस्तारकी तरह ही समझना चाहिए
। ३७॥ जंबूद्वीपके भी आठ उपद्वीप हैं ॥३८॥ जिस समय महाराज सगरके साठ हजार पुत्र समुद्रको खोद रहे थे,
तब उन्होंने ही इन द्वीपोंकी रचना की थी । ३९ । उन आठ द्वीपकि नाम इस प्रकार हैं स्वर्णप्रस्थ, चंद्रशुक्ल,
आवर्त रमणक, मन्दरहरिण पाञ्चजन्य, सिंहल और लङ्का ॥ ४० ॥ इनमेंसे लङ्काको छोड़कर शेष सब द्वीपोंमें
आकर वहांके राजाओंको रामने अपने वशम कर लिया । ४१ । भारत और इलावृतको छोड़कर सातो देशोंमें
असंख्य पर्वत और नदियाँ है, जिनका विस्तार बतलाना कोई समर्थ नही है। ४२ । इलावृत द्वीपमें जो
मुख्य मुख्य नदियाँ हैं, उन्हें ही हम बतलाते हैं। वे हैं-॥ ४३ ॥ अरुणीदा, जंबूनदी, दूध, घी, मधु गुड़, अन्न,
वस्त्र, शय्या, आसन और आभरणसंज्ञक नदियां हैं, इनमें पाँच नदियाँ तो ऐसी हैं, जिनमें सदा मधुकी धारा
बहती रहती है। मेरु पर्वतसे सीता, अलकनंदा, चक्षु, भद्रा तथा जाह्नवी ये पाँच नदियाँ निकली है