श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ८ ] मनोहरकाण्डम् ६५९
सर्गः ८ ] मनोहरकाण्डम् ६५९
तेषां वै स्मृतयो नाम ... केचिद्वैदिकेषु कर्मस्वधिकृताः पराः ॥९१॥
अवैदिकेषु मन्त्रेषु केचिद्यज्ञरता भुवि। अवैदिकेण मन्त्रेण नाधिकारो भवेत्क्वचित् ॥९२॥
ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिस्तथा। यथोक्तं कर्म कुर्वीत विप्राणां यच्च यद्विशेषतः ॥९३॥
कदा कुत्र कथं कर्म केन कार्यमिति स्फुटम्। यच्छास्त्रं न विजानात्यथा दोषभाग्भवेत् ॥९४॥
अदेशे यत्कृतं व्यङ्गकालवेलाविहितं च यत्। प्रत्येकं बहुवक्तव्यं प्रमादेनोदितं भवेत् ॥९५॥
तस्मादावश्यकं तत्र विप्राणां च विशेषतः। स्मृत्यर्थं ज्ञानतो वापि वेदार्थज्ञानतोऽधिकम् ॥९६॥
ऋग्वेदस्योपवेदः स्यादायुर्वेदश्च हि वैदिकः। परोपकारार्थमथ स्वस्यारोग्यार्थमेव वा ॥९७॥
जीविकार्थमप्यसौ हि पठितव्यो द्विजातिभिः। श्रह्मणं रोगिणं संप्रमुपचारेण जीवयेत् ॥९८॥
अद्यान्यभावं पापं तस्य नश्यति वै ध्रुवम्। परस्य च कृतो पुण्यं चरःकृच्छ्रमनुत्तमम् ॥९९॥
एवं पुण्यं भवेत्तस्य ... यत्नं कृतेऽपि रोगार्तः प्रायश्चापुनः शयात् ॥१००॥
सोऽप्यर्धफलभाग्नेति नात्र संशयो भवेत्। जीविकार्थे ... कथं दृष्टं विद्याचतुष्टयम् ॥१०१॥
इह लोके फलं तस्य परलोके न विद्यते। ... मानवः ॥१०२॥
कस्मात्त्वं कुरुते धर्मः का वा पूजा न मानिता। ... ॥१०३॥
गतश्रीश्च गतायुश्च ब्रह्मणाश्च द्विजो मृषाः। गान्धर्वशास्त्रमधीयानो रामग्रे यश्च गायति ॥१०४॥
तद्धन्तिकुलको लभते गांधर्वं सम्मुखे हरेः। चतुर्विधा जना... तु जीविका ॥१०५॥
क्षत्रियाणां तु सा प्रोक्ता दृष्टमुभयतः। ब्राह्मणेषु परेषु पुण्यं श्रुतानुगमनः ॥१०६॥
रहता है। वह ... । जिनमें तांत्रिक प्रकारके कर्मोंका आविष्कार हुआ है। उनमेंसे कुछ लोग वैदिक कर्मोंके अधिकृत हैं। कुछ तांत्रिकपद्धतिसे सब कर्म करते हैं और कुछ बिल्कुल पशुओंकी तरह ... भी अधिकार नहीं दिया गया है ततः ... मिश्रित धर्म माने गये हैं ॥ ९३ ॥ कब कहां और कर्म करना चाहिए वे सब बात यथार्थशास्त्र के निर्णय से जानी जा सकती हैं। यदि उनसे निर्णय किये बिना कोई कर्म किया जाय तो उसका भागी बनना पड़ता है ॥ ९४ ॥ जो कर्म अदेशार्थ, अङ्गरहित, बिना समयके अथवा ... जाता है, वह सब व्यर्थ होता है और पुण्यके स्थानमें पाप ही होता ... निर्णय कर लेना आवश्यक है। तिसमें भी ब्राह्मणको तो ... आज्ञा और स्मृतिसे भी वेदकी आज्ञा विशेष मानना है ॥ ९६ ॥ ... आयुर्वेद है। उसे परोपकारके लिए अथवा अपनी आरोग्यताके लिए या ... द्विजातियोंको अवश्य पढ़ना चाहिए। यदि कोई ब्राह्मण रोगी होनेके कारण दरिद्र हो तो उसका कष्ट बढ़ाकर देना चाहिए ॥ ९७ ॥ ९८ ॥ ऐसा करनेसे दवा देनेवालेके ... हो जाता है। यही उसे चार कृच्छ्रव्रतप्रायश्चित्त करनेके पुण्यकी प्राप्ति होती है ॥ ९९ ॥ इस ... पुण्य होता है। यदि यत्न करने पर भी कोई रोगी आयु पूर्ण हो जानेके कारण बच न सके तो भी दवा देनेवालेको आधा पुण्य होता ही है। इसमें किसी प्रकारका विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। जो मनुष्य अपनी जीविका चलानेके लिए चारों उपविद्याओंका उपयोग करता है उसे इस लोकमें अवश्य फल मिलता है, किन्तु परलोकमें कुछ भी नहीं मिलता। जो मनुष्य रोगरूपी समुद्रमें डूबे हुए निर्धनी मनुष्यका उद्धार करता है ॥ १०० ॥ १०१ ॥ उसने कौन-सा धर्म नहीं कर लिया और कौन-सी पूजा नहीं की। अर्थात् उसने सब कुछ कर लिया। जिस प्राणीकी श्री नष्ट हो जाती है, वह ज्योतिर्विदोंसे द्वेष करता है। जिसकी आयु क्षीण हो जाती है वह वैद्योंसे द्वेष करता है। गतश्री एवं गतायु ये दोनों प्राणी बहुतसा द्वेष किया करते हैं। जो मनुष्य गान्धर्वविद्या (संगीत) का अध्ययन करके रामचन्द्रजीके सम्मुख गाता है, उसे उत्तम गन्धर्वलोककी प्राप्ति होती है,
| ६६० | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ८ |
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विवेकस्तस्य कर्तव्यो द्रव्यदाने विशेषतः । यस्त्वन्नस्य क्षुधितः पात्रं पानीयस्य पिपासितः ॥१०७॥
द्रव्यदाने तु कर्तव्यं विशेषात्पात्रपरीक्षणम् । गवां गतं पयो दुग्धं नागानां पयसो विषम् ॥१०८॥
पात्रापात्रविचारण मन्वाग्रे दानमुत्तमम् । यत्तु युक्तं तथा पात्रं तथा दानं फलाधिकम् ॥१०९॥
ज्ञानाधिक्यात्तपोध्याधिक्यात्पात्रं श्रेष्ठं हि जायते । रामभक्त्य... सर्वैः संमान्यो न सर्वथा ॥११०॥
रामद्वेषी वर्जनीयो दर्शनालापनादिषु । सोऽद्य चेत्पुण्डरीकाक्षं मान्यो नान्यथा ॥१११॥
पञ्चांशेनाधिकं द्रव्याद्दानं तद्विशिष्यते । वित्तादर्थेन यद्दानं न तद्दानं स्मृतं बुधैः ॥११२॥
देशकालविशेषेण पात्रपात्रविशेषतः । दानस्य फलमृद्धिश्चाधिकं न्यूनमेव च ॥११३॥
विप्रशुल्कं तु यो मूढो न दद्याच्छक्तिसंभवम् । विष्ठाकृमिर्भवत्येव मुनीनां च संमत्या ॥११४॥
दिव्यवर्षाणि नैवात्र त्वया कार्यस्तु संशयः । यत्तु ज्ञानवता कर्म क्रियते पुण्यदायकम् ॥११५॥
अधिकं तत्फलं प्रोक्तमज्ञानिकृतकर्मणः । यथा यथाधिकं ज्ञानं पापहानिस्तथा तथा ॥११६॥
यत्तु ज्ञानरतः कर्म क्रियते पापकारकम् । तन्न्यूनफलदं ज्ञेयमज्ञानीकृतपातकात् ॥११७॥
यथा यथाऽधिकं ज्ञानं पापहानिस्तथा तथा । यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुते क्षणात् ॥११८॥
ज्ञानाग्निर्दग्धकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा । यथाधिक्यं यथा हेम्नो वह्निसंगेन जायते ॥११९॥
पुण्याधिक्यं तथा शिष्य ह्यग्निसंगेन जायते । पुण्ये न वर्द्धते पुण्यं पापं न्यूनं च जायते ॥१२०॥
पापेन पापवृद्धिस्तु पुण्यं स्वल्पं च जायते । अयं सूक्ष्मो विचारोऽयं दुर्ज्ञेयः स्थूलदृष्टिभिः ॥१२१॥
तथाप्येष विचार्यो स्यात्तज्ज्ञानानुसारतः । यस्तु सन्त्यधिकारेऽपि ज्ञाने वा पठनेऽपि वा ॥१२२॥
धनुर्वेद और दण्डनीति, ये दोनों ब्राह्मणको अविहित हैं ॥१०३-१०५॥ किन्तु क्षत्रियोंको वे वेदके उक्त फल देते हैं। ऊपर बतलायी हुई सब बातोंमें ज्ञानके अनुसार ही पुण्य होता है। इसलिए लोगोंको चाहिए कि विशेष करके द्रव्यदानके विषयमें विचार करें, भूखको अन्नदान और प्यासेको पानी पिलाना श्रेष्ठ धर्म है ॥१०६। १०७। द्रव्यदान देते समय पात्रका विचार करना आवश्यक है क्योंकि दुष्ट गोमें भी दूध होता है और सर्पके पेटमें दूध जानकर दूध का विष बन जाता है ॥१०८॥ इस तरह पात्र और अपात्रका विचार करके सन्यासम दान देना अच्छा है। दानका पात्र जितना ही अच्छा होगा, उतना ही अधिक पुण्य होगा ॥१०९॥ इस पात्र और अपात्रका विचार ज्ञानकी अधिकता, पुण्यकी अधिकता तथा परिश्रमकी अधिकता देखकर किया जाता है। जो मनुष्य रामका भक्त है, वही पात्र है और जो रामभक्तिसे रहित है, उसीको अपात्र जानना चाहिए। जो मनुष्य रामसे द्वेष रखता हो, उसका दर्शन और उससे सम्भाषण आदि कदापि न करें। जो मनुष्य भक्तिका मार्ग करता है, वह अपवित्र मनुष्य भी पवित्र हो जाता है ॥११०। १११॥ अपनी शक्तिसे अधिक जो दान दिया जाता है वही दान दान है और कंजूसीके साथ जो दान दिया जाता है, वह दान दान नहीं है ॥११२॥ देश, काल एवं पात्र अपात्रका विशेषताके अनुसार अधिक या न्यून फल कहा गया है ॥११३॥ जो मनुष्य ब्राह्मणको पारिश्रमिक नहीं देता, वह उन पैसोंकी संख्याके अनुसार दिव्य वर्षों तक विष्टाका क्रिमि बना रहता है। इसमे किसी प्रकारका संशय नहीं करना चाहिये। ज्ञानवान् मनुष्य जिन पवित्र कर्मोंको करता है अज्ञानियों की अपेक्षा उसे अधिक फल मिलता है जैसे-जैसे ज्ञानकी मात्रा बढ़ती जाती है वैसे-वैसे उसके पाप नष्ट होने लगते है ॥११४-११६॥ ज्ञानी मनुष्य यदि कोई पाप करता है तो अज्ञानियों द्वारा किये पातकोंकी अपेक्षा उस पापका भी न्यून ही कुफल मिलता है ॥११७॥ जैसे जैसे ज्ञान होता जाता है वैसे-वैसे पाप अपने आप नष्ट होते जाते हैं। जिस तरह जलती हुई अग्नि लकड़ियोंको जलाती है, उसी तरह ज्ञानाग्नि समस्त कर्मोको भस्म कर डालती है। जिस तरह अग्निके संयोगसे कंचनकी कान्ति अधिक हो जाती है, उसी तरह अनियोंका भस्म करनेसे पुण्यकी मात्रा बढ़ती जाती है। पुण्यसे पुण्य बढ़ता है और पाप कम होता जाता है ॥११८-१२०॥ पापसे पापकी वृद्धि होती है और पुण्य कम होता जाता है यह बड़ा ही सूक्ष्म विचार है और स्थूलदृष्टिवालोंके लिए तो और
सर्गः ९] मनोहरकाण्डम् ६६१
प्रयत्नं नैव कुर्वीत न नरो जायते पशुः । ज्ञातव्यमर्थं मतिमान् स्वयमेव विचारयेत् ॥ १२३॥
इति संक्षेपतः प्रोक्तमेतत्ते पृष्टमेव यत् । मया तदर्थं चावधार्य स्वयं निश्चयमाप्नुयात् ॥ १२४॥
धर्मास्तु बहवः सन्ति तथा पापानि भूरिशः । विविधानि च पापानि प्रायश्चित्तानि यानि वै ॥ १२५॥
कर्तव्यानि जनैस्तानि सम्यग्बुद्ध्या विचार्य च । सर्वधर्माणां सारश्च रहस्यं तु मयोदितम् ॥ १२६॥
ग्रहणीयं प्रयत्नेन न ह्यभक्ताय दीयताम् । शुश्रूषवे साधवे च रामभक्ताय दीयताम् ॥ १२७॥
इति शतकोटिरामचरितान्तर्गतायां श्रीमदानन्दरामायणे मनोहरकाण्डे अष्टमः सर्गः ॥८॥
सर्वदा दर्शनात्फलश्रुतिर्नाम नवमः सर्गः ।
नवमः सर्गः
रामकाण्डस्य पूजाविधिः
गुरोऽन्यद्रामचन्द्रस्य विशेषेण च पूजनम् । कस्मिन्काले प्रकर्तव्यं तं कालं वदस्व माम् ॥ १ ॥
श्रीरामदास उवाच -
शृणु शिष्य प्रवक्ष्यामि कालं पुण्यतमं शुभम् । रामचन्द्रस्य पूजार्थं विशेषतः ॥ २ ॥
माघस्य शुक्लपक्षस्य या तु पञ्चमी तिथिः । श्रीपञ्चमीति विख्याता त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥ ३ ॥
तदारभ्य साधनामादयं रामं महोत्सवैः । पूजयेत्सर्वदा यावद्वैशाखे कृष्णपञ्चमीम् ॥ ४ ॥
माघकृष्णचतुर्थ्याश्च नवमीं मधुशुक्लजाम् । यावत्केवलफलाहारैः चतुरशीति दिनानि हि ॥ ५ ॥
सीतारामस्य नित्यं हि केचित्कुर्वन्ति पूजनम् । पूर्णिमान्ताः स्मृताश्चात्र मासाः सर्वत्र भो द्विज ॥ ६ ॥
प्रत्यहं वाहना रूढं कृत्वा रामं महोत्सवैः । भेरीदुन्दुभिनिर्घोषैर्महावाद्यपुरःसरैः ॥ ७ ॥
नां कठिन है ॥ १२१ ॥ यह सब होते हुए भी तत्वज्ञानके अनुसार इसका विचार करना ही चाहिए। जो मनुष्य अधिकारी होता हुआ भी ज्ञानके लिए प्रयत्न नहीं करता, वह पशुयोनिमें जन्म पाता है। ज्ञान अथवा अध्ययनका विप्रका पुण्य कहना हुआ ॥ १२२, १२३ ॥ हे अनघ ! तुमने जो कुछ पूछा, मैंने उसे संक्षेपमें कह सुनाया; लोगोंको चाहिए कि इसका भलीभाँति विचारपूर्वक निश्चय कर लिया करे । १२४ ॥ पुण्य और पाप ये दोनों बहुत प्रकारके हैं । पाण्डवोंको यदुपतिने पापके प्रायश्चित्त बतलाये हैं । १२५ ॥ लोगोंको चाहिए, कि उनका अपनी बुद्धिसे अच्छी तरह विचार करें । सब धर्मोंका सार एवं रहस्य मैंने तुम्हारे आगे कह सुनाया । इसे यत्नके साथ ग्रहण करना चाहिए। इस भक्तिविहीन प्राणीको न देकर उसे देना चाहिए, जो शुश्रूषु, साधु एवं रामभक्त हो । १२६, १२७ ॥ इति शतकोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्द-रामायणे पं० रामतेजपाण्डेयकृत ज्योतिराभाटीकासहित मनोहरकाण्डे अष्टम सर्गः ॥ ८ ॥
श्रीविष्णुदासने कहा—हे गुरो ! रामचन्द्रजीका विशेष पूजन किस समय करना चाहिए । वह समय आप मुझे बतलाइये ॥ १ ॥ श्रीरामदासने कहा—हे शिष्य ! सुनो, मैं तुम्हें रामकी पूजाका परम पुनीत समय बतलाता हूँ। रामचन्द्रजीका पूजन करनेके लिय वह समय बहुत ही उपयोगी होता है । माघमासके शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथि बड़ी ही पवित्र तिथि है । श्रीपञ्चमी उसका नाम है । इसी नामसे वह तीनों लोकमें विख्यात है ॥ २ ॥ ३ ॥ तबसे लेकर जबतक वैशाखके कृष्णपक्षकी पञ्चमी न आ जाय अर्थात् ढाई महीनेतक महान् उत्सवोंके साथ रामचन्द्रजीका पूजन करे ॥ ४ ॥ माघके कृष्णपक्षकी चतुर्थीसे चैत्रके शुक्लपक्षकी नवमी तक अर्थात् इक्यासी दिन केवल फलाहार करके रहे ॥ ५ ॥ जो लोग नित्य सीतारामका पूजन करते हैं, उनके लिए पूर्णिमान्त ही मास माना जाता है ॥ ६ ॥ प्रतिदिन वाहनपर बैठे हुए रामको भेरी-दुन्दुभी आदि बाजे-गाजे, वेश्याओंके नृत्य, छत्र, चमर, तोरण, विविध प्रकारकी पुष्पवर्षा, नाना प्रकारके स्तोत्रपाठ, तरह-तरहके सुगन्धित
| ६६२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ९ |
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वारस्त्रीणां नृत्यगीतैश्छत्रचामरदर्पणैः । नानाकुसुमवर्षाद्यैर्नानास्तोत्रादिपाठतः ॥८॥
नानापरिमलद्रव्याञ्जलीनां मोचनादिभिः । नानामांगल्यवस्तूनामञ्जलीभिः सुशोभनैः ॥९॥
नानाकुसुमगन्धानां तैलानां च परस्परम् । सेचनैश्च वारनार्यश्च जलयन्त्रैः करे धृतैः ॥१०॥
मुहुर्मुहुः सिञ्चनाद्यैस्तथा वाजां सुगायनैः । द्विजानां वेदघोषैश्च धूपैर्नीराजनदिभिः ॥११॥
सहकाराराममध्ये नीत्वैवं परमोत्सवः । सहकारवृक्षबद्धदोलके तं निवेशयेत् ॥१२॥
नागेन वा पुष्पकेण शेषयानेन दन्तिना । रथेन गरुडेनापि तथा सिंहासनेन च ॥१३॥
तथा शिविकया वापि वायुपुत्रेण वा तथा । रामं सर्वोत्सवैर्नित्यं सदा नेयो रघूत्तमः ॥१४॥
आम्रवृक्षाराममध्ये वल्लीपुष्पवनाश्रिते । अवनिं चन्दनैर्लिप्त्वा विकीर्य कुसुमानि च ॥१५॥
आच्छाद्य नानावस्त्रैश्च शोभनायाऽऽलिभिः शुभां । हेमसिंहासनंश्चैव कृत्वा दोलकमुत्तमम् ॥१६॥
चूतवृक्षस्य शाखायां तं बद्ध्वा शृङ्खलादिभिः । तत्र श्रीरामतो भद्रे रामचन्द्रं प्रपूजयेत् ॥१७॥
नानाविधैर्भिः पुष्पैः षोडशोपचारकैः । भार्यया भ्रातृभिः पश्चात्सुग्रीवाद्यैः समान्वितम् ॥१८॥
आंदोलयेद्दोलकं तं शिशुबालकवच्छनैः । नर्त्तयित्वा वारयोषित्सदाऽग्रे शनकैर्मुदा ॥१९॥
गायनीया गायकांश्च नर्त्तयित्वा नटांस्तथा । वादनीयानि वाद्यानि ज्वालनीयाः सुधूपकाः ॥२०॥
वीजनीयाश्चामराद्यैः सीतया रघुनन्दनः । नटैश्च कीर्तनांश्चैव कारयित्वा महोत्सवैः ॥२१॥
पुनः पूज्य पूर्ववच्च समानीतो गृहं प्रति । मङ्गलनीयः श्रीरामः कुमदारार्णिकदादिभिः ॥२२॥
एवं नित्यं सार्धमासद्वयं रामं प्रपूजयन् । चूतवृक्षतले नीत्वा पूजयेच्च सविस्तरम् ॥२३॥
यदा रामश्च सीता च वहिर्नेया निजगृहात् । तदा तयार्नयनाधः कस्तूर्यांगुलिनाऽसिताः ॥२४॥
देयाश्च बिंदवो यस्मात्पग्दुर्दृष्टिनोभनाः । एवं दोलापूजनं च शिष्य ते कथितं मया ॥२५॥
विशेषं शृणु तत्रापि कथ्यते यो मयाऽधुना । वसंतपूजनात्पूर्वदिवसे गणनायकम् ॥२६॥
माघशुक्लचतुर्थ्या हि पूजयेद्विघ्ननाशनम् । माघशुक्लचतुर्थ्यां तु नक्तव्रतपरायणः ॥२७॥
द्रव्योंका अंजलीदान, विविध प्रकारक पुष्पोंकी वर्षा, रंग से परस्पर वेश्याओंके पिचकारी छोड़ने, स्त्रियोंके सुन्दर गायन, ब्राह्मणोंके वेदघोष, धूप नीराजन आदि करता हुआ आम्रके बगीचाम ले जाय और वहां भगवान्को आम्रवृक्षमें पड़े हिंडोलेपर बिठावे ॥ ८-१२ ॥ हाथी से, पुष्पकसे, शेषकी सवारीसे, घोड़ेसे, रथसे, गरुडसे, सिंहासनसे, शिविका द्वारा तथा वायुपुत्र द्वारा इन सब सवारियोंपर रामको ले जाना चाहिए ॥ १३ ॥ १४ ॥ आम्रवृक्षके बगीचे जिसमें कि वल्लरियों तथा पुष्पोंके वृक्ष लग हों, पृथ्वीको चन्दनसे लीपकर फूल बिखरे । १५ ॥ नाना प्रकारके वस्त्रोंसे ढंककर उस पृथ्वाको श्रृंगार करे । सुवर्णका सिंहासन बनाकर श्रृंखला आदि-के द्वारा आमके वृक्षमें झूला डालकर रामको बिठावे और सर्वतोभद्र बनाकर उनकी पूजा करे ॥ १६ ॥ १७ ॥ तदनन्तर विविध तथा नौ प्रकारके फूलों एवं षोडश उपचारोंसे सीता, बन्धु तथा सुग्रीव आदि मित्रोंके साथ भगवान्का पूजन करके बच्चोंकी तरह उस झूलेको धीरे-धीरे रस्सी खींचकर झुलाये । उनके आगे सैकड़ों वेश्यायें नचायें, गायकोंसे गाने गवाये, नटोंसे नृत्य करायें, विविध प्रकारके बाजे बजवाये और नाना प्रकारके धूपदीप आदि जलाये ॥ १८-२० ॥ सीता तथा रामपर चमर आदि ढाँके और रामभक्तोंको बुलाकर कीर्तन आदि कराये ॥ २१ ॥ इसके बाद पूर्वोक्त विधिके अनुसार फिर पूजन करके रामचन्द्रजीको घरपर ले आये । घर पहुंचनेके बाद भी कलश, दीप तथा आरती आदिसे रामकी पूजा करे ॥ २२ ॥ इस तरह प्रतिदिन ढाई महीने तक आम्रवृक्षके नीचे भगवान् रामका पूजन करे ॥ २३ ॥ जब राम और सीताको घरसे बाहर जाना हो तो उनकी आंखोके नीचे कस्तूरीकी काली बिन्दी लगा दे ॥ २४ ॥ इसको लगानेसे लोगोंकी दुर्दृष्टि उनपर नहीं पड़ेगी । हे शिष्य ! इस प्रकार मैंने तुम्हें दोलापूजनका प्रकार बतलाया । २५ ॥ इसमें भी जो
सर्गः ९ ] मनोहरकाण्डम् १६१
ये ढुंढिं पूजयिष्यन्ति तेऽर्च्याः स्युःसुरपुंगवन्। माधवाग्रे चतुर्थी तु तस्मिन्काल उपोषितः ॥२८॥
अर्चयित्वा विघ्नराजं यात्रां तत्र कारयेत्। चतुर्थी कुन्दनाम्नीयं कुन्दपुष्पैः प्रपूजयेत् ॥२९॥
माघशुक्लपंचमी सा ज्ञेया धीवरैर्परा शुभा । तस्यां तीर्थं रघुनाथमर्चयेद् गंधचंदनैः ॥३०॥
माघशुक्लचतुर्थ्यां तु वरमागत्य च श्रिया । पञ्चम्यां कुन्दकुसुमैः पूजां कुर्यात्ससृद्धये ॥३१॥
नीत्वा रामं चूतवृक्षमूले दोलस्थमीश्वरम्। सीतारामं पूजये च गेहे चाऽथ प्रपूजयेत् ॥३२॥
प्रवृत्ते मधुमासे तु प्रतिपद्दिने रवौ। कृत्वा चावश्यकार्याणि संतर्प्य पितृदेवताः ॥३३॥
वंदयेद्दोलिकाभूमिं... भूरिद्रुतोपशांतये यदिच्छसि सुखेंद्रेण बहुधा सुकृतेन च ॥३४॥
अतस्त्वं पाहि मां देवि भूते भूतिप्रदा भव। चैत्र मसि महापुण्य पुण्ये तु प्रतिपद्दिने ॥३५॥
यस्तत्र श्वपचं स्पृष्ट्वा स्नानं कुर्यान्नरोत्तमः। न तस्य दुरितं किंचिन्नाधयोव्याधयो नृप ॥३६॥
वृत्ते तुषारसमये सितपञ्चदश्याः प्रातर्वसन्तसमये मधुप्रारंभने च ।
प्राश्याय चूतकुसुमं सह चंदनेन नित्यं हि विप्रपुरुषोऽथ समाः सुखी स्यात् ॥३७॥
चूतमग्रं वसंतस्य माकरं कुसुमं नवं मन्मदनं विवृण्वन् सर्वकामार्थसिद्धये ॥३८॥
पञ्चम्यां माधवस्यापि चूतपुष्पं सचन्दनम् प्राशयेन्नरोऽपि वा गलकंठो भविष्यति ॥३९॥
चूतपुष्पप्राशनेन कोकिलास्वादवन्म्रुदुः भविष्यति मानवानां कलकंठो मनोरमः ॥४०॥
सीताराम मधूपूवैस्तथा कोमलपल्लवैः पूजयेत्त्वन्वहं भक्त्या दोलोत्सव महोत्सवैः ॥४१॥
चैत्रकृष्णप्रतिपदि चूतपुष्पं सचन्दनम् पीत्वा मनोरमं ज्ञेयं सीतारामं प्रपूजयन् ॥४२॥
विशेष बात है, उन्हें बतला रहा हूं। वसन्तऋतु में एक दिन आकर गणेशजीका पूजन करे ॥२५॥२६॥ माघशुक्ल चतुर्थीको गणपति का पूजन तथा उपवास करना चाहिये। ... ... ... अन्न और गणपतिको पूजन करता है, वह प्राणी देवताओं तथा असुरोंका भी पूज्य होता है ॥२७॥२८॥ शास्त्रोंका विधि है कि माघशुक्ल की चतुर्थीको उपवास करके गणेशजी का पूजन और ... ... करना चाहिये। इसका नाम 'कुन्द चतुर्थी' है। इसलिये इस दिन कुन्दके पुष्पसे गणेशजीका पूजन करना चाहिये ॥२९॥ माघशुक्लकी पञ्चमीको 'श्रीयञ्चमी' समझकर उस रोज रामचन्द्रजीका श्वेत चन्दन करना चाहिए। इससे यह मतलब निकला कि माघ शुक्ल चतुर्थीको श्रीसे पूजन करके पञ्चमीको कुन्दके फूलसे अपनी समृद्धिके लिये पूजन करे ॥३०॥३१॥ विशेष अच्छा तो यह हो कि रामचन्द्रजीको आम्रवृक्षके नीचे ले जाय और झूलेमें बिठाकर पूजन करे। यदि ऐसा न कर सके तो घर ही में पूजन कर ले ॥३२॥ चैत्रमास लगते ही प्रतिपदाको सूर्योदयके समय आवश्यक कामोसे निपटकर पितरोंका तर्पण करे और सब प्रकारके दुःखोंकी शान्तिके निमित्त होलिकाभूमिकी वन्दना करना चाहिये। हे देवि ! ब्रह्मा तथा विष्णुजीने आपकी वन्दना की है॥३३॥३४॥ अतएव हे देवि ! तुम मेरे लिये भी विभूतिदात्री बन जाओ। परम पवित्र चैत्रके महीने में पुण्य नक्षत्र और प्रतिपदाको जो मनुष्य श्वपच (चाण्डाल) को छूकर स्नान करता है, उसे न किसी प्रकारका पातक लगता है और न किसी प्रकारके आधि व्याधि ही सताती है ॥३५॥३६॥ जाड़ेके दिन बीत जाने और बसन्त ऋतुके अन्दर वसन्तपञ्चमीके पूर्णिमाको प्रातःकाल चन्दनके साथ आमका बौर चटे तो हे विप्र ! वह प्राणी साल भर बहुत सुखमें रहता है ॥३७॥ बौरको चाटते समय 'चूतमग्रं वसन्तस्य' यह मन्त्र पढ़ना जाय, जिसका मतलब होता है कि हे सहकार वृक्ष ! मैं वसन्तऋतुके अग्रिम भागमें तुम्हारा फूल चन्दनके साथ इस वास्ते चाट रहा हूं कि मेरी सब अभिलषित कामनायें पूर्ण हो जायें ॥३८॥ माधवमासकी बसन्ती पञ्चमीको भी चन्दनके साथ बौर चाटना चाहिये। ऐसा करनेसे उसका स्वर कोकिलके समान मीठा हो जाता है ॥३९॥ उस दिन आम्रपुष्पका प्राशन करनेसे प्रत्येक मनुष्यका स्वर कोयलके स्वरकी तरह मीठा हो सकता है ॥४०॥ प्रतिदिन नूतन म्रुग अथवा वस्त्रको झूलेमें बिछाकर बादामके बौर तथा कोमल पल्लवोंसे सीतासह पूजन करे ॥४१॥ चैत्रकृष्णाकी प्रतिपदाको चन्दनके साथ आम्रका
६६४ आनन्दरामायणे [ सर्ग ९
एवं त्रयश्च दिनं नीत्वा ततश्चैवोपरिष्टात् । ततोऽप्यायुर्विवृद्ध्यर्थं दीनानां चैव दत्तः परम् ॥४३॥
पञ्चम्यन्तं चोपरिष्टादपि श्रीराघवार्चनम् । स्नात्वा केशालवालैस्तु कस्तूर्याद्यैः सुभावितैः ॥४४॥
विचित्रवस्त्रं च परिधाय गन्धादिना सुशोभनम् । ततोऽप्यायुर्विवृद्ध्यर्थं नृपतिर्वस्त्राणि ॥४५॥
जनस्यै रामचन्द्राय दत्त्वा परिधाय पुनः । केव दत्त्वा गजैश्च वासांसि विचित्रानि हि ॥४६॥
दत्त्वा राजाय सीतायै ततो गच्छन् नृपोटजे । सर्वमङ्गलपूर्वेण नानामङ्गलपूर्वकम् ॥४७॥
नानादानानि देयानि स्वशक्त्या च प्रयत्नतः । नानारङ्गाणि संहृत्य गृहीत्वा च परस्परम् ॥४८॥
एकोऽपि विचित्राणि भक्ष्यपेयानि खादयेत् । मित्रादिभिर्युतोऽद्यान् स्वयं वापि मुहुर्मुहुः ॥४९॥
आक्रव्य तु वसन्तौ पञ्चम्यां मानवैरित्थं मुदान् । वसन्तपञ्चमी नाम्नी महापुण्यात्मिका स्मृता ॥५०॥
पक्षे पक्षे तु पञ्चम्यामर्चयेत् माधवमन्दिरे । एवं गमं पञ्चमेव यावद्वैशाखपञ्चमी ॥५१॥
विशेषेण नावर्च्चां के पक्षे दक्षे प्रपूजयेत् । अथवा पादशुक्लायां कृष्णायां चैत्रमासि वै ॥५२॥
कृष्णायां माधवे चापि पञ्चम्यन्तं प्रपूजयेत् । महोत्सवेन श्रीरामं दोलास्थोऽपि स्थितस्ततः ॥५३॥
ततश्चैव शुक्लपक्षे प्रतिपदि मधोर्नराः । तैलाभ्यङ्गं स्वयं कृत्वा रामस्याप्युद्वर्तनं चरेत् ॥५४॥
पञ्चम्यन्तमेतच्च न यावत्स्यान्नवमी तिथिः । उत्तमाङ्गं न तैलेन मर्दयेन्नरो नरकं व्रजेत् ॥५५॥
तैनाभ्यङ्गमकुर्वाणो नरकं प्रतिपद्यते । अथ नैऋतकोणे नामि प्रदे चैत्रे महोत्सवे ॥५६॥
पुण्येऽह्नि विप्रकथिते प्रपादानं समारभेत् । ततस्तु सर्वप्राण्यर्थं प्रपादानं समाचरेत् ॥५७॥
अरण्ये निर्जले देशे पथि ग्रामेऽथवा गृहात् । ततस्तैर्नामान्याहूतैः प्रपादानं समाचरेत् ॥५८॥
अस्याः प्रदानात्पितरस्तृप्यन्तु हि पितृभिः सह । ततो मासद्वयं देयं जलं मासचतुष्टयम् ॥५९॥
देवालयेषु विप्रार्थं देयं स्याच्छयनासनेति । पङ्के दानुशक्तेन विशेषान्मधर्ममीप्सुता ॥६०॥
और फांकर सीताजीका पूजा करना चाहिये। ... ३ दिन तथा आगेवाले तीन दिन बिताकर आगेवाले तीन दिन विविध प्रकारके दान-पुण्य करना चाहिये। तदनन्तर केशक्षालन वस्तुओंको मांगलिक सौभाग्याद्रव्योंके साथ स्नान करके कस्तूरी चन्दन लगाकर तरह-तरहके कपडे पहने और नाना प्रकारके बाजोंके साथ सुगन्धि रस अभिलाषापूर्वक भगवान् का विधिवत्पूर्वक सर्वस्नान कराके चित्र-विचित्र वस्त्र पहनाये। इसके अनन्तर वसन्तके फूलोंसे विधिवत् पूजन करे और अपने कल्याणके निमित्त नाना प्रकारके दान दे। इसके अनन्तर नाना प्रकारके गन्धित द्रव्योंसहित जलोंको लेकर लोग परस्पर एक दूसरेपर छोड़े। अच्छे-अच्छे पदार्थ खाए और भोजन करावे तथा अपने मित्रोंके साथ भोजन करें ॥ ४३-४९ ॥ यह वसन्त पञ्चमी बड़ी पवित्र तिथि कही है। इसलिये सबको चाहिए कि इस रोज अच्छे-अच्छे पदार्थ बनाकर स्वयं खायँ और अपने सगे-सम्बन्धियों को भी खिलावें ॥ ५० ॥ इस तरह माघ मासके शुक्लपक्षकी पञ्चमीसे लेकर सितपञ्चमी पर्यन्त पूजा करनी चाहिये ॥ ५१ ॥ विशेषकर प्रत्येक पक्षकी नवमीको पूजन करे अथवा माघके शुक्लपक्षसे लेकर कृष्णपक्ष और वैशाखकी भी कृष्णपक्षकी रामचन्द्रजीको पालनेमें बैठाकर भक्तिपूर्वक और उत्साहके साथ पूजन करे ॥ ५२ । ५३ । इसके बाद चैत्र शुक्लपक्षकी प्रतिपदाको स्वयं अपने शरीरमें उबटन लगाये ॥ ५४ ॥ इस तरह नौ रात्रि पर्यन्त अर्थात् जबतक नवमी तिथि न आये, तबतक संवत्सरके अष्टम दिन भी कभी तैल-उबटन नहीं लगाना, वह नरकगामी होता है। फाल्गुनमासकी समाप्ति और चैत्रमासके प्रारम्भके किसी पवित्र दिन अथवा ब्राह्मण जो दिन बतला दे उस रोजसे पौशालह बैठाकर जलदान प्रारम्भ करे। विद्वान् मनुष्योंको चाहिए कि प्रपादानके प्रारम्भमें 'अरण्ये प्रान्तर' इत्यादि मन्त्रका उच्चारण कर लिया करे ॥ ५५-५७ ॥ अरण्य, निर्जल प्रदेश, रास्ता अथवा ग्राममें सर्वसाधारणके लिए इस पौसलेकी स्थापना कर रहा हूँ। इसके दानसे मेरे पिता-पितामह आदि पितर तृप्त हों। इस प्रकार उसकी स्थापना करके चार महीने तक निरन्तर जलदान करे ॥ ५८ । ५९ । यदि कोई प्राणी प्रपादानका पुण्य प्राप्त करना चाहता हो और उसमें दान करनेकी सामर्थ्य न हो तो उसे चाहिए वह शिवालयमें जिनसिलापर