श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ६ ] मनोहरकाण्डम् ६१३
सर्गः ६ ] मनोहरकाण्डम् ६१३
तस्मात्पुत्रार्थिना नारी शोषणीया कदापि न । पोषयेच्च सदाऽऽत्मानं नानाखाद्यरसायनैः ॥२२३॥
अतएव हि वैद्याश्च पालनीयाः सदा नरैः । बलाबलबोधैर्वा शास्त्रज्ञैः स्वस्वसत्त्वबलम् ॥२२४॥
पुष्टदेहं निरीक्ष्याथ न ज्ञेयं त्वधिकं बलम् । वातेनापि पुमान्पुष्टो जायतेऽत्र सदैव हि ॥२२५॥
अतो वैद्यं विना तच्च न ज्ञास्यसि बलाबलम् । अतो वैद्यास्ते प्रष्टव्याः सदा भक्तिपुरःसराः ॥२२६॥
मंत्रे तीर्थे द्विजे देवे वैद्येऽथ गणके गुरौ । यादृशी भावना स्त्रीया सिद्धिर्भवति तादृशी ॥२२७॥
अतो वैद्योक्तमार्गेण सदा गच्छेन्मृगेक्षणः । बलाबलाद्विचारेण पुत्रा एव भवंति हि ॥२२८॥
एक एव वरः पुत्रः किं जाता दश कन्यकाः । पुन्नाम्नो नरकान्पुत्रस्त्रायतेऽत्रह्वलं क्षणात् ॥२२९॥
कन्या स्वांयदुराचारालक्षणाद्रिजपितुः कुलम् । तथा भर्तुः कुलं चापि नरके पातयेच्च सा ॥२३०॥
तस्मान्नरैश्च पुत्रार्थं यत्नः कार्यस्त्वहर्निशम् । एष्टव्या बहव पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत् ।
यजेत वाऽश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत् ॥२३१॥
जीवतो वाक्यकरणात्प्रत्यब्दं भूरि भोजनात् । गयायां पिंडदानेन त्रिभिः पुत्रस्य पुत्रता ॥२३२॥
एवं शिष्य त्वया पृष्टमशक्तेन कथं यतम् । कार्यं तच्च मया सर्वं शृणुष्व कथानकम् ॥२३३॥
तवाग्रे कथितं रम्यं रम्यं त्वचोवर्थमनुत्तमम् । तस्य व्रतस्य सामर्थ्यात्स दरिद्रो द्विजोत्तमः ॥२३४॥
लब्ध्वा तद्विपुलं राज्यं भुक्त्वा भोगान् मनोरमान् ।
सायुज्यं प्राप विष्णोश्च स्वायुषश्च क्षये द्विज ॥२३५॥
एव तद्व्रामचन्द्रस्य व्रत कोऽथ तु नाचरेत् । सुखेन भुक्तिदं चात्र परलोके विमुक्तिदम् ॥२३६॥
मुनिभिश्च सुरैर्नागैर्गंधर्वैः किन्नरैर्नृपैः । सदाऽनुभावितं चेदं व्रतानामुत्तमं व्रतम् ॥२३७॥
ही जन्मती हैं और पुरुष बल हो तो पुत्रकी उत्पत्ति अधिक होता है ॥ २२२ ॥ इसलिए जिन लोगोंको पुत्रकी अभिलाषा हो उन्हें चाहिए कि स्त्रियानको ज्यादा काम लिखाकर तबाह न करें। बल्कि रस्मों बढ़िया चीजें तथा रसायन खाकर बलवान् बनें ॥ २२३ ॥ लोगोंको यह भी उचित है कि बलाबल जाननेवाले अच्छे वैद्योंको अपने नगरमें रक्खें और समय-समयपर उनसे परामर्श करा लिया करें ॥ २२४ ॥ शरीर-को मोटा देखकर ही यह न समझे कि इसमें अधिक बल है। सदा ऐसा देखा गया है कि लोग वायुसे भी मोटे हो जाया करते हैं । २२५ । इसीसे वैद्यके बिना बलाबल ठीक तौरसे नहीं जाना जा सकता। अतएव लोगोंको चाहिए कि सदा वैद्योंसे आदरपूर्वक अपने स्वास्थ्यके विषयमें पूछताछ करते रहें । २२६ । मंत्रमें, तीर्थमें, ब्राह्मणमें, वैद्यमें, देवता और ज्योतिषीमें, जैसी जिसको भावना रहती है, वैसा ही उसे फल मिलता है । २२७ ।। अतएव वैद्य जिस तरह बतलाये, उसी तरह रात चलें यदि अच्छी तरह बलाबलका विचार करके पुरुष स्त्रीके साथ रति करे तो पुत्र ही होगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥ २२८ ।। केवल एक पुत्रका होना अच्छा, किन्तु दस कन्याओंका होना ठीक नहीं है। यदि पुत्र होता है तो वह क्षणमात्रमें अपने कुलको 'पु' नामक नरकसे तार देता है ॥ २२९ ।। इसके विपरीत कन्या दुराचार करके अपने पिता तथा पति दोनों कुलोंको क्षणभरमें नरकमें गिरा देती है ॥ २३० ॥ इसीलिए लोगोंको चाहिए कि सदा पुत्रके लिये यत्न करें । एक ही पुत्रसे सन्तोष न कर लें, बल्कि कइयोंकी इच्छा रक्खें । न मालूम उनमेंसे कौन गयामें जाकर पिण्डदान कर आये या अश्वमेध यज्ञ करे अथवा नील वृषभ (काला साँड़) छोड़ ॥ २३१ ॥ जबतक पिता रहे तबतक उसका कहना माने । मर जानेपर प्रतिवर्ष बहुतसे ब्राह्मणोंको भोजन कराये और गयामें आकर पिण्डदान करे । इन्हीं तीन कामोंसे पुत्रकी पुत्रता सार्थक होती है ॥ २३२ ॥ इस प्रकार हे शिष्य ! तुमने मुझसे जो पूछा था कि अशक्त प्राणी किस प्रकार व्रत करें। सो मैंने एक ब्राह्मणकी कथा सुनाकर समझा दिया । इस व्रतकी सामर्थ्यसे वह दरिद्र ब्राह्मण विपुल राज्यलक्ष्मी तथा तरह-तरहके मनोरम भोगोंको भोगकर आयु समाप्त होने-पर विष्णुभगवान्का सायुज्य मुक्तिको प्राप्त हुआ ॥ २३३-२३५ ॥ इस प्रकार उन रामचंद्रजीके व्रतको कौन नहीं करेगा, जो इस लोकमें आनन्दके साथ भुक्ति और परलोकमें मुक्ति प्रदान करनेवाला है ॥ २३६ ॥ अनेक
६४४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ७
श्रीपुत्रधनदं चैतत्सर्वसौख्यप्रदं नृणाम्। इहलोके परे चापि विष्णोः सायुज्यदायकम् ॥२३८॥
संति व्रतान्यनेकानि स्वर्गे मर्त्ये रसातले। तथापि रामनवमीसमानं व्रतमुत्तमम् ॥२३९॥
विष्णुदास द्विजश्रेष्ठ न भूतं न भविष्यति। तस्मात्सदा नरैः कार्यं व्रतं चेदं महत्तमम् ॥२४०॥
एवं त्वया यथा पृष्टं तथा ते विनिवेदितम्। किमन्वच्छ्रोतुमिच्छास्ति तद्वदस्व वदामि ते ॥२४१॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकांडे
आदिकाव्ये नवमीकथावर्णनं नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥
सप्तमः सर्गः
( लक्षरामानामोद्यापनविधि )
विष्णुदास उवाच
अन्यद्गुरो राघवस्य तुष्टिदं किं वदस्व तत्।
श्रीरामदास उवाच
शृणुष्व विष्णुदास त्वं यत्तेऽहं प्रवदामि च। तुष्ट्यर्थं रामचन्द्रस्य नित्यं पत्रे तु मानवैः ॥ १ ॥
लेखनीयं रामनामशतानि नव प्रत्यहम्। अथवाऽष्टोत्तरशतं पूजनीयं सविस्तरम् ॥ २ ।
एवं कोटिमितं लेख्यं लक्षं वा तु ततः परम्। हवनं हि दशांशेन कर्तव्यं विधिपूर्वकम् । ३ ।
इदं विष्णुरिति ऋचा तिलाज्यैः पायसेन वा। नवीनैर्नान्नवाद्या कार्यं राघवं परिपूज्य च ॥ ४ ॥
हवनांगे राघवादिदेवानां पूजने नरैः। आम्रनाथे तु भद्रं च स्थापनीयं प्रयत्नतः ॥ ५ ।
अष्टोत्तरसहस्रं च रामलिंगात्मकं शुभम्। अथवाऽष्टोत्तरशतं रामलिंगात्मकं शुभम् ॥ ६ ॥
अष्टोत्तरसहस्रं वा रामतोभद्रमुत्तमम्। अथवाऽष्टोत्तरशतं रामतोभद्रमुत्तमम् ॥ ७ ॥
एवं होमं लेखनं च पूजनाद् च यत्कृतम्। अर्पयेद्रघुनाथाय तत्सर्वं त्वतिभक्तितः ॥ ८ ।
मुनियों, देवताओं, नागों, गन्धर्वों, किन्नरों और राजाओंने कितने ही बार इस व्रतका अनुष्ठान किया है ॥ २३७ । यह व्रत इस लोकमें स्त्री-पुत्र धन तथा सब सुख देनेवाला है और परलोकमें विष्णुभगवान्का सायुज्य-मुक्ति प्रदान करता है ॥ २३८ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ विष्णुदास ! वैसे तो स्वर्ग, मर्त्य और रसातलमे बहुतसे व्रत हैं। किन्तु उनमेंसे रामनवमी व्रतके बराबर न कोई व्रत है और न होगा। इसी कारण लोगोको चाहिए कि सदा इस रामनवमीके महान् व्रतको करें ॥ २३९ ॥ २४० । इस तरह तुमने जो कुछ हमसे पूछा, सो कह सुनाया। अब और क्या सुनना चाहते, हो सो कहो. २४१ । इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्द-रामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते मनोहरकांडे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥
विष्णुदासने कहा—हे गुरो ! रामचन्द्रजीको प्रसन्न करनेवाली कोई और युक्ति बतलाइए। रामदास कहने लगे—हे विष्णुदास ! मैं तुम्हे जो बतला रहा हूँ, उसे सुनो। रामकी प्रीतिकी इच्छा रखनेवाले मनुष्योंको चाहिए कि कागजपर प्रतिदिन नौ सौ वा एक सौ आठ रामनाम लिखकर विस्तारके साथ उनका पूजन करें १॥ १ ॥ २॥ इस तरह लिखते हुए जब एक करोड़ अथवा एक लाख नामोंको लिख लें तो उनका दशांश विधिवत् हवन करे ॥ ३ ॥ हवन 'इदं विष्णुः ०' इस मन्त्रसे करे। तिल, घी और खीरसे हवन करना चाहिए। यदि ये वस्तुएँ न इकट्ठी हो सकें तो नवीन अन्नसे रामका पूजन करके हवन करना चाहिए । ४ ॥ हवन-के अंगोंमें भद्रादि बनाकर राघवादि देवताओंका पूजन करके अष्टोत्तरसहस्रात्मक रामलिंगतोभद्र अथवा अष्टोत्तरशत रामलिंगात्मक भद्र बनावे । अथवा अष्टोत्तरसहस्र रामतोभद्र वा अष्टोत्तरशत रामतोभद्रकी रचना करे ॥ ५-७ ॥ इस तरह होम-लेखन-पूजन आदि जो कुछ करे, सब भक्तिपूर्वक रामचन्द्रजीको अर्पण कर दे ॥८॥