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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ६ ] जन्मकाण्डम् ३१७

सर्गः ६ ] जन्मकाण्डम् ३१७

अनेन व्रतराजेन जन्मकाण्डश्रवादपि । अचिरान्मतिना योगं प्राप्स्यसि त्वं विदेहजे ॥१०॥
संयोगीकरणं नाम व्रतं चेदं सुपुण्यदम् । ये कुर्वन्त्यत्र मनुजाः प्रियसैयोगं लभन्ति ते ॥११॥
तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा जानकी प्राह तं पुनः । बह्वन्यब्जानि साकेते पुष्परागमजलाशये ॥१२॥
तन्ति कस्तत्र वै गन्तुं समर्थस्त्विह वर्तते । रामाज्ञया रामदूतैः क्रियते रक्षणं सदा ॥१३॥
इत्सीतावचनं श्रुत्वा तन्पुरः संस्थितो लवः अब्रवीन्मातरं वाक्यं पञ्चवर्षवयःस्थितः ॥१४॥
अम्बारभ्य व्रतस्याद्य त्वं कुरुष्वानेगदिह । अब्जान्यहं प्रदास्यामि महारत्नाय निरन्तरम् ॥१५॥
तल्लवस्य वचः श्रुत्वा विहस्यानिलाय बालकम् । चुचुम्ब तन्मुखं सीता लवं वचनमब्रवीत् ॥१६॥
पङ्कजानि कथं वत्स त्वं समानेतुं दास्यसि । प्रमदवने रामदूतैः क्रियते रक्षणं सदा ॥१७॥
तन्मातुर्वचनं श्रुत्वा लवः प्राहार्थ मातरम् । अम्ब त्वन्स्तन्यपानेन वाल्मीकेः शस्त्रविद्यया ॥१८॥
तथाशीभिर्मुनेश्चापि रामस्यापि भयं न मे पश्याम्ब पौरुषं मेऽद्य मामनुज्ञातुमर्हसि ॥१९॥
इत्युक्त्वा मातरं नत्वा वाल्मीकिं प्रणिपत्य च । आशीभिर्गदितस्त्वाभ्यां धृततूणीरकार्मुकः ॥२०॥
वस्त्रासङ्कारसंयुक्तस्त्वेकाकी रथमारिहतः ययो लवण्श्याप्स्यायां धीरैर्हीनां जवेन सः ॥२१॥
क्रोशोपरि रथं स्थाप्य पङ्कजामागद्वराशयो नावन्मध्याहमसमये गता अग्रगरक्षकाः ॥२२॥
भोजनार्थं स्वगेहानि लब्धोऽब्जानि तदाऽहरत् । पुनः स्वस्य रथे स्थित्वा गत्वाऽऽश्रमपदं मुनेः ॥२३॥
नत्वा मुनिं मातरं स्वां पङ्कजान्यर्पयन्मुदा मुदिता जानकी चापि व्रतारम्भमथाकरोत् ॥२४॥
एवं सप्तदिनान्यब्जान्यनयामास बालकः न विदुः रामदूतास्ते नौपतेऽब्जान चेत हि । २५॥
अथाष्टमीदिनेऽपोष्यां पूर्ववन् लवो ययो। आगत्यस्य बहिः स्थाप्य रथं पङ्कजां ययो लवः ॥२६॥

पश्चात् ८१ द्विजदम्पतीको वस्त्राभूषण आदिसे पूजा करके उन्हें भोजन करावो और दक्षिणा देकर विदा करो। इस व्रतराजक करने तथा जन्मकाण्डकी कथा सुनने से शीघ्र ही तुम्हारे पति तुम्हें मिल जायेंगे ॥९-१०॥ इस व्रतका नाम ही संयोगीकरण व्रत है। जो कोई इस पुनीत व्रत करता है उसे अपने प्रियजनकी प्राप्ति होती है॥११॥ वाल्मीकि मुनिकी बात सुनकर सीताजी कहने लगी कि साकेतके बागीचा में पद्‌म बहुत कमल होते हैं, वहाँ ही इतने फूल मिल सकते कि जिनसे मैं अपना व्रत पूर्ण कर सकूँ । लेकिन वहाँ से उन्हें लायेगा कौन ? रामचन्द्रजीकी आज्ञासे वहाँ बहुतेरे रक्षक उन फूलोंकी रखवाली करते हैं । १२॥१३॥ सीताकी बात सुनकर पास खड़े लवने, जिनको अवस्था पाँच वर्षकी हो चुका थी, मातासे कहा-॥१४॥ माँ ! तुम आजसे अपना व्रत प्रारम्भ कर दो, मैं नित्य कमलके फूल लाकर तुम्हें दूंगा । १५॥ लवकी वीरतापूर्ण वाणी सुनकर माता हँसी और छातीसे लगाकर उसका मुख चूमती हुई कहने लगी- ॥१६॥ बेटे तुम फूल कैसे लाओगे ? वहाँ रामके असंख्य सिपाही उनकी रक्षा करते हैं ॥१७॥ सीताकी बात सुनकर लवने कहा- माता ! तुम्हारे पवित्र स्तनोंके दुग्ध, महर्षि वाल्मीकिको सिखायी हुई शस्त्रविद्या और उनके आशीर्वादके प्रभावसे मैं रामसे भी नहीं डरता । आप मुझे आज्ञा दें और मेरा पुरुषार्थ देखें ॥१८॥१९॥ इतना कहकर लवने माता तथा वाल्मीकिको प्रणाम किया। फिर उनका आशीर्वाद लेकर धनुष-बाण सहित एक स्थपर जा बैठे ओर उस अमरावतीकी ओर बड़े, जो बहुत दिनोंसे कान्तिहीन हो चुकी थी ॥२०।२१॥ बगीचेके एक कोस आगे ही लवने अपना रथ रोक दिया और पैदल ही बगीचेमें जा पहुँचे । दोपहरका समय था । बगीचेके रक्षक भोजन करनेके लिए अपने-अपने घर जा चुके थे। इसलिए लवको फूल लेनेमें कोई बाधा नहीं हुई फूल लेकर लवने अपने रथपर रखा और आश्रमकी ओर चल दिये ॥२२॥ २३॥ वहाँ पहुँचकर लवने माता और वाल्मीकिको प्रणाम करके फूलोंको सामने रखा । जानकीने भी प्रसन्नताके साथ व्रत प्रारम्भ किया ॥ २४॥ इस प्रकार सात दिन तक लव बराबर फूल ले गये, लेकिन रामके दूतोंको कुछ भी पता नहीं लगा। आठवें दिन अष्टमी तिथिको रोजकी तरह लव फिर वहाँ गये। रथको बाहर रोका और सरोवरमें पहुँचकर निर्भीक-भावसे फूल तोड़कर लाने लगे । संयोगवश उस दिन सिपाही लोग भोजन करके बगीचेमें पहुँच

११८आनन्दरामायणे[ सर्गः ६

गत्वाऽऽरामाच्च कासारं गृहीत्वाऽब्जानि निर्भयः। शनैर्यानद्रथं प्राप तावदारामापाऽऽययुः ॥२७॥
तं तु दृष्ट्वा लवं साब्जं पप्रच्छुर्विस्मयान्विताः। न त्वं दृष्टः कदाऽस्माभिः श्रीरामानुचरेषु हि॥२८॥
कदारभ्य रामसेवा त्वया चाङ्गीकृता वद । यत्त्वं निर्भयोऽब्जानि गृहीत्वा गच्छसि प्रभोः॥२९॥
रामदूतवचः श्रुत्वा विहस्याह लवोऽपि सः। वाल्मीक्यनुगोऽहं न रामदर्शनं मम ॥३०॥
दासोऽहं मुनिराजस्य वाल्मीकेः शुद्धचेतसः। तदाज्ञया वै नीयन्ते कमलानि मया मुदा ॥३१॥
इति तद्वचनं श्रुत्वा वाल्मीकीयं लवं तदा। ज्ञात्वा दूताः पारक्यं क्रोधाद्वचनमब्रुवन् ॥३२॥
रामसेवया न दृष्टोऽत्र न नः पृष्ट्व्वया पुनः । नाज्ञादत्ताऽपि रामेण नीयन्तेऽब्जानि प्रत्यहम् ॥३३।
न ज्ञातमेतदस्माभिस्त्विदानीं तिष्ठ मा व्रज। अपराध्यसिरामस्य त्वां नेष्यामो वय प्रभोम् ॥३४॥
इत्युक्त्वा तस्य पन्थानं रुरुधु रामसेवकाः। चतुर्दश सशस्त्र स्ता समन्ता रामतो यदा ॥३५॥
तान्दृष्ट्वा स्यन्दनस्थ ह लवोऽप्याह विहस्य च । यूयं गच्छत श्रीरामं मद्वृत्तं ब्रूयमादरात् ॥३६॥
यद्यस्ति पौरुषं रामे तर्हि यास्यति मां प्रति । बालस्य वचनं श्रुत्वा कोपाद्द्ता वचोऽब्रुवन् ॥३७॥
कथ वत्स मर्तुकामस्त्वमित्थं वत्थसे मुधा । बद्ध्वा त्वां वयमेवाद्य विनेष्यामो रघूत्तमम् ॥३८।
इत्युक्त्वा ते लव धतुं ययुस्तस्य रथांतिकम्। तान्दृष्ट्वा निकटं यामान् रामदूतान्लवोऽपि सः ॥३९॥
टणस्कृत्य महच्चापं शुणम्धाय वेगतः । अब्रवीत्तान्पुनर्वाक्यं माऽऽगन्तव्य ममान्तिकम्॥४०॥
मार्गेणैषुणा युष्मान् त्यजामि राघवन्तिके । इत्युक्त्वा तान्पुनर्रदृष्ट्वा ऽऽगच्छन्तान धतुं समुद्यतान् ॥४१॥
रवाशं शशिखड्गार्हस्तीक्ष्णाऽप्यच्चम्मंडपे । चतुर्दश रामदूता लवमार्गणताडिताः ॥४२॥
निपेतुर्मूच्छिताः सर्वे श्यामे जाह्नवीतटे । शतशो रामदूतास्ते दृष्ट्वा चक्रुः पलायनम् । ३॥
लवोऽपि विजयी शीघ्र पूर्ववन्स्वाश्रम ययौ । समर्प्याब्जानि सीतायै सर्व वृत्त न्यवेदयत् ॥४४॥

गये ॥ २५-२७॥ लवको फूल लिये देखकर विस्मयपूर्वक वे बोले—हमने कुल कभी रामचन्द्रजीके सेवकोंमें नहीं देखा है ॥ २८ ॥ तुमने कब नौकरी की है ? जो इस तरह निर्भय होकर कमलके फूल ले जा रहे हो ॥ २९ ॥ तब दूतोंकी बात सुनकर हंसते हुए लवने कहा—मैंने तो अभी तक रामको देखा भी नहीं है ॥ ३० ॥ रामका नहीं मैं महर्षि वाल्मीकिका सेवक हूँ । उन्हींके आज्ञानुसार मैं यहांसे फूल ले जाता हूँ। किन्तु तुमने आज ही हमको देखा है। इसके पहले कभी नहीं देख पाया ॥ ३१ ॥ इस तरह अपनेको वाल्मीकिका सेवक बतलानेपर दूतोंको समझमें आया कि यह कोई अजनबी मनुष्य है। यह जानत ही वे मारे क्रोधके तमतमा उठे। उन्होंने कहा—॥ ३२ ॥ तुमने न रामकी आज्ञा ली, न हम लोगोंसे पूछा और रोज फूल ले जाते हो ॥ ३३ । यह बात हमको मालूम नहीं थी । किन्तु, अब ठहरो । तुम रामचन्द्रजीके अपराधी हो । अतएव हम तुम्हें उनके पास ले चलेंगे। ३४ । ऐसा कहकर उन लोगोंने लवका रास्ता रोक लिया। जब एक सौ चौदह सशस्त्र सैनिकों ने लवको घेर लिया। तब लवने रथपर बैठे ही बैठे उनकी ओर देख तथा हँसकर कहा तुम लोग रामके पास जाकर हमारा वृत्तान्त कहो । ३५ ॥ यदि राममे कुछ सामर्थ्य होगी तो वे स्वयं मेरे सामने आयेंगे एक पाँच वर्षके बच्चेकी ऐसी बातें सुनकर दूतोंने कोधपूर्वक कहा—॥३६॥३७॥ हे बच्चे ! तुम क्यों मरना चाहते हो, जो ऐसी बढ़-चढ़कर बातें करत हो ? तुमको बाँधकर हमीं लोग उनके पास अभी लिये चलते हैं । ३८ । ऐसा कहकर लवको पकड़नेके लिए कई दूत आगे बढ़े। उनकी निकट देखकर लवने तुरन्त अपने धनुषका टंकोर करके उसपर एक बाण चढ़ाया और उनसे कहा—सावधान ! मेरे पास न आना ॥ ३९ ॥ ४० ॥ नहीं मानोगे तो मैं इसी धनुष और बाणसे तुम लोगोंको उठाकर रामके पास फेंक दूँगा। ऐसा कहकर लवने देखा कि वे लोग फिर भी उन्हें पकड़नेका प्रयत्न कर रहे हैं ॥४१॥ ऐसी दशामें लवने बाणोंसे दूतोंको उठाकर फेंका और वे गङ्गाके समीप रामकरे यज्ञका कार्यमें मूर्छित होकर जा गिरे। इस प्रकार लवका पराक्रम देखकर रामके जो सैकड़ों सैनिक वहाँ बचे थे, वे सब इधर-उधर भाग गये ॥ ४२ ॥४३॥ सब विजयी होकर वे अपने आश्रमकी ओर बढ़े। वहाँ पहुंचकर लवने कमल

सर्गः १ ] अगम्यकाण्डम् ११९


चतुर्दश रामदूताः स्वस्थचित्ताश्चिरेण ते । सर्वं वृत्तं राघवाय कथयामासुरादरात् ॥४५॥
तच्छ्रुत्वा रामचन्द्रोऽपि विस्मयाविष्टमानसः । सहस्रदूतानामगमद्वनस्यार्थे प्रबोधवत् ॥४६॥
लवोऽप्यथ नवम्यां स साकेतं पुरंन्वयौ । भट्यं रामदूतास्ते तत्र योद्धुं समुद्यताः ॥४७॥
लवस्तानाह युष्माकं स्वामिना रावणेन हि । यदा सीता वने त्यक्ता जयश्रीश्च गता तदा ॥४८॥
युष्माकं राघवस्यापि गच्छध्वं राघवं पुनः । युष्माभिर्मा मया युद्धं कर्तव्यं मरणोन्मुखैः ॥४९॥
सीताशयायैतु युष्माकं स्वामिनः पौरुषं न हि । इति ते लववाग्बाणैर्भिन्नामर्मस्थलास्तदा ॥५०॥
दूताः शस्त्राणि मुमुचुर्लवोपरि महात्मनैः । लवेोऽपि बाणमाकृत्य रामदूतान्स्वमार्गजैः ॥५१॥
प्रक्षिपत्पूर्ववद्रामं तच्छत्रौघं निवार्य च । अह्नायतो यदा दूताश्शक्रुः सर्वं पलायनम् ॥५२॥
ययौ लवः स विजयी पुष्पसञ्चयलान्वितः । आश्रमं मातरं नत्वा सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥५३॥
पुत्रस्य पौरुषं श्रुत्वा तुतोष जानकी तदा । भुवि निवेदयामासु रामदूता रघूत्तमम् ॥५४॥
मूर्च्छा लवशरैः प्राप्ता भिन्नदेहा मग्नांगणे राम राम महाबाहो शृणुष्वापूर्वमादरात् ॥५५॥
पञ्चवर्षवयस्केन वयमद्य पराजिताः । वाल्मीकेर्भटपुत्रिणः स न जेयो लक्ष्मणादिभिः ॥५६॥
तद्वधे मंत्रयस्वाद्य त्वमुपायं रघूत्तम । सीतात्यागादिवचनैर्नास्तथापि च बालकः ॥५७॥
चकार निंदां श्रीराम गतभीस्त्वेक एव यः । तेषां वचनंवृत्तं कृत्स्नमाकर्ण्य राघवः ॥५८॥
मंत्रय्य सचिवैर्दूतं वाल्मीकि प्रेषयज्जवान् । नत्वा मुनिं रामदूतो रामवाक्यं न्यवेदयत् ॥५९॥
यस्ते शिष्यो महावीरः सोऽपराध्यस्ति वै मम । तं प्रेषयाथवा तेन त्वमागच्छत्व सन्मुखम् ॥६०॥


सीताको दिया और उस दिनका सारा हाल कह सुनाया ॥४४॥ जो दूत रामको यज्ञशालामें गिरे थे, वे बहुत देर तक मूर्छित पड़े रहे। जब चेतना आयी, तब सादर उन्होंने रामको लवका सब समाचार सुनाया ॥४५॥ सो सुनकर रामचन्द्रजीको भी बड़ा आश्चर्य हुआ; उन्होंने फिरसे एक हजार दूतोंको बगीचेकी रखवालीके लिए नियुक्त कर दिया ॥ ४६ ॥ दूसरे दिन अर्थात् नवमीको लव फिर फूल लेनेके लिए बगीचेमें जा पहुंचे। सबने दूतोंको देखकर कहा कि जिस दिन तुम्हारे प्रभु रामने सीताको वनमें भेज दिया उसी दिन उनकी जयश्री भी बिदा हो गयी ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ तुम्हें चाहिए कि तुम रामके पास जाकर लड़ाई करनेसे इनकार कर दो। तुम मरणोन्मुख हो। अतएव मैं नहीं चाहता कि तुम्हारे साथ युद्ध करूँ ॥ ४९ ॥ सीतापने त्यागनेवाले तुम्हारे प्रभु रामके साथ संग्राम करना मुझे उचित नहीं जँचता इस प्रकार लवके वचनरूपी बाणोंसे सैनिकोंके हृदय विदीर्ण हो गये ॥५०॥ तब उन्होंने लवपर बाणवर्षा आरम्भ कर दी। उधर लवने भी अपने बाणोंसे सैनिकोंके प्रहार बचाते हुए अपने बाणोंसे उनको उठा-उठाकर रामके पास फेंकना आरम्भ किया। थोड़ी देरमे ही सब दूत बगीचा छोड़ छड़कर भाग निकले। तब लव अपनेको विजयी जानते हुए रोजकी तरह फूल लेकर आश्रमको लौट गये। वहाँ पहुंचकर लवने सीता माताको प्रणाम किया और उस दिनका भी सारा हाल सुनाया ॥ ५१-५३ ॥ बेटाका पुरुषार्थ सुनकर सीता परम प्रसन्न हुईं। इधर रामचन्द्रके दूतोंने रामके पास जाकर सब अपनी आपबीती कह सुनायी ॥ ५४॥ जिनको लवने अपने बाणसे उठाकर रामके पास फेंका था, वे लोग घायल होकर बहुत देर तक मूर्छित अवस्थाम ही पड़े रहे। बाद होशमें आने तो कहने लगे हे राम ! हे महाबाहो ! मैं जो कह रहा हूँ, उसे तनिक ध्यान देकर सुनिए। आज हम सब बाल्मीकिके एक शिष्यसे, जिनकी अवस्था अभी पाँच वर्षकी है, परास्त हो गये। मेरा तो यहाँतक विश्वास है कि आपके अलावा लक्ष्मण आदि भी उसे नहीं हरा सकते। ५५ ॥ ५६ ॥ हे रघूत्तम ! उसे मारनेके लिए आप कोई उपाय कीजिए। सीतात्याग आदिकी बातें दुहराकर उस एकाकी बालकने हमारी और आपकी भी भरपूर निन्दा की है। उनकी बातें सुनी तो मंत्रियोंसे परामर्श करके रामने तुरंत कई दूतोंको बाल्मीकिके आश्रमपर भेजा। वे दूत बाल्मीकिके पास पहुंचे और उन्हें प्रणाम करके रामका सन्देश इस तरह सुनाने लगे ॥ ५७-५९ ॥ रामचन्द्रने कहा है कि आपका महावीर शिष्य लव हमारा अपराधी है। उसे या तो हमारे

३२०आनन्दरामायणे[ सर्गः ७

विस्मृत्यापूर्वमेव त्वं नाहूतोऽसि क्षमस्व तत् । तद्दूतवचनं श्रुत्वा रामीयं मुनिरब्रवीत् ॥६१॥
शिष्यान्साकं वा समाहूय यास्यामि त्वं व्रज । तथोक्तः रामदूतोऽपि मुनिं नत्वा ययौ मखम् ॥ ६२॥
जानन्नेव भावि वृत्तमादौ रामो मुनिं मखम् । नाहूयामास शिष्याभ्यां लौकिकीं रीतिमाश्रितः ॥६३॥
स्वीयव्रतसमाप्तिं साऽकरोत्सीताऽपि सादरम् ।

विष्णुदास उवाच
अशक्तश्च कथं पार्थ व्रतमपेतद्वदस्व माम् ॥६४॥

श्रीरामदास उवाच
काञ्चनस्याथवा रौप्यस्याथवा ताम्रनिर्मिते । कार्ये द्वे पादुके रम्ये राघवस्य यथासुखम् ॥६५॥
अभावे कमलानां च पुष्पैर्जलिरीरिता । एकाशीतिदंपतीनां न शक्तिः पूजने तदा । ६६।
पूजनीयानि युगलानि नव शक्त्याऽथवा सुखम् । स्वशक्त्या पूजनं कार्यं वित्तशाठ्यं परित्यजेत् । ६७॥
अनेकदूरगस्यापि संयोगश्च भवेद्ध्रुवात् । भाविकार्याणि वेगेन भविष्यन्ति न संशयः ॥६८।
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये
जन्मकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥

सप्तमः सर्गः

( राम लक्ष्मण आदिका लव-कुशके साथ युद्ध )

श्रीरामचन्द्र उवाच
अथ रामोऽपि धर्मात्मा चरमे तुरगाध्वरे । हयं मुमोच शत्रुघ्नस्तस्य पृष्ठे ययौ जवात् ॥१॥
दक्षिणां पश्चिमामाशासुत्तरां तुरगोत्तमः । अतिक्रम्य तथा प्राचीं यज्ञस्थानं न्यवर्तत ॥२।
नृपतिभ्यः समस्तेभ्यः शत्रुघ्नो वसु कोटिशः । गृहीत्वा नैरुपैर्युक्तस्तुरगस्यानुगो ययौ ॥३॥

दूतोंके साथ भेज दीजिए अथवा आप स्वयं अपने साथ लेकर हमारे यज्ञमण्डपमें आइए ॥६०। भूलसे मैंने आपको पहले निमन्त्रण नहीं दिया था, सो क्षमा कीजिएगा। इस प्रकार दूतोंके मुखसे रामका सन्देश सुनकर महर्षि वाल्मीकिने कहा- ॥ ६१ ॥ हम अपने शिष्योंके साथ स्वयं यज्ञमण्डपमें आयेंगे, तुम लोग जाओ। रामके दूतोंने ऋषिराजके वचन सुनकर प्रणाम किया और वहांसे प्रस्थान करके रामकी यज्ञशालाको चल पड़े ॥ ६२॥ राम इस भावी घटनाको पहिलेसे ही जानते थे। इसीलिए लौकिक रीति निभाते हुए शिष्योंके साथ वाल्मीकि-जीको पहले यज्ञमें नहीं बुलाया था । ६३ ॥ उधर सीताने भी नौ दिनवाला व्रत समाप्त कर लिया।
विष्णुदासने पूछा जो लोग सामर्थ्यहीन हैं, वे इस व्रतको कैसे करेंगे ? सो बताइए ॥ ६४॥ श्रीरामदासने उत्तर दिया यदि सुवर्णकी पादुका न बनवा सकें तो चांदीकी बनवा लें, वह भी न हो सके तो तांबेकी दो चरणपादुकाएं बनवानी चाहिए ॥ ६५ ॥ यदि उतने कमलक फल न मिल सकें तो साधारणतया किसी भी फलकी अञ्जली दे। यदि इक्यासी द्विजदम्पतीकी पूजा करनेकी सामर्थ्य न हो तो नौ द्विजदम्पतीका ही पूजन करे। उसके भी अभावमें अपनी शक्तिके अनुसार पूजा करे, लेकिन उनम कंजूसी न होने पाये ॥ ६६ ॥ ६७॥ इस व्रतको करनेसे चाहे कितनों ही दूरीपर रहनवाला भी प्रियजनका मिलाप अवश्य हो जाता है इसके अतिरिक्त जितने भी भविष्यके कार्य होंगे वे सब सम्पन्न हो जायेंगे। इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ६८ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत ज्योत्स्ना आख्याटीकासमन्विते जन्मकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥
श्रीरामदास बोले—इस प्रकार रामचन्द्रने ९९ अश्वमेध यज्ञ पूर्ण कर लिये, अन्तिम सौवें यज्ञके लिए भी घोड़ा अभिषिक्त करके छोड़ा और शत्रुघ्न उसकी रक्षा करनेके लिए इसके साथ गये ॥ १ ॥ दक्षिण, पश्चिम, पूर्व और उत्तर दिशाकी प्रदक्षिणा करक घोड़ा रामचन्द्रजीके यज्ञमण्डपकी ओर लौट पड़ा ॥ २॥ रास्तेमें कितने ही राजाओंसे अनेक प्रकारकी भेंटे ले लेकर उन राजाओंको अपने साथ लिये शत्रुघ्न अश्वसमेत

सर्गः ७ ]
जन्मकाण्डम्
३२१


सेनया चतुरङ्गिण्या च दशसाहस्रसंख्यया ।
तस्मिन्विमाने ऋषयः सर्वे राजर्षयस्तथा ॥ ५ ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः समाजग्मुः सहस्रशः ।
यज्ञाश्चर्यमयं द्रष्टुं हर्षेणोन्मत्तमागताः ॥ ६ ॥
दान्तौ चिरेऽपि संगृह्य गायन्तौ भूमिजात्मजौ ।
अगाम यज्ञवाटस्य समीपं सीतया सुखम् ॥ ६ ॥
मार्गे नृपसमूहेषु शिविकास्थां हि जानकीम् ।
न विदुः पांथाः सर्वे जानन्नपि यथेतरे ॥ ७ ॥
तथैव या जनकोऽपि ययौ रामाश्रयं प्रति ।
क्रोशार्धान्तरे पूर्वं पश्चादापन्मुनीश्वरः ॥ ८ ॥
कृत्वा पर्णकुटीं रम्यां ताभ्यां युक्तः स सीतया ।
वाल्मीकिर्निवासयामास पर्णकुट्यां विदेहजाम् ॥ ९ ॥
नृपसेनानिवासेषु जनकश्च सुमेधया ।
स्वसैन्येन ययौ तूष्णीं रामेणापि निरीक्षितः ॥ १० ॥
वाल्मीकिस्तौ प्राह तन्मान्तरमण्डितौ ।
जटाचीरधराधर्मी वीरपुत्रौ महाधियौ ॥ ११ ॥
यत्र यत्र च गायन्तौ पुरे वीथिषु सर्वतः ।
रामस्याग्रे प्रगायेतां शुश्रूषुर्यदि राघवः ॥ १२ ॥
आश्रमकाण्डकाण्डानि न गेयमथ बालकौ ।
यदा दयेत्सहं चाहो गायतां सकलं तदा ॥ १३ ॥
न ग्राह्यं नृपवर्याभ्यां यत्किंचिन्नृपमर्हति ।
इति तौ वाल्मीकिनात्र गान्धार्यौ विचेरतुः ॥ १४ ॥
तथोक्तं ऋषिणा पूर्वं तत्र तत्र व्यगायतम् ।
तौ तु शुश्रुव ऋषयः पूर्वमश्रुतं ततः ॥ १५ ॥
अपूर्वरसवादिनौ तौ समाविदुर्ब्रह्म बालकौ ।
सधनाः सर्वेऽनुसस्रुस्तेऽब्रवन् ॥ १६ ॥
अथ कर्मान्तरे रामः समाहूय मुनीश्वरान् ।
गान्धर्वं गायतामेतौ पृष्टवांश्च नृपोत्तमः ॥ १७ ॥
पौरांश्चित्रांश्छन्दविदो गाथाश्च विविधान्यतः ।
ज्ञातादींश्चैव नैपुण्यात्तथाऽऽहूय द्विजादिकान् ॥ १८ ॥
यज्ञवाटे तु वाल्मीक्ये गच्छन्तौ जनतो भयात् ।
ते सर्वे दृष्टमनसो बालौ ब्राह्मणादयः ॥ १९ ॥
रामं तौ दारको दृष्ट्वा विस्मिता निर्निमेषकः ।
अथोऽन्योन्यं पूर्वत परस्परमथानयोः ॥ २० ॥
इमौ रामस्य सदृशौ बिम्बाद्बिम्बिनिभाविनौ ।
जटिलौ यदि न स्यातां न वल्कलधारिणौ ॥ २१ ॥


अश्वमेधके समीप आ पहुंचे ॥ ५ ॥ उस समय अयोध्यामें उस हजार चतुरङ्गिणी सेना थी। इसके अतिरिक्त उस विमानमें कितने ही ऋषि, ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यगण इस दृश्यमें रामचन्द्रके इस अन्तिम यज्ञको देखने आये थे ॥ ५ ॥ ५ ॥ वाल्मीकि जी भी चुप रूप सीताको अपने साथ लेकर गएक यज्ञमण्डपकी ओर चल पड़े ॥ ६ ॥ रास्तेमें जाते समय न कोई लोग नहीं जान पाये कि इनमें कौन है। तब जनक और सुमित्रा ने भी रामाश्रय को गए। जब एक कोश बाकी रह गया, वहीं पर वाल्मीकिजी सीताजीके साथ ठहर गये और सुन्दर पर्णकुटी बनाकर पर्णकुटीके अन्दर सीताको छुपा दिया ॥ ८ ॥ ९ ॥ जनक अपना पड़ाव सेनाके पड़ावके पास ही डालकर ठहर गये। वहीं रामसे भेंट हुई ॥ १० ॥ वाल्मीकिने उन दोनों राजकुमारोंको वस्त्र भूषण उतार तथा जटा और अजिन पहन कर कहा कि तुम नगर भरमें घूमकर गाओ और जो रामचन्द्रजीको गाना यदि रामचन्द्र स्वयं सुनना चाहें तो उनको भी सुना देना ॥ ११ । १२ । लेकिन आश्रम काण्डका पूर्व भाग नहीं गाना, जब वे कहें कि हमसे लेकर बालकाण्ड पर्यन्तका गाओ बिल्कुल आवाज़ साफ़ रखकर उस समय कुछ देना चाहें तो ऐसा इन्कार कर देना। इस प्रकार वाल्मीकिजीके आज्ञानुसार वे दोनों बालक गान्धर्व गान गाते हुए घूमने लगे ॥ १३ ॥ १४ ॥ जहां-जहां और जिस-जिस प्रकार गुरुजीने आदर गान को कहा था, वहां-वहां जाकर दोनोंने गाया। रामचन्द्रजीके पास भी यह खबर पहुंची और उन्होंने सर्वोत्तम उत्तम गानकी प्रशंसा सुना ॥ १५ ॥ उस तरह बालक युगल इस प्रकार आश्चर्यजनक गानकी वान सुनकर तो सबका बड़ा कौतूहल हुआ ॥ १६ ॥ विश्राम के समय उन्होंने यज्ञमण्डपमें वाल्मीकि आश्रम, नैमिषारण्यके अन्यान्य मुनियों, राजाओं, ब्राह्मणों, पौराणिक पण्डितों, वैय्याकरणों तथा विभिन्न प्रकारके अन्य विद्वान लोगों को इस गानको सुनने बुलाया। इसके बाद सब गाने वालेका पूजा कर और उन दोनों कुमारोंको बुलाया। उन राजाओं और ब्राह्मणादि लोग दोनों बालकों को प्रथम देखा ॥ १७-२१ ॥ वहां लोगोंने एक बार रामकी ओर देखा, फिर बच्चोंकी तरफ निहारा तो उनके आश्चर्यका ठिकाना नहीं रहा। उनकी आँख निर्निमेष हो गयी

३२२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ७

विशेषं नाधिगच्छामो राघवस्यान्वयोस्तदा । एवं संवदतां तेषां विस्मितानां परस्परम् ॥२२॥
तदाऽऽह शमदूतोऽपि लवबाणरुजं स्मरन् । रामचंद्रं यजुर्वाट्स्थितं वै संभ्रमेण हि ॥२३॥
लवमंगुलिना वीरं दर्शयंश्च मुहुर्मुहुः राम राम महाबाहो तमेनं पश्य वै लवम् ॥२४॥
येनास्माकं शरौघैश्च प्रक्षिप्य तव सन्निधौ । नीतानि कनकच्छानेि सुगंधीनि निरंतरम् ॥२५॥
सीतान्यागनिमित्तेन येन तेनापि वा मुहुः । कृता निंदा गरिष्ठेन त्वद्दण्डस्यार्थिना प्रभो ॥२६॥
ननु दण्डभयादेव पूर्ववेषं विलोपितः । रथशस्त्राभरणानि शस्त्राण्यपि विहाय च ॥२७॥
धृतानि वल्कलादीनि दीनरूपोऽत्र दृश्यते । न्यायोऽय दण्डनीयोऽय वधुभागनिवर्हितः ॥२८॥
इति स्वदूतवाक्यानि शृण्वन्नपि रघूत्तमः । प्रेम्णाऽवलोकयामास सुधाक्षिभ्यां शिशू मुहुः ॥२९॥
मध्याह्वारि सभास्थानान्मस्कृत्य यथाक्रमम् । राघवं स्वपितृव्यांश्च वसिष्ठ प्रणिपत्य च ॥३०॥
उपाचक्रमतुर्गातुं वीणे रणयतः शुभे । ततः प्रवृत्तं मधुरं गांधर्वं गतिनुत्तमम् ॥३१॥
श्रुत्वा तन्मधुरं गीतं रामस्नोपमवाप ह । ताभ्यां श्रुतं स्वचरितं विलासाद्यद्यनुक्रमात् ॥३२॥
यद्यदाचरितं पूर्वं सीतया सह मौख्यदम् । ततोऽपराह्ने श्रीरामः प्रसन्नवदनांबुजः ॥३३॥
उवाच तौ समग्रं वै श्रो गेयं मम सन्निधौ । नवेति रामवचन तावंगीनकृतून्वदा ॥३४॥
ततो रामो लवं प्राह मे यद्यप्यपराधिनम् । त्वया पूर्वं तथापि त्वां तुष्टोऽह नात्र संशयः ॥३५॥
स्वद्गीतिमच्चरित्रादि श्रवणादय मे मनः । परं विश्रांतिमापन्नं त्वत्कृतं क्षमितं मया ॥३६॥
अधुना मद्भयं त्यक्त्वा त्वं सुखं विचरस्व हि । तद्रामवचन श्रुत्वा नयो राघवमब्रवीत् । ३७॥
मयाऽपराचितं राजंस्तव दर्शनकाम्यया । मदपराधिन ब्भून्वान्नाहान्तोऽहं यनस्त्वया । ३८॥

और वे आपसमें कहने लगे-२०। एक बिम्बसे निकले दूसरे प्रतिबिम्बकी भाँत ये दोनो बालक बिल्कुल रामचन्द्रके समान हैं। यदि इनके मस्तकपर जटा न रहे और वल्कल वस्त्र उतार दिये जायें तो इनमें तथा राममें कोई अन्तर ही नहीं रह जाता। जब सब लोग विस्मित होकर परस्पर इस प्रकार बात कर रहे थे। तभी उनके बाणोम बाघनेवाले मारको पाड़ाका स्मरण करता हुआ रामका एक दूत घबड़ाकर बोला -२१-२३॥ हे राम! हे महाबाहो! देखिये, यही लव है। जिसने अपने बाणोसे उठाकर मुझे आपके पास फेंक दिया था और सुगन्धित कनककमलके फूलोंको हठात् तोड़कर ले जाया करता था। २४। २५॥ आपके सीन्तात्यागविषयक बालक होकर इसीने बड़े घमण्डके साथ आपकी निन्दा की दी। २६॥ ज्ञान होता है कि आपके दण्डसे डरकर इसने रथ तथा वस्त्राभरण त्याग दिये हैं ओर वल्कलवस्त्र आदि पहन तथा दीनरूप धारण करके आया है। किन्तु मेरा यह परामर्श है कि इस अभिमानीको अवश्य दण्ड दीजिये। २७।२८॥ इस प्रकार दूतकी बातें सुन करके भी रामचन्द्र अपनी अमृतभरी आँखोंसे उन बच्चियोंको प्रेमपूर्वक देख रहे थे ॥ २९॥ उन्होंने सभाभें पहुँचकर वहाँ बैठे हुए लोगोंको प्रणाम करके रामको, लक्ष्मण आदि अपने चाचाओं को तथा वसिष्ठ आदि गुरुजनोंको प्रणाम किया और वीणा बजाते हुए रामचरित्र गान लगे। उस समय मघाम जैसे गान्धर्व गायनका रंग बरसने लगा ॥ ३० ॥ ३१ ॥ राम उनका मधुर गायन सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। गायनमे रामके उस चरित्रका वर्णन था, जो जन्मसे लेकर विलासकाण्ड पर्यन्त सीताके साथ उन्होंने किया था॥ ३२॥ गान-गाते दोपहरका समय हो गया। तब रामचन्द्रन प्रसन्नतापूर्वक उन बच्चास कहा-बच्चो, आज समय अधिक बीत चुका। इसलिये रहने दो। कल मेरे पास फिर आना और मुझे सारी रामायण सुनाना। रामकी बातको उन्होंने अङ्गीकार कर लिया ॥ ३३ ॥ ३४॥ इसके अनन्तर रामने लवस कहा-यद्यपि तुम हमारे अपराधी हो फिर भी मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम्हें कोई दण्ड देनेकी इच्छा ही नहीं होती। तुम्हार गानभीम अपनी चरित्रसुली सुनकर मेरा हृदय शान्त हो गया है और तुमने जो अपराध किया था, उसे क्षमा करता हूँ । ३५ ॥ ३६ ॥ अब तुम मुझसे डरो नहीं निर्भय होकर जहाँ चाहो घूमो। इस प्रकार रामकी बातें सुनकर सबने उत्तर दिया-राजन् ! उस समय

सर्गः ७ ] अष्टमकाण्डम् ३२१


अद्य ते दर्शनेनैव पौरुषं वृद्धिमङ्गतम् । कीर्तिर्न महती जाता तवाग्रे गायनादपि ॥३९॥
इत्युक्त्वाऽऽर्याज्ञयाऽऽपूर्णा बन्धुना गन्तुमुद्यतः । मखयात्रौ संतुकामो स्थलन्मीय निरीक्ष्य च । ४०॥
रत्नोऽयुतं वसु तपोऽर्थिनांवेन प्रदापयन् । दीयमानं सुवर्णं तौ न मजग्गृहतुस्तदा ॥४१॥
राजन् हेम्ना किमेतेन पात्रौ वै वन्यभोजिनौ । कृपालोकनेनैव यदि न्याय्योः सदा ॥४२॥
इति संत्यज्य तद्दत्तं जग्मतुर्मुनिमाश्रिषम् । आत्मानम्वृत्ता स्वचरितं रामो हृद्यतिविस्मितः । ४३॥
कुशोऽपि सकलं वृत्तं वाल्मीकिं मानदं तदा । निवेद्य बाहुवीर्यं स्नातुं कौतुकेन ययौ सुतम् ॥४४॥
लवो मुनीनां शिशुभिः शिशुक्रीडनमथाचरत् । एतस्मिन्नन्तरे यत्र लवः क्रीडां चकार ह ॥४५॥
बालकैस्तत्र संत्राप्तास्तुरगं ध्वजकारिणः । त्यक्त्वा क्रीडां लवः शीघ्रमुपमूर्वीटजान्तिके ॥४६॥
वृक्षे बबंध शिशुभिः पूर्ववत् क्रीडन व्यधात् । ततः से पुष्पकं प्राप्त दृष्ट्वा बहु तुरङ्गवम् ॥४७॥
श्रान्त्वा बालकृतं सर्वे शत्रुघ्नाया निवेद्य ते । दूतानाज्ञापयामासुर्न्नयतां तुरगः सुखम् ॥४८॥
लवस्तानागतान् दृष्ट्वा वायव्यास्त्रेण वै तृणम् संमन्त्र्य तान् सुमोधाय नीलपा शिशुसंयुतः ॥४९॥
सञ्चार्नस्तदा यातं हन्यश्चाथतुरङ्गितम् । शत्रुघ्नेनापि तैर्दूतैः खेडभूत्तद्रमगोपमम् ॥५०॥
तच्छ्रुत्वा राघवचन्द्रोऽपि प्रेषयामास सादरम् । सुग्रीवमङ्गदं नीलं मैन्दं जाम्बवन्तं नलम् ॥५१॥
सुषेणं भरतं वायुपुत्रं ताक्ष्यं विभीषणम् । नृपेण पार्थिवान्सर्वान् स्वस्त्रांस्तर्बलपेतान् ॥५२॥
द्विविदं दधिवक्त्रं च वानरान्मकराध्वजम् । ते सर्व दुद्रुवुर्योद्धुं चक्रुस्त्त्वरान्विताः ॥५३॥
तानागतान कपी दृष्ट्वा कस्यचित्पतितं भुवि । दूतस्याश्वमोचनायायातस्य शरासनम् ॥५४॥
तूणीरं च स्वयं धृत्वा ययौ योद्धुं त्वरान्वितः । टणत्कृत्य महच्चापं चिन्तयामास चेतसि ॥५५॥


मैंने जो अपराध किया था, उसका उद्देश्य एकमात्र यही था कि मैं किस प्रकार आपसे मिलूँ। आपने भी मेरे अपराधका स्मरण करके भी मुझे बुलाया साधुवत् कृपा की ॥ ३७ । ३८ ॥ आज आपके दर्शन करते ही मेरा पुरुषार्थ बढ़ गया और आपके सामने रामचरित गायन बड़ी कीर्ति की बात ॥ ३९ ॥ इतना कहकर कुश धूप दाशद और अपने भ्राताके साथ आश्रमको जानेकी तैयारी करने लगे। उधर रामने उन बच्चोंके लिए दस हजार स्वर्णमुद्रायें अवश्य दिलवायीं। किन्तु उन्होंने वह धन नहीं लिया। उन्होंने कहा—राजन् अरण्यमें फल-मूलपर जीवन बितानेवाले हम वगवाका काम आपकी इस सुवर्णराशिको लेकर क्या करेंगे। बस, आप अपनी कृपादृष्टिसे हमारी रक्षा करते रहिए ॥ ४०-४२ ॥ इस प्रकार उस दानद्रव्यका परित्याग करके वे दोनों वाल्मीकिजीके पास चले गये। वन्ताके मुखसे अपना चरित्र सुनकर रामचन्द्रजी बहुत विस्मित हुए ॥ ४३ ॥ उधर कुश आश्रमपर पहुँचे तो वहाँ वाल्मीकि तथा माताको उस दिनका वृत्तान्त सुनाया और स्नान करनेके लिए गङ्गाजी-को चले गये ॥ ४४ ॥ इधर लव कुछ मुनिकुमारोंके साथ खेलने लगे। इसी बीच जहाँ वे सब खेल रहे, उस तरफका अश्वमेघका घोड़ा चारों ओर घूमकर रामकी यज्ञशालामे जा रहा था। उसे देखते ही कौतुकवश भटोंने घेर लिया। लवने आगे बढ़कर घोड़ेको पकड़ा और अपने कुटियाके किनार ले जाकर एक वृक्षमें बाँध दिया ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ लडक फिर खेलने लगे। उस समय म.काश्रम पूरवक विमानपर बैठे हुए शत्रुघ्नने देखा तो बहुत हँसे। उन्होंने सोचा कि यह बच्चोंने खेलवाड़ किया है। शत्रुघ्नने दूतोंसे कहा जाओ और घोड़ेको यहाँम छुड़ा लान ओ। दूत लवके पास पहुँचे। ज्यों ही लवने एक तिनका उठाया और वायुव्य मन्त्रस अभिमन्त्रित करके उनपर डाल दिया। उसके डालते ही बड़ा जोरसा आँधी चलने लगी ओर शत्रुघ्न तथा उनके सैनिक हाथी, घोड़े, रथ आदि आकाशमें औरोंकी तरह उड़ने लगे ॥ ४७-५० ॥ यह समाचार सुनकर रामने अपने यहाँसे सुग्रीव, अङ्गद, नील, जाम्बवान् नल, सुषेण, भरत, हनुमान्, गरुड़, विभीषण, सुषेण तथा देश-देशान्तरसे आये हुए राजाओंको शत्रुघ्नकी सहायताके लिए भेजा। इनके अतिरिक्त द्विविद-दधिवक्त्र आदि वानर तथा मकरध्वज आदि वीर गर्जनाके साथ युद्धभूमिकी ओर दौड़ पड़े ॥ ५१-५३ ॥ इतनी बड़ी सेनाको सामने देखकर लवने एक साधारण मनुष्यको, जो घोड़ा छुड़ानेके लिए आये हुए किसी सैनिकका गिर पड़ा था,

३२५आनन्दरामायणे[ सर्गः ७

पितृव्याद्याः स्थिता योद्धुं ममाद्य पुरतःस्थले। इदमेवाथ सोढव्यं मया च महासंगरे ॥५६॥
कथं तीक्ष्णानथ शरांस्तेषु प्रक्षिपाम्यहम्। मन्मन्त्रादिशरैर्नाद्या मा भवन्तुनिगोचराः ॥५७॥
महिक्षतिं कथं दृष्ट्वा कर्तव्यं किं मयाऽधुना। सीतां गन्तुं पश्चिमेऽन्वा गच्छामि तं मुनिम्॥५८
वाल्मीकिशिक्षिता विद्या नष्टा स्यान्निष्फला मयि। अत्रोपायोऽथ विना युद्धं करोम्यहम् ॥५९
इति निश्चित्य मनसि मेघवल्लक्ष्मणो वदन्। प्रहसन्वै किमर्थं मा मुग्धा मित्रैव वेगतः ॥६०॥
न सीतास्वङ्गुलभोऽहं पीडनान्मोहनाय हि मोहास्त्रेणाऽन्मुह्वं मां मेवं वेत्थ भो खलाः ॥६१॥
सीतास्योच्छ्विसितेनाऽग्निरुत्थास्यतिभिड्ङिव पौरुषम्।
त्रिदग्ध न स्फुटं लोकेऽदर्शयन्मे समापि च ॥ ६२॥
इति स्ववाक्यैर्गर्जन्त्सहस्यान्यं मथ पुनः माहायामन्त्रमादाय मोहनास्त्रं विसृज्य च ॥ ६३ ।
ततो लवः सं विजया सुमंत्र दग्त तथा कृत्वा मर्कटशः प्राप्तै लब्ध्वा वायुनन्दनम्। ६४
सुग्रीवं च मुदा युक्तो मानायं तान प्रदर्शयत्। दृष्ट्वा मोहाविदान् वीरान् मोहनास्त्रं प्रमोहितान् ॥६५॥
पुत्रान्न मोचयामास क्षपयामास तानू रहः नानानानाविधैः श्रुत्वा लक्ष्मण बाष्पमब्रवीत् । ६६।
ईदृशं पौरुषं तथा रावणेनापि ना कृतर् यथा कृत बालकर इत्यायं किमत्र वै । ६७।
श्रीरामवचनं श्रुत्वा लक्ष्मणः प्राह राघवं मा विनेश वश कामं तृत्वाऽहं न शिशुं तुमाम् । ६८।
त्वन्मन्त्रिभारानयामि सिंहो मृगशिशुं यथा। इत्युक्त्वा माधव नत्वा रथाऽऽरूढो ययौ जवात् ॥६९।
सेनया मन्त्रिर्युक्ता वाग्माक्यव्योममण्डलम् । तत्रागतं धनुष्पाणिं लव दृष्ट्वा तन्मुखे ययौ ॥७०।
न दृष्ट्वा बालकं रम्यं कृपया लक्ष्णोऽब्रवीत् । मा शिशो त्व कुपर्याय माहवे मन्पुरस्थित ॥७१॥


उसका हाथ न हिलावेगा न लगावेगा और युद्ध करने के लिये राजी न होगा। हे देव ! यह तो मेरे सम्बन्धी सब इकट्ठे होकर मेरे चाचा आदि युद्ध करनेके लिए सामने आये हैं, इसलिए मैं इनपर अस्त्र न चलाऊंगा क्यों कि महात्माओंने स्वजनोंका वध करावर माना गया है । इस कारण यह मेरे दुष्कर्मोंको भला कैसे सहेंगे। ऐसी अवस्था में मैं क्या करूँ ? यदि युद्धसे मुँह मोडूँगा तो वाल्मीकिजीके आश्रम में न जाउँ तो महर्षिकी सिखायी विद्या निष्फल हो जायगी। अनन्तर कोई ऐसा उपाय सोचना होगा, जिसमें किसीका वध न हो ॥ ५४-५९ ॥ ऐसा निश्चय करके मेघकी तरह गर्जते हुए लवने कहा- हे दुष्ट ! तुमलोग किसलिये मेरी ओर दौड़े चले आ रहे हो ? ॥६०॥ तुम लोग धोके में न रहना । श्रीरामकी दी हुई मोहास्त्रको चुपचाप सह लूंगा। देखो मेरे समान बन्ध्य अग्निका दूसरा रूप ही मैं स्वयं हूँ। सीताकी उष्ण उच्छ्वासकी यह ज्वालाके समान आज बन गया है । इसलिए तुमलोगोने मेरे सामने व्यर्थ होगा और दुःख पायेगा इस प्रकार कहकर अपने धनुषपर प्रत्यञ्चा चढाकर बाणोंका तीक्ष्णतर प्रहार किया। तदनन्तर अपने माहेश्वरास्त्र और जीवास्त्र नाम बाणोंका संधान कर दिया ॥ ६१-६३ ॥ इसतरह विजय प्राप्त करके लवने सुमन्त्र और अन्य सबोंको बान्ध लिया। प्रयोग हनुमान्जी तथा सुग्रीवको दबाकर प्रसन्नतापूर्वक माताके पास ले गये और सबोंको दिखाया। उन वानरोंको माहास्त्रसहित देखकर सीताने उन्हें मुक्त करा दिया। उधर जब रामने यह सुना कि लव मोहनास्त्रसे मन्त्रियोंको मोहित करके बान्धके आश्रमको पकड़ ले गया है। तब एकान्तमें लक्ष्मणसे कहने लगे— हे लक्ष्मण ! इस प्रकारका पराक्रम तो रावण भी नहीं दिखा सका था, जैसा कि यहाँ वह छोकरा दिखा रहा है। इस विषयमें क्या करना चाहिये यह मैं कुछ भी नहीं सोच सका हूँ इस प्रकार रामकी बात सुनकर लक्ष्मण बोले- आप कुछ चिन्ता न करें। मैं अभी जाता हूँ और क्षणमात्र में उस बच्चेको बन्दी बनाकर आपके पास लाता हूँ ॥६४-६८॥ ऐसा कहकर लक्ष्मण रथपर बैठे और सेनाके साथ चल दिये। एक बड़ी सेना और मन्त्रियोंके साथ लक्ष्मण थोड़ी ही देरमें अश्वमेधके पास जा पहुँचे। जब लवने सुना कि लक्ष्मण आये हैं तो वे स्वयं उनके सामने गये। लक्ष्मण जब उस सुन्दर और सुकुमार किन्तु वीर