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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ४ ]

सर्गः ४ ]
विवाहकाण्डम्
२६१

चक्रतुस्तोषसम्पूर्णौ ते तत्रापि स्मिताननौ । वधूरथैश्च सर्वे निष्कपीता विरेजिरे ॥१५॥
कुङ्कुमाङ्कितपादी ते ददतुर्लक्ष्मरूपयोः । एवं नानामहोत्साहैर्गतास्तेषां दिनत्रयम् ॥१६॥
चतुर्थे दिवसे रात्रौ वध्वाप्तविराजिते । दर्पणेनार्त्तिजैर्नौ चांसौ बालको तौ विरेजतुः ॥१७॥
ततस्तौ बालकौ पत्न्योः स्वस्वस्याङ्के निवेश्य च । चक्रतुस्ताण्डवं नृत्यं कुशलौ मण्डपांगणे ॥१८॥
मातृश्वश्वादिकासु पश्यत्सु च समासदम् । यौतुकं भूरिकीर्त्तिः कुशाय च लवाय च ॥१९॥
ददौ तुष्टमनाः श्रीशं रामसम्बन्धहर्षितः । नियुतानां गजेन्द्रांश्च शिविकाश्चापि तन्मिताः ॥२०॥
तुरङ्गान्रथसंयुक्तान् नियुतान्सन्ददौ द्वयोः । ताभ्यां पृथक् पृथक् पौत्रीभवन्त्या द्रव्यपूरितान् ॥२१॥
नानालङ्कारवासांसि गा दासीः सेवकैस्तथा । ददौ ताभ्यां भूरिकीर्त्तिर्यत्संख्या सम्भवा न विद्यते ॥२२॥
एवं सम्मानितस्तेन धीमतो भूरिकीर्त्तिना । सपत्नीकाभ्यां पुत्राभ्यां गजारूढाभ्यो समन्वितः ॥२३॥
सीतया वधुभिः पौरैः सुहृद्भिर्भातृभिर्नृपैः । पूर्ववद्दुन्दुभ्याद्यैश्च स ययौ स्वकीयमण्डपम् ॥२४॥
अरण्ये ततो रामो मासमेकं विधाय सः । चकार सीतया क्रीडां नौकासंस्थो महोदधौ ॥२५॥
ततः स्नुषाभ्यां श्रीर मो ययौ निजपुरीं सुखम् । अयोध्याया विजितोऽपि श्रुत्वा रामं समागतम् ॥२६॥
स पुर्या रक्षणार्थं हि रामेणाज्ञापितः पुरा । स पुरीं शोभयामास पताकाध्वजतोरणैः ॥२७॥
वरेंद्रं पुरस्कृत्य नृत्यवादित्रनिःस्वनैः । विजयो गमनायेतो रामं प्रत्युद्गतो जवात् ॥२८॥
अथो नदत्सु वाद्येषु रामो दारैः सुहृज्जनैः । स्नुषाभ्यां सीतया वधूवन्तीभिर्भ्रातृभिः पुरीम् ॥२९॥
विवेश सेनया पौरैः पश्यद्भ्यश्चादिकं पथि । तदा वेश्या ननृतुस्तुष्टुवुर्वन्दिमागधाः ॥३०॥
स्वस्वपत्न्येयुतौ बालौ वरवारणयोः स्थितौ । तदा विरेजतुर्मेगि श्रीभिः पुष्पैः प्रवर्षिणौ ॥३१॥

... उन दोनों बालकों ... का ... वास बैठ गया अपना साम भूरिकीर्ति से वेष्टित होकर अपनी-अपनी स्त्रियोंकी वन्दना की ॥ १५-१६ ॥ उस समय वे वर वधु अतिशय प्रसन्न होकर मन्द-मन्द मुसका ... । रामके पीछे प्रकाशमय वे बड़े सुन्दर दीखते थे ॥ १५ ॥ इसके बाद उन दोनों बहुओंने कुमकुम- ... हुए अपने चरण पतिके गोदपर रख दिये । इस तरह नाना प्रकारके उत्सवके साथ तीन दिन बीते ॥ १६ ॥ चौथे दिन के समय ... कुशकी आरती की गयी । उस समय ... उनकी सुन्दरता देखने ही योग्य थी ॥ १७ ॥ इसके अनन्तर वे दोनों बालक अपनी अपनी स्त्रियोंको बैठ- ... कर ... ताण्डव नृत्य करने लगे ॥ १८ ॥ माताएं म... आदि स्त्रियाँ मण्डपमें बैठी यह कौतुक देख रही थीं । महाराज भूरिकीर्तिने अपने दोनों जामाताओको खूब दहेज आदि भी दिये ॥ १९ ॥ रामके सम्बन्धसे ... होकर उन्होंने उन्हें एक लाख हाथी, उतनी ही पालकियों, पाँच लाख घोड़े, एक लाख रथ, अश्रफि- ... तथा भारी सम्पत्ती ... द्रव्यसे भरकर दोनों बहुओंको दीं ॥ २०-२१ ॥ इनके सिवाय विविध ... के वस्त्र, गायें, दास, दासी और नौकर इतने दिये कि जिनकी गिनती सम्भव नहीं थी ॥ २२ ॥ ... सम्मानित होकर भाग्यवान् ... के साथ दोनों पुत्रोंके साथ हाथीपर सवार होकर ... नारियों, सुवासिनों, ... मण्डप- ... ॥ २३-२४ ॥ इसके अनन्तर रामने उस वटवृक्षमें एक मास बिताया । वहीं वे कभी कभी नौकापर ... क्रीड़ा किया । उधर अयोध्यामें उस विजयने, जिसको राम नगरकी रक्षाके लिए छोड़ आये थे, ... आगमनका हाल सुनी तो उसने ध्वजा-पताका-तोरण आदिसे नगरीको खूब सजाया । २५ ॥ २६ ॥ २७ ॥ ... हाथीको आगे करके रामका मंत्री विजय रामकी अगवानी करने जा पहुँचा ॥ २८ ॥ इसके अनन्तर ... विविध प्रकारके बाजे बज रहे थे तब राम अपने स्त्री, सुहृज्जन, बहुओं, सीता, पुरवासियों तथा ... साथ पुरीमें प्रविष्ट हुए । २९ ॥ उस समय वेश्या नाच रही थीं और मागध तथा बन्दीजन ... कर रहे थे ॥ ३० ॥ अपनी अपनी पत्नीके साथ दोनों बालक (कुश और लव) हाथीपर बैठे हुए

३६२ आनन्दरामायणे [सर्गः ४

एवं रामो गृहं गत्वा बालाभ्यां स्वीयमब्रवीत्। कारयित्वा समाश्चर्यं मददीद्दानान्यनेकशः ॥३२॥
तदाऽलङ्कारवस्त्राद्यैः संपूज्य रघुनन्दनः । मुदः सकलांश्चापिनिशान् जानपदान्नृपान् ॥३३॥
आचांडालदिकान्त्सर्वान् संतुष्टानकरोन्मुदा । ततः स भूरिकीर्तिस्तान् मन्त्रिणः सैन्यसंयुतान् ॥३४॥
सम्पूज्य प्रेषयामास स्वदेशं रघुनन्दनः । तत स्मातुन् जानपदान् महदृश्च प्लवङ्गमान् ॥३५॥
विभीषणादिकांश्चाज्ञां संमु मान्यस्थल ददौ, ततः सर्वे राघवस्य ने संभाषणाद्युहिनैः ॥३६॥
स्वस्वकोशेषु संपूर्य ययुः स्वं स्वं गृहं मुदा । मृगंडेशैर्नभेश्चरैः सर्वैः संपूज्याश्च तिवारिवाः ॥३७॥
अथ रामः स्नुषाभ्यां च पुत्राभ्यां बन्धुभिःसिया । राज्यं चकार राज्यं स भक्तेणप्रतिभं चिरम् ॥३८॥
ततः श्रावणमासस्य दर्शमारभ्य षोडश । प्राप्तमन्वन्तरे यानि सनिमुख्यार्हदिनानि हि ॥ ३९॥
नेषु मासं सं राम मागरूपं सवानरम् । संपूज्य भूरिकीर्तिः स विनाय परमं पदम् ॥४०॥
ऋणभायै विविधैर्वस्त्रालङ्कारवाहनैः । कियद्दिनानि सम्भाव्य ददावाज्ञां पुनः पुनः ॥४१॥
मन्वन्तरप्रमुखार्हदिनानि षोडशाधुना । विष्णुद स मया तेऽग्रे कथ्यन्ते तानि वै शृणु ॥४२॥
श्रावणस्याथ मासस्य कुहः श्रेष्ठा प्रकीर्तिता । भाद्रशुक्लचतुर्थी तु विजया दशमी नरापुनः ॥४३॥
दीपावल्याश्च चत्वारि दिनान्यानि हि । मार्तंडार्य पदंमा च तथा षष्ठाऽथ पुनः ॥४४॥
मक्रान्तिर्महानवम्या तु तथा चैव नवम्यपि । ... षष्ठ्युत्सवाश्चाथ पुनस्तदा ॥४५॥
अक्षय्याख्या तृतीया च तथा वै ज्येष्ठपूर्णिमा । कार्त्तिके हुतशांडश्चैव पञ्चैतानि हि ॥४६॥
मन्वन्तरप्रमुख्यानि त्वाख्यातानि... । तस्मिन् सर्वान् जनान् रामः सादरं पर्यपूजयत् ॥४७॥
एवं कुशस्य च तथा लवस्यापि सविस्तरम् । विरहोऽती रतिर्भर्ते शिष्य यथा पूर्वं श्रुतौ मया ॥४८॥
यदा श्रीरामचन्द्रश्च वैकुण्ठारोहणं शुभम् भवितव्येति तदाऽयोध्यापुर्यां वै मग्न्युजले ॥४९॥

सुशोभित हो रहे थे और अनेक नगाड़े बजने लगे थे, उसपर फूल बरस रहा था ॥३२॥ इस तरह बड़े उत्साहके साथ वे अपने राजभवनमें पहुंच वहां उन्होंने आश्चर्य्य रूपसे संस्कार दूरस्त कराया और अनेक तरहके दान दिये ॥३३॥ उस समय रामने अपने सम्बन्धीगण, समस्त पुरवासियों, मित्रों जनपदवासियों और चाण्डालों से लेकर साधारण श्रेणीवाले पालोंको सबका नाना प्रकारके वस्त्रों और अङ्गलङ्कार समर्पण करके सबको प्रसन्न किया। इसके पश्चात् महाराज भूरिकीर्तिके मंत्रियों तथा सेनाकी पूजा करके उन्हें विदा किया। इसके बाद जनक आदि सम्बन्धियों, वानरों तथा विभीषण आदि मित्रोंको उच्च प्रमाण के आदर के साथ सम्मामित करके अपने नगरको जानेकी आज्ञा दी ॥३३-३६॥ इस प्रकार रामके आदर सत्कारको स्वीकार करके उन लोगोंने भी वैसे रामका पूजा की और अपन-अपने देशको लौटे ॥३७॥ इसके बाद राम सीता पुत्रों एवं वधुओंके साथ रहते हुए बहुत दिनों तक धर्मातुकुल राज्य करते रहे। ३८। तदनन्तर श्रावणकी अमावास्यासे लेकर वर्षमें षोडश बड़े त्योहारों और उत्साहके दिनोंमें हजार व परिवार के साथ पुर समेत सुग्रीवको अपने यहां सादर बुलाते थे । ३९ । ४०॥ वहां पहुंचनेपर वे वस्त्र अलंकारादि समर्पित करके उनकी पूजा करते थे। कुछ दिन राम वहां रहकर फिर उनको राज भवन और सुग्रीवको आज्ञापर फिर पहुंचा जाया करते थे ॥४१॥ हे विष्णुदास अब मैं तुम्हें वर्षके उन सोह दिनों के नाम सुनाता हूँ सो तुम उन्हें श्रवण करो ॥४२॥ हे श्रावण मासकी अमावसया, भाद्रपद शुक्लपक्षकी चतुर्थी व उसकी विजया दशमी ॥४३॥ और दीपावलीके आगे पाछवाले चार दिन बड़े महत्पूर्ण होते हैं ।४४। मार्गशीर्ष कृष्णपक्षकी पंचमी तथा षष्ठी, मकरकी संक्रान्ति रघुनवमी और चैत्र शुक्लकी हुताशनी प्रतिपदा का बड़ा पवित्र शिव योग है ॥४५॥ अक्षयतृतीया ज्येष्ठकी पूर्णिमा और श्रावणके शुक्लपक्षकी नागपंचमी व छटवें मान्यवर शिव योग हैं ॥४६॥ ये ही मन्वन्तरके बड़े बड़े उत्सव और इस मासमें पड़े हैं। इन्हीं दिनों भारण कि सपरिवार रामके अपने यहां बुलाकर पूजन करते थे ॥४७॥ हे शिष्य ! जैसा कि मैंने आजके बहुत दिनों पहिले कुश तथा लवका विवाह वृत्तान्त सुना था, उसी तरह वर्णन किया ॥४८। इसके