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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ४ ] मनोहरणकाण्डम् ५९९

सर्गः ४ ] मनोहरणकाण्डम् ५९९


तन्नाम परमं ब्रह्म योगिगम्यमनामयम् । अनन्तनामरूपैश्च विधाकारं स्वमायया ॥२२३॥
भूत्वा सर्वेषु भूतेषु वशार्कं भूतचालकम् । स्फुटमप्यस्फुटं तेषामज्ञानं स्वात्मनः सदा ॥२२४॥
ब्रह्मज्ञाने परो हेतुः सर्वोऽपि परिवेष्टितः । मन्त्राः सन्ति तेनेदं विद्वद्ब्रह्म न प्रकाश्यते ॥२२५॥
परांचि खानि प्रभुणा सृष्टानि देवते तथा । नाऽऽस्ते सांतरात्मानं प्रसिद्धं श्रुत्युदाहृतम् ॥२२६॥
सर्वोऽपि मनुजो दम्भो गृहपुत्रात्मसम्भवम् । किञ्च कामदामोय तनाराध्यश्च काञ्चने ॥२२७॥
यदि भूतात्मदामन्यः स्वात्मानं परमुच्यते । तदा कस्याथ रोषेण व्यथयेद्यस्त्वयं हि ॥२२८॥
आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः । किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥२२९॥
इत्याह च श्रुतिः साध्वी बृहदारण्यगाऽभवत् । यस्यान्तरातिरात्रं स्यादामनत्रय मानवः ॥२३०॥
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते । इति भागवतश्चाथोपनिषाय प्रोक्तराञ्चयम् ॥२३१॥
भोगासक्तः पुमान्देवमेकाही रहने न च । तृष्णात्रयसम्पन्नो वारंवारं विपद्यता ॥२३२॥
स लोकैगुहार्थं श्रुत्वा दुर्बलः कामजः । जाया सम्पादयेत्यादावित्यूचेऽत्र गृहार्थः ॥२३३॥
पुत्रानुत्पाद्य देवेभ्यो देवानर्चयेत्ततः । पुत्राभावे स्वयं यजेदर्थं च धनेच्छया ॥२३४॥
अनिशं हूयते चित्ते न कामोज्झेद् व्यपेत्यतु । शास्त्रज्ञोऽप्यनिकेतश्चानन्नश्वाथः प्रतिग्रहम् ॥२३५॥
धनेच्छी याचयन्येवं ग्रामे भ्रमति सर्वदा । वायुभक्षाननां तु का वार्त्ता ब्रह्मचिन्तने ॥२३६॥
अनेकपुण्यपुञ्जैः सद्कुले जन्माऽथ लब्धिभिः । भजंत सद्गुरूनेव मार्गोऽहि पदा सदा ॥२३७॥
रामचन्द्रदर्शनार्थं मुद्रां स्वां पूरयन्मुदा । दृष्ट्वा गजादलपामन्त्रं स्वपादसलक्षणंक्वचित् ॥२३८॥

योगियोंके गम्यमान और कल्याणमय उस अनन्तब्रह्मने अपनी माया द्वारा विश्व आकारावाले बनकर सब प्राणियोंमें विद्यमान रहकर उनको सञ्चालन करते हैं। यद्यपि वह सबसे वशीभूत हैं, उनके आगे स्फुट या अस्फुट भावसे सामने होता हुआ भी वह ईश्वर नहीं दीखता ॥२२३-२२४॥ इस प्रकार ज्ञानमें अपनी आत्मा ही सर्वप्रधान है किन्तु मन्त्रोंकी शक्ति उसपर आवरण डाले रखती है। यही कारण है कि उस पर विद्वत्स्वरूप ब्रह्मज्ञान नहीं होता ॥२२५॥ एक प्रसिद्ध श्रुतिमें भगवान्ने कहा है कि प्राणियोंकी आंखें मैंने बाहर बनायी हैं; इसलिए लोग अन्तरात्माको नहीं देख पाते ॥२२६॥ संसारके सब मनुष्य अपने धन, स्त्री और पुत्रके दास बन रहे हैं। इसी कारण अन्तरात्मा उन्हें दीखती ही नहीं ॥२२७॥ यदि उनका ज्ञान न होकर सदा आत्मानन्दस्वरूप विष्णुमें परे रहें और आत्मा आत्माकी साक्षी बनाकर सब काम करे तो उन्हें लज्जाका बात ही नहीं रहता अथवा यदि जीव आत्माको जानकर यह समझ ले कि मैं ही वह परम पूज्य ब्रह्म हूँ तो फिर किसके लिए अपने शरीरका सांसारिक ज्वालामें भूने? यह बृहदारण्यकोपनिषद्में कहा गया है। इसके अतिरिक्त साक्षात् स्वयं भगवान्ने बहुतसा कहा है कि जो प्राणी और दिशा ओर अपना चित्तवृत्ति न लगाकर आत्मासे प्रेम करता है, आत्मामें ही तृप्त रहता है और आत्मामें सन्तोष करता है। उसके लिए संसारमें कुछ भी करना शेष नहीं रह जाता अर्थात् उस से उसकी सब काम पूर्ण हो जाता है ॥२२९-२३१॥ भोगोंमें आसक्त प्राणी पहले एकाएक इस ओर नहीं झुकता । वह तो तीन प्रकारकी इच्छाओंके चक्करमें पड़कर सदा धन पानेकी चेष्टा करता रहता है ॥ २३२ ॥ गृह सूत्र विधाने यदि स्वयं को अपुत्री समझता है तो पुत्रके उत्पादनमें तत्पर हो जाता है और इसके लिए 'जगतू यज्ञ' कर सकता है, करता है । २३३ । दैवतअं तथा तीर्थोंकी सेवासे यदि पुत्र उत्पन्न कर लेता है तो सूत्रात्मक भरण-पोषण तथा यज्ञके लिए धनकी इच्छासे मन ही मन रात दिन जला करता है, फिर भी अपनी कामना नहीं पूर्ण कर पाता। चाहे शास्त्रका पण्डित तथा सर्वज्ञ विद्यावान् हो क्यों न हो, यदि वह धनका अर्थी है तो प्रतिग्रह घर कुत्तेकी तरह दौड़ता रहता है। फिर यदि कोई अयुगपन्मति (समझदार) नहीं है तो इसके लिए आत्मचिन्तनकी चर्चा किस कामकी ॥ २३४-२३६ । अनेक प्रकारके पुण्य एकत्रित होनेपर प्राणी अच्छे कुलमें जन्म और सत्संगोंकी संगति पाता है। फिर उनकी बातोंपर चलता हुआ कथञ्चित् रामरूप ब्रह्माके दर्शनार्थ मुद्राओंकी भी पूर्ण करनेका उपाय करता है और

६०० आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

तं पूरणप्रकारं तु संक्षेपेणोच्यतेऽधुना । यथा लोकेऽञ्जनेन सम्यक्संवाद्य पूर्वतैस्सिद्धैः ॥ २३९॥
निधिः प्रत्यक्षतस्तस्य दर्शनं याति नान्यथा । एवमत्रापि सम्पूर्य साधनं यच्चतुष्टयम् । २४० ।
सम्पाद्य लभते शुद्धं रामेति पदमव्ययम् । मायाविद्येत्यितवर्णं यद् द्वयं तन्माधनं यथा ॥ २४१॥
शुद्धाविद्यामयं चेति प्रोच्यते तत्त्वदर्शिभिः । साध्यं साधनं च शास्त्रञ्च मिथ्याऽविद्यामयं त्रयम् २४२॥
ज्ञानोत्तरमिति मतं तस्मात्तद्दुर्गमीरितम् ।
चतुष्पादसाधनं सम्पूर्णमित्यभिधीयते । प्रत्येकं साधनं यच्च चतुःसाधनमुच्यते ॥ २४३॥
विवेकवैराग्यशमादिषट्कं मुमुक्षुता चेति प्रसिद्धमेतत् ।
लक्षणानि प्रत्येकमुत्तमानि प्रोक्तान्यमीषां स्मृतिभूमिकासु २४४॥
साधनानां चतुष्कं च ह्येषणात्यागपूर्वकम् । संन्यासश्च गुरोः सेवाश्रवणादित्रयं ततः ॥ २४५॥
पूर्वोत्तरसमाधी च पुञ्ज एकादशात्मकः । एतेषां तु मयः साक्षान्प्राणाद्या मङ्गतिर्मया ॥ २४६॥
मुमुक्षया तु न्यासादि षष्णां साक्षाद्विहोच्यते । समाधिरुत्तराक्षापि पृथगेवेति सम्मतः ॥ २४७॥
पूर्वत्रयाणां न विना मुमुक्षा द्योममन्तः । पर्नेः सदानमर्चत्र पदानि पूरयन्त्यलम् ॥ २४८
सर्वाणि तानि प्रोच्यन्ते श्रोतृणामवबुद्धये । दशेन्द्रियाणि नैषां तु गोलकानि नवैव तु ॥ २४९।
प्राणापानौ मनोबुद्धी तस्माद्धर्मश्च तन्मिताः । बुद्धर्शने यथाऽपीश क्रिया तन्वत्रता मता ॥ २५०॥
उभयेन्द्रियधर्माणामन्योऽमीसाधनाग्रहः । सप्तविंशतिसंख्यानि पदान्येतानि साधनैः २५१।
योग्यानि लाञ्छितुं सम्यक् पूरयन्त्वेन सर्वथा । तदा यत्परमं ब्रह्म रामेति पदमव्ययम् । २५२॥
याति प्रत्यक्षतस्तेन कृतकृत्यो हि जायते । एतद्धता विधानेन रामतोभद्रमुद्रिके ॥ २५३।
रामश्च कथितश्चाथ सर्वतोभद्रमीयन । स्वानतो नामरूपाणि संशयस्यापनुत्तये ॥ २५४॥

यदि उसके साथ सज्जन गुणिसे उसे सही समयपर ले जायँ तो वह अपनी साधना पूरा कर लेता है ॥२३७॥२३८॥ उसको पूर्ण करनेका प्रकार मैं यहाँ संक्षेपमें व्यक्त करता हूँ, जैसे संसारमें देखा जाता है कि आँखमें एक प्रकारका अंजन लगाकर गँवा दिए हुए खजानेको भी प्रत्यक्ष देख लेते हैं। उसी प्रकार पूर्वजो द्वारा बताये हुए मार्ग साधनाका सम्पादन करके प्राणो 'राम' इस शुद्ध और नाशरहित पदको प्राप्त कर लेता है। जिस तरह कि मायाया और अमित वर्णोंके शब्द सद्रूपकी प्राप्तिका साधन है, उसी तरह तत्त्वदर्शिंयोंने शुद्ध और विद्यमान साधन बतलाये हैं। साध्य, साधन और शास्त्र ये तीनों मिथ्या और अविद्यामय हैं ॥२३९-२४२॥ सकाम जितने भी सिद्धान्त हैं वे सब प्राणीको ज्ञानके पास पहुँचाते हैं। जितने चतुष्पाद साधन हैं, वे पूर्ण कहे जाते हैं और प्रायः सब साधन सङ्ख्यासे ही हुआ करते हैं ॥ २४३ ॥ स्मृतिकी भूमिकामें विवेक वैराग्य, शम, दम बादि ६ धर्म और मोक्षकी इच्छाका उत्पन्न होना ये सबके उत्तम चिह्न बतलाये गये हैं। २४४॥ इन सबमेंसे सबसे पहला साधन इष्णाओंका त्याग करना है। फिर संन्यास, गुरुकी सेवा, श्रवण, भजन, कीर्तन, पूर्वात्तर समाधि तथा एकादश प्रकारके पुञ्ज ही साधन हैं। इन सबके साथ प्राण आदिकी संगति होती है। २४५ ॥ - २४६ ॥ मोक्ष पानेके लिए षष्ठीवर छः प्रकारके न्यास आदि कार्य्य ज्ञान चाहिये। किन्तु उत्तर समाधि इसमें अलग ही रहेगी, यह बात सब लोग मान चुके हैं ॥ २४७ ॥ पूर्वके तीन समाधियोंके बिना मोक्ष नहीं प्राप्त हो सकता, इन साधनसमूहसे सब पद सरल होनेसे पूर्ण हो जाते हैं ॥ २४८ ॥ सुननेवालोंको बोध करानेके लिए उनके यहाँ बतला रहे हैं। उनके विचारमें कुल दस इन्द्रियां हैं और नौ गोलक हैं । २४९ । अनन्तर प्राण अपान, मन, बुद्धि, इन दोनोंके जितने प्रकार-के धर्म उत्पन्न हुए। बुद्धिसे ज्ञानकी उत्पत्ति हुई । ज्ञानेन्द्रिय अपने इच्छानुसार जो चाहे वह करे उसके लिए कोई नियम नहीं है । २५० । ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय इन दोनों प्रकारका इन्द्रियोंके धर्मसे और उनके धर्मसे कोई सम्बन्ध नहीं है । इस तरह इन सत्ताइस प्रकारके पदोंको साधन करके पूर्ण करना चाहिए। ऐसा करनेपर जो अव्यय परब्रह्म रामका पद है वह प्रत्यक्ष दीखने लगता है। जिससे प्राणी कृतकृत्य हो

सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ६०१


कल्याणं सर्वतः पुंसां चिंतनाद्यस्य ब्रह्मणः तद्ब्रह्मवाचक मुख्यं मंगलानां च मंगलम् ॥२५५॥
यत्र यद्व्यज्यते साक्षान्नाम्ना तदुदीर्यते । अधिदैवं तथाऽध्यात्मं सर्वतोभद्रमुच्यते ॥२५६॥
विविच्यतेऽत्रोभयं च प्रोच्यते वस्तुव्यक्तये । अधिदैवे तु यद्ब्रह्म तद्वाह्यमुदनेऽमरम् ॥२५७
अंडहृद्गतलोकोस्तु सर्वतोभद्रमुच्यते । तेनैव भद्र सर्वेषां लोकानामिति हि स्थितिः ॥२५८
तत्र स्वर्णमयं वेश्म निर्मितं प्रभुणा स्वयम् । दक्षपाणिरिति ज्ञेय यत्र कार्यचितिः स्वयम् । २५९
न्यासेन सर्वसत्त्वानां गतानां सर्वयोगिनाम् प्राणोपासननिष्ठानां त्रयणां नित्यकल्पने २६०
ब्रह्मणा सह ते सर्वे इति स्मृतिरुशामसः । क्रममुक्तेर्भयं पथाः श्रुतिस्मृतिमतोऽमलः । २६१
आध्यात्म हृदये यत्तत्सर्वतोभद्रमीर्यते । तेन भद्रेण कल्याणं सर्वेष्ववयवेष्विह २६२
तत्र यत्पुण्डरीकं तद्ब्रह्मणः स्थानमुच्यते । श्रुतावेव प्रसिद्धिरिति दहरश्रुत्यवेक्षनम् २६३
साधनसम्पन्नंयुक्ताश्निन्दिन्यन्ते तु समाहिताः । गुरुपदिष्टया युक्त्या तेषां ब्रह्म प्रकाशते ।२६४
परमः पुरुषो भूमौ न म्वाधमन्धयोरि । इत्यादिश्रुता यन्प्रोक्तं तच्च पारोक्ष्यमित्यपि । २६५
आह चाहमेवाधस्तादित्यादिसमदशामिताम् । गूढःनासां॑पि सर्वषां देहेऽहमिति दृश्यते २६६ ।
माभून्भ्रम इत्याधपारुवाक्यानि पुनर्वचः । एकात्मरूपयोरूषयोर्भेदशङ्कानिवृत्तये । २६७।
सर्वाषूपनिषत्स्वेवं ब्रह्म द्वैतं सुनिश्चितम् । ब्रह्मैवेददमृतमित्याह चाथर्वणः श्रुतः । २६८-
तत्त्वमेव त्वमेवैतदिति कण्ठव्यगं वचः तत्त्वमसीति छांदोग्ये ब्रह्माऽत्मैक्यं न भेदधीः २६९।
एकत्वं पदयोः स्पष्टं श्रुत्या यत्प्रतिपादितम् । साक्षात्मुक्तेः कारणं तद्वाधान्नैषां स एव हि ॥२७०॥


जाता है इतने विचारोंसे रामनेभद्रकी मुद्राएं बनायी और रामस्वरूप को बतलाया अब सन्देह नष्ट करनेके लिए प्रसंगवश सर्वतोभद्रका स्वरूप बतला रहे हैं ॥२५१-२५४॥ जिस ब्रह्मका स्मरण करनेसे प्राणियोंका सब प्रकार कल्याण होता है उसे लोग भद्र कहते हैं। भद्र एक वस्तु है और मङ्गलका भी मङ्गलकारी है ॥ २५५ । जहां कि वह ब्रह्म साक्षात् रूपमें अधिदेव या अध्यात्म रीतिसे व्यवसमान होता है, उसीको लोग सर्वतोभद्र कहते हैं ॥ २५६ ॥ अब यहाँ इसकी वास्तविक्ताको दिखानेके लिए उन दोनों प्रकारोंको दिखलाते हैं। अधिदैवके अन्तर्गत जो भद्र रहता है उस विप्रस्त भद्रका पहल बतलाते हैं ॥ २५७ ॥ इस अण्डको हरण करनेवाला लोक ब्रह्मलोक कहलाता है और उसीकी सर्वताभद्र संज्ञा भी है क्योंकि उसी लोकसे सबका कल्याण होता है और उसीके सहारे सब प्रजाका स्थिति बनी हुई है ॥ २५८ ॥ वहाँपर प्रभुने स्वयं एक सुवर्णमय घर बनाया है। उसे पक्ष या फाजंको नेत्राता, जो चाहे भी कह ली ॥ २५९ ॥ न्यासके द्वारा सब प्राणीभी सब वाशिदों तथा प्राणकी उपासना में लगे हुए प्रणियोंका वह नित्य पद दीखन लगता है ॥ २६० ॥ इससे ब्रह्म भी भासमान होने लगता है। यह स्मृतिका मत है और वेद भी इसी मतको स्वीकार करत है वास्तवम तो यह पवित्र मार्ग श्रुति और स्मृति इन दोनोंको मान्य है ॥ २६१ ।, अध्यात्मका जो हृदय है उसे लोग सर्वत भद्र कहते हैं । उस भद्रसे सब अवयवयोंका कल्याण होता है । २६२ ॥ वहाँपर जो कमल है, वह ब्रह्मका स्थान है, श्रुतियोंमें भी यह बात प्रसिद्ध है कि साधनरूपा सम्पत्तिके सम्पत्तिशाली जो लोग यहाँ रहते हैं उन लोगोंको गुरुजनोंकी उपदिष्ट मुक्ति द्वारा ब्रह्म प्रकाशमान दीखने लगता है । २६३ , २६४॥ नीचे, ऊपर तथा मध्य इन तीनों स्थानोंमें वह दृश्य विद्यमान रहता है । इन श्रुतिओग जो कुछ कहा गया है, वह परोक्षमे नहीं प्रत्यक्ष ही जानना चाहिये ॥ २६५ ॥ प्रभुने स्वयं कहा है कि सूर्य आदिके मध्य में संसारमें व्याप्त रहता हूँ और सबारी मृगोंके शरीरमे भी रहता हूँ ॥ २६६ ॥ किसीको भ्रम न हो इस विचारमे 'आत्मा एव' आदि वाक्योंको फिर-फिर दुहराया गया है । 'एकात्मारूपी उस आत्मार्क बदकी शंकाको निवृत्त करनंक लिए सब उपनिषदोंमे उस ब्रह्मको अद्वैत बतलाया गया है । 'ब्रह्म एव इदं अमृतं' आदि अथर्व वेदन कहा गया है ॥ २६७ ॥ २६८ ॥ 'त्वमेवेद' तथा 'त्वमेवैतत्' इन श्रुतियोहि तथा 'तत्त्वमसि इस छान्दोग्यके महावाक्यसे ब्रह्मके एकत्वका प्रति-

६०२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

यच्च किञ्चिज्जगत्यत्र दृश्यते श्रूयतेऽपि वा । अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः ॥२७१॥
इदं सर्वं यदयमात्मैकमेवाद्वितीयकम् । सर्वं खल्विदमिन्त्यादिश्रुत्यो यत्प्रवदन्ति हि ॥२७२॥
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । संपश्यन्नात्मयाजीति परमात्मा मनोर्वचः ॥२७३॥
एतादृशेन वै धेनो भूत्वा जगत्स्वरूपकः । कृतकृत्यः स्वयं तीर्त्वा सर्वांस्तारयतीति च २७४॥
अत्राक्तं श्रूयतेऽथाय ज्ञात्वाऽन्तं दृढनिश्चयम् । किं बहुक्तेन चोद्दिष्टं संक्षेपेणोपसंहृतम् ॥२७५॥
नारायणाच्युत जनार्दन वासुदेव गोविन्द माधव मुकुन्द रमेश विष्णो ।
मत्स्यैणपार नरसिंह परावरात्मन्सामोपनाय शिव वामन पाहि विश्वम् । २७६ ।
येनेदं विकृतं विश्वं विशता येन चेतनम् । यस्मिन् यत्प्रतिष्ठं च तस्मै सर्वात्मने नमः२७७॥
इदानीं रामतोभद्रस्याहोसरड्लस्य च । नानाभेदाः प्रकल्प्यन्ते लघुमुद्रान्वितस्य हि ॥२७८॥
पूर्वोक्तंऽष्टाविंशतीनां रेखावृन्दं प्रकल्पयेत् । परिधी द्वादशैकां तन्वन्तरकोष्ठकानि योजयत् ।२७९॥
प्रथमे लिखित्त्वेकाशावृतुषोडशपादकम्तः चाप्यः षोडशपादानांनवेष्टादशदान्विता, २८०॥
भद्रं नत्वमिमं चाथ द्वितीयेऽर्कमिताः शिवः । वाष्यत्योदशमिता रूपाष्टादशदान्विताः २८१॥
भद्रमर्कपदं शेषं पथार्थं प्रकल्पयेत् । ध्वट् यास्मनोभद्रप्रत्र च वषत्परम् ।२८२।
अथवाऽऽद्ये रसमुद्रा ग्समा वापिकाश्च परः । त्रयोदश पदाः कार्या १६ नन्दस्वसंयतकम् ।२८३॥
द्वितीये पञ्च मुद्राश्च लिङ्गषट्क च वापिकाः । तन्मिाथ भद्रकर्मपदंमण्डूष्मावधि ।२८४॥
तुर्यपञ्चतुर्यनेत्रचन्द्रसम्स्याथ मुद्रिका । पर्णनेत्रनेत्रनवनेत्रेन्दुसंख्यानेका ॥२८५॥
भद्रं षट्पदसङ्कीर्ण षट्पदं विंशपादकम् । षोडशां त्रिशुमपादं क्रमाज्ज्ञेय विचक्षणैः ।२८६॥

पावन किया गया है। वही मुक्तिका कारण है और उसका वोध होनमे तो प्राणी साक्षात् ब्रह्म ही हो जाता है ॥ २६६ । २७० ॥ इस जगन्म बाहिर-भीतर जो कुछ देखा और सुना जाता है, उन मबम व्याप्त होकर वह नारायण स्थित है। २७१ ॥ इस जगन्म जो कुछ है उभम एकमात्र वही अद्वितीय आत्मा है। "सर्व खल्विदं ब्रह्म" आदि वाक्योस श्रुतियां भी यही बात कहती है ॥ २७२ ॥ जो प्राणी संसारकी सब वस्तुओमे अपनेको देखता है और सब प्राणियोंका प्राणांदवन् अपनेमे देखता है। उन अ माज्ञानक लिये यह कोई साधारण बात नहीं है। यह मनु भगवानका कथन है ॥ २७३ ॥ इस प्रकारक ज्ञानस ता बंधी दृढ होकर अपनीको कृतकृत्य मानते हुए स्वयं तो तरते ही है साथ ही अपने अन्य जनोंको भी यह श्लोकाहूत पिलाकर भवसागरसे पार उतार देते हैं २७४ ॥ यहांपर बतलाया हुआ इतिहाव वशिष्ठादिका विद्वान लोग अच्छी तरह जानते हैं। अधिक कहना सुनना व्यर्थ है। संक्षेपम इस श्लोकका उपसंहार कर दिया गया है। २७५॥ हे नारायण, अच्युत जनार्दन, वासुदेव, गोविन्द, माधव, मुकुन्द, रमेश, विष्णो, मत्स्य, मण्डूक, कच्छप, सूकर, नृसिंह, परावरगत्मन्, राम, गरुडगामिन्, शिव, वामन ! आप इस त्रिष्णकी रक्षा क जिए ॥ २७६ ॥ सर्वव्यापी जीवोंमें प्रविष्ट होकर जिसने इस विश्वको सचेत किया है, जिसमें सब जीव स्थित हैं, जिसमें सब प्रतिष्ठित हैं, ऐसे सर्वात्मा रामको प्रणाम है । २७७ । अब लघुमुद्रार्क साथ-साथ एक सौ आठ रामतोभद्रोक अनेक भेद बतलाते हैं ॥ २७८ ॥ पूर्वोक्त २८ रेखाओंका वृत्त करे । उसमें २१ परिधि अधिक बनावे। फिर उनमें विलो- की योजना करे ॥ २७९ ॥ प्रथम पंक्तिमे १४ ईश और सोलह पादाका २४ भद्र बनाते ॥ २८० ॥ फिर दूसरे पंक्तिम १२ शिव और १८ पादाकं १२ वापी बनाना चाहिए । पहलोकी तरह १८ पादोंका भद्र बनावे । यह रामतोभद्र १०८ रुपका है । २८१ ॥ २८२ ॥ अथवा ६ मुद्रा, ६४ ईश और १३ पादसे छै वापिकायें बनावे और १६ पादका भद्र बनावे ॥ २८३ ॥ दूसरी पंक्तिम पांच मुद्रा बनावे और लिंग तथा छ ही वापी बनावे। आगे आठवी पंक्तिमे लेकर चार, पांच, दो, एक, इन संख्याओंके मुद्राय बनावे। फिर छ, दो, दो, दो, दो, एक इस क्रमसे शिवकी रचना करे इनमें छः पदका, बारह पदका, दो पादका बीस पादका सोलह पादका, चार पादका क्रमशः प्रत्येक पंक्ति यमे भद्र बनेंगें । ऐसा विद्वानों को जानना चाहिए ।२८४-२८६॥